शिक्षा शास्त्र

शिक्षा के दार्शनिक परिप्रेक्ष्य

    शिक्षा के सामाजिक परिप्रेक्ष्य

      शिक्षा के मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य

        शैक्षिक नेतृत्व एवं प्रबंधन

          शैक्षिक निर्देशन एवं परामर्श

            पाठ्यक्रम विकास एवं आकलन

              भारतीय शिक्षा प्रणाली का विकास

                वैदिककालीन शिक्षा, उच्च शिक्षा के उद्देश्य,

                उच्च शिक्षा के उद्देश्य

                उच्च शिक्षा के उद्देश्य – भारत में विभिन्न स्तरों की शिक्षा के उद्देश्य निश्चित करने का कार्य सर्वप्रथम वुड के घोषणा पत्र में किया गया।इसके बाद भारत में जो भी शिक्षा आयोग गठित किए गए सभी ने विभिन्न स्तरों की शिक्षा के उद्देश्य स्पष्ट करने का कार्य जारी रखा। 15 अगस्त 1947 को देश की […]

                सर्व शिक्षा अभियान

                सर्व शिक्षा अभियान

                सर्व शिक्षा अभियान केंद्र सरकार द्वारा चलाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण योजना है। इस योजना का उद्देश्य भारत भर में सभी को जहां तक संभव हो शिक्षित करना है। अक्टूबर 1998 में राज्य सरकारों को शिक्षा मंत्रियों की एक कॉन्फ्रेंस यह तय करने के लिए केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री ने दिल्ली में बुलाई थी कि […]

                शैक्षिक पर्यवेक्षण

                शैक्षिक पर्यवेक्षण शैक्षिक प्रशासन का महत्वपूर्ण अंग है। जिसके द्वारा व्यक्तियों को किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्रियाशील रखा जाता है। शैक्षिक पर्यवेक्षण का कार्य उस समय प्रारंभ होता है जब शिक्षक कक्षा में होता है। शैक्षिक पर्यवेक्षण का संबंध मुख्यतः मानवीय तत्व से होता है। यह विद्यालय में मुख्यता विद्यालय के प्रधानाचार्य द्वारा […]

                समूह परामर्श

                समूह परामर्श – आधुनिक जीवन में समूह का अधिक महत्व है। व्यक्ति अपने जीवन काल में किसी ना किसी प्रकार के समूह के संपर्क में रहता है। मनोवैज्ञानिक कैंप ने “सामूहिक परामर्श के आधार” नामक पुस्तक में लिखा है – व्यक्तियों को जीवन के सभी क्षेत्रों में अर्थ पूर्ण संबंधों की आवश्यकता होती है। इन्हीं […]

                शिक्षा के प्रकार, राष्ट्र गौरव, आदर्श शैक्षिक पाठ्यक्रम

                शिक्षा के प्रकार

                शिक्षा के प्रकार (रूप) अनेक हैं। शिक्षा, समाज एक पीढ़ी द्वारा अपने से निचली पीढ़ी को अपने ज्ञान के हस्तांतरण का प्रयास है। इस विचार से शिक्षा एक संस्था के रूप में काम करती है, जो व्यक्ति विशेष को समाज से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा समाज की संस्कृति की निरंतरता को बनाए […]

                भारतीय समाज का बालक पर प्रभाव

                भारतीय समाज का बालक पर प्रभाव – बालक जब समाज में जन्म लेता है तो वह एक असहाय प्राणी होता है। बालक का विकास समाज की प्रकृति और स्वरूप पर निर्भर करता है। बालक का विकास उसकी शिक्षा और समाज द्वारा ही होता है। इसलिए समाज की प्रकृति व स्वरूप बालक की शिक्षा व विकास […]

                मन्द बुद्धि बालक, बाल्यावस्था में मानसिक विकास, मानव का शारीरिक विकास, शैशवावस्था में मानसिक विकास

                मानव का शारीरिक विकास

                मानव का शारीरिक विकास मुख्य रूप से शैशवावस्था तथा बाल्यावस्था में ही हो जाता है। मानव विकास की मुख्य रूप से तीन अवस्थाएं हैं शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था। शारीरिक विकास की गति स्थिर नहीं होती, वरन् पृथक् आयु अंतराल में भिन्न होती है। मानव का शारीरिक विकास शारीरिक विकास से तात्पर्य, सामान्य शारीरिक रचना, शरीर की […]

                भारत में नव सामाजिक व्यवस्था

                भारत में नव सामाजिक व्यवस्था

                भारत में नव सामाजिक व्यवस्था – नवीन भारत में देश की सामाजिक व्यवस्था मुख्य रूप से राजतंत्र, अर्थतंत्र और शिक्षा व सामाजिक व्यवस्थाओं पर आधारित है। परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि इसके इस स्वरूप निर्धारण में धर्म तथा अन्य सामाजिक व्यवस्थाओं का योगदान नहीं है। भारत में नव सामाजिक व्यवस्था भारत विभिन्न संस्कृतियों […]

                बाल्यावस्था, अधिगम

                अधिगम

                अधिगम विकास का आधार है। ज्ञान प्राप्त करके व्यक्ति अनेक अनुभवों से परिचित होता है। इन अनुभवों के द्वारा उसके विचारों, संवेगो, कार्यों आदि में किसी न किसी प्रकार का परिवर्तन अवश्य होता है। यह परिवर्तन ही व्यक्ति के विकास की प्रक्रिया को संचालित करता है। व्यक्ति के विकास को दिशा एवं गति देने वाले […]

                व्याख्यान विधि के गुण, सेमिनार

                सेमिनार के 4 प्रकार उपयोगिता सेमिनार के उद्देश्य

                सेमिनार उच्च अध्यापन की एक अनुदेशनात्मक प्रविधि है जिसके अन्तर्गत किसी विषय पर एक पत्र प्रस्तुत किया जाता है जिस पर बाद में सामूहिक विचार-विमर्श किया जाता है ताकि विषय के जटिल पहलुओं को स्पष्ट किया जा सके। सेमिनार समूह के लिये एक स्थिति उत्पन्न करता है जहाँ पर लोगों में आपस में उस विषय […]

                रागदरबारी उपन्यास व्याख्या

                कहानी शिक्षण प्रकार कहानियों का चयन

                कहानी शिक्षण – कहानी सुनने और कहने की शिक्षा शिशु कक्षा से प्रारम्भ करने और कहानी लेखन की शिक्षा कक्षा 3 से प्रारम्भ करने की बात हम तत्सम्बन्धी अध्यायों में स्पष्ट कर चुके हैं। कहानियों में बच्चों की स्वाभाविक रुचि होती है इसलिए लिखित भाषा की शिक्षा का प्रारम्भ कहानी शिक्षण से ही करना चाहिए। […]

                शिक्षण नीतियाँ

                शिक्षण नीतियाँ परिभाषाएँ 9 विशेषताएँ वर्गीकरण

                शिक्षण नीतियाँ दो शब्दों से मिलकर बना है-शिक्षण + नीतियाँ। शिक्षण एक अन्तक्रियात्मक प्रक्रिया है जो कक्षागत परिस्थितियों में वांछित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए छात्र और शिक्षकों के द्वारा सम्पन्न की जाती है। नीतियाँ योजना, नीति, चतुराई तथा कौशल की ओर संकेत करती हैं। कौलिन इंगलिश जैम शब्दकोष के अनुसार नीति का अर्थ […]

                संवेगात्मक बालक

                वंचित बालक परिभाषा लक्षण व विशेषताएँ

                कुछ बालक ऐसे होते हैं जो सुविधाओं के क्षेत्र में सामान्य बालक से कम होते हैं। वंचित बालक कहलाते हैं। ये विभिन्न प्रकार की सुविधाओं; जैसे—आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक से वंचित रह जाते हैं। यथा भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र, वर्ण, लिंग के कारण अपवंचित रह जाते हैं। इन सुविधाओं के अभाव में उनका विकास सामान्य बालकों […]

                प्रतिभाशाली बालक

                विज्ञान शिक्षक की 13 विशेषताएँ

                विज्ञान शिक्षक समाज का एक महत्त्वपूर्ण एवं सम्भ्रांत व्यक्ति होता है। वह सामाजिक अभियन्ता है। समाज में विभिन्न प्रकार के परिवर्तनों में उसका योगदान होता है। वह अपनी शिक्षा, योग्यता, क्षमता और चरित्र की शुद्धता से बालक में विशिष्ट सामाजिक परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। समाज की रूढ़िवादी परम्पराओं को शिक्षा द्वारा दूर करने […]

                वुड का घोषणा पत्र, संप्रेषण,

                वुड का घोषणा पत्र 1854 – मुख्य बिंदु व प्रभाव

                वुड का घोषणा पत्र – 19 जुलाई 1854 को ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से एक नया शिक्षा संबंधी घोषणा पत्र आया। इस घोषणा पत्र को वुड का घोषणा पत्र कहा गया। इस घोषणा पत्र का मुख्य कारण भारतियों की शिक्षा सम्बंधी मांग थी। 1853 में कंपनी को ब्रिटिश सरकार की ओर से एक आज्ञा […]

                old lady chatting

                प्रौढ़ शिक्षा की समस्याएं – 3 Problems of Adult Education

                प्रौढ़ शिक्षा की समस्याएं – प्रौढ़ शिक्षा निर्विवाद रूप से एक राष्ट्रीय आवश्यकता है। विकास का संबंध केवल कल कारखानों, बांधों और सड़कों से नहीं, इसका संबंध बुनियादी तौर पर लोगों के जीवन से है। इसका लक्ष्य है कि लोगों की भौतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उन्नति। मानवीय पक्ष तथा उससे जुड़ी हुई बातें सबसे महत्वपूर्ण […]

                वैदिककालीन शिक्षा, उच्च शिक्षा के उद्देश्य,

                विश्वविद्यालय शिक्षा प्रशासन आंतरिक व्यवस्था व संस्थाएं

                विश्वविद्यालय शिक्षा प्रशासन – विश्वविद्यालय शिक्षा से हमारा अभिप्राय केवल उच्च शिक्षा से नहीं है, जो विश्वविद्यालयों के द्वारा ही प्रदान की जाती है। वरन् उसका अर्थ उच्च शिक्षा से है। जो विश्वविद्यालय से संबद्ध कालेजों में भी प्रदान की जाती है। विश्वविद्यालय एक स्वायत्त प्राप्त संस्था है, जिसका प्रबंध स्वयं उसी के द्वारा किया […]

                Career After 12th, समूह गतिशीलता

                समूह गतिशीलता परिभाषा व विशेषताएँ – 8 Important Facts

                समूह गतिशीलता डायनॉमिक्स भौतिक शास्त्र से लिया गया है। डायनॉमिक्स ग्रीक भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है शक्ति। इस प्रकार समूह गत्यात्मकता समूह में छिपी हुई शक्ति के अध्ययन से संबंधित विषय है। समूह गति विज्ञान उन विषयों का ज्ञान देता है जो एक समूह में सक्रिय होती हैं। उन व्यक्तियों का अध्ययन […]

                शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य, उदारवादी व उपयोगितावादी शिक्षा

                शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य पक्ष में 6 तथा विपक्ष में 8 तर्क

                शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य – सामाजिक उद्देश्य के अनुसार समाज या राज्य का स्थान व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है। बैगेल और डीवी ने सामाजिक उद्देश्य का तात्पर्य सामाजिक दक्षता से लगाया है लेकिन अपने अतिवादी स्वरूप में या उद्देश्य व्यक्ति को समाज की तुलना में निचली श्रेणी का मानता है तथा व्यक्ति के सारे अधिकारों […]

                मौलिक अधिकार

                6 मौलिक अधिकार – समानता स्वतंत्रता शोषण के विरूद्ध अधिकार

                मौलिक अधिकार का सामाजिक जीवन पद्धति में व्यक्ति और राज्य के पारस्परिक संबंधों में महत्वपूर्ण स्थान है। शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति को राज्य के बनाए गए कानूनों और नियमों के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। किंतु साथ ही राज्य की शक्तियों और अधिकारों को सीमित करना भी आवश्यक है। […]

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