लेखक: rohitsharma991

प्रचार अर्थ परिभाषा प्रचार के Top 5 साधन

प्रचार अर्थ परिभाषा प्रचार के Top 5 साधन

प्रचार एक मनोवैज्ञानिक ढंग है जिसके माध्यम से व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूह को एक पूर्व निर्धारित दिशा की ओर मोड़ने का प्रयास किया जाता है। आज चाहे कोई भी क्षेत्र हो। सर्वत्र प्रचार का महत्व है। प्रचार का कार्य क्षेत्र राजनीति ही नहीं रहा वरन् इसका प्रसार धार्मिक, आर्थिक सभी क्षेत्रों में हो गया … पढ़ना जारी रखें प्रचार अर्थ परिभाषा प्रचार के Top 5 साधन

जनमत अर्थ परिभाषा Top 7 विशेषताएं

जनमत अर्थ परिभाषा Top 7 विशेषताएं

आधुनिक युग में जनमत सामाजिक नियंत्रण का महत्वपूर्ण साधन है। आदिम समाजों में यह सामाजिक नियंत्रण का प्रमुख साधन है। ग्रामीण क्षेत्रों में जन मत ही सर्वोपरि होता है, इसकी अवहेलना करना प्रायः ग्रामीणों के लिए असंभव होता है। गांवों में इसका प्रतिनिधित्व ग्राम पंचायतें करती हैं। ग्रामीणों में पंच के प्रति अगाध श्रद्धा होती … पढ़ना जारी रखें जनमत अर्थ परिभाषा Top 7 विशेषताएं

व्यवस्थापन अर्थ परिभाषा पद्धतियां व्यवस्थापन के परिणाम

व्यवस्थापन अर्थ परिभाषा पद्धतियां व्यवस्थापन के परिणाम

व्यवस्थापन संघर्षकारी समूहों में सन्तुलन कायम करने की एक व्यवस्था भी है। इसमें दोनों पक्षों में सहिष्णुता पैदा हो जाती है और वे अपनी सच्ची और न्यायपूर्ण मांगों का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं। यह संघर्षकारियों को सहयोग एवं निर्माण की ओर अग्रसर करता है तथा उन्हें पूर्ण विनाश से भी रोकता है। प्रजातंत्र में कई … पढ़ना जारी रखें व्यवस्थापन अर्थ परिभाषा पद्धतियां व्यवस्थापन के परिणाम

प्रतिस्पर्धा क्या है? प्रतिस्पर्धा के परिणाम एवं महत्व

प्रतिस्पर्धा क्या है? प्रतिस्पर्धा के परिणाम एवं महत्व

प्रतिस्पर्धा या प्रतियोगिता को एक असहगामी सामाजिक प्रक्रिया माना गया है। इसका कारण यह है कि प्रतिस्पर्द्धियों में कम या अधिक मात्रा में एक-दूसरे के प्रति कुछ ईर्ष्या-द्वेष के भाव पाये जाते हैं। प्रत्येक दूसरों को पीछे रखकर स्वयं आगे बढ़ना चाहता है। अपने उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है। अत्यधिक या अनियन्त्रित प्रतिस्पर्धा समाज … पढ़ना जारी रखें प्रतिस्पर्धा क्या है? प्रतिस्पर्धा के परिणाम एवं महत्व

व्यावसायिक पर्यावरण परिभाषा 6 विशेषताएं व भारत में महत्व

व्यावसायिक पर्यावरण परिभाषा 6 विशेषताएं व भारत में महत्व

व्यावसायिक पर्यावरण दो शब्दों अर्थात व्यवसाय तथा पर्यावरण के योग से बना है। अतः इसे विधिवत समझने के लिए दोनों शब्दों के समुचित आशय को समझना आवश्यक है। 1. व्यवसाय अर्थ अंग्रेजी भाषा का शब्द 'बिजनेस' (Business) 'बिजी' (busy) शब्द से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है 'व्यस्त' तथा 'बिजनेस (business) का शाब्दिक अर्थ है … पढ़ना जारी रखें व्यावसायिक पर्यावरण परिभाषा 6 विशेषताएं व भारत में महत्व

औद्योगीकरण परिभाषा 7 विशेषताएं समाज पर प्रभाव

औद्योगीकरण परिभाषा 7 विशेषताएं समाज पर प्रभाव

औद्योगीकरण शब्द का प्रयोग प्रायः दो अर्थों में किया जाता है प्रथम संकुचित अर्थ में तथा दूसरा व्यापक अर्थ में संकुचित अर्थ में औद्योगीकरण का अर्थ है निर्माता उद्योगों की स्थापना एवं विकास। इस अर्थ में औद्योगीकरण को आर्थिक विकास की व्यापक प्रक्रिया का एक अंग माना जाता है जिसका उद्देश्य उत्पादन के साधनों की … पढ़ना जारी रखें औद्योगीकरण परिभाषा 7 विशेषताएं समाज पर प्रभाव

नगरीकरण परिभाषा 4 विशेषताएं नगरीकरण का समाज पर प्रभाव

नगरीकरण परिभाषा 4 विशेषताएं नगरीकरण का समाज पर प्रभाव

नगरीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें गाँव नगरों में परिवर्तित होते हैं। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप किसी भी देश की जनसंख्या में वृद्धि होने लगती है। नगरीकरण नगरीय बनने की एक प्रक्रिया है। इसका तात्पर्य व्यक्तियों अथवा सामाजिक प्रक्रियाओं को नगरीय क्षेत्रों के अनुरूप बनाना है। नगरीकरण नगरीकरण का आशय नगरीय क्षेत्रों की जनसंख्या नगरीय प्रक्रियाओं … पढ़ना जारी रखें नगरीकरण परिभाषा 4 विशेषताएं नगरीकरण का समाज पर प्रभाव

आधुनिकीकरण अर्थ भारत में आधुनिकीकरण के कारण परिणाम व हानियाँ

आधुनिकीकरण अर्थ भारत में आधुनिकीकरण के कारण परिणाम व हानियाँ

आधुनिकीकरण की प्रक्रिया किसी एक ही दिशा या क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन को प्रकट नहीं करती वरन यह एक बहु-दिशा वाली प्रक्रिया है। साथ ही यह किसी भी प्रकार के मूल्यों से बंधी हुई नहीं है, परन्तु कभी-कभी इसका अर्थ अच्छाई और इच्छित परिवर्तन से लिया जाता है। पारम्परिक समाजों में होने वाले बदलावों … पढ़ना जारी रखें आधुनिकीकरण अर्थ भारत में आधुनिकीकरण के कारण परिणाम व हानियाँ

संस्कृतिकरण अर्थ 11 विशेषताएं संस्कृतिकरण के 7 स्रोत New

संस्कृतिकरण अर्थ 11 विशेषताएं संस्कृतिकरण के 7 स्रोत New

संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई निम्न हिन्दू जाति या कोई जनजाति अथवा कोई अन्य समूह किसी उच्च और प्रायः द्विज जाति की दिशा में अपने रीति-रिवाज कर्मकाण्ड, विचारधारा और पद्धति को बदलता है। सामान्यतः ऐसे परिवर्तनों के बाद निम्न जाति, जातीय संस्तरण की प्रणाली में स्थानीय समुदाय में उसे परम्परागत रूप से जो … पढ़ना जारी रखें संस्कृतिकरण अर्थ 11 विशेषताएं संस्कृतिकरण के 7 स्रोत New

सामाजिक नियंत्रण परिभाषा विशेषताएं उद्देश्य धर्म में भूमिका

सामाजिक नियंत्रण परिभाषा विशेषताएं उद्देश्य धर्म में भूमिका

सामाजिक नियंत्रण का अर्थ उस ढंग से है जिससे सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था में एकता व स्थायित्व बना रहता है। अर्थात् वह किस प्रकार परिवर्तनशील संतुलन के रूप में क्रियाशील होती है। प्लेटो व अरस्तू से लेकर आधुनिक समय तक के सामाजिक विचारकों ने यह स्वीकार किया है कि समाज के अस्तित्व के लिये थोड़ी बहुत … पढ़ना जारी रखें सामाजिक नियंत्रण परिभाषा विशेषताएं उद्देश्य धर्म में भूमिका

सामाजिक परिवर्तन के प्राकृतिक कारक

सामाजिक परिवर्तन के प्राकृतिक कारक

सामाजिक परिवर्तन के प्राकृतिक कारक - परिवर्तन प्रकृति का नियम है प्रकृति आवश्यकतानुसार स्वयं परिवर्तन करती रहती है। प्राचीन ग्रीक दार्शनिक हेराक्लीट्स के अनुसार, एक व्यक्ति के लिए एक ही नदी में दो बार पैर रखना असम्भव है इसके दो कारण है। पहला दूसरी बार में नदी पहले जैसे नहीं रहेगी नदी के साथ-साथ वह … पढ़ना जारी रखें सामाजिक परिवर्तन के प्राकृतिक कारक

सामाजिक परिवर्तन के जनसंख्यात्मक कारक

सामाजिक परिवर्तन के जनसंख्यात्मक कारक

सामाजिक परिवर्तन के जनसंख्यात्मक कारक - सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में जनसंख्यात्मक कारकों का भी अत्यधिक महत्व है। जनसंख्यात्मक कारक भी सामाजिक परिवर्तन के कारण होते हैं। अन्य शब्दों में जनसंख्या का आकार और घनत्व में परिवर्तन जन्म दर और मृत्यु दर के घटने-बढ़ने से कई परिवर्तन होते हैं। उदाहरण के लिए भारत में 1901 … पढ़ना जारी रखें सामाजिक परिवर्तन के जनसंख्यात्मक कारक

सामाजिक परिवर्तन के कारक

सामाजिक परिवर्तन के कारक

सामाजिक परिवर्तन के कारक - सामाजिक जीवन के सम्बन्धों में परिवर्तन अनेक कारणों से हो सकता है और होता भी है। ये कारण प्राकृतिक या भौगोलिक हो सकता है, जनसंख्यात्मक हो सकते हैं, प्राणिशास्त्रीय भी हो सकते हैं या आर्थिक प्रौद्योगिकीय या सांस्कृतिक भी हो सकते हैं। परन्तु इस सम्बन्ध में स्मरणीय है कि सामाजिक … पढ़ना जारी रखें सामाजिक परिवर्तन के कारक

भुगतान संतुलन की 5 विशेषताएं असंतुलन के कारण ठीक करने के उपाय

भुगतान संतुलन की 5 विशेषताएं असंतुलन के कारण ठीक करने के उपाय

भुगतान संतुलन अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के आर्थिक लेन-देन या संव्यवहारों का लेखांकन है। यह विदेशों से प्राप्तियों व भुगतानों का विवरण-पत्र होता है। भुगतान संतुलन एक विवरण है जो एक वर्ष की अवधि में एक देश के कुल आयातों एवं निर्यातों के मूल्यों को बताता है। यह किसी देश का विश्व के अन्य देशों में होने … पढ़ना जारी रखें भुगतान संतुलन की 5 विशेषताएं असंतुलन के कारण ठीक करने के उपाय

FDI FPI में अन्तर

FDI FPI में अन्तर

FDI FPI में अन्तर क्या है? अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रवाह विकासशील और विकसित देशों के पूँजी बाजारों में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रवाह के दो महत्वपूर्ण रूप हैं- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI)विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश किसी भी देश के आर्थिक विकास में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा … पढ़ना जारी रखें FDI FPI में अन्तर

भारत का विदेशी व्यापार

भारत का विदेशी व्यापार

भारत का विदेशी व्यापार - भारत प्राचीन काल से ही विभिन्न देशों से व्यापार करता आ रहा है। उस समय भारतवासी व्यापार करने के लिए अन्य देशों में जाया करते थे। आगे चलकर यूरोपवासियों को भारत के साथ व्यापार करने की लालसा उत्पन्न हुई जिसके कारण पुर्तगाल, हालैण्ड, फ्रांस व इंग्लैण्ड के लोगों को भारत … पढ़ना जारी रखें भारत का विदेशी व्यापार

भारत में आर्थिक असमानता के प्रभाव 9 कारण व दूर करने के उपाय

भारत में आर्थिक असमानता के प्रभाव 9 कारण व दूर करने के उपाय

आर्थिक असमानता अथवा आय तथा सम्पत्ति के असमान वितरण से अभिप्राय अर्थव्यवस्था उन परिस्थितियों से है, जिसमें कि राष्ट्र के कुछ लोगों की आय, राष्ट्र की औसत आय से बहुत अधिक तथा अधिकाश लोगों की आय, राष्ट्र की औसत आय से बहुत कम होती है। आय तथा सम्पत्ति के असमान द्वितरण की समस्या का सम्बन्ध … पढ़ना जारी रखें भारत में आर्थिक असमानता के प्रभाव 9 कारण व दूर करने के उपाय

समावेशी विकास के तत्व आवश्यकता महत्व चुनौतियां

समावेशी विकास के तत्व आवश्यकता महत्व चुनौतियां

समावेशी विकास एक ऐसी अवधारणा है, जिसमें समाज के सभी लोगों को समान अवसरों के साथ विकास का लाभ भी समान रूप से प्राप्त हो, अर्थात सभी वर्ग, क्षेत्र, प्रान्त के व्यक्तियों का बिना भेदभाव, एक समान विकास के अवसरों के साथ-साथ होने वाले देश के विकास को समावेशी विकास कहा जाता है या हम … पढ़ना जारी रखें समावेशी विकास के तत्व आवश्यकता महत्व चुनौतियां

भारत में शिक्षित बेरोजगारी के कारण व दूर करने के 15 सुझाव

भारत में शिक्षित बेरोजगारी के कारण व दूर करने के 15 सुझाव

शिक्षित बेरोजगारी - शिक्षा की सुविधायें तो बढ़ी हैं पर उपलब्ध नौकरियों की संख्या में उतनी अधिक वृद्धि नहीं हुई है। अब शिक्षित व्यक्तियों में यह विश्वास अधिक प्रचलित है कि चयन समिति के अधिकांश सदस्य भ्रष्ट और घूसखोर होते हैं, नियुक्तियों जातीयता या प्रान्तीयता के आधार पर की जाती है तथा अच्छी नौकरियाँ केवल … पढ़ना जारी रखें भारत में शिक्षित बेरोजगारी के कारण व दूर करने के 15 सुझाव

बेरोजगारी परिभाषा प्रकार भारत में बेरोजगारी के 7 कारण व उपाय

बेरोजगारी परिभाषा प्रकार भारत में बेरोजगारी के 7 कारण व उपाय

बेरोजगारी (Unemployment) - जब कोई व्यक्ति किसी भी कार्य को करने की पूर्ण क्षमता व योग्यता रखता हो तथा कार्य करने का इच्छुक भी हो, किन्तु उसे कोई कार्य न मिले तो यह बेरोजगारी कहलाती है। भारतीय अर्थव्यस्था में बेरोजगारी की भीषण समस्या व्याप्त है क्योंकि भारत की जनसंख्या जिस अनुपात में बढ़ रही है, … पढ़ना जारी रखें बेरोजगारी परिभाषा प्रकार भारत में बेरोजगारी के 7 कारण व उपाय

उदारवादी विचारधाराएं सफलताएं योगदान

उदारवादी विचारधाराएं सफलताएं योगदान

1885 से लेकर 1905 तक भारतीय आन्दोलन का नेतृत्व उदारवादी राष्ट्रवादियों के हाथों में था। जिन्होंने कांग्रेस के माध्यम से कार्य करते हुए सरकार के समक्ष अपनी माँगे रखी। बहुत से इतिहासकारों की दृष्टि में उदारवादी युग का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में कोई विशेष महत्व नहीं है। कारण यह है कि उदारवादी अपने … पढ़ना जारी रखें उदारवादी विचारधाराएं सफलताएं योगदान

भारतीय राष्ट्रवाद उद्भव विकास के कारण

भारतीय राष्ट्रवाद उद्भव विकास के कारण

भारतीय राष्ट्रवाद - उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीय राष्ट्रवाद का उदय हुआ जिसने आगे चल कर भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को जन्म दिया और भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया। राष्ट्रवाद ऐसा नहीं है कि भारतवासियों के मन में स्वतः ही और अचानक ही घर कर गया हो। यह धीरे धीरे भारतवासियों के हृदय … पढ़ना जारी रखें भारतीय राष्ट्रवाद उद्भव विकास के कारण

क्षेत्रीय असमानता के कारण

क्षेत्रीय असमानता के कारण

क्षेत्रीय असमानता के कारण - भारत में असमानता अर्थात आय तथा सम्पत्ति में पाई जाने वाली असमानता का मुख्य कारण जमींदारी प्रथा तथा भूमि के स्वामित्व में पाई जाने वाली असमानता है। स्वतन्त्रता से पहले देश में जमींदारी प्रथा पाई जाती थी। इसके फलस्वरूप भू-स्वामित्व में सारी असमानता पाई जाती थी। क्षेत्रीय असमानता के कारण … पढ़ना जारी रखें क्षेत्रीय असमानता के कारण

भारत में असमानता के कारण

भारत में असमानता के कारण

भारत में असमानता के कारण निम्नलिखित हैं- भूमि के स्वामित्व में असमानताशहरी क्षेत्रों में सम्पत्ति का निजी स्वामित्वविरासत का कानूनव्यावसायिक प्रशिक्षण की असमानतामहंगाईवित्तीय संस्थाओं की ऋण नीतिअप्रत्यक्ष करों का अधिक बोझभ्रष्टाचारवेरोजगारीकर चोरी 1. भूमि के स्वामित्व में असमानता भारत में असमानता अर्थात आय तथा सम्पत्ति में पायी जाने वाली असमानता का मुख्य कारण जमीदारी प्रथा … पढ़ना जारी रखें भारत में असमानता के कारण

जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास 7 फायदे 7 नुकसान

जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास 7 फायदे 7 नुकसान

जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास - मानवीय शक्ति का आर्थिक विकास से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध रहा है, जिसको सभी ने स्वीकार किया है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि तकनीकी यंत्र, उपकरण, संपत्ति एवं पूँजी आर्थिक विकास में सहायता प्रदान करते हैं किन्तु उचित मानवीय साधनों के अभाव के कारण यह अपना पूर्ण … पढ़ना जारी रखें जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास 7 फायदे 7 नुकसान

कहानी शिक्षण प्रकार कहानियों का चयन

कहानी शिक्षण प्रकार कहानियों का चयन

कहानी शिक्षण - कहानी सुनने और कहने की शिक्षा शिशु कक्षा से प्रारम्भ करने और कहानी लेखन की शिक्षा कक्षा 3 से प्रारम्भ करने की बात हम तत्सम्बन्धी अध्यायों में स्पष्ट कर चुके हैं। कहानियों में बच्चों की स्वाभाविक रुचि होती है इसलिए लिखित भाषा की शिक्षा का प्रारम्भ कहानी शिक्षण से ही करना चाहिए। … पढ़ना जारी रखें कहानी शिक्षण प्रकार कहानियों का चयन

कहानी के तत्व – कथावस्तु पात्र कथाकथन भाषा शैली उद्देश्य

कहानी के तत्व – कथावस्तु पात्र कथाकथन भाषा शैली उद्देश्य

कहानी के तत्व - कहानी किसी भी प्रकार की हो, उसका कुछ कथानक अवश्य होता है, उसमें कुछ पात्र अवश्य होते इन पात्रों का अपना स्वभाव और चरित्र अवश्य होता है और वे आपस में कुछ वार्तालाप भी करते हैं। यदि कहानी उचित भाषा-शैली में न लिखी जाए तो उसका प्रभावहीन होना निश्चित है। फिर … पढ़ना जारी रखें कहानी के तत्व – कथावस्तु पात्र कथाकथन भाषा शैली उद्देश्य

नाटक शिक्षण के लक्ष्य नाटक शिक्षण की 5 प्रणालियां

नाटक शिक्षण के लक्ष्य नाटक शिक्षण की 5 प्रणालियां

नाटक शिक्षण - अनुकरण (अभिनय) मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। प्रारम्भ से ही बच्चे दूसरों का अनुकरण करते हैं। लकड़ी की डण्डी, बेंत अथवा बाँस आदि को जब बच्चे दोनों पैरों के बीच रखकर उसे घोड़ा मानकर, तिक-तिक करते हैं तो कितने प्यारे लगते हैं। कभी-कभी वे अपने माता-पिता और भाई-बहन आदि की भूमिका भी … पढ़ना जारी रखें नाटक शिक्षण के लक्ष्य नाटक शिक्षण की 5 प्रणालियां

नाटक के तत्व – कथावस्तु पात्र संवाद भाषा शैली उद्देश्य अभिनय

नाटक के तत्व – कथावस्तु पात्र संवाद भाषा शैली उद्देश्य अभिनय

नाटक के तत्व - नाटक साहित्य की प्राचीनतम विधा है। नाटक का अभिनय रंगमंच पर होता है, उसे देखने से दर्शक के हृदय में यथा भाव जाग्रत होते हैं, इसलिए इसे संस्कृत में दृश्य काव्य की संज्ञा दी गई है। परन्तु यहाँ हमें नाटक को साहित्य की विधा के रूप में देखना है न कि … पढ़ना जारी रखें नाटक के तत्व – कथावस्तु पात्र संवाद भाषा शैली उद्देश्य अभिनय

मौखिक पठन प्रकार महत्त्व तत्व तथा गद्य व पद्य में मौखिक पठन

मौखिक पठन प्रकार महत्त्व तत्व तथा गद्य व पद्य में मौखिक पठन

लिखित भाषा का मुख से उच्चारण करते हुए पढ़ने और पढ़कर उसका अर्थ समझने की क्रिया को मौखिक पठन कहते हैं। अर्थ बोध एवं भावानुभूति मौखिक पठन के आवश्यक तत्त्व हैं, यह बात दूसरी है कि पाठक को यह अर्थ बोध एवं भावानुभूति किस सीमा तक होते हैं। यह तो पठनकर्ता के ज्ञान एवं कौशल … पढ़ना जारी रखें मौखिक पठन प्रकार महत्त्व तत्व तथा गद्य व पद्य में मौखिक पठन