साकेत महाकाव्य मैथिलीशरण गुप्त की रचना है। भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों ही दृष्टि से साकेत की कथावस्तु गरिमा संपन्न है। साकेत अष्टम सर्ग की कथावस्तु का निर्माण मानवता की श्रेष्ठता का प्रतिस्थापन करने के लिए किया गया है। गुप्तजी ने इसमें संपूर्ण कथा को ना पकड़कर कुछ मार्मिक एवं हृदय स्पर्शी प्रसंगों को ही पकड़ा है।
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साकेत अष्टम सर्ग
साकेत महाकाव्य में कुल 12 सर्ग हैं। जिनमे अष्टम एवं नवम सर्ग का विशेष महत्व है।
अष्टम सर्ग में चित्रकूट में घटी घटनाओं का वर्णन किया है। अष्टम सर्ग में वर्णित घटना केवल इतिवृत्त नहीं है, अपितु घटनाओं का संयोजन युग की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति करने के उद्देश्य से इस प्रकार किया है कि वह अपनी आधुनिक चेतना के कारण प्रासंगिक हो उठा है। कवि अष्टम सर्ग का आरंभ बड़े ही आकर्षक ढंग से करता है।
सीता जी चित्रकूट में अपनी पर्णकुटी के आसपास के पेड़ पौधों का सिंचन कर रही है साथ ही एक गीत गुनगुना रही है। पति के सानिध्य में रहकर जंगल में भी उन्हें राज भवन का सुख प्राप्त हो रहा है। श्री रामचंद्र सीता का विनोद, दांपत्य जीवन की मधुरता, स्नेह, त्याग की प्रेरणा देते हैं। कवि ने साकेत अष्टम सर्ग में श्री राम और सीता के संवाद में अपने युग चेतना को वर्णित किया है।

श्री राम अपने वनागमन का उद्देश्य वन में द्वित वानर के सद्रश्य वन में रह रहे लोगों को आर्य तत्व प्रदान करना बताते हैं। धरती को स्वर्ग बनाने मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करने के लिए प्रभु श्री राम का अवतार हुआ है। इस प्रकार श्री राम सीता संवाद महत्वपूर्ण है।
इसके अतिरिक्त साकेत अष्टम सर्ग में,
- वन में जोर का कोलाहल सुन सीता का घबराना
- लक्ष्मण का आक्रोश
- भरत के प्रति श्री राम का विश्वास
- महाराज दशरथ का तर्पण पुणे सभा का बैठना
- कैकई का अनुताप
- श्री राम भरत संवाद
- जाबलि मुनि द्वारा श्री राम की परीक्षा लेना
- भरत द्वारा श्री राम से उनकी चरण पादुका मांगना
- लक्ष्मण और उर्मिला का संवाद जैसी
सच्ची घटनाओं का बड़ा ही मर्मस्पर्शी वर्णन अष्टम सर्ग में हुआ है।
साकेत के संपूर्ण प्रसंग स्वतंत्र होते हुए भी कवि की कल्पना पटुता के कारण परस्पर एवं एक अंवित दूसरे से रखते दिखाई पड़ते हैं। कथा की प्रवाह मानता में व्यवधान पड़ता नहीं दिखाई पड़ता महाकाव्य में घटनाओं का प्रवाह अविकल एवं अवनी होना चाहिए जो साकेत कृति में दिखायी देता है।
साकेत अष्टम सर्ग की सारी घटनाएं संवाद द्वारा आयोजित होती है। स्वागत कथन तथा संवाद के द्वारा कथा आगे बढ़ती है। राम सीता के प्रणय परिहास में संवाद चुटीले हो गए हैं। चित्रकूट में भरत को सेना सहित आते देखकर लक्ष्मण क्रोध से भर उठते हैं। मरने मारने पर आ जाते हैं सीता भी भावी ग्रह कला की आशंका से घबरा उठती है।
मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ
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