कुरुक्षेत्र छठा सर्ग सारांश

कुरुक्षेत्र छठा सर्ग सारांश

कुरुक्षेत्र छठा सर्ग – ‘कुरुक्षेत्र’ एक प्रबंध काव्य है। इसका प्रणयन अहिंसा और हिंसा के बीच अंतर्द्वंद के फल स्वरुप हुआ। कुरुक्षेत्र की ‘कथावस्तु’ का आधार महाभारत के युद्ध की घटना है, जिसमें वर्तमान युग की ज्वलंत युद्ध समस्या का उल्लंघन है। ‘दिनकर’ के कुरुक्षेत्र प्रबंध काव्य की कथावस्तु सात सर्गो में विभक्त है। कुरुक्षेत्र छठा सर्ग के अंतर्गत आधुनिक युग की समस्याओं, मानवीय रचनात्मक प्रवृत्तियों तथा कोरे मानसिक उत्थान की निंदा की गई है। कवि भगवान से धर्म, दया, शांति आदि की स्थापना से संबंधित प्रश्न करता है। आधुनिक वैज्ञानिक विकास की काफी चर्चा की गई है।

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कुरुक्षेत्र छठा सर्ग

मानव वंशज की वायु, अग्नि ,आकाश, पृथ्वी सब कुछ है ।कवि खेद करता है कि मनुष्य के मानसिक विकास का उसके हृदय के साथ नहीं दिया है, उनकी उन्नति एकांकी है, अधूरी है अतएव परिपूर्ण महत्व नहीं है। उसके मिले-जुले विकास के लिए ज्ञान ही नहीं प्रेम और बलिदान भी आवश्यक है। मानव जीवन श्रेय का सर्वोच्च स्थान है, उसके लिए उसे असीमित मानव से प्रेम विषमता के अंतर को कम करने तथा हृदय एवं बुद्धि पक्ष में संतुलन बनाए रखने की महती आवश्यक है।

रामधारी सिंह दिनकर की रचनाएँ

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