समाज के प्रकार – समाज के गत संपूर्ण विवेचन से स्पष्ट हो जाता है। कि सामाजिक संबंध ही समाज के निर्माण का वास्तविक आधार है। इसका तात्पर्य है कि सामाजिक संबंधों की प्रकृति के अनुसार ही समाज को भी एक विशेष स्वरूप प्राप्त हो जाता है। इस संबंध में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सभी समाजों की सामाजिक संरचना अथवा सामाजिक ढांचा समान नहीं होता।
इसका कारण यह है कि सामाजिक संबंधों की प्रकृति, व्यक्त की स्थिति का निर्माण करने वाले तत्व, सांस्कृतिक विशेषताएं, नातेदारी के नियम, संपत्ति का स्वरूप, व्यक्तियों की कार्यक्रम का समूह का आकार और विभिन्न संस्थाओं का रूप सभी स्थानों पर भिन्न होता है।
समाज के प्रकार
स्पेन्सर दुखीम, मार्क्स तथा अनेक विचारकों ने विभिन्न आधारों पर समाज के प्रकार का उल्लेख किया है। इसके बाद भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यदि हम सामाजिक सम्बन्धी सामाजिक संरचना तथा प्रौद्योगिकी के विकास के आधार पर समाज के मुख्य प्रकारों को स्पष्ट करें तो इन्हें क्रमशः जनजातीय समाज, कृषक अथवा खेतिहर समाज, औद्योगिक समाज एवं उत्तर औद्योगिक समाजों के रूप में विभाजित करना अधिक उचित है। जनजातीय तथा कृषक समाज सरल समाजों के प्रतिनिधि हैं, जबकि औद्योगिक एवं उत्तर औद्योगिक समाजों में जटिल समाज के लक्षण देखने को मिलते हैं। समाज के प्रकार निम्न हैं-
- जनजातीय समाज
- कृषक समाज
- औद्योगिक समाज
- उत्तर औद्योगिक समाज
1. जनजातीय समाज
मानव सभ्यता के विकास से स्पष्ट होता है कि अपने आरम्भिक जीवन में विभिन्न मानव समुदाय एक लम्बे समय तक जंगलों, पहाड़ों और दुर्गम क्षेत्रों में भटकते हुए जानवरों के शिकार और फल-फूल के द्वारा अपनी उदर-पूर्ति करते रहे। दुर्गम क्षेत्रों में निवास करने के कारण जिन समुदायों का बाहरी समूहों में कोई मिश्रण नहीं हुआ तथा जिन्होंने अपनी एक अलग सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखी, उन सरल समाजों को ही हम जनजातीय समाज कहते हैं। यह अति महत्वपूर्ण समाज के प्रकार में से एक है।
यह जनजातीय समाज एक विशेष संस्कृति का प्रतिनधित्व करते हैं। जनजातीय समाज को प्राचीनतम मानने के कारण इन्हें ‘आदिवासी समाज’ अथवा ‘आदिम समाज’ के नाम से भी जाना जाता है। बेन्स (Baines) ने भी जनजातीय समाज को ‘वन्य समाज’ अथवा ‘जंगली समाज’ के नाम से सम्बोधित किया। एल्बिन (Elvin) ने जनजातीय समाज को सभ्यता का सबसे मौलिक प्रतिनिधि मानते हुए आदिवासी समाज’ शब्द का प्रयोग किया। आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं।


जी. एस. घुरिए का मानना है कि जनजातीय समाज वह है, जिसके जीवन में हिन्दुओं के प्राचीन जीवन और विश्वासों का समावेश है। इस कारण जनजातियों को ‘पिछड़े हिन्दू’ कहना अधिक उचित है। श्यामाचरण दुबे ने लिखा है कि जनजाति एक सरलतम समाज है। इसका तात्पर्य है कि यदि हम सांस्कृतिक विशेषताओं, जीवन-स्तर, धार्मिक विश्वासों, भाषा और आर्थिक संरचना के आधार पर कृषकों से जनजातीय समाज की तुलना करें, तो इसका जीवन किसानों से भी अधिक सरल और परम्परागत देखने को मिलता है। आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं।
स्थानीय आदिवासियों के किसी भी ऐसे समूह को एक जनजाति कहा जाता है, जो एक सामान्य क्षेत्र में रहता है, एक सामान्य भाषा बोलता है तथा एक सामान्य संस्कृति के अनुसार व्यवहार करता है।
गिलिन
जनजाति वह समूह है, जो एक विशेष भाषा बोलता है तथा जिसकी एक विशेष संस्कृति उसे दूसरे जनजातीय समूहों से पृथक् करती है
हॉबेल
इन कथनों से स्पष्ट होता है कि जनजातीय समाज एक समरूप और अन्तर्विवाही क्षेत्रीय समुदाय है, जिसके सदस्य सामान्य भू-भाग, भाषा, संस्कृति, जीवन-स्तर, धर्म तथा आजीविका की प्रकृति के आधार पर समानता की चेतना से बंधे रहते हैं। इसी को स्पष्ट करते हुए इवान्स प्रिचार्ड ने लिखा है, “जनजातीय समाज वे हैं, जो जनसंख्या, भू-भाग और सामाजिक सम्पर्क के आधार पर छोटे होते हैं तथा प्रगतिशील समाजों की तुलना में जिनकी प्रौद्योगिकी एवं अर्थव्यवस्था बहुत सरल होने के साथ ही बहुत कम विशेषीकृ होती है।”
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सभी जनजातीय समाजों की अपनी पृथक भाषा और पृथक संस्कृति होने के कारण यह एक अन्तर्विवाही समाज है। आर्थिक और सांस्कृतिक आधार पर आत्मनिर्भरता इसकी प्रमुख विशेषता है, जो जनजातीय समाज आज खेती अथवा दस्तकारी के द्वारा आजीविका उपार्जित करने लगे हैं, उनकी अर्थव्यवस्था भी बहुत पिछड़ी हुई देखने को मिलती है। यह अति महत्वपूर्ण समाज के प्रकार में से एक है।
अधिकांश जनजातीय समाजों का अपना एक पृथक राजनीतिक संगठन होता है, जिससे सम्बन्धित व्यवहार के नियमों को जनजाति के मुखिया या जनजातीय पंचायत के द्वारा प्रभावपूर्ण बनाया जाता है। प्रयागत कानून इस समाज की एक प्रमुख विशेषता है। जनजातीय सामाजिक व्यवस्था में किसी स्पष्ट सामाजिक संस्तरण का अभाव होता है। जनजातीय समाज साधारणतया अपने आप को एक बड़े वंश के रूप में देखते हैं। इसी विशेषता के कारण उनमें समानता की चेतना अधिक स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं।
भारत में स्वतन्त्रता के बाद जनजातीय समाज के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 342 के आधार पर विभिन्न जनजातियों की एक सूची तैयार की गई। इस सूची में जिन जनजातियों को सम्मिलित किया गया, उन्हें ‘अनुसूचित जनजाति’ कहा जाता है। वर्तमान में ऐसी जनजातियों की संख्या 230 से भी अधिक है तथा सन् 2011 की जनगणना के समय तक जनजातीय समाज के लोगों की कुल जनसंख्या 10 करोड़ से भी अधिक हो गई। अनेक परिवर्तनों के बाद भी दूसरे समाजों की तुलना में जनजातीय समाजों की प्रकृति आज भी बहुत सरल और परम्परागत है। यह अति महत्वपूर्ण समाज के प्रकार में से एक है।
2. कृषक समाज
सामाजिक एवं आर्थिक विकास के आधार पर जनजातीय समाज की तुलना में कृषक समाज को कुछ अधिक उच्च स्तर के रूप में देखा जाता है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कृषक समाज की अवधारणा ग्रामीण समाज से भिन्न है। ग्रामीण समाज में विभिन्न श्रेणियों के किसानों, मामूली व्यापारियों, दस्तकारों और शिल्पियों का भी समावेश होता है। इससे भिन्न, कृषक समाज का सम्बन्ध केवल उन छोटे किसानों से हैं, जो भूमि के एक छोटे से हिस्से के मालिक होते हैं तथा अपनी भूमि पर स्वयं कृषि करके अपनी सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
रॉबर्ट रेडफील्ड ने अपने एक महत्वपूर्ण अध्ययन टेपोजलान में कृषक समाज को परिभाषित करते हुए लिखा है, “कृषक समाज का तात्पर्य उन ग्रामीणों से है, जो जीवन निर्वाह के लिए अपनी कृषि भूमि पर नियन्त्रण बनाए रखते हैं तथा उसे जोतते हैं; कृषि जिनके जीवन का एक ढंग है जो उन नगरीय लोगों की ओर देखते हैं तथा उनसे प्रभावित होते हैं, जिनके जीवन का ढंग लगभग उन्हीं के समान होते हुए भी उनसे कुछ सभ्य होता है।” आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं। इस कथन के आधार पर रेडफील्ड ने कृषक समाज को इसकी पांच मुख्य विशेषताओं के आधार पर स्पष्ट किया—
- कृषक समाज तुलनात्मक रूप से एक समरूप अथवा समान विशेषताओं वाला समाज है।
- इस समाज के सदस्यों की आजीविका का मुख्य साधन भूमि पर नियन्त्रण रखना तथा अपनी भूमि को स्वयं जोतना है।
- यह एक अविभेदीकृत समाज है, जिसमें स्तरीकरण का अभाव होता है।
- कृषक समाज कस्बों के निवासियों से भिन्न होता है। यद्यपि अनेक क्षेत्रों में यह उनसे प्रभावित होता है।
- कृषक समाज को आर्थिक आधार पर भी दूसरे समाजों से स्पष्ट रूप से पृथक किया जा सकता है।
उपर्युक्त विशेषताओं के अतिरिक्त शेनिन, नॉर्बेक तथा आन्द्रे बेतेइ ने कृषक समाज की कुछ अन्य विशेषताओं का भी उल्लेख किया है। शेनिन के अनुसार कृषक समाज में व्यक्ति का खेत बहुआयामी सामाजिक संगठन की मौलिक इकाई होता है। इसका तात्पर्य है कि कृषक समाज में परिवार के लिए खेत ही उसकी सम्पत्ति, सामाजिक सम्बन्धों, उत्पादन, उपभोग और विभिन्न कार्यों की मौलिक इकाई होती है। नॉर्वेक के अनुसार, कृषक समाज वह है, जिसमें साधारणतया उपभोग के लिए ही उत्पादन किया जाता है।


ऐसे समाज में व्यावसायिक विशेषीकरण का पूरी तरह अभाव होता है। कुछ लेखकों ने कृषक समाज को एक ‘अवशिष्ट समाज’ के नाम से सम्बोधित किया। इस सम्बन्ध में क्रोवर ने लिखा है, “कृषक समाज मध्यवर्ती स्थिति में होता है, इसके एक ओर जनजातीय समाज है, तो दूसरी ओर नगरीय समाज है। इसका तात्पर्य है कि क्रोवर ने उन सभी समाजों को कृषक समाजों के रूप में स्पष्ट किया, जो जनजातीय समाज और नगरीय समाज के बीच में आते हैं। आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं।
3. औद्योगिक समाज
इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रान्ति के प्रभाव से संसार के अधिकांश नगरीय समाज औद्योगिक समाजों के रूप में बदलने लगे। साधारणतया नगरीय समाजों को ही औद्योगिक समाज कह दिया जाता है, यद्यपि सभी नगरीय समाजों का औद्योगिक समाज होना आवश्यक नहीं होता। बहुत से नगरों की पहचान आज भी ऐतिहासिक अथवा धार्मिक नगरों के रूप में है। इसके बाद भी नगरीय समाज मे जब बड़ी जनसंख्या की आवश्यकताओं को छोटी मात्रा में किए जाने वाले उत्पादन द्वारा पूरा करना सम्भव नहीं रह जाता, तब उनमें भी धीरे-धीरे औद्योगिक समाज की विशेषताएं बढ़ने लगती हैं।
औद्योगिक समाज वे हैं, जिनमें विकसित प्रौद्योगिकी पर आधारित मशीनों द्वारा वस्तुओं का उत्पादन होता है। जिन नगरों में उद्योगों का केन्द्रीयकरण होने से जनसंख्या के आकार और घनत्व में वृद्धि होने के साथ रोजगार के अवसर भी बढ़ने लगते हैं, उनकी अर्थव्यवस्था, सामाजिक संरचना तथा व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों के प्रतिमान बदल जाने से उनकी परम्परागत संरचना में परिवर्तन होने लगता है। आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं।
औद्योगिक समाज की अवधारणा को प्रस्तुत करने वाले विद्वानों में सेन्ट साइमन का नाम प्रमुख है। उनके अनुसार, औद्योगिक समाज जटिल समाज की विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये वे समाज हैं, जो एक ओर जनसंख्या और क्षेत्र के आधार पर काफी बड़े होते हैं तथा दूसरी ओर आर्थिक सम्बन्धों में विशेषीकरण और व्यक्तिवादिता बढ़ने से एक विशेष प्रकार के सामाजिक स्तरीकरण और सामाजिक सम्बन्धों का प्रभाव बढ़ने लगता है। अवैयक्तिक, औपचारिक, हित प्रधान तथा अस्थायी सम्बन्ध औद्योगिक समाज की विशेषताएं हैं। इसके बाद भी यह एक विभेदीकृत समाज है, जिसमें प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने के साथ समाज एक-दूसरे से भिन्न अनेक वर्गों में विभाजित होने लगता है।
औद्योगिक समाज अपनी प्रकृति से बहुलवादी होते हैं। ऐसे समाज में एक-दूसरे से भिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विशेषताओं वाले लोग साथ-साथ रहते हुए अपने हितों को पूरा करने के लिए एक-दूसरे से अस्थायी समायोजन करने में लगे रहते हैं। मशीनों द्वारा बड़ी मात्रा में उत्पादन करके लाभ प्राप्त करना आर्थिक क्रियाओं का मुख्य आधार होता है। प्रतिस्पर्द्धा और विशेषीकरण इन समाजों की मुख्य विशेषताएं हैं। यह अति महत्वपूर्ण समाज के प्रकार में से एक है।
औद्योगिक समाज में जैसे-जैसे श्रम विभाजन बढ़ता है, आर्थिक श्रम विभाजन के साथ सामाजिक श्रम विभाजन की प्रकृति में भी परिवर्तन होने लगता है। यह समाज अवैयक्तिक सम्बन्धों पर आधारित होते हैं, जिनमें विभिन्न व्यक्तियों को उनकी आर्थिक प्रस्थिति, आर्थिक शक्ति, सत्ता अथवा अधिकारों के आधार पर कम या अधिक महत्व दिया जाता है। गतिशीलता ऐसे समाज की एक प्रमुख विशेषता है। आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं।
अधिकांश व्यक्ति अधिक-से-अधिक आर्थिक साधन प्राप्त करने के लिए एक व्यवसाय से दूसरे व्यवसाय तथा एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर परिवर्तन करते रहते हैं। ऐसे समाज में प्रथा, नैतिकता और परम्परा का प्रभाव कम हो जाने के कारण कानूनों द्वारा नियन्त्रण की स्थापना की जाती है। समाज में जैसे-जैसे औद्योगिक उत्पादन बढ़ता है, समाज अनेक ऐसे वर्गों में विभाजित होने लगता है, जो अपने लिए अधिक सुविधाओं की मांग करने के कारण एक-दूसरे से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संघर्ष करते रहते हैं। इसी आधार पर मार्क्स ने वर्ग संघर्ष को औद्योगिक समाजों की एक प्रमुख विशेषता के रूप में स्पष्ट किया।


अनेक लेखक यह मानते हैं कि समाजशास्त्रीय आधार पर औद्योगिक समाज को आधुनिक समाज कहना अधिक उचित है। लर्नर, योगेन्द्र सिंह, एस. सी. दुवे तथा शिल्स ने धार्मिक मूल्यों की जगह सांसारिक हितों में होने वाली वृद्धि, प्रौद्योगिक विकास, गतिशीलता, शिक्षा में वृद्धि, धर्मनिरपेक्षता, वैयक्तिक स्वतन्त्रता तथा परिवर्तनशील मनोवृत्तियों को आधुनिक समाज की विशेषताओं के रूप में स्पष्ट किया है। यह अति महत्वपूर्ण समाज के प्रकार में से एक है।
यह सभी वे विशेषताएं हैं, जो औद्योगिक समाजों में देखने को मिलती हैं। यदि हम इन सभी लक्षणों के आधार पर नगरीय समाज की अवधारणा का विश्लेषण करें, तो भारत के अधिकांश नगरों को औद्योगिक समाज की श्रेणी में रखना कठिन हो सकता है। इस आधार पर भी अनेक समाजशास्त्री यह मानते हैं कि भारतीय दशाओं में यहां औद्योगिक समाज की जगह ‘आधुनिक समाज’ शब्द का प्रयोग करना अधिक उचित है। आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं।
4. उत्तर औद्योगिक समाज
कोई समाज जब औद्योगिक विकास के बहुत उच्च स्तर पर पहुंच जाता है, तब साधारणतया ऐसे को हम उत्तर औद्योगिक समाज कहते हैं। डेनियल बेल (Daniell Bell) ने अपनी पुस्तक ‘द कमिंग समाज ऑफ पोस्ट इंडिस्ट्रियल सोसाइटी’ में उत्तर औद्योगिक समाज को ‘एक उच्च स्तर का तकनीकी समाज’ कहा है। अनेक दूसरे लेखकों ने इसे ‘तकनीकी विशेषज्ञों का समाज’ जैसे नाम से सम्बोधित किया है। आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं।
इसका तात्पर्य यह हैं कि औद्योगिक समाज की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संरचना का विकास उन नीतियों के आधार पर होता है, जिनके द्वारा समाज को प्रौद्योगिक आधार पर अधिक-से-अधिक शक्तिशाली बनाया जा सके। ऐसे समाजों को औद्योगिक समाजों से कुछ विशेष लक्षणों के आधार पर पृथक किया जा सकता है।
- औद्योगिक समाज में शक्ति का केन्द्रीयकरण उच्च स्तर की तकनीकी और व्यावसायिक कुशलता लोगों के हाथ में होता है। अधिकांश राजनीतिक निर्णय भी इन्हीं व्यक्तियों की सलाह से लिए जाते हैं।
- उत्तर औद्योगिक समाज में बड़ी मात्रा के उत्पादन के साथ उच्च स्तर की तकनीकी सेवाओं का विशेष महत्व होता है। यह सेवाएं वे हैं, जिन्हें बौद्धिक प्रौद्योगिकी (Intellectual Technology) से सम्बन्धि माना जाता है। उदाहरण के लिए, नवाचार, बड़े पैमाने पर कम्प्यूटर का उपयोग, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सेवाओं की सम्बद्धता तथा वित्तीय सलाह और सेवा केन्द्र तकनीकी सेवाओं के कुछ विशेष रूप हैं। ऐसी सेवाएं देने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के बड़े-बड़े सेवा केन्द्रों की स्थापना की जाती हैं, जहां हजारों कर्मचारी दिन-रात देश-विदेश के ग्राहकों को विभिन्न प्रकार की सेवाएं देते रहते हैं।
- ऐसे समाज में उद्योगों, निर्माण कार्यों और कारखानों से सम्बन्धित श्रमिकों की संख्या कम होने लगती है तथा अर्थव्यवस्था में उन लोगों के प्रतिशत में तेजी से वृद्धि होती है, जिनका काम विभिन्न व्यवसायों से सम्बन्धित लोगों को विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्रदान करना है। आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं।
- अर्थव्यवस्था का उदारीकरण (liberalization) उत्तर औद्योगिक समाज की एक मुख्य विशेषता है। यह अर्थव्यवस्था इस अर्थ में उदार होती है कि इसमें विदेशी पूंजी के प्रवाह पर कोई रोक नहीं होती तथा वस्तुओं की गुणवत्ता के आधार पर आयात और निर्यात के सन्तुलन को बनाए रखने का प्रयत्न किया जाता है। यही कारण है कि उत्तर औद्योगिक समाज में अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने में बहु- राष्ट्रीय कम्पनियों की में ‘बहु- एक बड़ी भूमिका होती है।
- उत्तर औद्योगिक समाज का भूमण्डलीकरण से विशेष सम्बन्ध है । भूमण्डलीकरण अथवा वैश्वीकरण वह दशा है, जिसमें सम्पूर्ण विश्व की में एकीकरण होने लगता है। आर्थिक और क्षेत्र में ऐसे देश निर्वाध रूप से एक-दूसरे की सेवाएं लेते और देते हैं। आयात कर कम हो जाने से अपने उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार करना इसलिए आवश्यक हो जाता है, जिससे दूसरे देशों के उत्पादन से प्रतिस्पर्द्धा की जा सके।
- वर्तमान अनुभवों के आधार पर अब यह माना जाने लगा है कि वि-नगरीकरण (De-urbanization) उत्तर औद्यागिक समाजों का एक लक्षण होने के साथ ही इसके अस्तित्व से सम्बन्धित एक आवश्यक दशा है। जब अति-नगरीकरण के कारण किसी समाज के आकार में बहुत वृद्धि हो जाती है (जैसा कि दिल्ली, मुम्बई तथा कोलकाता आदि), तब वहां की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को आस-पास के क्षेत्रों में स्थानान्तरित करना आवश्यक हो जाता है। आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं।


वर्तमान विश्व में ऐसा दावा किया जाता है कि अनेक समाज उत्तर औद्योगिक समाज के स्तर तक पहुंच चुके हैं, लेकिन व्यवहार में आज दुनिया का कोई भी औद्योगिक नगर ऐसा नहीं है, जिसमें सभी लोगों की मनोवृत्तियां, व्यवहार के तरीके और अर्थव्यवस्था का प्रारूप उत्तर औद्योगिक समाज से पूरी तरह मेल खाता हो। यह भी सच है कि उत्तर औद्योगिक समाजों ने विभिन्न प्रकार की असुरक्षाओं, दुर्घटनाओं और पर्यावरण प्रदूषण में भी वृद्धि करके जनजीवन के सामने नए खतरे पैदा किए हैं। आप समाज के प्रकार hindibag पर पढ़ रहे हैं।
ऐसे समाज में बहु-राष्ट्रीय निगमों का दबदबा होने के कारण अप्रत्यक्ष रूप से अत्यधिक विकसित समाजों ने विकासशील देशों को आर्थिक आधार पर अपना उपनिवेश बनाना आरम्भ कर दिया। यह एक ऐसा नव-उपनिवेशवाद हैं, जो उत्तर औद्योगिक समाज के औचित्य पर ही प्रश्न चिह्न लगा देता है। यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि वर्तमान विश्व में उत्तर औद्योगिक समाज केवल एक प्रारूप है, क्योंकि विश्व में अभी तक कोई ऐसा समाज विकसित नहीं हो सका है, जिसमें उत्तर- औद्योगिक समाज अथवा उत्तर-आधुनिक समाज की सभी विशेषताएं पाई जाती हों। इसके बाद भी समाजों के विभिन्न रूपों को समझने के लिए इस प्रारूप की प्रकृति से परिचित होना आवश्यक है।