व्रत रहने के कारण 10 Reasons of fast in Hindi

व्रत रहने के कारण कई हो सकते हैं। भले ही व्रत-उपवास का वास्तविक अर्थ कुछ भी हो, लेकिन जनमानस में धर्म, आस्था एवं श्रद्धा का प्रतीक है। कुछ लोग इसे धर्म के साथ जोड़कर देखते हैं तो कुछ ज्योतिषीय उपायों की तरह लेते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से इसके अलग लाभ हैं तो मनोविज्ञान की दृष्टि से इनका अपना महत्त्व है। शायद यही कारण है कि व्रत-उपवास का चलन सदियों नहीं, युगों पुराना है।

एक तरफ हिंदू शास्त्र व्रत-उपवास जैसे धार्मिक कर्मकांडों की पैरवी करते नजर आते हैं तो दूसरी ओर खुद ही इसी बात पर जोर देते हैं कि ‘भूखे भजन न होय गोपाला’, अर्थात् भूखे पेट तो भगवान् का भजन भी नहीं हो पाता। लंबी तपस्या के बाद भगवान् बुद्ध ने स्वयं इस बात का अनुभव किया कि भूखे रहने से मात्र शरीर को कष्ट होता है, ऐसा करने से किसी मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति नहीं हो सकती। ध्यान या भक्ति की राह में स्वयं को निराहार रखना गलत है।

व्रत रहने के कारण

व्रत रहने के कारण

हमारे शास्त्रों में, धर्मों में दोनों ही बातें मिल जाती हैं। व्रतों के पक्ष में भी और व्रतों के विपक्ष में भी, लेकिन पलड़ा फिर भी व्रतों को रखने की ओर ही झुकता मालूम पड़ता है। सच तो यह है कि लोग व्रत चाहे विश्वास में रखें या अंधविश्वास में, लेकिन अधिकतर लोग व्रत के प्रति अपनी सहमति जताते हैं।कुछ लोग श्रद्धा से रखते हैं तो कुछ लोग भय से, कुछ लोग शारीरिक स्वास्थ्य के लिए रखते हैं तो कुछ लोग मानसिक शांति के लिए। कारण भले ही कोई हो, लेकिन लोगों के जीवन में व्रत-उपवास का विशेष स्थान है। आइए जानते हैं, उन व्रत रहने के कारण को, जिनके चलते व्रत-उपवास का चलन शुरू हुआ।

  1. भक्ति का सहज भाव
  2. भगवान् की याद
  3. धार्मिक आस्था
  4. भगवान् का भय
  5. ज्योतिषीय उपाय
  6. मनोकामनाओं की पूर्ति
  7. बेहतर स्वास्थ्य के लिए
  8. आत्म-रूपांतरण
  9. अनाज एवं भोजन की बचत
  10. कामवासना पर नियंत्रण

भक्ति का सहज भाव

देखा जाए तो व्रत-उपवास को किसी ने कहीं से पढ़कर या देखा-देखी नहीं शुरू किया, बल्कि परमात्मा में लीन भक्तों का यह सहज, स्वतः भाव था, जिसे व्रत-उपवास कहना भी गलत है; क्योंकि उन्होंने सोच- समझकर किसी फल की प्राप्ति या भगवान् को प्रसन्न करने के लिए व्रत नहीं किए, बल्कि वह भगवान् के ध्यान में, भक्ति में इतने लीन हो गए थे कि उनका खाना-पीना, सोना-जागना अपने आप ही छूट गया।

उनके लिए यह प्रयास नहीं बल्कि एक अवस्था थी। इसलिए धर्म एवं अध्यात्म के जगत् में जो भी लोग परमात्मा के निकट हुए हैं, वे अपने आपसे तथा सांसारिक क्रियाकलापों एवं औपचारिकताओं से अपने आप छूट गए हैं। व्रत रहने के कारण में यह सबसे मुख्य कारण है।

व्रत

अतः यह कहा जा सकता है कि व्रत-उपवास भक्तिभाव का प्रतीक है। यह अवस्था हर उस इनसान के स्तर एवं तल को दरशाती है, जो स्वयं को भूलकर अपने आपको पूर्ण रूप से परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देता है। तल्लीनता का समय और स्थान से कोई सरोकार नहीं, इसीलिए व्रत- उपवास कब और क्यों शुरू हुए, यह कहना मुश्किल है, क्योंकि इसका संबंध समय से नहीं, भक्ति के सहज भाव से है। हाँ, मगर यह कहा जा सकता है, इनके शुरू होने के पीछे इनसान की भगवान् के प्रति अपार श्रद्धा एवं आस्था ही रही है।

भगवान् की याद

संसार की मोह-माया में, चमक-धमक में लोग भगवान् को कहीं न भूल जाएँ, इसलिए व्रत-उपवास को रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल किया गया, ताकि इसी बहाने से लोग भगवान् का स्मरण तो करेंगे। लोग चाहते थे, इनसान को यह सदा याद रहे कि उससे शक्तिशाली भी कोई है, जो सदा हमें देखता-परखता रहता है। यदि व्रत-उपवास को लोग करते रहेंगे तो संबंधित रीति-रिवाज, संस्कार-परंपराओं तथा धार्मिक कर्मकांड एवं अनुष्ठान आदि का महत्त्व एवं अस्तित्व कभी धुँधला नहीं पड़ेगा। इसीलिए यह व्रत रहने के कारण में अपना विशेष स्थान रखता है।

व्रत-उपवास के बहाने से इनसान इनसे सदा जुड़ा रहेगा। इन सबके चलते इनसान न केवल पाप करने से घबराएगा, बल्कि उसके व्यवहार में दया एवं करुणा का भी भाव बना रहेगा। भले ही इनसान कितनी ही ऊँचाइयों के छू ले, पद, प्रतिष्ठा, सम्मान आदि प्राप्त कर ले, लेकिन उसे ध्यान रहना चाहिए कि उससे ऊँचा भी कोई है। इसलिए जीवन में कभी किसी बात का अभिमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि भगवान् की अदालत में कोई ऊँचा-नीचा नहीं है। व्रत रहने के कारण में मुख्य बिन्दु साबित होता है।

वह सभी के कर्मों का हिसाब रखता है आदि; यह सब तभी संभव है। जब इनसान को यह याद रहे कि भले ही परमात्मा दिखता नहीं है; लेकिन वह फिर भी सदा हमारे आस-पास हर पल मौजूद है। इनसान में इसी याद को बनाए रखने के लिए व्रत-उपवास को उसके जीवन के साथ जोड़ा गया, जिसका चलन धीरे-धीरे बढ़ता चला गया।

धार्मिक आस्था

व्रत रहने के कारण रहे हमारे धार्मिक शास्त्र, जिनके द्वारा इनसान को पंडित, पुरोहित एवं ऋषि-मुनियों द्वारा देवी-देवता का व उनसे जुड़े वारों का ज्ञान हुआ तथा इस बात का पता चला कि फलाँ व्रत करने से फलाँ देवी-देवता प्रसन्न होते हैं। व्रत-उपवास को भक्ति का, परमात्मा को पाने का एक मार्ग बताया गया, जिसके चलते लोगों में न केवल उत्सुकता जगी, बल्कि भगवान् को पाने तथा मोक्ष प्राप्त करने की गहरी आस्था भी जगी और लोग व्रत-उपवास द्वारा भगवान् को प्रसन्न करने में जुट गए।

व्रत

भगवान् का भय

व्रत-उपवास को सीधे देवी-देवताओं के साथ न केवल जोड़ा गया, बल्कि यह भ्रांतियाँ भी फैलाई गईं कि जो लोग देवी-देवताओं के व्रत- उपवास नहीं करते, उनसे भगवान् नाराज हो जाते हैं, जिसके चलते जीवन में कई कष्ट व बाधाएँ उत्पन्न हो जाती हैं।

इसलिए कई लोगों ने या तो भगवान् के भय से बचने के लिए व्रत रखने आरंभ किए अथवा किसी- न-किसी दूसरे की देखा-देखी, होड़ में व्रत रखना शुरू किया। लोगों को लगा कि यदि जीवन में सुख-शांति चाहिए तो व्रत-उपवास ही एकमात्र उपाय है। नास्तिक लोग व्रत रहने के कारण में इसे मुख्य मानते हैं।

ज्योतिषीय उपाय

इतना ही नहीं, व्रतों को ज्योतिषियों ने रहस्यमयी शक्ति एवं ग्रहों की चाल से भी जोड़ दिया। कई लोग तो ऐसे हैं, जो व्रत किसी भगवान् की भक्ति या भय के कारण से नहीं, ज्योतिषी द्वारा बताए गए उपाय की वजह से रखते हैं, उनके लिए व्रत-उपवास अपने ग्रहों की स्थिति को ठीक करने का माध्यम भर हैं। फिर वह शनि के प्रकोप से बचने का शनि का व्रत हो या मंगल के कष्ट को कम करने के लिए मंगल का व्रत। शनि की साढ़ेसाती हो या राहु की कुदृष्टि ! ज्योतिषियों की मानें तो हर तरह के कष्ट से बचने एवं मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए ढेरों व्रत हैं। व्रत रहने के कारण

मनोकामनाओं की पूर्ति

इन्हीं उपायों तथा पुराणों में स्थित कहानियों के चलते ऐसे भी कई व्रत सामने आने लगे हैं, जिन्हें मनोवांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए बड़े ही जोरों-शोरों से रखा जाने लगा है। अधिकतर लोगों का मानना है कि बताए गए व्रत-उपवास को यदि पूर्ण विधि-विधान द्वारा नियमित रूपसे किया जाए तो वह जरूर फलते हैं अर्थात् जिस मनोकामना के लिए व्रत रखा गया है, वह अवश्य पूर्ण होती है।

फिर वह मनचाहे वर के लिए सोमवार का व्रत हो या पति की लंबी आयु के लिए करवाचौथ का व्रत; बच्चे के लिए अहोई का व्रत हो या फिर संतान प्राप्ति के लिए कृष्ण का व्रत। व्रतों का यह सिलसिला इनसान की मनोकामनाओं से जुड़ा रहा और यह जीवन का अहम हिस्सा बन गए। व्रत रहने के कारण में वृद्धि करता है।

व्रत

बेहतर स्वास्थ्य के लिए

तमाम कारणों में से व्रत-उपवास को करने का एक कारण आरोग्यता भी बताया गया है। प्राचीन काल के वैद्य हों या आज के आधुनिक डॉक्टर – दोनों का ही मानना है, यदि हफ्ते में एक दिन उपवास यानी भोजन का त्याग किया जाए तो स्वास्थ्य अच्छा रहता है। हफ्ते भर जो हम खाते हैं, वह ठीक से पच नहीं पाता, जिसके कारण शरीर में कई तरह के रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

ऐसे में एक दिन का व्रत न केवल हमारे अपच को ठीक करता है, बल्कि हमारे हाजमे को भी ठीक रखता है। आयुर्वेद के अनुसार, व्रत-उपवास रखने से अरुचि, अजीर्ण, उदरशूल, वातव्याधि एवं मंदाग्नि जैसे घातक रोगों से बचा जा सकता है। इसलिए कितने लोग तो ऐसे हैं, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से नियमपूर्वक व्रत-उपवास करते हैं, ताकि वह दुरुस्त रहें। व्रत रहने के कारण

आत्म-रूपांतरण

व्रत-उपवास को रखने का एक कारण आत्म-रूपांतरण भी रहा है; क्योंकि जब कोई व्रत रखता है तो उसे उस दिन भोजन का ही नहीं, अपनी वाणी का भी त्याग करना होता है, अर्थात् मौन रहना होता है। ऐसा करने के लिए स्वयं पर नियंत्रण चाहिए। संयम चाहिए। व्रत के जरिए इनसान की इच्छाशक्ति और सुदृढ़ होती है। वह स्वयं पर काबू पाना सीखता है। मौन एवं एकांतवास भी व्रत का एक अहम हिस्सा है, ताकि इनसान संसार के शोर-गुल से दूर हो सके, शांत हो सके, आत्मनिरीक्षण कर सके।

चिंतन-मनन द्वारा आत्मा को अनुभव कर सके। वह ऊर्जा का भंडार है, इस बात को समझ सके तथा अपने भीतर बहती ऊर्जा को एकाग्र कर उसे सही, सच्चे, सकारात्मक, सात्त्विक रास्ते पर लगा सके; स्वयं को रूपांतरित कर सके। देखा जाए तो व्रत-उपवास को शरीर, मन औरआत्मा के शुद्धीकरण के साथ-साथ भीतर आध्यात्मिक गुणों के विकास के लिए भी अपनाया गया।

व्रत रहने के कारण

अनाज एवं भोजन की बचत

भारत में बढ़ती जनसंख्या व अनाज की कमी ने भी व्रत-उपवास को बढ़ावा दिया। कहते हैं-व्रत-उपवास इसलिए भी रखे गए, ताकि अन्न की बचत हो सके तथा हर भूखे को भी भोजन मिल सके। एक समय ऐसा भी था, जब गरीबी और भुखमरी – दोनों की बड़ी तादाद ने अपना पाँव पसार रखा था।

तब न केवल खानेवाले अधिक थे, बल्कि खेतों में अनाज भी कम था। ऐसे में व्रत-उपवास को ही एकमात्र उपाय समझा गया। लोगों ने प्रण किया कि हफ्ते में कम-से-कम एक दिन निराहार रहा जाए, ताकि जिन लोगों को भोजन नहीं मिलता, उन्हें भी मिले। ऐसा करने से पेट भी ठीक रहेगा तथा भोजन के साथ-साथ देश में अन्न की समस्या भी सुधर जाएगी।

कामवासना पर नियंत्रण

व्रत रहने के कारण में एक कारण इनसान में स्थित कामवासना को शांत करना भी है। भोजन से न सिर्फ शरीर में ऊर्जा का विस्तार होता है, बल्कि तामस (आलस) भी बढ़ता है। यदि हम हफ्ते भर खाते रहेंगे तो शरीर में ऊर्जा का स्तर बढ़ता रहेगा और बढ़ी हुई ऊर्जा सदा निकलने का मार्ग खोजती रहती है, जिसके कारण लोग सबसे पहले काम (सेक्स) को ही चुनते हैं।

इसलिए ऐसा न हो, ब्रह्मचर्य न टूटे या फिर इस कामवासना का अतिक्रमण न हो, इसके लिए व्रत-उपवास को चुना गया। शास्त्रों में इसलिए व्रत-उपवास को इतना महत्त्व दिया गया है। शास्त्रों में तो एक दिन का नहीं, कई-कई दिनों का उपवास रखने के लिए कहा गया है और यदि कुछ खाने के लिए कहा भी है तो वह भी एक बार। व्रत रहने के कारण

वह भी सात्त्विक, बिना नमक-मिर्च का, बिना लहसुन-प्याज का सादा भोजन या फिर फलाहार, ताकि ऊर्जा उतनी ही निर्मित हो, जितनी भक्ति के लिए या जीने के लिए जरूरी है, इससे ज्यादा नहीं। सच तो यह है कि भोजन भी एक तरह की मादकता पैदा करता है, जिसके चलते ध्यान-कीर्तन में बाधा पैदा उत्पन्न होती है और विचार निर्मल और स्वच्छ नहीं रह पाते।

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