अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

 
अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
कवि
जन्म

1865 ई॰

जन्म स्थान

निज़ामाबाद (आज़मगढ़)

पिता

पंडित भोला सिंह

निधन

सन 1947 ई॰

शिक्षा

स्वाध्याय से विभिन्न भाषाओं का ज्ञान

लेखन विधा

नाटक, उपन्यास, काव्य

भाषा

बृजभाषा एवं खड़ी बोली

शैली

प्रबंध एवं मुक्तक

प्रमुख रचनाएँ
  • प्रिय प्रवास
  • चोखे चौपदे
  • चुभते चौपदे
  • वैदेही वनवास

अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि एवं गद्य-लेखक थे। हरिऔधजी पहले ब्रजभाषा में कविता किया करते थे। इनकी आरम्भिक कविताएँ समस्याप्रधान तथा छोटी-छोटी होती थीं। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने इन्हें खड़ीबोली में काव्य-रचना की प्रेरणा दी। इसलिए आगे चलकर इन्होंने खड़ीबोली में काव्य-रचना की और हिन्दी काव्य को अपनी प्रतिभा का अमूल्य योगदान दिया।

हरिऔधजी काव्य को लोकहित एवं मानव-कल्याण के प्रेरकीय साधन के रूप में स्वीकार करते थे। इनके काव्य में पौराणिक एवं आधुनिक समाज के ख्यातिप्राप्त लोकनायक नायिकाओं को प्रतिनिधि स्थान प्राप्त हुआ है। भावुकता के साथ ही मौलिकता को प्रश्रय देनेवाले हरिऔधजी की एक अन्य विशेषता काव्यात्मक विषयों की विविधता भी रही है। इसी कारण इनके काव्य में भक्तिकाल, रीतिकाल एवं आधुनिक काव्य के उज्ज्वल पहलुओं का समावेश हुआ है।

जीवन परिचय

हरिऔधजों का जन्म आजमगढ़ जिले के निजामाबाद गाँव में सन् 1865 ई० में हुआ था। इनके पिता का नाम पं० भोलासिंह और माता का नाम रुक्मिणी देवी था। इनके पूर्वज शुक्ल यजुर्वेदी सनाढ्य ब्राह्मण थे, जो कालान्तर में सिक्ख हो गए थे। मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् इन्होंने काशी के क्वींस कॉलेज में प्रवेश लिया, किन्तु अस्वस्थता के कारण इन्हें बीच में ही अपना विद्यालयीय अध्ययन छोड़ देना पड़ा।

तत्पश्चात् इन्होंने घर पर फारसी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं का अध्ययन किया। कुछ वर्ष तक इन्होने निजामाबाद के तहसीली स्कूल मे अध्यापन कार्य किया। बाद में 20 वर्ष तक कानूनगो के पद पर कार्य किया। कानूनगो पद से अवकाश प्राप्त करके हरिऔधजी ने 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' में अवैतनिक रूप से अध्यापन कार्य किया। हरिऔधजी के जीवन का ध्येय अध्यापन ही रहा। इनका जीवन सरल, विचार उदार और लक्ष्य महान् था। सन् 1947 ई० में हरिऔधजी का निधन हो गया।

रचनाएँ
नाटक
  • प्रद्युम्न-विजय
  • रुक्मिणी परिणय
उपन्यास

हरिऔधजी का प्रथम उपन्यास 'प्रेमकान्ता' है।

  • ठेठ हिन्दी का ठाठ
  • अधखिला फूल
काव्य-ग्रन्थ

हरिऔधजी के मुख्य रूप से तीन काव्य ग्रंथ निम्न हैं -

  1. प्रियप्रवास - 'प्रियप्रवास' खड़ीबोली में लिखा गया पहला महाकाव्य है, जो 17 सगों में विभाजित है। इसमें राधा-कृष्ण को सामान्य नायक-नायिका के स्तर से उठाकर विश्व-सेवी एवं विश्व प्रेमी के रूप में चित्रित किया गया है।
  2. पारिजात
  3. वैदेही वनवास

प्रबन्ध काव्यों के अतिरिक्त इनकी मुक्तक कविताओं के अनेक संग्रह -

  • चोखे चौपदे
  • चुभते चौपदे
  • पद्य प्रसून
  • ग्राम-गीत' 'कल्पलता