छठ पूजा पूजन विधि वैज्ञानिक महत्व

छठ पूजा केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि इसे महापर्व का दर्जा प्राप्त है। इस पर्व के साथ करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है और हो भी क्यों न, भगवान् सूर्य की उपासना से जुड़े इस महापर्व की महिमा ही ऐसी है। दीपावली के ठीक छह दिन बाद मनाए जानेवाले पर्व छठ का भारतीय संस्कृति में व्यापक महत्त्व है। हमारे देश भारत में छठ पूजा मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।

छठ पूजा

सूर्योपासना का यह पर्व बिहार में घर-घर में मनाया जाता है। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल और पूर्वोत्तरी राज्यों में भी इस पर्व को लेकर खासा उत्साह रहता है। हिंदुओं द्वारा मनाए जानेवाले इस पर्व को इसलाम व अन्य धर्मावलंबी भी मनाते देखे गए हैं। हमारे यहाँ मान्यता है कि सूर्य की शक्तियों का मुख्य स्रोत उनकी पत्नियाँ उषा और प्रत्यूषा हैं। छठ पूजा में सूर्य के साथ-साथ उनकी दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रातःकाल में सूर्य की पहली किरण (उषा) और संध्याकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों को नमन किया जाता है।

छठ पूजा

छठ पूजा क्यों की जाती है?

  • ऐसी मान्यता है कि चौदह वर्ष की वनवास की अवधि पूरी करने के पश्चात् भगवान् राम, जानकी और लक्ष्मण के साथ कार्तिक अमावस्या के दिन अयोध्या लौटे थे, उसी दिन से दीपावली मनाई जाती है। अपने प्रिय राजा राम और रानी सीता के आने के उपलक्ष्य में राज्य भर में घी के दीये जलाए गए थे। राम के राज्याभिषेक के पश्चात् राम राज्य की परिकल्पना को ध्यान में रखकर राम और सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास रखकर प्रत्यक्ष देव भगवान् सूर्य की आराधना की और सप्तमी को इसे पूर्ण किया। पवित्र सरयू तट पर राम-सीता के इस अनुष्ठान से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया था। तब से छठ पूजा इस अंचल विशेष में लोकप्रिय हो गया।
  • एक पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल षष्ठी के सूर्यास्त एवं सप्तमी के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था। भगवान् सूर्य की आराधना करते हुए विश्वामित्र के मुख से अनायास ही वेदमाता गायत्री प्रकट हुई थीं। यह पवित्र मंत्र भगवान् सूर्य के पूजन का परिणाम था। तभी से कार्तिक शुक्ल षष्ठी की तिथि आर्यों के लिए परम पूज्य हो गई और छठ पूजा आर्यों का महान् धरोहर बन गया।
  • एक अन्य मान्यता है कि जुए में पांडव अपना राजपाठ, धन-दौलत सभी कुछ हारकर जंगल- जंगल घूम रहे थे, उस समय पांडवों के बुरे हाल, दुर्दशा और संकट से मुक्ति पाने के लिए द्रौपदी ने स्वयं सूर्यनारायण की आराधना करते हुए छठ पूजा व्रत किया। फलस्वरूप पांडवों को खोया राजपाठ, सम्मान, प्रतिष्ठा सभी कुछ प्राप्त हुआ।
छठ पूजा

सूर्य को समर्पित छठ पूजा नियम

  • प्रत्यक्ष देव भगवान् श्रीसूर्यनारायण की उपासना से व्रतधारी सुख- शांति, समृद्धि तथा मनोवांछित फल की कामना करते हुए, इस पर्व को आस्था, श्रद्धा, भक्ति एवं अत्यंत शुद्धता से पूरे 36 घंटे निर्जला रहते हुए, समीप के किसी स्वच्छ जलाशय अथवा नदी के तीरे जाकर, जल में षष्ठी तिथि को नहाकर उसी जल में खड़े होकर, सायंकालीन समय अस्ताचलगामी सूर्यदेव को तथा पुनः सप्तमी तिथि को व्रती द्वारा प्रातःकाल उसी स्थान पर जल में खड़े होकर उदीयमान सूर्यदेव को अर्घ्य देकर पूजा की जाती है।
  • पहले जरूरी है पवित्रता – यों तो घर की साफ-सफाई का काम रोशनी के उत्सव दीवाली के पहले ही हो जाता है, पर छठ के लिए सफाई के साथ पवित्रता का होना भी जरूरी है। यही कारण है कि धुले घर-आँगन फिर से धोए जाते हैं तथा छत की सफाई का खास ध्यान रखा जाता है, क्योंकि छठ पूजा में चढ़ाए जानेवाले प्रसाद ठेकुआ के लिए गेहूँ धोकर वहीं सुखाया जाता है। ठेकुआ बनाने के लिए बाजार से खरीदा आटा कतई इस्तेमाल नहीं किया जाता। धुले गेहूँ को पीसने के लिए आटा चक्कियों की भी विशेष सफाई की जाती है। यदि प्रसाद सामग्री रसोई में बनानी हो, तो रसोई में बिना स्नान प्रवेश वर्जित रहता है। ज्यादातर घरों में पूजा गृह में ही मिट्टी के चूल्हे का बंदोबस्त किया जाता है, जिसमें सूखी लकड़ियाँ जलाकर पूजा के लिए खास रखे बरतनों में प्रसाद बनाया जाता है।
  • कद्दू-भात का प्रयोग – छठ पूजा का शुभारंभ कद्दू-भात या नहाय-खाय से होता है। कद्दू-भात यानी लौकी की बिना लहसुन-प्याज की सब्जी और अरवा चावल का भोजन और नहाय-खाय यानी गंगा में स्नान करके भोजन पकाना व खाना।
  • घरों में तो कार्तिक मास के शुरू होते ही मांसाहार, लहसुन, प्याज जैसे तामसी भोजन बंद हो जाते हैं। व्रती यानी घर की प्रमुख महिला, जो छठ का व्रत रखती हैं, के साथ-साथ घर के सभी सदस्यों का उस दिन का खाना यही कद्दू-भात होता है।
छठ पूजा पूजन विधि

छठ पूजा में उपवास की शुरुआत

कद्दू-भात के अगले दिन व्रती महिला दिन भर का उपवास रखती है और संध्याकाल में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करती है। भगवान् के भोगस्वरूप कहीं खीर-पूड़ी या रोटी, तो कहीं चावल-दाल साफ-सफाई के कड़े नियमों का पालन करते हुए भोग बनाकर चढ़ाया जाता है। साथ में सभी मौसमी फलों का भी भोग लगता है। पूजा करने के बाद व्रती महिला भोग सामग्री से ही व्रत तोड़ती है, जिसे ‘खरना’ कहते हैं।

घर के सभी परिजन इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि व्रती महिला निःशब्द वातावरण में भरपेट भोजन कर ले, क्योंकि इसे अगला पूरा दिन निर्जल उपवास रखना होता है। ‘खरना’ के उपरांत घर के सभी लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस प्रसाद को ग्रहण करना काफी महत्त्वपूर्ण माना जाता है और आस-पड़ोस के जिन घरों में छठ पूजा नहीं होती, उनके सदस्य भी आकर श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण करते हैं।

सूर्यास्त की प्रतीक्षा में

तीसरा दिन काफी गहमागहमी भरा होता है, क्योंकि इसी दिन संध्या में डूबते सूरज को अर्घ्य देने के लिए गंगातट या पास के किसी अन्य नदी या तालाब पर श्रद्धालुओं का हुजूम जुटता है। इस दिन छठ पूजा के गीत गाए जाते हैं। सभी पूजन सामग्री को बाँस से बने सूपों में सजाकर साफ धुली धोती में बाँधकर श्रद्धापूर्वक सिर पर रखकर नंगे पैर घाट तक ले जाते हैं। घाट पर सूपों को अस्त होते सूर्य की दिशा क्रम में घी के दीये जलाकर रखते हैं।

व्रती महिला नदी में स्नान करती है और पानी में खड़े होकर ही भीगे आँचल को हथेलियों पर रखती है। दूसरा व्यक्ति प्रसाद सामग्री से सजे सूपों को एक-एक करके व्रती महिला की हथेलियों पर रखते जाते हैं और श्रद्धालु सूर्य देव का स्मरण करते हुए सूप के समक्ष जल का अर्घ्य देते हैं। सूर्य अस्त होते ही सभी समूह घर वापस आ जाते हैं।

अर्घ्य दिए सूपों को उसी श्रद्धा से पूजागृह में रखा जाता है। निर्जला व्रती महिला के साथ सभी को अगले दिन के सूरज की पहली किरणों की प्रतीक्षा रहती है और रात आँखों-आँखों में सूरज के इंतजार में कट जाती है।

छठ पूजा पूजन विधि

उगते सूर्य को नमन

सूरज के अँगड़ाई लेने से पहले ही सभी लोग नहा-धोकर, साफ कपड़े पहनकर घाट पर जाने को तैयार हो जाते हैं। सूपों के बीच की सामग्री रात में बदल दी जाती है। फिर उसी प्रकार सूपों को घाट पर ले जाकर सजाया जाता है। प्रज्वलित दीपों से सारा नदी तट रोशन हो जाता है।

बच्चे पटाखे-फुलझड़ियाँ चलाते हैं। व्रती नदी में स्नान कर भीगे वस्त्रों में सूपों को अपनी हथेलियों पर रखती है और सभी श्रद्धा से पूरब में लालिमा बिखेर रहे सूर्य देवता को अर्घ्य देती है। अगले दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही छठ पूजा संपन्न होती है और साथ ही पारिवारिक सामाजिक सौहार्द की सुखद अनुभूतियाँ शुरू होती हैं। घाट पर ही व्रती महिला से छोटे सभी लोग उनका चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं।

हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को संपन्न होनेवाले छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता है कि इतना भव्य धार्मिक आयोजन होने के बावजूद इसमें न तो किसी पुजारी की जरूरत होती है, न किसी कठिन अनुष्ठान की। बस साफ-सफाई, पवित्रता और व्यक्तिगत आस्था के दम पर संपन्न यह पर्व आज के युग में लोगों में परंपरा से जुड़ी चंद उन बातों को जीवित रख रही हैं, जो परस्परता और सामाजिकता की जीवन रेखा है।

छठ पूजा पूजन विधि

पूजा-अर्चना के समय शुद्ध घी के दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं, जिससे जलाशय अथवा नदी के तीर का दृश्य बड़ा ही मनोरम तथा लुभावना हो जाता है। इन दीपकों को जल में प्रवाहित किया जाता है। षष्ठी तिथि सायंकालीन अस्ताचलगामी सूर्यदेव को अर्घ्य देने के पश्चात् व्रती स्त्रियाँ अपने-अपने घरों के आँगन में विशेष अनुष्ठान के तहत ‘कोसी भरना’ कार्यक्रम करती हैं। इसके अंतर्गत चीनी अथवा गुड़ के साथ आटा मिलाकर पकाया हुआ ‘ठेकुआ’ मुख्य होता है।

छठ पूजा पूजन विधि

इसके साथ ही चावल के आटे में गुड़ मिलाकर बनाई गई ‘कचवनिया’ जो कि लड्डू की तरह होती है, के साथ गन्ना, नारियल, अमरूद, केला, सेब अथवा बाजार में उपलब्ध फल को लेकर गन्नों (सात) को खड़ा करके उसका घेरा बनाकर उसके अंदर उक्त प्रसाद को रखकर, लोकगीतों के माध्यम से सूर्यनारायण प्रभु की पूजा पूरी रात करती हैं। इस प्रकार के प्रसाद का बड़ा ही प्राचीन एवं पौराणिक महत्त्व है।

छठ पूजा का वैज्ञानिक महत्त्व

छठ पूजा की परंपरा में बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है। षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगोलीय अवसर है। उस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथासंभव रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में है। पर्व पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैंगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है। पृथ्वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिल सकता है।

सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैंगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वी पर आती हैं। सूर्य का प्रकाश जब पृथ्वी पर पहुँचता है तो पहले उसे वायुमंडल मिलता है। वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है। पराबैंगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है। इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैंगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है। पृथ्वी की सतह पर उसका केवल नगण्य भाग ही पहुँचता है।

सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुँचनेवाली पराबैंगनी किरण की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है। अतः सामान्य अवस्था में मनुष्य पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उस धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ ही होता है।

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