समाजशास्त्र का परिचय

समाजशास्त्र मुख्य रूप से समाज, सामाजिक सम्बन्धों, सामाजिक जीवन, सामाजिक घटनाओं, व्यक्तियों के व्यवहार एवं कार्यों, सामाजिक समूहों एवं सामाजिक अन्तर्क्रियाओं का अध्ययन करने वाला विषय है। यह एक आधुनिक विज्ञान है। इसमें मानव व्यवहार के प्रतिमानों और नियमितताओं पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया जाता है।

भारतीय सामाजिक व्यवस्था

भारतीय सामाजिक व्यवस्था के 5 आधार

भारतीय सामाजिक व्यवस्था वह स्थिति या अवस्था हैं जिसमें सामाजिक संरचना का निर्माण करने वाले विभिन्न अंग या इकाइयां सांस्कृतिक व्यवस्था के अंतर्गत निर्धारित पास्परिक प्रकार्यात्मक संबंध के आधार पर सम्बध्द समग्रता की ऐसी सन्तुलित स्थिति उत्पन्न करते हैं जिससे मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति तथा सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति संभव होती है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था …

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मानविकी उन्मेष,

बहुलवाद क्या है? भारतीय समाज में बहुलवाद

बहुलवाद – संस्कृति की पूर्व विवेचना से यह स्पष्ट हो चुका है कि संस्कृति से सम्बन्धित विभिन्न विशेषताएं सामाजिक संरचना को व्यापक रूप से प्रभावित करती हैं। एक ओर संस्कृति व्यक्तित्व के निर्माण का आधार है दूसरी ओर आज के बदलते हुए समाजों में संस्कृति का सार्वभौमिक रूप समाप्त होता जा रहा है। कुछ पहले …

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सभ्यता तथा संस्कृति

सभ्यता तथा संस्कृति में 5 अंतर व सम्बंध

साधारणतया सभ्यता तथा संस्कृति का एक ही अर्थ में प्रयोग कर लिया जाता है, लेकिन वास्तव में संस्कृति तथा सभ्यता की धारणा एक-दूसरे से अत्यधिक भिन्न है। इस दृष्टिकोण से यह आवश्यक हो जाता है कि प्रस्तुत विवेचन में हम सभ्यता के अर्थ को स्पष्ट करके इसका संस्कृति से अन्तर तथा सम्बन्ध स्पष्ट करेंगे। सभ्यता …

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man in white shirt carrying girl in gray shirt

परिवार

मानव सभ्यता के सम्पूर्ण इतिहास में परिवार का महत्व सबसे अधिक रहा है। व्यक्ति परिवार में जन्म लेता है तथा परिवार में ही उन सभी नियमों और व्यवहारों को सीखता है, जो उसे सच्चे अर्थों में एक सामाजिक प्राणी बनाते हैं। कोई समाज चाहे परम्परागत हो अथवा आधुनिक, ग्रामीण हो या नगरीय, धनी हो या …

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संस्था की विशेषताएं

संस्था

संस्था व्यक्तियों का कोई संगठन न होकर कुछ ऐसे नियमों अथवा कार्य-प्रणालियों का बोध कराती है, जिनके माध्यम से हम अपने विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करते हैं। व्यक्तियों द्वारा अपने विभिन्न हितों को पूरा करने के लिए जिन समितियों की स्थापना की जाती है, वे कभी-भी मनमाने रूप से कार्य नहीं कर सकतीं। उन्हें अपने …

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समुदाय

समाज के प्रकार

समाज के प्रकार – समाज के गत संपूर्ण विवेचन से स्पष्ट हो जाता है। कि सामाजिक संबंध ही समाज के निर्माण का वास्तविक आधार है। इसका तात्पर्य है कि सामाजिक संबंधों की प्रकृति के अनुसार ही समाज को भी एक विशेष स्वरूप प्राप्त हो जाता है। इस संबंध में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि …

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समुदाय

समाज

समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है। इसके बाद भी सभी सामाजिक विज्ञानों में ‘समाज’ शब्द का उपयोग एक-दूसरे से बहुत भिन्न अर्थ में किया जाता रहा है। बोलचाल की सामान्य भाषा में हम ‘समाज’ शब्द का उपयोग जिस अर्थ में करते हैं, समाज का समाजशास्त्रीय अर्थ उससे बहुत भिन्न है। साधारणतया हम यह समझते हैं …

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सामाजिक समूह की विशेषताएं, समाज की विशेषताएँ

समुदाय तथा समिति में अन्तर

समुदाय तथा समिति में अन्तर – समिति तथा समुदाय एक-दूसरे के पूरक हैं। मैकाइवर का कथन है कि “समिति एक समुदाय नहीं है बल्कि समुदाय के अन्तर्गत ही एक संगठन है।” यह कथन जहां एक ओर समिति और समुदाय के अन्तर को स्पष्ट करता है, वहीं इनकी पारस्परिक निर्भरता पर भी प्रकार डालता है। इसका …

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समुदाय

समिति

जब कुछ व्यक्ति अपनी एक या अधिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सहयोग के आधार पर किसी संगठन का निर्माण करते हैं, तब इसी संगठन को हम समिति कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि समितियां हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने का महत्वूर्ण साधन हैं। मैकाइवर ने लिखा है कि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की …

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समाज के प्रकार

समुदाय

समाजशास्त्र की प्राथमिक अवधारणाओं में समुदाय एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह इस दृष्टिकोण से प्राथमिक है कि एक ओर इसकी सहायता से एक विशेष मानव समूह की प्रकृति को समझा जा सकता है तथा दूसरी ओर, इसी के सन्दर्भ में समाज की अवधारणा को तुलनात्मक आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है। समुदाय की अवधारणा …

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सामाजिक समूह, समाज

द्वितीयक समूह

द्वितीयक समूह वे हैं, जिनमें प्राथमिक समूह की विशेषताएं नहीं पाई जातीं। ये समूह प्राथमिक समूहों की तुलना में कहीं अधिक बड़े होते हैं और इनके सदस्य एक-दूसरे से सैकड़ों मील दूर रहकर भी अपने बीच सम्बन्धों को बनाए रख सकते हैं। फलस्वरूप द्वितीयक समूह के सदस्यों के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्धों का होना आवश्यक नहीं …

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five human hands on brown surface

प्राथमिक समूह

चार्ल्स कूले ने प्राथमिक समूह को ‘मानव स्वभाव की पोषिका’ कहा है। कूले ने कुछ समूहों को ‘प्राथमिक’ इसलिए कहा है, क्योंकि महत्व के दृष्टिकोण से इनका स्थान प्रथम और प्रभाव प्राथमिक है। परिवार ही समाजीकरण का केन्द्र है, जहां बच्चा प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करता है। परिवार के पश्चात् दूसरा स्थान क्रीड़ा-समूह (play-group) का है। …

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समाज के प्रकार

सामाजिक समूह की विशेषताएं

सामाजिक समूह की विशेषताएं अनेक हैं, जोकि यहाँ विस्तारपूर्वक बतायी गयी है। सामाजिक समूह ऐसे व्यक्तियों का एकत्रीकरण है, जो एक-दूसरे के साथ क्रिया करते हैं और इस पारस्परिक क्रिया की एक इकाई के रूप में ही अन्य सदस्यों द्वारा पहचाने जाते हैं। समूह का अर्थ अधिक या कम ऐसे व्यक्तियों से है, जिनके बीच …

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समाज के प्रकार

सामाजिक समूह

सामाजिक समूह को समाजशास्त्रीय अध्ययन में एक ‘प्राथमिक अवधारणा’ के रूप में देखा जाता है। सच तो यह है कि विभिन्न प्रकार के सामाजिक समूह ही व्यक्ति को एक सामाजिक प्राणी बनाते हैं तथा उसकी विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। अपने जीवन में व्यक्ति जिन सामाजिक समूहों का सदस्य होता है, विभिन्न आधारों पर …

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मानविकी उन्मेष,

समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि

बीसवीं शताब्दी के विचारकों में सी. राइट मिल्स (C. Wright Mills) वह प्रमुख विचारक हैं जिन्होंने समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि के रूप में सामाजिक यथार्थ को समझने के लिए एक नए उपागम का उल्लेख किया। मिल्स ने ‘Sociological Imagination’ शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में किया है, उसका सम्बन्ध सामाजिक तथ्यों या घटनाओं का उनके यथार्थ रूप …

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समाजशास्त्र तथा मानवशास्त्र में संबंध

मानविकी उन्मेष

समाजशास्त्रीय अध्ययन के मानविकी उन्मेष का तात्पर्य सामाजिक घटनाओं का इस तरह अध्ययन करना है जिससे जटिल और परिवर्तनशील मानवीय सम्बन्धों और विभिन्न प्रकार के व्यवहारों को उनकी पृष्ठभूमि एवं कुछ विशेष अर्थों के सन्दर्भ में समझा जा सके। ऐसे अध्ययन पूरी तरह वस्तुपरकता पर जोर न देकर अध्ययन की विषयपरकता (Subjectivity) को भी महत्वपूर्ण …

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समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में संबंध

समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति

समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति – समाजशास्त्रियों में इस बारे में मतभेद हैं कि समाजशास्त्र की प्रकृति वैज्ञानिक है या नहीं अथवा यह कि क्या इसे एक विज्ञान के रूप में विकसित किया जा सकता है? बहस का एक मुद्दा यह भी है कि क्या समाजशास्त्र में प्राकृतिक विज्ञानों की तरह सिद्धान्तों का निर्माण करना सम्भव …

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समाजशास्त्र, प्राथमिक समूह

समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य – समाजशास्त्र क्या है ? इसे समझने के लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि हम इसके परिप्रेक्ष्य को समझें। शाब्दिक रूप से परिप्रेक्ष्य का अर्थ होता है— नजरिया या दृष्टिकोण। किसी भी घटना या वस्तु को देखने का हर व्यक्ति का अपना अपना एक विशेष नजरिया या दृष्टिकोण होता है। हमारा दृष्टिकोण …

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समाजशास्त्र

समाजशास्त्र

समाजशास्त्र समाज का व्यवस्थित और वैज्ञानिक अध्ययन है। इसके बाद भी समाजशास्त्र में हम जिस समाज का अध्ययन करते हैं, उसके बारे में हमें ऐसा लगता है कि समाज हमारे लिए कोई नया तथ्य नहीं है, क्योंकि हम सभी समाज में रहते हैं और समाज के बारे में पहले से ही कुछ-न-कुछ जानते हैं। वास्तविकता …

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समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र में संबंध

समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र में संबंध

समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र में संबंध – राजनीतिशास्त्र सामाजिक ज्ञान की वह शाखा है जो राज्य के स्वरूप, महत्व, संगठन, शासन सिद्धान्तों और नीतियों की व्याख्या करती है। इस प्रकार राजनीतिविज्ञान राज्य के जीवन अथवा सम्पूर्ण समूह के राजनीतिक भाग से भी सम्बन्धित है। समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र को आरम्भ से ही एक-दूसरे से सम्बन्धित माना जाता …

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समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में संबंध

समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में संबंध

समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में संबंध क्या है? अनेक अर्थशास्त्रियों ने समाजशास्त्र के सामान्य सिद्धान्तों को उपयोग में लाकर इस तथ्य को स्वीकार भी कर लिया है “अर्थशास्त्र जीवन की सामान्य दशाओं से सम्बन्धित उन आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन है जिनका उद्देश्य भौतिक सुख न होकर आर्थिक और सामाजिक कल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करना है। …

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समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान में संबंध

समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान में संबंध

समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान में संबंध – मनोविज्ञान मनुष्य की मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन है। यह उन मानसिक विशेषताओं से सम्बन्धित है, जो व्यक्ति को अनुभव करने, विचार करने और विभिन्न इच्छाओं तथा प्रेरणाओं के लिए क्षमता प्रदान करती है। साधारणतया ऐसा समझा जाता है कि समाज का निर्माण करने वाले पारस्परिक सम्बन्ध व्यक्ति की मानसिक …

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samajshashtra

समाजशास्त्र एवं समाजिक विज्ञान

समाजशास्त्र एवं समाजिक विज्ञान में क्या सम्बन्ध है? – समाजशास्त्र की प्रकृति को समझने के लिए यह जानना बहुत आवश्यक है कि दूसरे सामाजिक विज्ञानों की तुलना में समाजशास्त्र का स्थान क्या है? यह सच है कि समाजशास्त्र सम्पूर्ण समाज का एक सामान्य अध्ययन है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि समाजशास्त्र को ही …

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समाजशास्त्र की परिभाषा

सामाजिक क्रिया

सामाजिक क्रिया की प्रकृति को बहुत व्यवस्थित रूप से स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा “सामाजिक क्रिया कोई भी वह मानवीय दृष्टिकोण अथवा कार्य है जिसका सम्बन्ध क्रिया करने वाले लोगों के अर्थपूर्ण व्यवहार से होता है, चाहे वह कार्य करने की असफलता को स्पष्ट करता हो या निष्क्रिय स्वीकारोक्ति को।” इस कथन के द्वारा उन्होंने …

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समाजशास्त्र तथा मानवशास्त्र में संबंध

समाजशास्त्र तथा मानवशास्त्र में संबंध

समाजशास्त्र तथा मानवशास्त्र में संबंध क्या है? यह किस प्रकार सम्बंधित है? मानवशास्त्र यह विज्ञान है जो आदिकालीन मानव की शारीरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और उद्विकास सम्बन्धी विशेषताओं का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र और मानवशास्त्र एक-दूसरे से इतने घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है कि क्रोबर (Kroeber) ने इन्हें जुड़वां बहनें तक कह दिया है। ऐसा इसलिए …

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समाजशास्त्र तथा इतिहास में संबंध

समाजशास्त्र तथा इतिहास में संबंध

समाजशास्त्र तथा इतिहास में संबंध – अतीत की घटनाओं का क्रमबद्ध अध्ययन ही इतिहास है। प्रसिद्ध विद्वान वुल्फ (Wolf) का विचार है कि इतिहास विशेष राष्ट्रों, संस्थाओं, खोजों और आविष्कारों से सम्बन्धित है इस विज्ञान में हम उन सभी घटनाओं का अध्ययन करते हैं जो अतीत के समाज की विशेषताओं को स्पष्ट करती हैं। समाजशास्त्र …

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