विज्ञान शिक्षण

विज्ञान शिक्षण – शिक्षण उद्देश्यों की सफलता को उच्चतम ऊंचाई तक पहुंचाने में शिक्षण विधियों का महत्वपूर्ण योगदान है। शिक्षण कार्य की आधी सफलता शिक्षण विधियों में निहित है। समुचित शिक्षण विधियों के बिना शिक्षण उद्देश्यों की सफलता प्राप्ति उसी प्रकार है जिस प्रकार बिना पंख का पक्षी। शिक्षण विधि की सफलता शिक्षक विद्यार्थी तथा पाठ्यवस्तु पर निर्भर करती है।

विज्ञान शिक्षण

छात्र को सीखने के लिए शिक्षक का ज्ञान उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितनी कि शिक्षक द्वारा प्रयुक्त शिक्षण विधि। यदि कोई शिक्षक पाठ्यवस्तु के ज्ञान के रूप में विद्वता हासिल किए हुए हैं तो यह आवश्यक नहीं है कि छात्र भी शिक्षक के ज्ञान से उतने ही लाभान्वित हो। क्योंकि यदि शिक्षक ने छात्रों के अनुरूप शिक्षण विधि का प्रयोग नहीं किया है तो पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती। सभी छात्रों का मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक स्तर पर एक समान ना होने के कारण शिक्षक को सर्वप्रथम छात्रों के बौद्धिक स्तर को समझ कर उनके अनुरूप ही शिक्षण विधि का प्रयोग करना चाहिए।

ह्यूरिस्टिक विधि, विज्ञान शिक्षण

शिक्षण विधि से संबंधित कुछ विद्वानों के कथन हैं

विधि शिक्षक का भी शिक्षक है।

टेलीरेंड के अनुसार

व्यूह रचना अनुदेशन या शिक्षण की व्यापक विधियां होती है।

आइवर डेवीज के अनुसार

शिक्षण विधि एक प्रकार की कला है जो शिक्षक के व्यक्तित्व पर निर्भर करती है। यद्यपि शिक्षण की अनेक परंपरागत विधियां प्रचलित है फिर भी यह शिक्षक के विवेक, छात्रों की क्षमता, पाठ्य वस्तु तथा शिक्षण परिस्थितियों द्वारा निर्धारित होती है। इस संबंध में कोई एकमत संभव नहीं है कि कौन सी विधि उपयुक्त है या कौन सी अनुपयुक्त।

शिक्षण विधि का चुनाव शिक्षक तथा छात्रों के आपसी समन्वय पर निर्भर करता है क्योंकि इन दोनों का निकटतम संपर्क शिक्षण प्रक्रिया से है इन्हीं के द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों सूचियों प्रशिक्षण और विद्यालय में उपलब्ध शिक्षण सुविधाओं के आधार पर उचित शिक्षण विधि का निर्धारण किया जा सकता है।

विज्ञान शिक्षण की विधियां

इस प्रकार विज्ञान शिक्षण की रचनाओं में मुख्य रूप से विभिन्न विधियों, तकनीकों, कौशलों आदि को शामिल किया जाता है। इन विधियों को निम्नलिखित मुख्य भागों में विभाजित किया जा रहा है-

  1. परंपरागत एवं सामान्य विधियां
  2. ऐतिहासिक विधि
Science fair, बाल्यावस्था में मानसिक विकास

परंपरागत एवं सामान्य विधियां

परंपरागत विधियां सभी विद्यालय के विषयों के शिक्षण में अपनाई जा रही है। इनमें व्याख्यान ऐतिहासिक और पाठ्यपुस्तक विधियां शामिल हैं। इन विधियों की प्रभावहीनता के कारण शिक्षण में इनसे छुटकारा पाने के लिए 20 वीं सदी में अनुसंधानों के आधार पर प्रयास किए गए।

ऐतिहासिक विधि

ऐतिहासिक विधि विज्ञान शिक्षण के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय इतिहास शब्द को सुनते ही मन में जो प्रतिक्रिया होती है। उससे किसी प्रकार का उत्साह वर्धन नहीं होता है क्योंकि हमारे मस्तिष्क में इस शब्द के साथ इतिहास विषय जुड़ा हुआ है जो कि अपार तथ्यों का एक वृहत् भंडार है। लेकिन विज्ञान शिक्षण के संदर्भ में देखें तो प्राथमिक स्तर के विज्ञान में कहानी के रूप में किसी वैज्ञानिक द्वारा की गई खोज को विद्यार्थी के समक्ष प्रस्तुत करना अति रुचिकर होता है।

इसीलिए यदि ऐतिहासिक विधि को प्रभावी ढंग से उपयोग में लाया जाए तो विज्ञान के कुछ प्रकरणों का इस प्रणाली में विस्तार करना शिक्षण में अत्यंत स्वाभाविक होगा।

विज्ञान शिक्षण की कुछ महत्वपूर्ण प्रचलित विधियां निम्न है-

  1. व्याख्यान विधि
  2. प्रदर्शन विधि
  3. प्रयोगशाला विधि
  4. समस्या समाधान
  5. पाठ्यपुस्तक विधि
  6. ह्यूरिस्टिक विधि
  7. आगमनात्मक विधि
  8. निगमनात्मक विधि
गृहकार्य, सतत शिक्षा

विज्ञान शिक्षण में प्रतिमान का महत्व

शिक्षक के बारे में गुणात्मक सुधार लाने में प्रतिमान सहायक होते हैं। शिक्षण प्रतिमान शिक्षक को मनोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करते हैं जिनके द्वारा नवीन विधियों एवं प्रविधियों आदि का विकास किया जाता है। विज्ञान शिक्षण में प्रतिमान के निम्न महत्व होते हैं-

  1. शिक्षा के सभी उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु इनका अधिक महत्व है।
  2. शिक्षण प्रतिमानों द्वारा शिक्षक प्रशिक्षण को प्रभावपूर्ण बनाया जा सकता है।विद्यालयों की शिक्षण व्यवस्था एवं उसके उद्देश्यों की रूपरेखा तैयार करने में सहायक होते हैं।
  3. भारतीय परिस्थितियों में कक्षा शिक्षण की समस्याओं में सुधार लाने में सहायक है।
  4. शिक्षक प्रतिमान शिक्षण की मूल्यांकन प्रणाली को नवीनतम रूप देता है।
  5. विभिन्न विषयों के शिक्षण प्रतिमानों के प्रयोग का विशेष महत्व होता है।
  6. इसके प्रयोग से शिक्षण में विशिष्टीकरण संभव है।
  7. शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली और सार्थक बनाने में गतिमान सहायक होता है।
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