विज्ञान अर्थ परिभाषा

विज्ञान शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा की क्रिया Seire (जानना) और संज्ञा Scientia (ज्ञान) से हुई है। Science की प्राप्ति सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध ज्ञान व अनुभव पर आधारित अन्वेषणों के फल स्वरुप होती है।

अर्जित ज्ञान या अर्जित किए जाने वाले ज्ञान की एक विशिष्ट पहचान एवं विशेषता होती है। यह ज्ञान सामान्य विषयों के ज्ञान से कुछ अलग होता है। विज्ञान में किसी भी समस्या के समाधान के लिए एक विशिष्ट प्रक्रिया पर बल दिया जाता है। यह विशिष्ट प्रक्रिया ही ज्ञान प्राप्त करने की वैज्ञानिक विधि है तथा इस विशिष्ट प्रक्रिया के द्वारा अर्जित ज्ञान को विज्ञान कहते हैं।

विज्ञान

विज्ञान

वैज्ञानिक विधि के अंतर्गत ज्ञानार्जन के लिए या समस्या समाधान के लिए किसी समस्या की आवश्यकता होती है, जब हमारे समाज को समस्या उत्पन्न होती है, तो हम उस समस्या को हल करने के लिए संबंधित तथ्यों का संग्रह करते हैं। इन तथ्यों के आधार या सम्मिलित हल की परिकल्पना करते हैं।

परिकल्पना के सत्यापन के लिए विश्लेषण करते हैं तथा विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचते हैं, तब उस निष्कर्ष का समस्याएं करण करके उसे उपयोग में लाते हैं, यह प्रक्रिया ही विज्ञान की पहचान होती है।

विज्ञान की परिभाषा

विज्ञान की परिभाषाएं निम्नलिखित हैं-

विज्ञान प्राकृतिक विषय का व्यवस्थित ज्ञान एवं धारणाओं के मध्य संबंधों का तार्किक अध्ययन है, जिनमें यह विषय व्यक्त होते हैं।

डैंपियर के अनुसार

विज्ञान वैज्ञानिक विधियों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक मानसिकता के द्वारा प्राकृतिक घटनाओं के संबंध में ज्ञान प्राप्त करने की वह प्रक्रिया है जिसमें अधिगम अधिक सुव्यवस्थित तथा क्रमबद्ध ढंग से होता है।

कुलश्रेष्ठ के अनुसार

हमारी ज्ञान अनुभूतियों की अस्त-व्यस्त विभिन्नता को एक तर्कपूर्ण विचार प्रणाली में निर्मित करने के प्रयास को विज्ञान कहते हैं।

आइंस्टीन के अनुसार
विज्ञान की परिभाषा

विज्ञान वह मानवीय व्यवहार है जो घटनाओं की एवं उन परिस्थितियों की जो प्राकृतिक वातावरण में उपस्थित हो पूर्ण शुद्धता से व्याख्या करने का प्रयास करें।

वुडबर्न एवं ओबोर्न के अनुसार

विज्ञान निरंतर क्रांतिकारी परिवर्तन की स्थिति है और वैज्ञानिक सिद्धांत तब तक वैज्ञानिक नहीं होते हैं जब तक कि उन्हें आगामी अनुभव लगा समाज द्वारा परिवर्तन किया जाना निहित नहीं है।

कार्ल पॉपर के अनुसार

विज्ञान की प्रकृति

मनुष्य सदा से सृष्टि के पीछे छिपे सत्य की खोज में रहा है। उसे प्रकृति की बनावट, उसकी कार्यशैली तथा उसके मूल सिद्धांतों को जानने की तीव्र इच्छा रहती है। प्रकृति के कार्यों के नियमों को समझे बिना प्रकृत की शक्तियों को अपने सुख के लिए प्रयोग से लाना असंभव था। प्रकृति के नियमों के प्रतिकूल कार्य करने में कहीं संपूर्ण जीवन नष्ट ना हो जाए।

विज्ञान प्रत्येक तत्व का विश्लेषण करके प्रकृति के प्रत्येक भाग को बारीकी से समझने का प्रयत्न करता है। सृष्टि में बहुत से तथ्य बहुत जटिल है, इसलिए यदि उनका विश्लेषण करके उन्हें छोटे-छोटे भागों में बांट दिया जाए और फिर समझा जाए तो समझना आसान हो जाता है।

उदाहरण – चुंबकीय आकर्षण किस पर निर्भर है? इसे हम कई भागों में बांट सकते हैं जैसे क्या वह आकर्षित करने वाले चुंबक के ध्रुव की शक्ति पर निर्भर है? तथा क्या वह दोनों के बीच की दूरी पर निर्भर है? आदि।

जब कभी हम दो तथ्यों को सदा एक साथ घटित होते हुए देखते हैं तो हम तुरंत उनके बीच किसी संबंध की कल्पना कर लेते हैं। फिर इस कल्पना के आधार पर नए तत्वों की खोज की जाती है। वैज्ञानिक विचारणा पक्षपात रहित होती है। वैज्ञानिक विचार किसी व्यक्ति विशेष की धारणाओं पर निर्भर नहीं है और ना ही उन्हें किसी व्यक्ति की भावनाओं का कोई स्थान है। वैज्ञानिक केवल सत्य की खोज में रहता है।

जिन व्यक्तियों को वैज्ञानिक विधि में प्रशिक्षण नहीं मिला होता है वह अटकल से या व्यक्तिगत अनुमान से मूल्यांकन करते हैं। लेकिन जो वैज्ञानिक विधि में प्रशिक्षण प्राप्त होते हैं उनका मूल्यांकन तथ्यों के परिणामों के माप तोल या अन्य किन्हीं परीक्षणों पर आधारित होता है। इसलिए विज्ञान की प्रगति अच्छे मार्गों पर उस सीमा तक निर्भर रहती है जितना उन मापक यंत्रों का शोधन होता है और जितनी उनमें सूक्ष्मता आती है।

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