भारतीय समाज अर्थ परिभाषा आधार

भारतीय समाज – समाजशास्त्री समाज को एक अचित्रित या अमूर्त संप्रत्यय कहते हैं। समाज को सामाजिक संबंधों का जाल मानते हैं। साधारण भाषा में सामाजिक संबंधों से बने सामाजिक समूह को समाज कहते हैं। प्रत्येक समाज लगभग इसी प्रकार का ही होता है। भारतीय समाज भी इसी प्रकार का है परंतु भारतीय समाज को अनेक विद्वान भिन्न-भिन्न रूपों में मानते हैं और इसकी विवेचना करते हैं।

वर्तमान में भारत देश में लोकतंत्र आत्मक शासन प्रणाली है। लोकतंत्र किसी भी व्यक्ति से जाति, धर्म, वर्ग या संस्कृति के आधार पर भेदभाव नहीं करता है। भारत की संपूर्ण जनसंख्या भारतीय समाज का हिस्सा है।

भारतीय समाज
भारतीय समाज

उदीयमान भारतीय समाज का अर्थ

समाज गतिशील है। इसका विकास का भी सकारात्मक होता है। कभी इसका विकास नकारात्मक होता है जब कोई समाज विकास की ओर उन्मुख होता है। तो उसे उदीयमान समाज कहते हैं। उदीयमान समाज को निम्न शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है –

उदीयमान समाज से तात्पर्य उस समाज से होता है जो अच्छाइयों को स्वीकार कर रहा होता है और ऊर्ध्वगामी अर्थात विकास उन्मुख होता है।

अतः हमारा वर्तमान समाज उदीयमान समाज है। हमारे भारतीय समाज का इतिहास स्वर्णिम रहा है। इसमें शुरू से कल्याणकारी समाज था। परंतु आदिकाल से इस समाज में गिरावट आनी शुरू हो गई थी। उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मणों ने कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था को जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था कर दिया था, जिससे कल्याणकारी समाज शोषण युक्त समाज में बदल गया।

भारतीय समाज

बौद्ध धर्म के प्रादुर्भाव से मानवतावादी बौद्ध धर्म दर्शन का विकास हुआ। परंतु या भारतीय समाज पर अपना स्थाई प्रभाव छोड़ने में असफल रहा। मध्यकाल में मुस्लिम शासकों का शासन रहा है। उस शासन काल में भारतीय समाज का बहुत पतन हुआ। अंग्रेजों का शासन आया, उन्होंने हम पर बहुत अत्याचार किए। परंतु उन्होंने हमारे भारतीय समाज को जागरूक बनाया तथा भारतीय समाज की बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया।

भारतीय समाज के प्रमुख आधार

स्वतंत्रता के उपरांत हमारा यह कर्तव्य हो गया कि हमने समाज का निर्माण करें। अतः हमने लोकतंत्र की शासन प्रणाली को स्वीकार किया। हमारा स्वयं का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हो गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात संविधान में एक नवीन लोकतांत्रिक समाज की संकल्पना की गई है। संविधान प्रस्तावना में किस समाज की स्पष्ट रूपरेखा के हमें दर्शन होते हैं। इस समाज के प्रमुख से आधार बताए गए हैं।

  1. स्वतंत्रता
  2. समानता
  3. न्याय
  4. भ्रातृत्व
  5. समाजवाद
  6. धर्मनिरपेक्षता
भारतीय समाज
भारतीय समाज

स्वतंत्रता (Liberty)

लोकतंत्र का सबसे प्रमुख सिद्धांत स्वतंत्रता है। क्योंकि मनुष्य स्वतंत्रता को सबसे अमूल्य मानता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को विचारों की अभिव्यक्ति विश्वास आस्था एवं विकास करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा अनुसार कोई भी धर्म मानने की स्वतंत्रता है। संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को विचार करने, विचार व्यक्त करने, सभा करने, भ्रमण करने, आवास की व्यवस्था करने, संपत्ति अर्जित करने एवं उनका क्रय विक्रय करने और व्यवसाय एवं व्यापार के चयन में स्वतंत्र प्रदान की गई है।

लोकतंत्र किसी मनुष्य को दूसरे मनुष्य पर किसी समाज को दूसरे समाज पर और किसी राज्य को दूसरे राज्य पर अधिपत्य स्थापित करने का अधिकार नहीं देता। लोकतंत्र जियो और जीने दो की धारणा में विश्वास रखता है।

समानता

तंत्र का दूसरा प्रभुत्व स्तंभ समानता है। भारतीय लोकतंत्र मनुष्य मनुष्य में जाति,संस्कृतिधर्म एवं लिंग आज किसी भी आधार पर भेद नहीं करता। (अनुच्छेद 15) कानून के समक्ष सभी को समान समझता है। (अनुच्छेद 14)लोक सेवाओं में सभी को समान अवसर देता है (अनुच्छेद 16)सार्वजनिक स्थानों का प्रयोग करने के सभी को समान अवसर प्रदान करता है।

(अनुच्छेद 15) अस्प्रश्यता की समाप्त कर सभी को समान दर्जा देता है। (अनुच्छेद 17)और अंग्रेजों द्वारा प्रदत रायबहादुर आदि उपाधियों का अंत कर सभी को समान नागरिक मानता है। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार प्रदान करता है तथा प्रत्येक नागरिक से यही अपेक्षा की जाती है कि वह भी किसी के अधिकार का हनन न करें।

भारतीय समाज
भारतीय समाज

न्याय

लोकतंत्र का तीसरा आधार न्याय है। लोकतंत्र सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय का पक्षधर है। भारतीय लोकतंत्र में अस्प्रश्यता का निवारण कर के 6 से 14 आयु वाले वर्ग सभी बच्चों को शिक्षा के समान अवसर देकर और पुरुष एवं स्त्रियों को समान अधिकार देकर सामाजिक न्याय किया गया है।

बेगार प्रथा,दास प्रथा और बद्दुआ मजदूरी का अंत एवं स्त्री पुरुषों को समान कार्य के लिए समान वेतन का प्रावधान कर आर्थिक न्याय किया गया है और जाति, धर्म ,लिंग एवं शिक्षा आदि किसी भी आधार पर भेदभाव किए बिना सभी को वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार देकर राजनीतिक न्याय है। मूल अधिकारों का हनन होने में अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान द्वारा न्याय देने की भी व्यवस्था की गई है।

भ्रातृत्व

भारत में एकता का गुण प्रारंभ से ही विद्यमान है। अतः भारतीय संविधान में तत्वों के सिद्धांत का होना स्वाभाविक है। प्रत्येक व्यक्ति के मध्य हम भी भावना ही तत्व है। तत्व की भावना कोही शास्त्री की भावना भी कहते हैं, अर्थात संसार की किसी भी समस्या को विचार-विमर्श के माध्यम से दूर किया जा सकता है ना कि संघर्ष के द्वार।

समाजवाद

भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ समाजवाद भी है। समाजवाद का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है। सामाजिक संरचना तथा आर्थिक व्यवस्था के संदर्भ में। समाज की संरचना के संदर्भ में समाजवाद का अर्थ है वर्ग विहीन समाज जहां कोई भेदभाव नहीं है सबको समान दर्जा प्राप्त है। आर्थिक संदर्भ में समाजवाद का भिन्न अर्थ है।

आर्थिक समाजवाद का अर्थ है कि एक ऐसी व्यवस्था जहां उत्पादन और वितरण के साधन जनता के हाथों में हो और सरकारी स्वायत्तता हो और जहां सभी व्यक्तियों को श्रम के अनुसार ही पारिश्रमिक मिले, जहां शारीरिक व मानसिक श्रम के पारिश्रमिक में बहुत ही कम अंतर हो भारतीय समाज में सामाजिक समाजवाद की संकल्पना को स्वीकार किया गया है तथा सामाजिक संरचना के क्षेत्र में जाति,संस्कृति,धर्म ,लिंग आदि किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं बरता जाता है।आर्थिक क्षेत्र में भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई है। आर्थिक शोषण का विरोध तथा आर्थिक विकास के एक समान अवसरों की व्यवस्था द्वारा आर्थिक समाजवाद की व्यवस्था को लाने का प्रयास किया गया है।

धर्मनिरपेक्षता

धर्मनिरपेक्षता

संविधान के 42 वें संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में सेकुलर शब्द जोड़ा गया। इसका हिंदी अर्थ धर्मनिरपेक्ष है। साधारण बोलचाल की भाषा में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्मोंन्माद के विपरीत लिया जाता है।जहां सेकुलर का अर्थ है राज्य अपने नागरिकों के कल्याण का प्रयास, उनके धर्म के प्रति तटस्थ रहकर करता है भारतीय संविधान में धर्म परिवर्तन का निषेध किया गया है तथा राज्य द्वारा संचालित किसी भी शिक्षण संस्था में धर्म की शिक्षा नहीं की जाएगी एवं किसी भी धर्म के शिक्षा को जबरन दास जी द्वारा किसी व्यक्ति पर नहीं ठोकेगा।

भारतीय संविधान में उदीयमान समाज की संकल्पना को प्रकट किया गया। यह कहां तक प्रभावी हो पाया, यह कह पाना काफी कठिन है।परंतु वह महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए,उससे भारत एवं भारतीय समाज विकास की ओर कदम दर कदम विकसित हो रहा है।

आधुनिक भारतीय समाजसामाजिक परिवर्तनभारतीय समाज का आधुनिक स्वरूप
भारतीय समाज अर्थ परिभाषा आधारभारतीय समाज का बालक पर प्रभावधर्मनिरपेक्षता अर्थ विशेषताएं
आर्थिक विकाससंस्कृति अर्थ महत्वसांस्कृतिक विरासत
मौलिक अधिकारभारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्यप्रजातंत्र परिभाषा व रूप
प्रजातंत्र के गुण व दोषलोकतंत्र और शिक्षा के उद्देश्यसतत शिक्षा
भारत में नव सामाजिक व्यवस्थाजनतंत्र अर्थजनतंत्र और शिक्षा
स्त्री शिक्षाविकलांग शिक्षाभारत में स्त्री शिक्षा का विकास
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