प्राचीन धर्म ग्रंथ

प्राचीन धर्म ग्रंथ वेदों को माना जाता है। हिन्दू धर्म किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रवर्तित धर्म नहीं है। वेद संख्या में चार हैं जो हिन्दू धर्म के आधार स्तंभ हैं। अधिकतर हिंदुओं के पास अपने धर्म ग्रंथ को पढ़ने के लिए समय नहीं है। शास्त्रों को दो भागों में बांटा गया है श्रुति और स्मृति। श्रुति के अंतर्गत धर्म ग्रंथ, वेद आते हैं और स्मृति के अंतर्गत इतिहास और वेदों की व्याख्या की पुस्तकें पुराण, महाभारत, रामायण, स्मृतियां आदि आती हैं।

प्राचीन धर्म ग्रंथ
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प्राचीन धर्म ग्रंथ

भारत के सबसे प्राचीन धर्म ग्रंथ में वेदों का नाम आता है वेदो कि रचना महर्षि वेदव्यास ने कि थी। वेदों में श्लोकों को रचनाएं कहते थे। इनकी संख्या चार है-

  1. ऋग्वेद
  2. यजुर्वेद
  3. सामवेद
  4. अथर्ववेद

ऋग्वेद

यह सबसे प्राचीन वेद है। इसमें मंडलों की संख्या 10 है। 2 से 7 मंडल सबसे प्राचीन है। जिन्हें वंश कहकर पुकारा जाता है। पहला और दसवां मंडल सबसे बाद में जोड़ा गया है। ऋग्वेद के नवें मंडल में सोमरस का उल्लेख मिलता है। इसलिए इसे सोम मंडल भी कहते हैं। ऋग्वेद के 10वां मंडल पुरुष सूत्र है। जिसमें चार वर्णो से सुसज्जित समाज के निर्माण की स्थापना की गई है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।

  • ऋग्वेद के दसवें मंडल में ही पहली बार शूद्रों का उल्लेख किया गया है।
  • इसमें इंद्र को सबसे शक्तिशाली और प्रतापी देवता माना गया है। इंद्र को वर्षा एवं युद्ध का देवता माना जाता है।
  • इंद्र के लिए सबसे अधिक 250 सूक्त, अग्निदेव के लिए 200 सूक्त और वरुण देव के लिए 120 सूक्त का वर्णन किया गया है।
  • इस वेद में भगवान विष्णु के वामन अवतार का उल्लेख मिलता है।
  • ऋग्वेद में 25 नदियों का उल्लेख मिलता है। सिंधु नदी का सबसे अधिक बार उल्लेख किया गया है।
  • सरस्वती को सबसे पवित्र नदी माना गया है। गंगा नदी का केवल एक बार तथा यमुना नदी का तीन बार उल्लेख मिलता है।
  • ऋग्वेद के तीसरे मंडल में प्रसिद्ध गायत्री मंत्र लिखा गया है जो माता सावित्री को समर्पित है, जिसे विश्वामित्र ने लिखा।
  • ऋगवैदिक आर्यों का मुख्य व्यवसाय कृषि है यह पशुपालक भी थे।
  • ऋगवैदिक काल में समाज कबीलों में बैठा था जिसे जन कहते थे यह पांच कबीलो में बटा है जो निम्न वत है- अनु, दुह, पुर, यदु, तू
  • विश्व के नियामक देवता के रूप में वरुण देव का नाम मिलता है।
  • वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति सम्मानीय थी। इस काल में घो, अपाला, विश्वनाथ, गार्गी, लोपामुद्रा का उल्लेख मिलता है।
  • वहवल काल जिसमें यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, उपनिषद, ब्राह्मण ग्रंथ, पुराण, अरण्यक ग्रंथों की रचना की गई है वह काल उत्तर वैदिक काल कहलाता है।
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यजुर्वेद

यजुर्वेद को 40 अध्यायों में विभाजित किया गया है। प्राचीन धर्म ग्रंथ यजुर्वेद की रचना गद्य एवं पद्य दोनों में की गई थी। यजुर्वेद को दो भागों में बांटा गया है-

  1. शुक्ल यजुर्वेद
  2. कृष्ण यजुर्वेद
  • यजुर्वेद गद्य तथा पद शैली में लिखा गया है।
  • शुक्ल यजुर्वेद को बाजसनेयी संहिता के नाम से जानते हैं।
  • यजुर्वेद का ब्राह्मण ग्रंथ शतपथ तैत्रैय है।
  • शतपथ सबसे प्राचीन ब्राह्मण ग्रंथ है जिसमें 12 रत्नियों का उल्लेख मिलता है।
  • यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद है।
  • इस उपवेद की रचना विश्वामित्र ने की।
  • यजुर्वेद में यज्ञ कराने वाला आधरव्यू कहलाता है।
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सामवेद

सामवेद दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है साम+वेद। जिसमें साम का अर्थ होता है गान तथा वेद का अर्थ होता है ज्ञान।

  • सामवेद को भारतीय संगीत का जनक कहकर पुकारा जाता है।
  • सामवेद का अर्थ गायन होता है।
  • सामवेद की रचना मंत्रों का उच्चारण करने, देवी-देवताओं की स्तुति करने के उद्देश्य से की गई थी।
  • सामवेद के मंत्रों को गाने वाला उद्घगाता कहलाता है।
  • सामवेद के दो संबंधित ब्राह्मण ग्रंथ पंचविश एवं शदविश है।
  • सामवेद का उपवेद गंधर्व वेद है।
  • उपवेद वेद की रचना भरतमुनि ने की है।
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अथर्ववेद

अथर्ववेद की रचना महर्षि अथर्ववेद ने की थी। इस वेद में विभिन्न प्रकार के रोग का निरवारण बताया गया है। इसमें तंत्र मंत्र जादू करण, विवाह, प्रेम, शासन, संचालन, राजनीत का समावेश मिलता है।

  • अथर्ववेद अथर्ववेद का ब्राह्मण ग्रंथ गोपथ है।
  • अथर्ववेद का उपवेद शिल्प वेद है।
  • उपवेद के रचनाकार विश्वकर्मा है।
  • अथर्ववेद का यज्ञ कराने वाले को ब्रह्मा कहते हैं।
  • अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहकर पुकारा गया था।
  • अथर्ववेद में मगध निवासियों को वार्ता कहकर पुकारा जाता था।
  • ब्राह्मण ग्रंथों की रचना यज्ञ एवं कर्मकांड को समझाने के उद्देश्य से की गई थी।
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