नेतृत्व के सिद्धांत

नेतृत्व के सिद्धांत – नेतृत्व का विकास कैसे होता है इस संबंध में अलग-अलग विद्वानों ने अलग अलग सिद्धांत रखे हैं।

नेतृत्व के सिद्धांत
नेतृत्व के सिद्धांत

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नेतृत्व के सिद्धांत

वर्तमान में नेतृत्व के सिद्धांत से संबंधित निम्न नियम देखने को मिलते हैं-

  1. अयोग्यता में योग्यता का सिद्धांत
  2. संयोग का सिद्धांत
  3. विलक्षणता का सिद्धांत
  4. संतुलन का सिद्धांत
  5. समूह प्रक्रिया सिद्धांत

1. अयोग्यता में योग्यता का सिद्धांत

इस सिद्धांत की व्याख्या हम मनोविज्ञान के क्षेत्र पूर्ण के सिद्धांत के आधार पर करते हैं कि मनुष्य जब किसी एक क्षेत्र में आ योग्यता रखता है तो वह अपनी इस अयोग्यता की क्षतिपूर्ति स्वरूप अन्य क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करता है। इस सिद्धांत के अनुसार कुछ व्यक्तियों में कुछ कमियां होती हैं तो वह अपनी कमियों की क्षतिपूर्ति हेतु अन्य क्षेत्रों में उत्तम कार्य कर नेता बन जाते हैं। उदाहरण के लिए अध्ययन में कमजोर छात्र अच्छा खिलाड़ी बनकर टीम का नेता बन जाता है।

2. संयोग का सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार कभी-कभी कोई व्यक्ति सहयोग से ही नेता बन जाता है। किसी व्यक्ति को नेता बनने का सहयोग तभी मिलता है, जब उसके लिए निम्न तीन परिस्थितियां एक साथ उत्पन्न होती है-

  • व्यक्ति की श्रेष्ठ व्यक्तिगत योग्यता
  • किसी प्रकार के संकट या समस्या का पैदा होना
  • व्यक्ति को समस्या समाधान के लिए अपनी योग्यता प्रदर्शन के अवसर मिलना।
परीक्षा सुधार आवश्यकता, नेतृत्व के सिद्धांत
नेतृत्व के सिद्धांत

3. विलक्षणता का सिद्धांत

कुछ विद्वानों का मानना है कि नेतृत्व व्यक्ति की विलक्षण प्रतिभाओं का परिणाम है। इसके अनुसार कुछ व्यक्तियों में कुछ विशिष्ट योग्यताएं तथा गुण होते हैं जो दूसरों में नहीं होते हैं। वे अपने विशिष्ट गुणों के कारण समूह के अन्य सदस्यों को अपना अनुयाई बनाकर उसका नेता बन जाते हैं। इसे गुण सिद्धांत भी कहते हैं।

4. संतुलन का सिद्धांत

इस सिद्धांत के समर्थकों की मान्यता है कि नेतृत्व का विकास तभी होता है। जब किसी व्यक्ति के समस्त या अधिकांश नेतृत्व गुणों का संतुलित विकास होता है। यदि नेतृत्व गुणों का असंतुलित विकास होता है, अर्थात कोई एक दो गुण बहुत अधिक विकसित होते हैं तथा कुछ अन्य अपेक्षाकृत उतने ही विकसित हो पाते हैं तो उस व्यक्ति का नेतृत्व संकट में पड़ जाता है।

5. समूह प्रक्रिया सिद्धांत

कुछ विद्वानों का विचार है कि नेतृत्व समूह प्रक्रिया का परिणाम होता है। समूह के सदस्यों में परस्पर अंत: क्रियाएं विचार-विमर्श तथा परामर्श होते रहते हैं। इन्हीं के आधार पर कोई व्यक्ति समस्त समूह में से नेता उभर कर आता है। जो व्यक्ति समूह की आवश्यकता तथा समस्याओं को पुष्टि प्रदान कर देता है समूह उसी को अपना नेता मान लेता है।

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