हिन्दू विवाह एक अस्थायी वन्धन अथवा कानूनी समझौता नहीं है बल्कि इसे एक पवित्र धार्मिक संस्कार के रूप में देखा जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह एक ऐसा पवित्र बन्धन है जिसे जन्म-जन्मान्तर में भी तोड़ा नहीं जा सकता। भारतीय संस्कृति में व्यक्ति के लिए चार प्रमुख कर्तव्यों को पूरा करना आवश्यक माना गया है। इन्हें हम क्रमशः धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष कहते हैं।

ऐसा विश्वास किया जाता है कि विवाह के द्वारा ही व्यक्ति धर्म, अर्थ तथा काम की पूर्ति करके मोक्ष प्राप्त कर सकता है। इस दृष्टिकोण से हिन्दू विवाह का एक ऐसा धार्मिक संस्कार कहा जा सकता है जो पति-पत्नी को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके उन्हें अपने धार्मिक तथा सामाजिक कर्तव्यों को पूरा करने का अवसर प्रदान करता है।

हिन्दू विवाह के उद्देश्य

हिन्दू विवाह एक अनिवार्य धार्मिक कृत्य है। इसका कारण यह है कि विवाह के माध्यम से ही उन यों को पूरा किया जा सकता है जिनका हिन्दू जीवन में विशेष महत्व है। इस दृष्टिकोण से हिन्दू विवाह के तीन प्रमुख उद्देश्य है जिनका उल्लेख निम्नांकित रूप से किया जा सकता है:

  1. धार्मिक कर्तव्यों की पूर्ति– हिन्दू समाज का सबसे प्रमुख उद्देश्य धार्मिक क्रियाओं को पूरा करना है। विवाह का यह उद्देश्य सबसे अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि हिन्दू विश्वासों के अनुसार पत्नी के दिना व्यक्ति को किसी भी धार्मिक क्रियाओं को करने का फल नहीं मिलता। तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहा गया एवा पत्नी अर्थात विना पत्नी के व्यक्ति को यज्ञ करने का कोई अधिकार नहीं है। यह भी कहा गया है कि एकाकी पुरुष अधूरा है, उसकी पत्नी ही उसका अर्द्धभाग है। ‘धर्म’ का तात्पर्य समाज में दूसरे व्यक्तियों के प्रति उन कर्तव्यों को पूरा करने से है जिन्हें ‘यज्ञ’ कहा जाता है। इस प्रकार विवाह का उद्देश्य देव यज्ञ, ऋषि यज्ञ, पितृ यज्ञ, अतिथि यज्ञ तथा जीव यज्ञ को पूरा करना है। इसके अतिरिक्त माता-पिता की मृत्यु के बाद उनके श्राद्ध की व्यवस्था करने और देवताओं के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए भी विवाह एक माध्यम है।
  2. पुत्र – जन्म – हिन्दू विवाह का दूसरा प्रमुख उद्देश्य कम-से-कम एक पुत्र को जन्म देना है। भारतीय संस्कृति मैं पुत्र का विशेष महत्व है, क्योंकि वही अपने पूर्वजों को पिण्ड दान दे सकता है और उसी के द्वारा वंश की निरन्तरता को बनाए रखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति जब तक एक पुत्र को जन्म नहीं देता, तब तक वह पितृ ऋण से भी मुक्त नहीं हो सकता। यही कारण है कि विवाह संस्कार को पूरा करते समय यह कामना की जाती है कि “हम दोनों मिलकर एक यशस्वी और दीर्घायु पुत्र को जन्म दें।” परम्परागत रूप से, यदि एक पत्नी से पुत्र का जन्म न हो सके, तब ऐसी स्थिति में व्यक्ति को दूसरी स्त्री से विवाह करने की अनुमति दी गई थी।
  3. रति – रति का अर्थ समाज के नियमों के अनुसार यौन सम्बन्धों की स्थापना करना और इस तरह मानसिक उद्वेगों को सन्तुष्ट करना है। हिन्दू विवाह में रति का अभिप्राय ‘वासना’ अथवा व्यभिचार से नहीं है, बल्कि इसे एक पवित्र धार्मिक उद्देश्य के रूप में स्वीकार किया गया है। इसी कारण कुछ विशेष दशाओं में ही रति को पूरा करने की अनुमति दी गई है। इसके पश्चात् भी यह विवाह का सबसे निम्न कोटि का उद्देश्य है और इसलिए इसकी गणना सबसे बाद में की जाती है।

वास्तविकता यह है कि हिन्दू विवाह के ये उद्देश्य इतने उपयोगी प्रमाणित हुए हैं कि जो व्यक्ति भारतीय व्यवस्थाओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने का प्रयत्न कर रहे हैं, वे भी विवाह संस्था के इस परम्परागत रूप में कोई परिवर्तन करने के पक्ष में नहीं हैं। हिन्दू विवाह से सम्बन्धित कुछ नियम अवश्य रूढ़िगत हो गए हैं, लेकिन स्वयं इस संस्था की प्रकृति और उद्देश्य में कोई दोष नहीं है।

1. परम्परागत भारतीय सामाजिक व्यवस्था की आधारभूत विशेषताएं
1. भारतीय सामाजिक व्यवस्था के आधार
2. भारतीय समाज का क्षेत्रपरक दृष्टिकोण1. भारतीय समाज में विविधता में एकता
3. भारत का जनांकिकीय परिवेश1. भारतीय जनसंख्या के लक्षण
2. जनांकिकी
3. राष्ट्रीय जनसंख्या नीति
5. भारत में विवाह : हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई तथा जनजातीय1. विवाह के उद्देश्य व नियम
2. हिन्दू विवाह
3. मुस्लिम विवाह
4. हिंदू व मुस्लिम विवाह में अंतर
5. ईसाई विवाह
6. जनजातीय विवाह
6. भारत में परिवार तथा परिवर्तन की प्रवृत्तियां1. भारतीय संयुक्त परिवार
2. एकाकी परिवार
7. भारत में नातेदारी1. नातेदारी
2. पितृसत्ता
3. मातृसत्ता
4. वंश क्रम
5. वंश समूह
8. भारत में जाति व्यवस्था: परिप्रेक्ष्य, विशेषताएं एवं परिवर्तन के आयाम1. जाति अर्थ परिभाषा लक्षण

हिन्दू विवाह की विशेषताएँ

हिन्दू विवाह की प्रकृति अन्य समाजों से बहुत भिन्न है। जहां एक ओर मुसलमानों में विवाह एक ‘समझौता’ और ईसाइयों में इसे ‘मित्रतापूर्ण बन्धन’ माना जाता है, वहीं हिन्दू विवाह एक धार्मिक संस्कार है। हिन्दू विवाह को एक संस्कार कहने अथवा इसकी प्रकृति को ‘धार्मिक’ आधार पर समझने से पहले ‘संस्कार’ शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है।

संस्कार का अर्थ है वह कृत्य जिसके द्वारा व्यक्ति का परिष्कार अथवा शुद्धिकरण किया जाए। दूसरे शब्दों में, संस्कार वह धार्मिक विधि है, जो व्यक्ति को एक विशेष स्थिति में अपने कर्तव्यों का बोध कराती है। एक धार्मिक संस्कार के रूप में ही हिन्दुओं में विवाह को आवश्यक माना जाता है, क्योंकि परम्परागत विश्वासों के अनुसार इस संस्कार के बिना व्यक्ति मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता।

हिन्दू विवाह व्यक्ति में संयम और त्याग के गुण उत्पन्न करके उनका शुद्धिकरण करता है और साथ ही उसे पारिवारिक दायित्व का बोध कराके व्यक्ति में सामाजिक गुणों का विकास करता है। हिन्दू विवाह की सम्पूर्ण प्रक्रिया भी इसे धार्मिक संस्कार का रूप प्रदान करती है। विवाह की प्रक्रिया में कन्यादान, पाणिग्रहण, लाजा होम, अग्नि-परिणयन तथा सप्तपदी आदि ऐसे अनुष्ठान हैं, जो विवाह को एक धार्मिक बन्धन बना देते हैं।

विवाह के द्वारा न केवल पति-पत्नी जीवनपर्यन्त एक-दूसरे के साथ रहने की शपथ लेते हैं, बल्कि अग्नि और अनेक दूसरे देवताओं को साक्षी मानकर एक-दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करने का वचन देते हैं। इसी के माध्यम से अन्न, धन, सुख, सन्तान, बल और पारस्परिक निष्ठा की कामना की जाती है। ये सभी विशेषताएं हिन्दू विवाह को एक धार्मिक संस्कार बना देती हैं। हिन्दू विवाह की कुछ दूसरी विशेषताएं भी इसकी धार्मिक प्रकृति को स्पष्ट करके इसे एक संस्कार का रूप प्रदान करती हैं। ये विशेषताएं इस प्रकार हैं :

  1. धार्मिक कृत्यों की अनिवार्यता — हिन्दू विवाह सर्वप्रथम एक धार्मिक संस्कार इसलिए है कि जब तक कुछ विशेष अनुष्ठानों को पूरा नहीं किया जाता, विवाह को वैध नहीं माना जाता है। उदाहरण के लिए, कन्यादान, पाणिग्रहण, लाजा होम और सप्तपदी इस प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान हैं। इनमें से प्रत्येक अनुष्ठान के समय वर-वधू के लिए एक धार्मिक जीवन व्यतीत करने की कामना की जाती है तथा वर-वधू को उनके भावी कर्तव्यों का बोध कराया जाता है। यह विशेषता हिन्दू विवाह को व्यक्तित्व के परिष्कार के साधन अथवा दूसरे शब्दों में, धार्मिक संस्कार के रूप में स्पष्ट करती है।
  2. आध्यात्मिक सम्बन्ध – हिन्दू विवाह की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसे पति-पत्नी के भौतिक सुख का आधार नहीं माना जाता बल्कि हिन्दुओं की धारणा है कि विवाह एक आध्यात्मिक सम्बन्ध है जो जन्म-जन्मान्तर तक बना रहता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि पति-पत्नी का सम्बन्ध कभी समाप्त नहीं होता, बल्कि यह अनेक जन्मों तक स्थायी रहता है। इस विश्वास के कारण पति-पत्नी प्रत्येक परिस्थिति में एक-दूसरे से अनुकूलन करने की कोशिश करते रहते हैं। वे यौन सम्बन्धों को विवाह का उद्देश्य न मानकर पवित्रता की भावना को अधिक महत्व देते हैं।
  3. विवाह सम्बन्धों में स्थायित्व — हिन्दू विवाह एक स्थायी बन्धन है जिसे जीवन भर तोड़ा नहीं जा सकता। एक ओर स्त्री को यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसके पति के लिए उसका दान कर दिया गया है और दूसरी ओर, पुरुष को किसी भी परिस्थिति में उससे विवाद – विच्छेद करने की अनुमति नहीं दी जाती। यह सम्बन्ध इसलिए भी स्थायी है कि हिन्दू-जीवन में व्यक्ति को पुनर्विवाह की अनुमति साधारणतया नहीं दी जाती। विवाह के बाद परिवार में सभी धार्मिक क्रियाएं पति-पत्नी के पारस्परिक सहयोग द्वारा ही की जाती हैं और यह विश्वास किया जाता है कि जीवन-साथी के अभाव में किसी भी व्यक्ति को धार्मिक क्रियाओं का पुण्य प्राप्त नहीं होता फलस्वरूप हिन्दू विवाह में कहीं अधिक स्थायित्व आ जाता है।
  4. सामाजिक स्थिति का निर्धारण भारतीय समाज में व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का निर्धारण करने में विवाह को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। परम्परागत रूप से विवाह के द्वारा ही व्यक्ति को परिवार की सम्पत्ति में अधिकार मिलता था और इसी के द्वारा उसे धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने का अधिकार दिया जाता था। अविवाहित व्यक्ति को केवल सन्देह की दृष्टि से ही नहीं देखा जाता, बल्कि परिवार में भी उसे कोई स्थिति नहीं मिलती। विवाह एक ऐसा प्रवेश द्वार है जिससे गुजरने के बाद ही व्यक्ति की पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक स्थिति का निर्धारण होता है। हिन्दू जीवन में स्त्रियों को तो विवाह से पहले किसी प्रकार के भी अधिकार नहीं दिए जाते।
  1. ऋणों और पुरुषार्थ का आधार भारतीय संस्कृति में यह मान लिया गया है कि जब तक व्यक्ति अपने विभिन्न ऋणों से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक उसके व्यक्तित्व का वास्तविक विकास नहीं हो सकता। जैसा कि हम पहले कह चुके हैं, व्यक्ति विवाह के पश्चात् ही इन ऋणों से मुक्त हो सकता है। इसके अतिरिक्त विवाह ही व्यक्ति को ‘धर्म’, ‘अर्थ’ और ‘काम’ को पूरा करने के अवसर प्रदान करता है। सामान्यतया व्यक्तित्व का विकास तीन विशेषताओं पर निर्भर होता है—आर्थिक सफलता, पारिवारिक कर्तव्यों की पूर्ति तथा मानसिक स्थिरता हिन्दू-जीवन में इन तीनों गुणों का विकास से ही सम्बन्धित माना गया है। यही कारण है कि भारतीय समाज में एक अविवाहित व्यक्ति की अपेक्षा विवाहित व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास कहीं अधिक सरलता से कर लेता है।
  2. आगामी परिस्थितियों का पथ-प्रदर्शक हिन्दू विवाह की एक प्रमुख विशेषता यह है कि विवाह की के बीच ही व्यक्ति को उन सभी परिस्थतियों से परिचित करा दिया जाता है जो उसके पारिवारिक जीवन में आ सकती है। यह कार्य विभिन्न अनुष्ठानों के द्वारा किया जाता है। इसके फलस्वरूप विवाह की प्रक्रिया काफी लंबी हो जाती है, लेकिन इससे व्यक्ति अपने को आगामी जीवन के लिए तैयार करने में सफलता प्राप्त कर लेता है। विवाह की इस विशेषता ने हिन्दुओं के दृष्टिकोण को अधिक उदार और बना दिया है। इसी की सहायता से मानसिक संघधों की सम्भावना भी कम से कम हो सकी है।
  3. धार्मिक आदेशों और निषेधों से युक्त परम्परागत रूप से हिन्दू विवाह उन सभी आदेशों और दोशो से युक्त है जिनका हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। उदाहरण के लिए, अपनी जाति में विवाह करना, अपने धर्म में विवाह करना, विवाह को वैदिक रीति से पूरा करना तथा विवाह सम्बन्ध को सदैव स्थायी बनाए रखना इसके प्रमुख आदेश है। दूसरी ओर, अपने गोत्र प्रवर अथवा पिण्ड के व्यक्तियों में विवाह न करना, प्रतिम विवाह का बहिष्कार करना तथा विवाह को भौतिक सुख के दृष्टिकोण से देखना इसके कुछ प्रमुख निषेध है। इन धार्मिक आदेशों और निषेधों से हिन्दू विवाह का क्षेत्र कुछ सीमित जरूर हो गया है, लेकिन इससे विवाह को एक दृढ धार्मिक आधार प्राप्त हुआ है।

हिन्दू विवाह की उपर्युक्त सभी विशेषताएं इसके परम्परागत रूप से सम्बन्धित है। वर्तमान समय में इन विशेषताओं में तेजी से परिवर्तन हो रहा है, लेकिन फिर भी सभी व्यक्ति इसे एक धार्मिक संस्कार के रूप में ही देखते हैं।

1. परम्परागत भारतीय सामाजिक व्यवस्था की आधारभूत विशेषताएं
1. भारतीय सामाजिक व्यवस्था के आधार
2. भारतीय समाज का क्षेत्रपरक दृष्टिकोण1. भारतीय समाज में विविधता में एकता
3. भारत का जनांकिकीय परिवेश1. भारतीय जनसंख्या के लक्षण
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5. भारत में विवाह : हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई तथा जनजातीय1. विवाह के उद्देश्य व नियम
2. हिन्दू विवाह
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5. ईसाई विवाह
6. जनजातीय विवाह
6. भारत में परिवार तथा परिवर्तन की प्रवृत्तियां1. भारतीय संयुक्त परिवार
2. एकाकी परिवार
7. भारत में नातेदारी1. नातेदारी
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3. मातृसत्ता
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5. वंश समूह
8. भारत में जाति व्यवस्था: परिप्रेक्ष्य, विशेषताएं एवं परिवर्तन के आयाम1. जाति अर्थ परिभाषा लक्षण

हिन्दू विवाह के परम्परागत स्वरूप

मनुस्मृति में हिन्दू विवाह के आठ स्वरूपों का उल्लेख किया गया है। यह ध्यान रखना चाहिए कि हिन्दू विवाह के स्वरूपों का सम्बन्ध विभिन्न हिन्दू धर्मशास्त्रों तथा मुख्य रूप से मनुस्मृति में बताए गए आठ स्वरूपों से ही है। ये स्वरूप उन परिस्थितियों का बोध कराते है जिनके अन्तर्गत नियमित अथवा कुटिल तरीकों के द्वारा पुरुष किसी स्त्री पर अधिकार कर लेता था।

हिन्दू शास्त्रकार स्त्रियों की नैतिक प्रतिष्ठा को बहुत महत्वपूर्ण मानते थे, इसलिए ऐसे सम्बन्धों को भी किसी रूप से मान्यता प्रदान करके इन्हें विवाह के स्वरूपों के अन्तर्गत सम्मिलित कर लिया गया। हिन्दू विवाह की इन सभी की प्रकृति को संक्षेप में निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है।

1. ब्राह्म विवाह

ब्राह्म विवाह वह विधि है जिसके अन्तर्गत पिता कन्या के लिए उचित व योग्य वर की खोज करता है और उसे अपने यहां धार्मिक रीतियों के अनुसार आमन्त्रित करता है, अनेक धार्मिक संस्कारों के बाद कन्या को वस्त्र, अलंकार आदि से सम्पन्न करके वर को ‘दान’ के रूप में दे दिया जाता है। आज दान में दी गई वस्तु का दूसरा ही अर्थ लगाया जाता है, लेकिन प्राचीन समय में दान का अर्थ था ‘किसी सुपात्र को कोई वस्तु प्रदान करना’ आज के अधिकांश हिन्दू विवाह इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

2. दैव-विवाह

इस प्रकार के विवाह में ‘यज्ञ का महत्व सबसे अधिक है। प्राचीन समय में कन्या के पिता द्वारा एक यज्ञ की व्यवस्था की जाती थी और जो भी व्यक्ति उस यज्ञ को समुचित ढंग से पूरा करता था, उसी को कन्यादान कर दिया जाता था। इस प्रकार यज्ञ में किसी कुशल पुरोहित से अपनी कन्या का विवाह करना ही दैव विवाह था। आज के समय में यज्ञ का महत्व घट जाने के साथ-ही-साथ इस प्रकार के विवाह भी समाप्त हो चुके है।

3. आर्य विवाह

आर्य का शाब्दिक अर्थ ‘ऋषि’ है। प्राचीन समय में ऋषि लोग प्रायः विवाह के प्रति उदासीन होते थे, लेकिन यदि किसी समय वे विवाह की इच्छा करें, तब परिणामस्वरूप उनके लिए आवश्यक था कि मेहनत के द्वारा कुछ धन एकत्रित करके कन्या के पिता को एक गाय या बैल या इनका जोड़ा प्रदान करें। यह गाय अथवा बैल इस बात का प्रमाण था कि ऋषि अव विवाह करने का इच्छुक है तथा उन्होंने सामाजिक-आर्थिक जीवन में प्रवेश कर लिया है।

इस उपन्ना के बाद ही माता-पिता अपनी कन्या को ऋषि की पत्नी के रूप में उसके पास छोड़ देते थे और इस प्रकार उनको गृहस्थ जीवन व्यतीत करने का अवसर प्रदान किया जाता था।

4. प्रजापत्य विवाह

‘तुम दोनों मिलकर गृहस्थ धर्म का पालन करना और तुम दोनों का जीवन सुखी और समृद्धशाली हो” कहकर विधिवत कन्या को दान करना ही प्रजापत्य विवाह है। इस प्रकार इस विवाह द्वारा पति-पत्नी को यह आदेश दे दिया जाता है कि वे एक-दूसरे को धार्मिक कृत्यों में सहयोग देकर सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत करें। कुछ विद्वानों का विचार है कि प्रजापत्य विवाह तथा ब्राह्म विवाह में कोई अन्तर नहीं है।

सम्भवतः विवाह के आठ स्वरूपों की संख्या पूरी करने के लिए ही इसका उल्लेख कर दिया गया है। वास्तव में ऐसा नहीं है। प्रजापत्य विवाह ब्राह्म विवाह से इस अर्थ में भिन्न है कि इसमें विवाह के समय कन्या को वस्त्रों और अलंकारों का उपहार देना आवश्यक नहीं है। सम्भवतः यह वैदिक रीति से सामान्य व्यक्तियों के द्वारा किए जाने वाले विवाह थे, इसलिए इसका नाम ‘प्रजापत्य’ अर्थात् ‘जन साधारण का संरक्षण करने वाला’ रखा गया।

5. असुर विवाह

इसके अनुसार कन्या का एक निश्चित मूल्य रख दिया जाता है। जो भी व्यक्ति उस कन्या से विवाह करना चाहता है, उसे इस राशि का भुगतान कन्या के पिता को करना आवश्यक होता है। यह एक प्रकार की आसुरी प्रवृत्ति है, इसलिए ऐसे विवाहों को असुर विवाह कहा जाता है। साधारणतया उच्च जातियों में अब भी कहीं-कहीं कन्या मूल का निर्धारण किया जाता है और उस मूल्य का भुगतान करने वाले व्यक्ति को ही उस लड़की से विवाह करने का अधिकार प्राप्त होता है।

6. गान्धर्व विवाह

इस विवाह का दूसरा नाम ‘प्रेम विवाह भी है। यह विवाह कन्या व वर के पारस्परिक प्रेम का परिणाम है। इसके अन्तर्गत दोनों पक्ष अपने माता-पिता की अनुमति के बिना अपने को पति तथा पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। इसके बाद धार्मिक कृत्यों के करने पर ही ऐसा विवाह समाज के द्वारा मान्य होता है।

ऐसे विवाहों में शारीरिक सम्बन्ध साधारणतया विवाह से पहले ही स्थापित हो जाते हैं। बौधायन ने ऐसे विवाहों को सर्वोत्तम माना है, क्योंकि इसमें कन्या व वर दोनों को ही इच्छानुसार जीवन-साथी प्राप्त हो जाता है। इसी कारण कुछ गृह्यसूत्रों में ऐसे विवाहों को सुखी पारिवारिक जीवन के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है।

7. राक्षस विवाह

राक्षस विवाह का अर्थ है ‘छीनकर या कपट से कन्या से विवाह कर लेना। प्राचीन समय में ऐसे विवाहों का प्रचलन बहुत अधिक था। उस समय जीते हुए राजा पराजित राज्यों से अनेक सुन्दर कन्याओं का अपहरण कर लाते थे। कभी-कभी तो स्त्रियों को प्राप्त करने के लिए युद्ध भी किए जाते थे और शक्ति से कन्या को उठाकर ले जाया जाता था। ऐसे विवाह विशेषकर क्षत्रियों में ही होते थे, इस कारण ऐसे विवाहों को ‘क्षात्र विवाह’ भी कहा जाता है। उदाहरण के लिए, हम पृथ्वीराज व संयोगिता के ऐतिहासिक विवाह को ले सकते हैं जिसमें हरण के द्वारा संयोगिता से विवाह किया गया था।

8. पैशाच विवाह

मनु के अनुसार सोई हुई, उन्मत्त, मदिरापान की हुई अथवा राह में अकेली जाती हुई लड़की के साथ यदि व्यक्ति बलपूर्वक सहवास करके बाद में उससे विवाह कर ले, तब ऐसे विवाह को पैशाच विवाह कहा जाता है। यह विवाह के सभी तरीकों में अथम कोटि का है। ऐसे विवाहों को भी समाज स्वीकार कर लेता है यदि बाद में उचित धार्मिक कृत्य पूरे कर लिए जाएं।

यह स्वीकार किया गया है कि विवाह के इन आठ स्वरूपों में से पैशाच, राक्षस तथा असुर विवाह अप्रशस्त अथवा निम्न श्रेणी के हैं तथा समाज द्वारा पूर्णतया अमान्य हैं। गान्धर्व विवाह को कुछ विद्वानों ने स्वीकृति दी है, लेकिन कुछ स्मृतिकार इसके विपक्ष में हैं। ब्राह्म, दैव, आर्य तथा प्रजापत्य विवाह समाज के द्वारा मान्य हैं, लेकिन तो भी वर्तमान समय में ब्राह्म विवाह को ही समाज के द्वारा सबसे अधिक महत्व प्रदान किया जाता है।

वास्तव में, ये सब तरीके हिन्दू विवाह के स्वरूप नहीं है, बल्कि उन परिस्थतियों को स्पष्ट करते हैं जिनके अन्तर्गत किसी स्त्री से विवाह सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। इस प्रकार असुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच विवाह को ‘हिन्दू विवाह के स्वरूप’ न कहकर विवाह की कुछ असामान्य परिस्थितियां कहना उचित होगा। एक प्रश्न यह उठता है कि आधुनिक भारत में हिन्दू विवाह के कौन-कौन स्वरूप प्रचलित हैं? आज यज्ञों का प्रचलन लगभग समाप्त हो जाने के कारण देव विवाहों का कोई अस्तित्व नहीं रहा।

इसी प्रकार एक परम्परागत धारणा के रूप में न तो आज ऋषियों का कोई अस्तित्व है और न ही आर्ष विवाह का प्रचलन देखने को मिलता है। आज के युग में होने वाले युद्ध राष्ट्रीय स्तर के होते हैं, किसी व्यक्ति की इच्छा और समस्या से सम्बन्धित नहीं होते। इस प्रकार राक्षस विवाहों के प्रचलन का भी कोई प्रश्न नहीं उठता। पैशाच विवाह तथा असुर विवाह गैर-कानूनी इसलिए कोई व्यक्ति न तो किसी लड़की को खरीद सकता है और ही लड़की की सहमति के बिना बलपूर्वक ऐसा विवाह किया जा सकता है।

इस प्रकार वर्तमान समाज में केवल ब्राह्म, प्रजापत्य तथा गान्धर्व विवाहों का ही प्रचलन पाया जाता है। इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखना होगा कि ब्राह्म और प्रजापत्य विवाह को एक धार्मिक और नैतिक कृत्य के रूप में देखा जाता है, जबकि गान्धर्व विवाह के लिए जन सामान्य की स्वीकृति न होने पर भी पश्चिमीकरण के प्रभाव से इसका प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कुछ पिछड़ी हुई हिन्दू जातियों में असुर विवाह का प्रचलन भी अप्रत्यक्ष रूप से बना हुआ है, लेकिन ऐसे विवाहों को एक अपराधी प्रवृत्ति अथवा अपवादों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

हिन्दू विवाह के नियम

हिन्दू समाज ने विवाह के क्षेत्र में अनेक निषेध अथवा प्रतिबन्ध लगाए हैं। हिन्दू विवाह के ये निषेध मुख्य रूप से तीन हैं – अन्तर्विवाह, बहिर्विवाह तथा कुलीन विवाह

अन्तर्विवाह का नियम – हिन्दू विवाह

धर्मशास्त्रों के द्वारा प्रत्येक हिन्दू को अपने वर्ण अथवा जाति में ही विवाह करने की अनुमति दी गई। है. परन्तु व्यावहारिक दृष्टिकोण से आज भारत की प्रत्येक जाति बहुत-सी उपजातियों तथा क्षेत्रीय जातियों में बंटी हुई है और प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति में नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र की उपजाति में ही विवाह सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। इस प्रकार आज अन्तर्विवाह का अर्थ अपने ही वर्ण में विवाह करने से नहीं बल्कि अन्तर्विवाह का तात्पर्य है कि प्रत्येक व्यक्ति केवल अपनी उपजाति के अन्दर ही विवाह सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। व्यवहार में आज अन्तर्विवाह का तात्पर्य चार प्रमुख नियमों से है –

  1. व्यक्ति अपनी उपजाति में विवाह करे.
  2. यह उपजाति समान धार्मिक सम्प्रदाय को मानने वाली हो
  3. उप-जाति दूसरे सांस्कृतिक क्षेत्र की न हो
  4. उसकी सामाजिक – आर्थिक स्थिति समान स्तर की हो अर्थात् जाति अन्तर्विवाह, धर्म-अन्तर्विवाह, क्षेत्र अन्तर्विवाह तथा वर्ग-अन्तर्विवाह, वर्तमान समय में अन्तर्विवाह के चार प्रमुख स्वरूप है। इसी कारण केतकर ने व्यंग्यात्मक शब्दों में कहा है कि “भारत में करोड़ों हिन्दू आपस में इस प्रकार विभाजित हैं कि उनमें ऐसी जातियां भी हैं, जो पन्द्रह परिवारों के बाहर विवाह नहीं कर सकतीं।” इससे है कि विवाह के दृष्टिकोण से हिन्दू समाज बहुत से छोटे-छोटे समूहों में बंटा हुआ है।

उत्तर- वैदिक काल तक ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों वर्ण एक ही श्रेणी के माने जाते थे। इन तीनों वर्णों को एक ही नाम अर्थात् ‘द्विज’ के नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस कारण इन तीनों वर्णों के व्यक्तियों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं थे। अन्तर्विवाह की नीति के द्वारा केवल शूद्रों से ही सामाजिक दूरी को बनाए रखने का प्रयत्न किया जाता था।

जब चारों वर्ण एक-दूसरे से पृथक् हो गए तो अन्तर्विवाह का अर्थ अपने ही वर्ण में विवाह करना हो गया। स्मृतियों की रचना होने के बाद से जो भी व्यक्ति अपने वर्ण से बाहर विवाह करते थे, उन्हें अपवित्र समझकर उनका अपने समूह से बहिष्कार कर दिया जाता था। इन्हीं व्यक्तियों से नई-नई उप-जातियों का निर्माण होना आरम्भ हुआ। इसके फलस्वरूप धर्मशास्त्र युग तक प्रत्येक व्यक्ति का यह अनिवार्य नैतिक कर्तव्य हो गया कि वह अपनी उपजाति में ही विवाह सम्बन्ध स्थापित करे।

अनेक कारणों से भारत में अन्तर्विवाह के नियम को प्रोत्साहित मिला। सर्वप्रथम भारत में बहुत-सी प्रजातियां बाहर से आकर बसने लगी और इस कारण अपनी जाति में रक्त की विशुद्धता को बनाए रखने के लिए अन्तर्विवाह के नियम कठोर होने लगे। इसके अतिरिक्त, जैन व बौद्ध धर्मों का हास होने, बाल-विवाह के बढ़ने और मुस्लिम संस्कृति के प्रभाव के कारण धीरे-धीरे अन्तर्विवाह का क्षेत्र सीमित होता। इस नीति का सर्वप्रमुख कारण भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करना तथा अपनी जाति की पवित्रता को बनाए रखना था।

वर्तमान समय में अन्तर्विवाह के नियम का लगभग सभी हिन्दू जातियों द्वारा पालन किया जाता है, लेकिन आज पश्चिमी संस्कृति व शिक्षा के प्रभाव से हमारा दृष्टिकोण काफी बदल चुका है। आज शिक्षा और औद्योगीकरण से रोमांस के अवसर तेजी से बढ़े और फलस्वरूप अन्तर्विवाह के नियमों की कठोरता में भी कभी होने लगी। नए कानूनों ने भी ऐसे नियमों के प्रभाव को कम किया है।

सन् 1872 में ‘विशेष विवाह अधिनियम’ ने पहले ही अन्तर्जातीय विवाहों पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया था, लेकिन स्वतन्त्रता के बाद बने ‘हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955’ के द्वारा अन्तर्विवाह के निषेध को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया, लेकिन इन कानूनों के बाद भी व्यावहारिक रूप से हिन्दुओं में अन्तविवाह की नीति को व्यापक रूप से अपनाया जाता रहा है। कापड़िया का कथन है कि भारत में जाति की नैतिक शक्ति आज भी इतनी अधिक है कि केवल कानून द्वारा अन्तर्विवाह के नियमों को तोड़ा जा सकेगा, यह सन्देहजनक है।

बहिर्विवाह का नियम – हिन्दू विवाह

बहिर्विवाह एक ऐसा नियम है जिसका पालन करना प्रत्येक हिन्दू के लिए अनिवार्य समझा जाता रहा है। इसका आधार गोत्र प्रवर और पिण्ड की वे धारणाएं हैं जिनका स्मृतिकारों ने समय-समय पर मनमाने रूप से उपयोग करके हिन्दू सामाजिक जीवन में अनेक जटिल समस्याएं उत्पन्न कर दीं। वहिर्विवाह का निषेध इस बात पर बल देता है कि कोई भी हिन्दू अपने ही गोत्र प्रवर अथवा पिण्ड की कन्या से विवाह सम्बन्ध “स्थापित नहीं कर सकता। इस दृष्टिकोण से हिन्दू विवाह के बहिर्विवाह का नियम तीन शाखाओं में विभाजित है :

सगोत्र बहिर्विवाह – हिन्दू विवाह

गोत्र का अर्थ व्यक्तियों के एक ऐसे समूह से है जो एक ही पूर्वज से अपनी उत्पत्ति होने और इस प्रकार अपने में समान रक्त होने में विश्वास करते हैं। ईसा से 600 वर्ष पहले तक सम्भवतः सगोत्र विवाह पर कोई नियन्त्रण नहीं था, लेकिन इसके बाद अपने ही गोत्र के सदस्य के साथ विवाह सम्बन्ध स्थापित करने पर कठोर नियन्त्रण लगा दिया गया।

ऋग्वेद में ‘गोत्र’ शब्द का प्रयोग अनेक स्थानों पर मिलता है जिसके अनुसार गोत्र के तीन-चार सम्भावित अर्थ लगाए जाते हैं; जैसे- गोशाला, गाय का समूह. पहाड़ और किला आदि। इन अयों से भी यही स्पष्ट होता है कि आरम्भ में ‘गोत्र’ का तात्पर्य एक विशेष स्थान पर रहने वाले व्यक्तियों के समूह से था। बाद में स्मृतिकारों ने गोत्र का अर्थ एक पूर्वज की सन्तानों के रूप में स्पष्ट करके एक गोत्र के व्यक्तियों के बीच विवाह सम्बन्ध स्थापित करने पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिए।

गोत्र की धारणा चाहे वास्तविक हो अथवा पूर्णतया काल्पनिक, एक गोत्र के सदस्य अपने को रक्त सम्बन्धी मानते हैं और इस कारण अपने ही गोत्र के सदस्य से विवाह करना अच्छा नहीं समझते। विज्ञानेश्वर का कथन है कि वास्तविक गोत्र केवल ब्राह्मणों के ही होते हैं। इसके पश्चात् भी भारत में लगभग सभी जातियां किसी-न-किसी पूर्वज से अपनी उत्पत्ति का दावा करके अनेक गोत्र समूहों में विभाजित हैं और इस प्रकार वे अपने गोत्र के सदस्यों के साथ विवाह सम्बन्ध स्थापित करना नैतिक नहीं समझतीं।

सप्रवर बहिर्विवाह

‘प्रवर’ शब्द का अर्थ आह्वान करना है। वैदिक काल में अग्नि प्रज्वलित करते समय किसी प्रसिद्ध ऋषि अथवा पूर्वज का नाम लेकर अथवा उसका आह्वान करके यज्ञ आरम्भ किया जाता था। यज्ञ के समय एक ही ऋषि अथवा पूर्वज के नाम का उच्चारण करने वाले व्यक्ति धीरे-धीरे अपने आपको एक ही वंश का सदस्य मानने लगे और इस कारण उनमें आपस में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करना अनैतिक कार्य समझा जाने लगा।

इसी को सप्रवर बहिर्विवाह कहा जाता है। काणे का भी यही विचार है कि सगोत्र तथा सप्रवर विवाह पर तीसरी शताब्दी के बाद ही बहुत कठोर प्रतिबन्ध लगा दिए गए। वर्तमान युग में यज्ञों का प्रचलन न होने के कारण प्रवर की धारणा लगभग समाप्त ही हो चुकी है।

सपिण्ड बहिर्विवाह

हिन्दू समाज सपिण्ड विवाह पर कठोर प्रतिबन्ध लगाता है। पिण्ड का अर्थ दो प्रकार से लगाया जाता है— दायभाग के अनुसार पिण्ड का अर्थ चावल के उन गोलों से है, जो श्राद्ध के समय पूर्वजों को अर्पित किए जाते हैं। इस प्रकार एक ही व्यक्ति या पूर्वज को पिण्डदान करने वाले व्यक्ति आपस में सपिण्ड होते हैं और इसलिए उनके बीच वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकते। दूसरी ओर, ‘मिताक्षरा’ के अनुसार, पिण्ड का अर्थ ‘समान रक्त कणों’ से है।

इस प्रकार जिन लोगों में भी समान रक्त- हैं, वे आपस में सपिण्ड हैं और इसलिए उनके बीच विवाह सम्बन्ध निषिद्ध है। उदाहरण के लिए, पुत्र के शरीर में माता तथा पिता के रक्त का समावेश होता है, इस प्रकार वह माता और पिता का सपिण्ड होगा। दूसरे शब्दों में, हम यह कह सकते हैं कि जिन व्यक्तियों में समान पूर्वज का रक्त होने की सम्भावना की जाती है, वे सभी व्यक्ति सपिण्ड होते हैं।

वहिर्विवाह के नियम के अनुसार उनके बीच विवाह सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकते इसको स्पष्ट करने के लिए याज्ञवल्क्य ने माता की ओर पांच पीढ़ियों और पिता की और सात पीढ़ियों तक का उल्लेख किया है अर्थात् इतनी पीढ़ियों के अन्दर आने वाले स्त्री-पुरुषों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नहीं होंगे। महाभारत के समय में सम्भवतः सपिण्ड विवाह पर अधिक नियन्त्रण नहीं थे।

अर्जुन ने अपने मामा की लड़की से विवाह किया था। कृष्ण ने भी अपने मामा की लड़की रुक्मणी से विवाह किया, पर स्मृतियों की रचना होने के बाद से ऐसे विवाहों पर कठोरता से प्रतिबन्ध लगाया जाने गा जो कुछ भी हो, बहिर्विवाह का एकमात्र उद्देश्य एक विशेष समूह के अन्दर अनैतिकता की सम्भावना को रोकना है।

कुलीन विवाह का नियम – हिन्दू विवाह

कुलीन विवाह वह नियम है जिसके अनुसार एक लड़की का विवाह अपने बराबर अथवा अपने से ऊंची जाति और वंश के लड़के के साथ ही किया जाना चाहिए। इस प्रकार इस नियम से नीचे कुल की लड़कियों को वर प्राप्त करने के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं, लेकिन उच्च कुल की लड़कियों के लिए विवाह का क्षेत्र बहुत सीमित हो जाता है। संक्षेप में, कुलीन विवाह का निषेध इस धारणा पर आधारित है कि किसी भी स्थिति में लड़के की पारिवारिक और जातिगत स्थिति अपनी पत्नी की स्थिति से नीची नहीं होनी चाहिए।

अक्सर कुलीन विवाह को अनुलोम और प्रतिलोम से भिन्न मान लिया जाता है। यद्यपि इन दोनों धारणाओं में कुछ भिन्नता जरूर है, लेकिन इसका सम्बन्ध एक समय विशेष की परिस्थितियों से है। वास्तविकता यह है कि आरम्भ में हमारा समाज केवल दो वर्गों में विभाजित था द्विज तथा अन्य आर्य लोग अपने को द्विज कहते थे और द्रविड़ों से दास के समान व्यवहार करके उन्हें अन्त्यज की श्रेणी में रखा जाता था।

इस समय आर्यों में स्त्रियों की बहुत कमी थी. इसलिए आर्यों ने यह नियम बनाया कि आर्य पुरुष दास स्त्रियों से तो विवाह कर सकते हैं, लेकिन आर्य स्त्री की स्थिति इन दास अथवा द्रविड़ पुरुषों से उच्च होने के कारण उसका विवाह किसी द्रविड़ पुरुष से नहीं हो सकता।

इसी नियम को आरम्भ में ‘अनुलोम का नियम’ कहा गया। इस नियम का उल्लंघन करने अर्थात् उच्च स्थिति की स्त्री द्वारा अपने से निम्न स्थिति के पुरुष से विवाह करने को ‘प्रतिलोम’ कहा जाने लगा। बाद में जब हमारा समाज चार वर्णों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित हो गया, तब चारों वर्णों के बीच अनुलोम और प्रतिलोम का यह लागू हो गया। इस समय यदि उच्च वर्ण की कोई स्त्री अपने से निम्न वर्ण के पुरुष से विवाह करती थी तो इसे एक गम्भीर सामाजिक अपराध के रूप में देखा जाता था।

भारत में लगभग 2,000 वर्ष पहले एक-एक वर्ण के अन्दर बहुत सी जातियों का निर्माण होना आरम्भ हो गया। एक वर्ण के अन्दर बनने वाली जातियों की स्थिति भी समान नहीं रही, बल्कि उन्हें एक दूसरे की तुलना में उच्च अथवा निम्न सामाजिक स्थिति प्राप्त होने लगी। इसी प्रकार एक विशेष जाति से सम्बन्धित कुल अथवा परिवार भी उच्च और निम्न स्थितियों में विभाजित हो गए।

यहीं से अनुलोम के नियम ने कुलीन विवाह के नियम का रूप ले लिया। इसके अनुसार प्रत्येक कन्या के माता पिता का यह नैतिक कर्तव्य हो गया कि वे अपनी कन्या का विवाह अपने कुल और जाति के बराबर अथवा उससे उच्च स्थिति वाले पुरुष से करें। ऐसे विवाहों में कुल अथवा परिवार की सामाजिक स्थिति का महत्व बढ़ जाने के कारण ही इस नियम को कुलीन विवाह का नियम कहा जाने लगा।

कुलीन विवाह के दोष

वास्तव में, अनुलोम अथवा कुलीन विवाह के नियम का विकास इसलिए हुआ था जिससे उच्च सामाजिक स्थिति के पुरुषों को विवाह के अधिक अवसर मिल सकें, लेकिन जब इसे एक दृढ़ नियम का रूप मिल गया। तो इसके अनेक दुष्परिणाम सामने आने लगे-

  1. उच्च कुलों में लड़कों की मांग अधिक बढ़ जाने के बहुपत्नी विवाह की प्रथा का प्रचलन हो गया।
  2. इसके फलस्वरूप दहेज प्रथा का आरम्भ हुआ।
  3. उच्च कुल में लड़की का विवाह करने को इतना महत्व दिया जाने लगा कि एक कम आयु की लड़की का विवाह उच्च कुल के वृद्ध पुरुष से करना भी अच्छा समझा जाने लगा। इससे वेमेल विवाहों की संख्या में वृद्धि हुई।
  4. स्वाभाविक था कि इस स्थिति में बाल विधवाओं की समस्या में अभूतपूर्व वृद्धि होती।
  5. इसी के फलस्वरूप स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में भी बहुत हास हुआ। आज के नए सामाजिक विधानों द्वारा कुलीन विवाह के निषेध को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।
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हिन्दू विवाह में वर्तमान परिवर्तन

एक धार्मिक संस्कार के रूप में हिन्दू विवाह की प्रकृति अपने आदर्श रूप में थी, लेकिन सातवीं शताब्दी से लेकर बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक इसमें निरंतर रूढ़ियों का समावेश होता गया। इस दशा को स्पष्ट करते हुएपणिक्कर ने लिखा है कि “सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार जब कभी भी समाज में सुधार लाने का प्रयत्न किया गया, तब हमारी उन रूढ़ियों को और अधिक दृढ़ बनाने का प्रयत्न किया गया जिन्हें स्मृतिकारों का आशीर्वाद मिला हुआ था।

इसके फलस्वरूप जो नियम स्मृतिकारों के आशीर्वाद से फल-फूल रहे थे. उनमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया जा सका।” भारत में स्वतन्त्रता के वाद जब शिक्षा का प्रसार हुआ तथा सभी जाति के लोगों ने धर्मशास्त्रों के कथनों को समझना आरम्भ किया, तब उन्होंने अन्य संस्थाओं की तरह हिन्दू विवाह के नियमों का भी पुनर्परीक्षण करना आरम्भ कर दिया। हिन्दू समाज की यह विशेषता है कि इसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म की पुनर्विवेचना करने तथा धर्म के किसी पक्ष को मानने या न मानने की स्वतन्त्रता है।

इसके फलस्वरूप बदलती हुई दशाओं के अनुसार आज हिन्दू विवाह की प्रकृति तथा इसमें सम्बन्धित नियमों में परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हो चली है। हिन्दू विवाह में होने वाले कुछ प्रमुख परिवर्तनों को निम्नांकित रूप से देखा जा सकता है।

  1. धार्मिक पक्ष का हास— परम्परागत रूप से हिन्दू विवाह एक धार्मिक संस्कार था जिसका उद्देश्य पति-पत्नी द्वारा धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करना था। वर्तमान काल में कर्मकाण्डीय धर्म का प्रभाव कम हो जाने के कारण विवाह का यह धार्मिक पक्ष कमजोर पड़ता जा रहा है। परिवार में यज्ञों तथा पिण्डदान का महन बहुत कम रह जाने के कारण इन कार्यों को विवाह के उद्देश्य के रूप में नहीं देखा जाता। हिन्दू विवाह के द्वारा पुत्र को जन्म देना भी अब आवश्यक नहीं समझा जाता। पश्चिमीकरण के प्रभाव से अविवाहित स्त्री-पुरुषों की संख्या में भी निरन्तर वृद्धि हो रही है।
  2. विवाह विच्छेद में वृद्धि — अतीत में हिन्दू विवाह पति-पत्नी के बीच जन्म-जन्मान्तर का एक स्थायी सम्बन्ध था। आज शिक्षा तथा नगरीकरण के प्रभाव से पति-पत्नी द्वारा विवाह को मित्रता तथा सुविधा के बन्धन के रूप में देखा जाने लगा है। इसके फलस्वरूप जब कभी भी पति-पत्नी को एक-दूसरे से अनुकूलन करने में कठिनाई होती है, वे पृथक्करण अथवा विवाह विच्छेद को एक अधार्मिक कृत्य के रूप में नहीं देखते। कानून द्वारा भी हिन्दू विवाह विच्छेद का अधिकार मिल जाने से विवाह सम्बन्धों में अस्थिरता आई है।
  3. विवाह के नियमों में परिवर्तन — हिन्दू विवाह जिन मुख्य नियमों पर आधारित था, वे सभी नियम आज तेजी से बदल रहे हैं। आज कोई भी व्यक्ति न तो प्रवर वहिर्विवाह को मानता है और न ही कुलीन विवाह के नियम का पालन करता है। अन्तर्विवाह का नियम भी तेजी से शिथिल होता जा रहा है तथा अपनी जाति के बाहर विवाह को सामाजिक अपराध के रूप में नहीं देखा जाता। हिन्दू मनोवृत्तियां भी इस तरह उदार बनती जा रही है कि हिन्दू विवाह के परम्परागत नियमों को किसी धार्मिक सन्दर्भ में नहीं देखा जाता।
  4. हिन्दू विवाह की आयु में परिवर्तन—मृतिकालीन धर्म के अनुसार व्यक्ति के लिए यह आवश्यक या कि वह 8 से 12 वर्ष की आयु में अपनी कन्या का विवाह कर दे। इसके फलस्वरूप भारत तक बाल विवाह का प्रचलन रहा। आज कानून के द्वारा 18 वर्ष से कम की लड़की तथा 21 वर्ष से कम के लड़के का विवाह करना एक दण्डनीय अपराध है। अधिकांश माता-पिता स्वयं भी लड़की का विवाह तब तक उचित नहीं समझते जब तक भली-भांति शिक्षित और परिपक्व बुद्धि की न हो जाए।
  5. विवाह सम्बन्धी मनोवृत्तियों में परिवर्तन — हिन्दुओं में विवाह सम्बन्धी परम्परागत मनोवृत्तियों में आज आपके परिवर्तन हुए है। आज लड़की को दान में दी जाने वाली एक ‘वस्तु’ के रूप में नहीं देखा जाता कि जीवन साथी के चुनाव में उसकी स्वतन्त्र इच्छा को विशेष महत्व दिया जाने लगा है। कुछ समय पहले एक जहाँ विधवा पुनर्विवाह को एक अक्षम्य अपराध के रूप में देखा जाता था, वहीं अब विवाह-योग्य विधवाओं वाहको माता-पिता अपने नैतिक कर्तव्य के रूप में देखने लगे हैं।
  6. हिन्दू विवाह में समझीते का समावेश– हिन्दू विवाह की प्रकृति में आज अनेक ऐसे तत्त्वों का समावेश होने लगा है, जो इसकी समझौते वाली प्रकृति को स्पष्ट करते हैं। परम्परागत रूप से विवाह दो परिवारों का सम्बन्ध था, लेकिन आज समाचार-पत्रों में वैवाहिक विज्ञापनों के द्वारा जीवन साथी के गुणों की रूपरेखा पहले नत करके आवेदनों के द्वारा जीवन साथी का चुनाव करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती जा रही है। कभी-कभी ऐसे विवाह सम्बन्ध व्यावसायिक रूप ग्रहण कर लेते हैं, जो परम्परागत हिन्दू मूल्यों के विरुद्ध है।
  7. वैवाहिक विशेषाधिकारों की समाप्ति – हिन्दुओं में कुलीन विवाह के नियम के कारण उच्च जातियों के पुरुषों को विवाह के विशेष अधिकार प्राप्त थे जिनके फलस्वरूप बहुपत्नी विवाह को प्रोत्साहन मिला था। बंगाल के कुलीन ब्राह्मणों में बहुत-सी पत्नियां रखने का परम्परा इसी दोषपूर्ण नियम का परिणाम थी। आज कानून के द्वारा बहुपत्नी विवाह पर पूर्ण प्रतिबन्ध लग जाने के कारण उच्च जातियों के विवाह सम्बन्धी विशेषाधिकार समाप्त हो चुके हैं। इसके फलस्वरूप हिन्दू दाम्पत्य जीवन पहले की अपेक्षा अधिक व्यवस्थित बन सका है।

हिन्दू विवाह की प्रकृति तथा इससे सम्बन्धित परम्परागत व्यवहारों में होने वाले वर्तमान परिवर्तनों से जहां एक ओर अनेक वैवाहिक कुरीतियां समाप्त हुई हैं, वहीं इन परिवर्तनों ने कुछ नई समस्याओं को जन्म दिया है। प्रेम विवाह, अन्तर्जातीय विवाह तथा विवाह विच्छेद की बढ़ती हुई घटनाओं ने पारिवारिक जीवन में अनेक ऐसे तनाव उत्पन्न किए हैं जिनका पहले हिन्दू परिवारों में अभाव था।

विवाह में स्त्रियों की बढ़ती हुई स्वतन्त्रता से जहां नारी शोषण कम होता जा रहा है, वहीं व्यक्तिवादिता से उत्पन्न दशाएं दाम्पत्य जीवन को विघटित भी करने लगी हैं। इन सामान्य समस्याओं के बाद भी यह कहना अधिक उचित प्रतीत होता है कि हिन्दू विवाह से सम्बन्धित वर्तमान परिवर्तनों ने उन रूढ़ियों को समाप्त करने में विशेष योगदान किया है जिन्होंने स्मृतिकालीन धर्म की आड़ में नारी जीवन को अभिशप्त कर रखा था।

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