हिंदू व मुस्लिम विवाह में अंतर

हिंदू व मुस्लिम विवाह में अंतर – मुस्लिम विवाह के उपर्युक्त सम्पूर्ण विवेचन से स्पष्ट होता है कि मुस्लिम विवाह के आदर्श विवाह प्रक्रिया विवाह के स्वरूप निषेध तथा तलाक के आधार हिन्दू विवाह से काफी भिन्न है।

हिंदू व मुस्लिम विवाह में अंतर

कुछ प्रमुख आधारों पर हिंदू व मुस्लिम विवाह में अंतर निम्नांकित रूप से की जा सकती है-

  1. हिन्दुओं में विवाह एक धार्मिक संस्कार है। इसका अर्थ है कि हिन्दू विवाह का उद्देश्य धार्मिक कर्तव को पूरा करना है। विवाह के बिना व्यक्ति को धार्मिक क्रियाओं में भाग लेने का भी पूर्ण अधिकार प्राप्त नहीं होता। दूसरी ओर, मुसलमानों में विवाह एक सामाजिक समझौता है। मुस्लिम विवाह का कानूनी तथा सामाजिक उद्देश्य यौन सन्तुष्टि तथा बच्चों को वैध रूप प्रदान करना ही है। धार्मिक क्रियाओं को पूरा करने के लिए भी मुस्लिम समाज में पत्नी का होना आवश्यक नहीं समझा जाता।
  2. हिन्दू विवाह स्थायी बन्धन है जिसे तोड़ना हिन्दू सांस्कृतिक मूल्यों के विरुद्ध समझा जाता है। इसी आधार पर हिन्दुओं में विधवा पुनर्विवाह को मान्यता प्रदान नहीं की जाती। मुस्लिम विवाह के अन्तर्गत विवाह सम्बन्धों में स्थायित्व की उतनी प्रधानता नहीं है। इसके साथ ही मुसलमानों में ‘मुता’ विवाह का भी प्रचलन है जिसका उद्देश्य यौनिक सन्तुष्टि ही है।
  3. हिन्दुओं में कानून के द्वारा केवल एक विवाह का ही प्रचलन है। सामाजिक रूप से भी हिन्दुओं को एक से अधिक पत्नियां रखने की अनुमति प्रदान नहीं की गई है। मुसलमानों में आज भी बहु-पत्नी विवाह का प्रचलन बना हुआ है तथा सम्पन्न पुरुषों के द्वारा ही बहु-पत्नी विवाह के अधिकार का उपयोग पूरी स्वतन्त्रता के साथ किया जाता है।
  4. हिन्दुओं में दहेज प्रथा का प्रचलन है। दहेज वह राशि या उपहार है जो विवाह के समय कन्या पक्ष के द्वारा वर पक्ष को प्रदान की जाती हैं। दहेज की इस प्रथा को बहुत प्राचीन काल से ही सामाजिक तथा धार्मिक मान्यता मिली हुई है। इसके विपरीत, मुसलमानों में ‘महर’ का प्रचलन है। महर वह राशि है, जो पति द्वारा पत्नी को प्रदान की जाती है। महर की राशि के आधार पर मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति को पुरुषों से उच्च प्रमाणित करने का प्रयत्न किया जाता है।
  5. हिन्दुओं में किन्हीं भी ऐसे स्त्री-पुरुष के बीच विवाह सम्बन्ध स्थापित करने पर सामाजिक निषेध है जो एक ही गोत्र, पिण्ड अथवा प्रवर के हों। इस निषेध के द्वारा किसी भी ऐसे स्त्री तथा पुरुष के बीच विवाह सम्बन्ध को मान्यता प्रदान नहीं की जाती जिनमें काफी दूर तक रक्त सम्बन्ध अथवा धार्मिक सम्बन्ध होने की सम्भावना की जाती है। दूसरी ओर, मुसलमानों में बहुत पास के नातेदारों के बीच भी विवाह सम्बन्ध स्थापित करने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।
  6. परम्परागत रूप से हिन्दुओं में विवाह विच्छेद की एक अधार्मिक रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि विवाह विच्छेद से सम्बन्धित स्त्री तथा पुरुष उच्च सामाजिक स्थिति प्राप्त नहीं कर पाते। मुसलमानों में विवाह-विच्छेद को अनैतिक नहीं समझा जाता है। यही कारण है कि मुसलमानों में न्यायालय की सहायता के बिना भी सामाजिक रूप से तलाक की व्यवस्था की गई है।

इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि हिंदू व मुस्लिम विवाह में अंतर एक-दूसरे से काफी भिन्न है। इसके बाद भी मुसलमानों की संस्कृति भारतीय संस्कृति से इतनी प्रभावित हुई है कि मुसलमानों में भी विवाह-विच्छेद के प्रति निरन्तर उदासीनता बढ़ती जा रही है। हिन्दुओं के समान मुसलमानों में भी व्यावहारिक रूप से स्त्रियों का स्थान पुरुषों से काफी निम्न है। शिक्षा का विकास होने और सामाजिक जागरूकता में वृद्धि हो जाने से हिन्दू विवाह से सम्बन्धित कुरीतियों में काफी सुधार हुआ है, लेकिन मुस्लिम विवाह का रूप आज भी परम्परागत बना हुआ है।

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