सैडलर आयोग 1917

सैडलर आयोग – सन् 1913 के “शिक्षा संबंधी सरकारी प्रस्ताव” में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा की उन्नति एवं विस्तार के लिए अनेक बहुमूल्य विचार व्यक्त किए गए थे। किंतु इन विचारों को व्यावहारिक रूप प्रदान करने के लिए शिक्षाविदों की सहमति की आवश्यकता थी। अतएव शिक्षा आयोग की नियुक्ति का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। परंतु 1914 के आरंभ में होने वाले विश्व युद्ध ने आयोग की नियुक्ति को असंभव बना दिया और शिक्षा संबंधी सब सुधार कागज पर लिखे रह गए।

सैडलर आयोग 1917

विश्वयुद्ध समाप्ति से कुछ दिन पहले भारत सरकार ने कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति की। इस आयोग के अध्यक्ष विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ माइकल सैडलर थे आता उनके नाम पर इस आयोग को सैडलर आयोग भी कहा जाता है।

कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थिति एवं आवश्यकताओं की जांच करना और उसके द्वारा उपस्थित किए जाने वाले प्रश्न पर रचनात्मक नीति का सुझाव देना।

यद्यपि आयोग को केवल कोलकाता विश्वविद्यालय की जांच करनी थी। परंतु तुलनात्मक अध्ययन के लिए आयोग ने अन्य विश्वविद्यालयों का भी दौरा किया और सुझाव दिए।

हण्टर आयोग 1882, सैडलर आयोग
सैडलर आयोग

सैडलर आयोग का प्रतिवेदन

आयोग ने लगभग 17 माह के अथक परिश्रम के उपरांत मार्च 1919 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। रिपोर्ट 13 भागों में विभाजित थी। इसके अंतर्गत माध्यमिक एवं विश्वविद्यालय शिक्षा का पूर्ण विवेचन किया गया था और उन पर रचनात्मक सिफारिशें प्रस्तुत की गई थी।

  1. माध्यमिक शिक्षा संबंधी सिफारिशें
  2. कोलकाता विश्वविद्यालय संबंधित सिफारिशें
  3. भारतीय विश्वविद्यालयों से संबंधित सामान्य सिफारिशें
  4. मुस्लिम शिक्षा संबंधी सिफारिशें
  5. महिला शिक्षा संबंधी सिफारिशें
  6. शिक्षक प्रशिक्षण संबंधी सिफारिशें
  7. प्रौद्योगिक शिक्षा संबंधी सिफारिशें
  8. व्यवसायिक शिक्षा संबंधी सिफारिशें

हण्टर आयोग

लार्ड कर्जन की शिक्षा नीति, सैडलर आयोग
सैडलर आयोग

सैडलर आयोग के प्रतिवेदन की मुख्य विशेषताएं

भारत के विश्वविद्यालयों को आधुनिक रूप देने का श्रेय वास्तव में सैडलर आयोग को ही है। इस आयोग की नियुक्ति केवल कोलकाता विश्वविद्यालय के लिए की गई थी। इसके सुझाव भारत के सभी विश्वविद्यालयों पर लागू होते थे। उन्हें स्वीकार करके उनके अनुसार भारतीय विश्वविद्यालयों का पुनर्संगठन किया गया, जिससे विश्वविद्यालय वास्तविक अर्थों में ज्ञान के मंदिर बन सके। इस आयोग के प्रतिवेदन की मुख्य विशेषताएं निम्न प्रकार थी-

  1. आयोग के सुझावों से भारती विश्वविद्यालय परीक्षण संस्था मात्र ना रहकर शिक्षण और अनुसंधान के केंद्र बने। इससे उनमें नवजीवन का संचार हुआ।
  2. माध्यमिक शिक्षा के उत्तर दायित्व से मुक्त होकर विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा में अपना ध्यान केंद्रित कर सके।
  3. एकेडमिक काउंसिल में प्राध्यापकों को अधिक प्रतिनिधित्व प्राप्त होने से विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली अधिक जनतांत्रिक हो गई।
  4. काउंसिल ने विश्वविद्यालयों के शैक्षिक प्रशासन में प्रशंसनीय सुधार किए।
  5. पाठ्यक्रम में व्यवसायिक विषयों को स्थान मिल जाने के कारण विश्वविद्यालयी शिक्षा जीवनोपयोगी हो गई।
  6. अंतर विश्वविद्यालय बोर्ड के माध्यम से एक ऐसा मंच स्थापित हुआ जहां सभी विश्वविद्यालयों की समस्याओं पर सम्मिलित रूप से विचार किया जा सकता था।
  7. माध्यमिक शिक्षा परिषद के बन जाने से काम का बंटवारा हो गया जिससे कार्य कुशलता बढ़ी।
  8. माध्यमिक शिक्षा का माध्यम से मातृभाषा को बनाने के प्रति किए गए।
  9. शिक्षा के पाठ्यक्रम को भी जीवनोपयोगी बनाने का सुझाव दिया।
  10. आयोग के सुझावो ने स्त्री शिक्षा को भी प्रोत्साहित किया।
  11. आयोग का सुझाव विश्वविद्यालयों की शिक्षा में औद्योगिक शिक्षा को सम्मिलित किया जाना अति प्रशंसनीय है।
  12. आयोग के प्रतिवेदन में विश्वविद्यालयों में व्यवसायिक शिक्षा की व्यवस्था करना भी अति महत्वपूर्ण है।

सैडलर आयोग ने उच्च शिक्षा के विस्तार और संगठन के लिए अभीनंदनीय कार्य किया। केवल कोलकाता विश्वविद्यालय की स्थिति की जांच करने के लिए नियुक्त किया गया था, किंतु उसने और भी अनेक विश्वविद्यालयों की जांच करके भारत के सब विश्वविद्यालयों के संबंध में अति उत्तम सुझाव देकर उनका महान उपकार किया। कार इसलिए किया क्योंकि भारत सरकार ने आयोग के सभी सुझावों को सहर्ष स्वीकार करके, विश्वविद्यालयों में सुधार करने के लिए रचनात्मक कदम उठाए। इन सुधारों में सर्वश्रेष्ठ सुधार या था कि भारती विश्वविद्यालय केवल परीक्षा संस्थाएं ना रहकर शिक्षण और अनुसंधान के भी केंद्र बन गए।

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