सूक्ष्म शिक्षण

सूक्ष्म शिक्षण – शिक्षण के द्वारा ही शिक्षक, छात्रों में पाठ्य उद्देश्यों की प्राप्ति कर उसमें वांछित दक्षताओं का विकास करता है। शिक्षण कार्य की कुशलता शिक्षक के स्वःज्ञान पर निर्भर है, साथ ही शिक्षण कला कुशलता हेतु शिक्षक की दक्षता भी आवश्यक है। शिक्षा तकनीकी की यह धारणा है कि शिक्षक जन्मजात नहीं होते बल्कि उन्हें इस हेतु तैयार किया जाता है। शिक्षक दक्षता में शैक्षिक तकनीकी की प्रमुख भूमिका रही है।

सूक्ष्म शिक्षण

सूक्ष्म-शिक्षण शिक्षक प्रशिक्षण के क्षेत्र में 20वीं सदी की अभिनव देन है। इसके विकास का श्रेय कीथ एवीसन, राबर्ट बुश एवं डी.डब्ल्यू. एलन को जाता है जिन्होंने सर्वप्रथम नियन्त्रित रूप में ‘सीमित अध्ययन अभ्यास क्रम’ के द्वारा 1961 में छात्राध्यापकों के शिक्षण व्यवहार में वांछित परिवर्तन हेतु इसका प्रयोग किया। भारत में सर्वप्रथम शिक्षक प्रशिक्षण के क्षेत्र में डी.डी. तिवारी ने ‘सूक्ष्म शिक्षण’ शब्द का प्रयोग किया।

सूक्ष्म शिक्षण भी एक ऐसी ही तकनीकी है जो शिक्षकों में दक्षता विकसित करने का स्रोत है। इससे शिक्षक व्यवहार में अपेक्षित सुधार हो सकता है। शिक्षक व्यवहार में अपेक्षित सुधार तथा प्रभावशाली शिक्षक तैयार करने के उद्देश्य से जिस विधि का प्रादुर्भाव हुआ उसे Micro Teaching के रूप में जानते हैं।

सूक्ष्म शिक्षण

सूक्ष्म शिक्षण परिभाषाएं

सूक्ष्म शिक्षण शैक्षिक तकनीकी का एक ऐसा उपागम है जिसमें शिक्षण की जटिल प्रक्रिया के सभी अंगों को छोटे या सूक्ष्म रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

सूक्ष्म-शिक्षण सरलीकृत शिक्षण प्रक्रिया है, जो छोटे आकार की कक्षा में कम समय में पूर्ण होती है।

डी. डब्ल्यू. एलन

सूक्ष्म शिक्षण कम समय, कम छात्रों तथा कम शिक्षण क्रियाओं वाली प्रविधि है।

बी. एम. शोर के अनुसार

सूक्ष्म शिक्षण वह सूक्ष्मपदीय शिक्षण परिस्थितियाँ हैं जिनका आयोजन पुराने कौशलों में सुधार एवं नवीन कौशलों के विकास के लिए किया जाता है।

मेक्नाइट के अनुसार

सूक्ष्म-शिक्षण एक प्रशिक्षण विधि है जिसमें छात्राध्यापक किसी एक शिक्षण कौशल का प्रयोग करते हुए थोड़ी अवधि के लिए, छोटे छात्र समूह को कोई एक सम्प्रत्यय पढ़ाता है।

प्रो. बी. के. पासी के अनुसार
सूक्ष्म शिक्षण परिभाषाएं

सूक्ष्म शिक्षण के सिद्धान्त

मनोवैज्ञानिक स्किनर (1960) ने सक्रिय अनुबन्ध के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इस सिद्धान्त के अनुसार- “जब कोई प्राणी सक्रिय अनुक्रिया प्रदर्शित करता है और उसे तत्काल उसी समय प्रति पुष्टि या पुनर्बलन प्रदान किया जाता है तब उस व्यवहार को बार-बार प्रदर्शित करने की सम्भावना बढ़ जाती है।” सूक्ष्म शिक्षण का उद्देश्य भी शिक्षक में वांछनीय व्यवहार परिवर्तन उत्पन्न करना है अतः यह भी सक्रिय अनुबन्ध के सिद्धान्त पर आधारित है। इसमें प्रतिपुष्टि व पुनर्बलन आधार स्तम्न माने जाते हैं। एलन तथा रियान (1968) ने इसके पाँच सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया, जो निम्नवत् हैं –

  1. वास्तविक शिक्षण सिद्धान्त – Micro Teaching सूक्ष्म समय, छोटे आकार व सूक्ष्म पाठ्य-सामग्री का किसी विशेष कौशल प्रवीणता हेतु एक वास्तविक शिक्षण है।
  2. शिक्षण साध्यता का सिद्धान्त – सूक्ष्म शिक्षण द्वारा कक्षा-कक्ष के शिक्षण के दौरान आने वाली विभिन्न प्रकार की शिक्षण जटिलताओं को बार-बार के प्रयास द्वारा सरलता में बदल दिया जाता है। इस प्रकार शिक्षण साध्य और जटिलरहित हो जाता है।
  3. कौशल प्रशिक्षण सिद्धान्त – इसमें एक समय में किसी एक कौशल विकास एवं एक कार्य हेतु प्रशिक्षण पर बल दिया जाता है। विभिन्न शिक्षण कौशलों में से कम से कम 5 कौशलों में दक्षता प्राप्त करना आवश्यक होता है।
  4. नियन्त्रित अभ्यास सिद्धान्त – यह अभ्यास नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाने वाला शिक्षण अभ्यास है।
  5. प्रतिपुष्टि विकास सिद्धान्त – यह प्रक्रिया के परिणामों के मूल्यांकन से प्रतिपुष्टि के प्रभाव का क्षेत्र विकसित होता है जिससे स्थायित्व सबल होता है।
सूक्ष्म शिक्षण की विशेषताएं

सूक्ष्म शिक्षण की विशेषताएं

सूक्ष्म शिक्षण के पक्षधरों के अनुसार इसमें निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. सूक्ष्म-शिक्षण में शिक्षण क्रियाओं का वस्तुनिष्ठ ढंग से निरीक्षण किया जाता है और उनका निदान कर सुधार के लिए सुझाव दिए जाते हैं। इस प्रकार यह विधि एक उपचारात्मक विधि है।
  2. Micro Teaching में एक समय में एक शिक्षण कौशल सिखाया जाता है और शिक्षक प्रशिक्षणार्थी को अपने यथा शिक्षण कौशल के गुण-दोषों को स्वयं देखने-समझने के अवसर दिए जाते हैं और वह उसमें सुधार का प्रयत्न करता है। इस प्रकार यह स्वयं सीखने की विधि है।
  3. इसमें पुनर्बलन और प्रतिपुष्टि दोनों एक साथ मिलते हैं।
  4. सूक्ष्म शिक्षण तब तक चलता है जब तक शिक्षक प्रशिक्षणार्थी यथा शिक्षण कौशल को सीख नहीं जाता।
  5. इस विधि द्वारा सेवापूर्व और सेवारत दोनों प्रकार के शिक्षकों को दिया जा सकता है।

सूक्ष्म शिक्षण के गुण

सूक्ष्म शिक्षण की प्रविधि अध्यापक प्रशिक्षण के क्षेत्र में अभिनव प्रयोग है। इसके निम्न गुण हैं :

  1. इस प्रविधि द्वारा शिक्षण कौशल के प्रशिक्षण के लिए छात्राध्यापक को अन्य स्कूल में नहीं जाना पड़ता बल्कि महाविद्यालय में ही इसका प्रयोग किया जाता है।
  2. एक समय में एक ही शिक्षण कौशल विकास हेतु योजना तैयार करनी पड़ती है जिससे वास्तविक कौशल विकास होता है।
  3. यह वास्तविक शिक्षण है जो सामान्य कक्षा-शिक्षण की जटिलताओं से इतर है।
  4. अनुशासनहीनता की समस्या पर नियन्त्रण रहता है।
  5. इस प्रशिक्षण प्रविधि में तत्काल प्रतिपुष्टि की व्यवस्था होती है जिससे तत्काल स्वमूल्यांकन का अवसर मिलता है।
  6. इस प्रविधि में छात्राध्यापक को अन्य साथियों द्वारा निरीक्षण व प्रतिपुष्टि प्राप्त होता है जिससे सीखने हेतु अवसर मिलता है।
  7. इसके पदों में पुनः नियोजन, पुनः शिक्षण तथा पुनःमूल्यांकन की सुविधा होती है।
  8. छात्राध्यापकों को दो या दो से अधिक शिक्षण व्यवहारों की तुलना का अवसर प्राप्त होता है जो कौशल विकास हेतु उत्प्रेरक का कार्य करता है।
  9. छात्राध्यापकों को छात्र असहयोग समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है।
सूक्ष्म शिक्षण की विशेषताएं

सूक्ष्म शिक्षण प्रणाली की सावधानियाँ

यद्यपि इस प्रविधि के अनेक गुण हैं तथापि इसके प्रयोग में कतिपय सावधानियाँ अपेक्षित हैं-

  1. इस प्रविधि में उद्देश्यों की स्पष्टता का होना अतिआवश्यक है।
  2. एक कौशल पर आधारित पाठ योजना ही एक बार के लिए तैयार की जानी चाहिये।
  3. छात्राध्यापक में आत्मविश्वास जाग्रति हेतु आदर्श पाठ योजना का प्रस्तुतीकरण आवश्यक है।
  4. छात्राध्यापक की कमजोरियों की समालोचना तथा सुझाव रूप में प्रतिपुष्टि होना चाहिए।
  5. एक ही विषय वर्ग के छात्राध्यापकों को निरीक्षण का अवसर देना चाहिए।
  6. छात्राध्यापकों की सूक्ष्म पाठ योजना नियोजन अभ्यास हेतु सहायक है।

सूक्ष्म शिक्षण की कमियां

Micro Teaching के आलोचकों के अनुसार इसमें निम्नलिखित कमियाँ हैं-

  1. सूक्ष्म शिक्षण में कक्षा का आकार अपेक्षाकृत बहुत छोटा होता है, शिक्षण का समय अपेक्षाकृत कम होता है, पाठ्य सामग्री अपूर्ण होती है और एक समय केवल किसी एक शिक्षण कौशल का प्रयोग होता है और इस प्रकार सब कुछ अवास्तविक होता है।
  2. Micro Teaching के लिए 5-5 छात्रों की छोटी कक्षाओं का निर्माण और उसके लिए 10-10 मिनट हेतु ऐसी पाठ्य-सामग्री का चयन जिसमें किसी एक शिक्षण कौशल का ही प्रयोग हो, एक महाकठिन कार्य है।
  3. शिक्षण कौशल एक-दूसरे से जुड़े हैं। तब एक समय एक शिक्षण कौशल का प्रयोग कैसे सम्भव हो सकता है!
  4. सूक्ष्म शिक्षण के लिए आवश्यक उपकरणों (टेपरिकॉर्डर, वीडियो कैमरा, कैसेट्स और टेलीविजन) की व्यवस्था भी बहुत व्यय साध्य है और इनके प्रयोग के लिए भी बहुत अधिक समय की आवश्यकता होती है।
  5. लोगों का यह कहना भी गलत है कि सूक्ष्म शिक्षण द्वारा किसी शिक्षण कौशल का प्रशिक्षण कम समय और कम शक्ति द्वारा किया जा सकता है, इसमें तो बहुत अधिक धन, समय और शक्ति की आवश्यकता होती है।
सेमिनार के उद्देश्य, सूक्ष्म शिक्षण

सूक्ष्म शिक्षण की सीमाएं

  1. छोटे प्रशिक्षण महाविद्यालयों हेतु यह विधि असाध्य है क्योंकि सूक्ष्म शिक्षण प्रयोगशाला की व्यवस्था करना मँहगा पड़ता है।
  2. इस प्रविधि में प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता होती है।
  3. यह विधि निदानात्मक शिक्षण तथा उपचारात्मक शिक्षण कार्य पर ध्यान नहीं देती।
  4. कौशल दक्षता हेतु छात्राध्यापकों को उचित प्रेरणा का अभाव रहता है।
  5. सूक्ष्म शिक्षण की वास्तविक प्रविधि हेतु वीडियो, टेप रिकार्डर तथा अन्य उपकरण की आवश्यकता रहती है तभी यह प्रणाली प्रभावशाली सिद्ध हो सकती है
  6. सूक्ष्म शिक्षण प्रशिक्षण हेतु प्रशिक्षक की व्यावहारिक शिक्षण आस्था आवश्यक है। जिससे पूर्ण मनोयोग से प्रविधि संचालित हो।
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