सामाजिक प्रक्रियाएं

सामाजिक प्रक्रियाएं – एक व्यक्ति या समूह की दूसरे के साथ अन्तःक्रिया होती है और वह अन्तः क्रिया सहयोग, संघर्ष, प्रतिस्पर्धा, आदि किसी भी रूप में हो सकती है। अन्तःक्रिया के विभिन्न स्वरूपों को ही सामाजिक प्रक्रिया के नाम से पुकारा गया है। जब अन्तः क्रिया में निरन्तरता पायी जाती है और साथ ही जब वह किसी निश्चित परिणाम की ओर बढ़ती है तो ऐसी अन्तःक्रिया सामाजिक प्रक्रिया के नाम से जानी जाती है।

यदि दो व्यक्ति समय-समय पर एक-दूसरे से मिलते रहते हैं आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे की सहायता करते रहते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुख में हाथ बँटाते रहते हैं तो उनकी इस अन्तःक्रिया में निरन्तरता पायी जाती है। धीरे-धीरे उनके सम्बन्ध घनिष्ठ और मधुर होते जाते हैं और इसका परिणाम मित्रता के रूप में निकलता है, उनमें सहयोग पनपता है। यही सामाजिक प्रक्रिया है। सामाजिक प्रक्रियाएँ व्यक्ति, समूह, और समाज के जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं।

सामाजिक प्रक्रियाएं

अन्तःक्रिया के विभिन्न स्वरूपों को ही सामाजिक प्रक्रिया कहते हैं।

बीसंज के अनुसार

एक प्रक्रिया का अर्थ परिस्थिति पहले से ही मौजूद शक्तियों की क्रियाशीलता के माध्यम से एक निश्चित तरीके से होने वाले निरन्तर परिवर्तन से है।

मैकाइवर तथा पेज के अनुसार

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि सामाजिक प्रक्रियाएं सामाजिक जीवन में सदैव बनी रहने वाली और साथ ही परस्पर सम्बन्धित घटनाओं का वह क्रम है जो एक विशिष्ट परिणाम या परिवर्तन को जन्म देने के लिए उत्तरदायी है।

सामाजिक प्रक्रियाएं आवश्यक तत्व विशेषताएँ

  1. घटनाओं का एक रूप – किसी एक घटना को चाहे वह कितनी ही कम या अधिक महत्वपूर्ण क्यों न हो सामाजिक प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता। सामाजिक प्रक्रिया के लिए यह आवश्यक है कि उसमें विभिन्न घटनाओं का एक क्रम हो। आप सामाजिक प्रक्रियाएं Hindibag पर पढ़ रहे हैं।
  2. घटनाओं की पुनरावृत्ति – सामाजिक प्रक्रिया के अन्तर्गत कुछ घटनाओं का बार-बार घटित होना आवश्यक है। यदि कोई घटना एक बार घटित हो जाये तो उसे सामाजिक प्रक्रिया नहीं माना जायेगा। यहाँ तो घटनाओं की पुनरावृत्ति आवश्यक है।
  3. घटनाओं के वीच सम्बन्ध होना – सामाजिक प्रक्रिया के अन्तर्गत विभिन्न घटनाओं की प्रवृत्ति अलग-अलग हो सकती है, उनका क्षेत्र पृथक-पृथक हो सकता है, परन्तु उन सभी घटनाओं के बीच सम्बन्ध का होना अत्यन्त आवश्यक है। इस सम्बन्ध के अभाव में केवल घटनाएँ मात्र सामाजिक प्रक्रिया नहीं कहला सकती।
  4. निरन्तरता – सामाजिक प्रक्रिया के लिए घटनाओं की पुनरावृत्ति बार-बार होना ही काफी नहीं है। इसके लिए घटनाओं का निरन्तर बने रहना आवश्यक है। उदाहरण के रूप में सहयोग एक सामाजिक प्रक्रिया है। इसका कारण यह है कि सामाजिक जीवन में सहयोग की आवश्यकता सदैव बनी रहती है। सहयोग को व्यक्त करने वाली घटनाएँ समाज में घटित होती रहती हैं, उनमें निरन्तरता पायी जाती है। इतना अवश्य है कि किसी समय सहयोग की मात्रा कम और किसी समय अधिक हो सकती है।
  5. विशिष्ट परिणाम – परिणाम सामाजिक घटना का एक परम आवश्यक तत्व है। सामाजिक प्रक्रिया तो घटनाओं का ऐसा क्रम है जिसमें निरन्तरता का गुण पाया जाता है और जिसके कुछ निश्चित परिणाम अवश्य निकलते हैं। उदाहरण के रूप में सहयोग एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है जो व्यक्तियों और समूहों को एकता के सूत्र में बांधती है जो संगठन पनपती है जो प्रगति में योग देती है।

सामाजिक प्रक्रियाओं के प्रकार (स्वरूप)

गिलिन और गिलिन के अनुसार सामाजिक प्रक्रियाएं तीन प्रकार की होती है-

  1. सामान्य प्रक्रिया
  2. सहयोगी या सहभागी सामाजिक प्रक्रिया
  3. असहगामी और असहगामी सामाजिक प्रक्रिया

इसी प्रकार की सामाजिक प्रक्रियाओं को मूलतः दो भागों में बाँटा गया है सहयोगी तथा असहयोगी। सहयोगी, सहगामी, संगठनात्मक या एकीकरण करने वाली सामाजिक प्रक्रियाएँ तथा असहोगी, असहगमी, विघटनात्मक करने वाली सामाजिक प्रक्रियाएँ। सहयोगी या एकीकरण करने वाली सामाजिक प्रक्रियाओं के अन्तर्गत सहयोग, व्यवस्थापन (समायोजन) तथा सात्मीकरण आते हैं। असहयोगी या पृथक्करण करने वाली सामाजिक प्रक्रियाओं के अन्तर्गत प्रतिस्पर्द्धा, प्रतिकूलन तथा संघर्ष आते हैं।

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