सामाजिक परिवर्तन के कारक

सामाजिक परिवर्तन के कारक – सामाजिक जीवन के सम्बन्धों में परिवर्तन अनेक कारणों से हो सकता है और होता भी है। ये कारण प्राकृतिक या भौगोलिक हो सकता है, जनसंख्यात्मक हो सकते हैं, प्राणिशास्त्रीय भी हो सकते हैं या आर्थिक प्रौद्योगिकीय या सांस्कृतिक भी हो सकते हैं। परन्तु इस सम्बन्ध में स्मरणीय है कि सामाजिक परिवर्तन साधारणतया इसमें से किसी एक कारक के कारण घटित नहीं होता है। इसमें बहुधा एक से अधिक कारकों का योग रहता है।

हाँ, यह हो सकता है कि उन एकाधिक कारकों में कोई एक कारक मुख्य और दूसरे कारक केवल सहायक हों। इसके अतिरिक्त एक विशेष बात यह है कि ये कारक एक-दूसरे को भी प्रभावित करते रहते है। वास्तव में सामाजिक परिवर्तन एक जटिल प्रक्रिया है और इसे केवल एक कारक के आधार पर न तो समझा जा सकता है और न ही समझने का प्रयत्न करना वैज्ञानिक ही है। आप सामाजिक परिवर्तन के कारक Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

सामाजिक परिवर्तन के कारक

सामाजिक परिवर्तन किसी एक कारण से नहीं होता इसके लिए कई कारण उत्तरदायी होते हैं। अन्य शब्दों में सामाजिक परिवर्तन के कारक अनेक होते हैं-

  1. सामाजिक परिवर्तन के प्राकृतिक कारक
  2. सामाजिक परिवर्तन के प्राणिशास्त्रीय कारक
  3. सामाजिक परिवर्तन के जनसंख्यात्मक कारक
  4. सामाजिक परिवर्तन के आर्थिक कारण
  5. सामाजिक परिवर्तन के प्रौद्योगिकीय कारक
  6. सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारक

सामाजिक परिवर्तन के प्राकृतिक कारक

हटिंग्टन के अनुसार जलवायु का परिवर्तन ही सभ्यताओं और संस्कृति के उत्थान व पतन का एकमात्र कारण है जिस स्थान पर लोहा और कोयला निकल आता है वहाँ के समाज में तीव्रता से परिवर्तन होता है।” 21 जून, 1990 को ईरान में आये भूकम्प से 1 लाख से अधिक व्यक्तियों के मारे जाने का अनुमान है। 26 जनवरी, 2001 को गुजरात में भुज और आस-पास के क्षेत्रों में आये भूकम्प के कारण 50,000 व्यक्तियों की जान गई, कई लाख व्यक्ति घायल हुए व कई करोड़ रुपयों की क्षति हुई।

इसी प्रकार पश्चिमी बंगाल के भीषण अकाल के कारण कई माँ अपने बच्चों को छोड़कर चली गई, पति ने एक मुट्टी धान के लिए बच्चो व पत्नी को बेच दिया रोटी के टुकड़ों के लिए मनुष्यों व जानवरों में संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में जानवर विजयी हुआ क्योंकि मानव इतना दुर्बल व भूख से पीड़ित था वह रोटी छीनने में भी समर्थ नहीं था। प्रकृति के अनेक विकराल रूप जैसे – बाढ़, अकाल, भूकम्प आदि से मनुष्य पीड़ित होता है तथा इनकी शक्ति के सामने सिर झुकाकर नतमस्तक हो उनकी वन्दना में लग जाता है यही सब कारक (प्राकृतिक कारक) सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी होते है।

सामाजिक परिवर्तन के प्राणिशास्त्रीय कारक

सामाजिक परिवर्तन अनेक प्राणिशास्त्रीय कारकों से भी प्रभावित होता है। 1992-93 में आँकड़ों के अनुसार 50 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु 10 वर्ष से कम आयु में हो जाती थी जबकि 1992 में यह दर 10 प्रति हजार थी स्री पुरुष का समान अनुपात में न होने के कारण भी सामाजिक परिवर्तन होता है क्योंकि इससे बहुपति या बहुपत्नि प्रथा का विकास होता है। अगर लड़कों का जन्म अधिक होता है तो स्त्रियों में बाझपन पनपता है गुप्त रोग बढ़ते है ये कारण प्राणिशास्त्रीय कारकों को बढ़ावा देते हैं। आप सामाजिक परिवर्तन के कारक Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

मैकाइवर तथा पेज के अनुसार “सामाजिक परिवर्तन के दूसरे साधन सामाजिक निरन्तरता की जैविक दशा में, जनसंख्या के बढ़ाव तथा घटाव में प्राणियों व मनुष्यों की वंशानुगत दशा के ऊपर निर्भर करती है। जैविक या प्राणिशास्त्रीय कारक से तात्पर्य जनसंख्या के गुणात्मक पक्ष से है जो वंशानुक्रमण के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते है हमारी शारीरिक व मानसिक क्षमतायें, स्वास्थ्य व प्रजनन दर वंशानुक्रमण आदि प्राणिशास्त्रीय या जैवकीय कारणों से प्रभावित होते हैं।

सामाजिक परिवर्तन के जनसंख्यात्मक कारक

जनसंख्यात्मक कारक भी सामाजिक परिवर्तन के कारण होते हैं। अन्य शब्दों में जनसंख्या का आकार और घनत्व में परिवर्तन जन्म दर और मृत्यु दर के घटने-बढ़ने से कई परिवर्तन होते हैं। उदाहरण के लिए भारत में 1901 में जनसंख्या 24 करोड़ थी जो 2001 की जनगणना के अनुसार 1 अरब से अधिक अर्थात् 1,02,270, 1524 हो गई है। मॉल्थस के अनुसार अति जनसंख्या की स्थिति में भूखमरी तथा महामारी का प्रकोप होता है। आप सामाजिक परिवर्तन के कारक Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

उदाहरण के लिए सन् 1888 से सन 1900 तक भारत में 80 लाख व्यक्तियों की मृत्यु इसी कारण हुई। विभाजन के बाद 89 लाख शरणार्थियों के भारत आकर बसने से भारत के सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक जीवन में कई परिवर्तन हुए। जहाँ पर अनुकूल व आदर्श जनसंख्या होती है वहाँ के लोगों का जीवन स्तर ऊँचा होता है। जनसंख्या के विकास के साथ-साथ सामाजिक मान्यताओं, प्रथाओं व रीति-रिवाजों में भी परिवर्तन होता है। आप सामाजिक परिवर्तन के कारक Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

सामाजिक परिवर्तन के आर्थिक कारण

आर्थिक कारण भी सामाजिक परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण हैं जब कोई समाज कृषि समाज की अपेक्षा औद्योगिक स्तर पर आता है तो इस समाज की सामाजिक संस्थाओं, परम्पराओं, रीति-रिवाजों तथा जनरीतियों में व्यापक परिवर्तन होते हैं। भारत में औद्योगिक विकास के कारण कई परिवर्तन हुए है। आप सामाजिक परिवर्तन के कारक Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

सामान्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि किसी व्यक्ति के आर्थिक स्तर में परिवर्तन आने के पश्चात् उसके रहन-सहन तथा सामाजिक स्तर में स्वयं परिवर्तन आ जाता है। वर्ग संघर्ष, आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा आदि आर्थिक कारणों से उत्पन्न होता है। मार्क्स के अनुसार, हमारी सामाजिक संरचना, राजनीतिक संरचना विचार आदि सभी आर्थिक कारकों से प्रभावित होते हैं।

सामाजिक परिवर्तन के प्रौद्योगिकीय कारक

ऑगवर्न के अनुसार, “प्रौद्योगिकी हमारे वातावरण को परिवर्तित करके जिससे कि हम अनुकूलन करते हैं हमारे समाज को परिवर्तित करती है। यह परिवर्तन सामान्य रूप से भौतिक पर्यावरण में होता है और हम परिवर्तनों से जो अनुकूलन करते है उससे बहुधा प्रथाएँ और सामाजिक संस्थाएँ संशोधित हो जाती हैं।’ अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि विभिन्न अविष्कारों और औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप समाज में अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं।

आज हमारे जीवन में जो परिवर्तन दिखाई देते हैं वे सब औद्योगिक विकास के कारण ही होते हैं। वैबलन ने सामाजिक परिवर्तन लाने में प्रौद्योगिकी को एक महत्वपूर्ण कारक माना है। मैकाइवर तथा पेज के अनुसार भाप से चलने वाले इंजनों के कारण सामाजिक जीवन में अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए। ऑगबर्न ने भी रेडियो के आविष्कार के कारण उत्पन्न हुए 150 परिवर्तनों की सूची तैयार की। मशीनों के कारण व्यापार तथा वाणिज्य में उन्नति हुई इससे जहाँ व्यक्ति का जीवन स्तर सुधार हुआ तथा वही पर गन्दी बस्तियों का विकास भी हुआ तथा अपराधों में भी वृद्धि हुई।

सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारक

सांस्कृतिक कारक का सर्वाधिक पक्ष मैक्स वेबर, सोरोकिन, ऑगवर्न ने लिया। मैक्स वेबर ने विभिन्न धर्मों और व्यवस्थाओं की तुलना करके सांस्कृतिक परिवर्तनों के कारण बतायें। सोरोकिन ने सांस्कृतिक उतार-चढाव के आधार पर सामाजिक परिवर्तन बतायें। हमारे देश में पाश्चात्य संस्कृति ने भारतीय समाजों में अनेक परिवर्तन किये सामाजिक जीवन हमारे विश्वास, धर्म, प्रथा, संस्थाओं और रूढ़ियों पर निर्भर होता है व सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक परिवर्तन का कारक होता है। भारत में पाश्चात्य संस्कृति के कारक पर्दा प्रथा की समाप्ति, शिक्षा का प्रसार, स्रियों का नौकरी करना, संयुक्त परिवार विघटन और जाति प्रथा आदि अनेक परिवर्तन हुए।

भारत में सामाजिक परिवर्तन के कारक

उपरोक्त दिए गए कारकों के अलावा भारत में सामाजिक परिवर्तन के कारक अनेक हैं जो निम्न हैं-

  1. संस्कृतिकरण
  2. लौकिकीकरण
  3. नगरीकरण
  4. जनसंख्या (जन्म-दर तथा मृत्यु-दर)
  5. जनतन्त्रीकरण
  6. पश्चिमीकरण
  7. औद्योगीकरण
  8. प्रौद्योगीकरण
  9. सामाजिक नियोजन
  10. भारतीय स्वतन्त्रता
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