सामाजिक अध्ययन

सामाजिक अध्ययन – 19वीं शताब्दी में विभिन्न विषयों जैसे इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, राजनीतिकशास्त्र और समाजशास्त्र का अध्ययन एक-दूसरे से पृथक् विषय के रूप में होता था। वास्तव में सामाजिक अध्ययन विषय का प्रादुर्भाव सन् 1892 में संयुक्त राज्य अमरीका में हुआ। 1921 में इस विषय के संबंध में विस्तृत अध्ययन करने के लिए अमेरिका में राष्ट्रीय परिषद का तथा 1934 में एक कमीशन की नियुक्ति की गई। इसके बाद सामाजिक अध्ययन विषय के क्षेत्र में बहुत से अनुसन्धान कार्य किये गए जिनके फलस्वरूप सामाजिक अध्ययन के एकीकृत स्वरूप का विकास हुआ और इसको क्षेत्रीय विषय के रूप में मान्यता प्रदान की गई।

भारत में सामाजिक अध्ययन विषय का चयन महात्मा गाँधी की बेसिक शिक्षा के साथ प्रारम्भ हुआ। गाँधी जी विभिन्न सामाजिक विषयों के समन्वित रूप पर जोर देते थे। इसके उपरान्त विश्वविद्यालय कमीशन, माध्यमिक शिक्षा आयोग तथा कोठारी कमीशन ने समन्वित ज्ञान के महत्व को समझा व उस पर प्रकाश डाला। उन्होंने आधुनिक शैक्षिक परिवेश में सामाजिक अध्ययन को महत्व प्रदान कर एक आवश्यक विषय के रूप में प्रतिपादित कर इसके मान्यता प्रदान की।

पर्यावरण शिक्षा, सामाजिक अध्ययन

सामाजिक अध्ययन

सामाजिक अध्ययन को अंग्रेजी में Social studies कहते हैं। यहाँ Social से तात्पर्य ‘समाज का’ तथा Studies से तात्पर्य ‘अध्ययन’ से है। इस प्रकार Social studies (सामाजिक अध्ययन) का अर्थ है- समाज का अध्ययन। वैसे तो समाज का अध्ययन विभिन्न दृष्टिकोणों से किया जाता है किन्तु सामाजिक अध्ययन का विषय मानवीय परिप्रेक्ष्य में निहितार्थ है। अतः यहाँ सामाजिक अध्ययन का शाब्दिक अर्थ है- मानवीय परिप्रेक्ष्य में समाज का अध्ययन।

सामाजिक अध्ययन वह अध्ययन है जो मानव जीवन के रहन-सहन के ढंगों, मूलभूत आवश्यकताओं, क्रियाओं जिनमें मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लगा रहता है तथा संस्थाओं, जिनका उसने विकास किया है, का ज्ञान प्राप्त करता है।

शैक्षिक अनुसन्धान विश्वकोश के अनुसार

सामाजिक अध्ययन वह क्षेत्र है जो युवकों को उस ज्ञान, सूचना तथा क्रियात्मक अनुभवों के द्वारा सहायता प्रदान करता है, जो मूलभूत मूल्यों, वांछित आदतों, स्वीकृत वृत्तियों तथा उन महत्वपूर्ण कुशलताओं के निर्माण के लिए आवश्यक है जिनको प्रभावशाली नागरिकताओं का आधार माना जाता है।

एम. पी. मुफात के अनुसार
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सामाजिक अध्ययन पढ़ाने का उद्देश्य छात्र को अपने पर्यावरण का ज्ञान, मानव संबंध को समझने की शक्ति और कुछ अभिवृत्तियों तथा मूल्यों को जो कि लोगों, राज्य, राष्ट्र और विश्व के मामलों में बुद्धिमत्तापूर्वक भाग लेने के लिए अपरिहार्य है, प्राप्त करने में सहायता देना है।

कोठारी शिक्षा आयोग के अनुसार

सामाजिक अध्ययन की विशेषताएं

सामाजिक अध्ययन ज्ञान का वह क्षेत्र है जिनमें मानवीय संबंधों एवं उनके स्पष्टीकरण के लिए विभिन्न पर्यावरणों का अध्ययन किया जाता है। यहाँ मानवीय संबंधों से अभिप्राय उन सम्बन्धों से है जो मनुष्य और समुदायों, राज्यों आदि के बीच स्थित रहते हैं। मनुष्य के व्यक्तिगत, पारस्परिक एवं सामूहिक संबंध भी इसी के अन्तर्गत आते हैं। सामाजिक अध्ययन की अवधारणाओं के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक अध्ययन निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं –

  1. शिक्षा का अत्याधुनिक दृष्टिकोण – सामाजिक विज्ञान शिक्षा के अत्याधुनिक दृष्टिकोण का एक स्वरूप है जिसका ध्येय तथ्यात्मक सूचनाओं को संगृहीत या एकत्रित करने की अपेक्षा मानदण्डों, वृत्तियों, आदर्शों तथा रुचियों का निर्माण करना है।
  2. सामाजिक प्राणी के रूप में मानव का अध्ययन – वास्तव में मानव जीवन के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्ष हैं। सामाजिक अध्ययन उन सभी पक्षों का समागम स्थल है। यहाँ वैयक्तिक विकास को सामाजिक ढांचे में ढालने की कला मौजूद है। साथ ही यहाँ बालक के विभिन्न विकासों यथा; शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, चारित्रिक व नैतिक तथा व्यावसायिक आदि का एकीकृत स्वरूप देखने को मिलता है।
  3. मानव का सम्पूर्ण अध्ययन – मानव जीवन के विभिन्न पक्ष होते हैं। सामाजिक अध्ययन इन सभी पक्षों का अध्ययन करता है। इसके अन्तर्गत मानव जीवन के मूल्यों, आदतों, विश्वासों व परम्पराओं, नित नयी बदलती आवश्यकताओं व क्षमताओं के संदर्भ में उसके ज्ञानात्मक, भावात्मक व क्रियात्मक पक्षों का उसके अतीत, वर्तमान व भविष्य के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन किया जाता है।
  4. जीवन जीने की कला – आज मानव जीवन बहुआयामी है। मानव जीवन के विभिन्न आयामों यथा; साहित्यिक, वैज्ञानिक व कलात्मक के समन्वय में ही आज मनुष्य वैश्विक परिदृश्य को समझ सकता है तभी वह पूर्ण जीवन की सार्थकता अपना सकता है। पूर्ण जीवन की सार्थकता के लिए पूर्ण जीवन जीने हेतु सामाजिक अध्ययन ही जीवन जीने की कला में पारंगत करता है।
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  1. मनुष्य का विभिन्न पर्यावरणों के साथ सामन्जस्य एवं विकास का अध्ययन – इसके अन्तर्गत मनुष्य तथा उसके भौतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक, वैयक्तिक, पारस्परिक एवं सामूहिक पर्यावरण के मध्य होने वाली विभिन्न अन्तःक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है जिसके ज्ञान से वह इन विभिन्न पर्यावरणों के साथ सामन्जस्य स्थापित कर अपना पूर्ण विकास कर अपनी क्षमताओं से समाज को प्रभावित करता है।
  2. ज्ञान की सापेक्षता पर बल – सामाजिक अध्ययन विभिन्न विषयों का एकीकृत अध्ययन है, न कि सम्मिश्रण। यह विभिन्न विषयों का समूह नहीं है वरन् अध्ययन की एक नवीन संकल्पना है। वास्तविक जीवन के अनुभव से हम जानते हैं कि एक विषय का दूसरे विषय से अटूट सापेक्षिक सम्बन्ध होता है। सामाजिक अध्ययन विषयों के विभाजन की कठोरता व गैर मनोवैज्ञानिकता को समाप्त कर ज्ञान की सापेक्षता पर बल देता है। यही समग्र ज्ञान की कुंजी है।
  3. श्रेष्ठ नागरिक के विकास में सहायक – एक योग्य व सफल नागरिक तभी कहलाया जा सकता है जब अधिकारों और कर्तव्यों के साथ व्यक्ति को भौगोलिक परिस्थितियों एवं ऐतिहासिक परिदृश्यों का भी ज्ञान हो। तभी वह अपने दृष्टिकोण में व्यापकता लाकर योग्यता एवं सफलता के साथ एक श्रेष्ठ नागरिक की श्रेणी में आ सकता है। तभी कोई राष्ट्र सफल व सुरक्षित रह सकता है।

सामाजिक अध्ययन की अवधारणा

इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र एवं नागरिकशास्त्र विषयों के एकीकृत स्वरूप को सामाजिक अध्ययन कहते हैं। बाद में इस विषय समूह में समाजशास्त्र को भी सम्मिलित किया गया। यहाँ मूल रूप में विभिन्न विषयों के एकीकृत स्वरूप की भावना पर आधारित है, जहाँ अलग-अलग विषयों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। सामाजिक अध्ययन विभिन्न विषयों का वह एकीकृत स्वरूप है जो एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्तियों तथा व्यक्ति का उसके पर्यावरण से संबंधों का अध्ययन करता है।

इसकी पाठ्य सामग्री विभिन्न सामाजिक विषयों से ली जाती है किन्तु उनमें से किसी के भी नियमों से निर्धारित नहीं की जाती। वरन् सामाजिक अध्ययन की पाठ्य सामग्री तथा संगठन सीधे उन प्रयोजनों से प्राप्त किये जाते है जिनके लिए इसे पढ़ाया जाता है। इन प्रयोजनों में शामिल हैं मानवीय संबंधों की समझ, पर्यावरण का ज्ञान, जिस समाज में वह पढ़ाया जाता है। वहाँ के मूल सिद्धान्तों तथा मूल्यों के प्रति समर्पण और इस प्रक्रिया में भाग लेने की प्रतिबद्धता जो समाज को बनाए रखती है तथा उसमें सुधार लाती है।

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सामाजिक अध्ययन का क्षेत्र

डॉ. बी. एम. माथुर के अनुसार, “सामाजिक अध्ययन का उद्देश्य मानवीय सभ्यता के उन सत्यों की खोज करना है जिनका सामाजिक उपयोगिता एवं ज्ञान की अभिवृद्धि में योगदान है। सामाजिक महत्व के जो विषय इसमें सम्मिलित हैं उनमें इतिहास, भूगोल, नागरिकशास्त्र व अर्थशास्त्र प्रमुख हैं। ये विषय क्रमशः मानव के पीढ़ी-दर-पीढ़ी घटनाक्रम से, विशाल विश्व रंगमंच से, लोकतांत्रिक सामुदायिक जीवन से व मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं से संबंधित हैं।”

जॉन ह्यजिंगा के अनुसार “इतिहास वह बौद्धिक स्वरूप है जिसमें सभ्यता अपने अतीत को चित्रित करती है।” इसी कारण इतिहास को एक आवश्यक विषय के रूप में महत्व दिया जाता रहा है।

नागरिकशास्त्र विषय में उपरोक्त समस्त व्यवस्थाओं एवं स्थितियों के प्रबन्धन का जिम्मा होता है। वास्तव में, वह विषय जो उन जागरूक नागरिकों का अध्ययन करता है जो आपसी सहयोगी जीवन और नागरिक व राजनीतिक जिम्मेदारियों के पालन को अपना ध्येय मानते हैं, उसे नागरिकशास्त्र कहते हैं।

उपरोक्त विवेचन से सामान्य रूप से सामाजिक अध्ययन के क्षेत्र की व्यापकता का स्पष्ट बोध हो जाता है किन्तु वास्तव में, इसके अतिरिक्त भी विभिन्न विषय है जो राष्ट्र के नन्हें नागरिकों के लिए उपयोगी है अर्थात् बालक के विकास एवं उसमें समग्रता के दृष्टिकोण को उत्पन्न करने के लिए अति आवश्यक हैं। इस सम्बन्ध में इसके अन्तर्गत अध्ययनरत विषयों के संदर्भ में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसन्धान परिषद (Indian Council of Social Science Research) के अनुसार निम्नलिखित विषय हैं –

  1. वाणिज्य (Commerce)
  2. जनसंख्या शास्त्र (Demography)
  3. शिक्षा (Education)
  4. पत्रकारिता ( Journalism)
  5. ग्रन्थालय विज्ञान (Library Science)
  6. भाषा विज्ञान (Linguistics)
  7. प्रबन्ध अध्ययन (Management Studies)
  8. लोक प्रशासन (Public Administration)
  9. नगर एवं राष्ट्रीय नियोजन (Town & Country Planning)
  10. विज्ञान नीति (Science policy)
  11. सामाजिक एवं नियन्त्रण औषध विज्ञान (Social & Preventive Medicine Science)

उपर्युक्त विषय नवसृजित विषय हैं एवं इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र व नागरिकशास्त्र परम्परागत विषय रहे हैं। इन दोनों प्रकार के परम्परागत एवं नवसृजित विषयों के अन्तर्गत होने वाले विभिन्न अध्ययन ही सामाजिक अध्ययन के क्षेत्र की व्यापकता को स्पष्ट करते हैं।

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सामाजिक अध्ययन की प्रकृति

सामाजिक अध्ययन, सामाजिक विज्ञानों से अपनी पाठ्य-वस्तु ग्रहण करता है। सामाजिक अध्ययन की विषय वस्तु कालेज स्तर के सामाजिक विज्ञानों की प्रस्तावना का कार्य करती है। सामाजिक विज्ञानों का स्वरूप सैद्धान्तिक होता है जबकि सामाजिक अध्ययन का स्वरूप व्यावहारिक सामाजिक अध्ययन में अतीत की खोजों, घटनाओं, तथ्यों व बातों तथा व्यवहारों का अध्ययन वर्तमान के सन्दर्भ में किया जाता है। यहाँ मानवीय संबंधों का अध्ययन केन्द्र बिन्दु है।

मानवीय संबंधों का अध्ययन प्रसंग आधारित भौतिक वातावरण की व्याख्या पर निर्भर करता है। सामाजिक अध्ययन प्राकृतिक वातावरण और सामाजिक वातावरण का एक-दूसरे पर अन्योन्याश्रितता का भी अध्ययन करता है। सामाजिक अध्ययन अपनी इस विषय वस्तु का क्रमबद्ध, सुव्यवस्थित तथा सुसंगठित रूप से अध्ययन करने का प्रयास करता है जो विज्ञान की विशेषता है।

“सामाजिक विज्ञानों में प्राकृतिक विज्ञानों की भांति शुद्धता प्राप्त करना असम्भव है। परन्तु सामाजिक समस्याएं उन्हीं वैज्ञानिक विधियों से प्रतिपादित की जा सकती हैं जिनसे कि भौतिक शास्त्र या रसायन शास्त्र की समस्याएं हल की जाती हैं।”

ब्रज भाषा साहित्य

अतः स्पष्ट है कि सामाजिक विज्ञान एक विज्ञान होने के साथ ही एक कला भी है क्योंकि सामाजिक अध्ययन व्यावहारिक पहलू का अध्ययन करता है जिसका आधार सामाजिक विज्ञान की सैद्धान्तिकता है। इस सन्दर्भ में कोसा महोदय ने कहा है कि – “विज्ञान केवल व्याख्या करता है, जबकि कला साध्यों की प्राप्ति के लिए विचारों का प्रतिपादन करती है।”

सामाजिक अध्ययनसामाजिक अध्ययन पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धांतपाठ्यक्रम संगठन के उपागम
व्याख्यान विधिपर्यवेक्षिक अध्ययन विधिसमस्या समाधान विधि
सेमिनारसमाजीकृत अभिव्यक्ति विधिपर्यवेक्षिक अध्ययन विधि
सूक्ष्म शिक्षणशिक्षण कौशलशिक्षण तकनीकी
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