समानता अर्थ परिभाषा

समानता के संबंध में विभिन्न अर्थ प्रचलित हुए। बहुत सी धारणायें भ्रमपूर्ण भी रहीं। प्राकृतिक समानता पर बल देने वाले मानते हैं कि चूँकि ईश्वर ने सभी को समान बनाया अतः सभी के साथ समान व्यवहार होना चाहिए सभी को बराबर साधन मिलने चाहिए कुछ विचारक मानते हैं कि प्रकृति के मूल में असमानता है। व्यक्ति बुद्धि, बल, चातुर्य में असमान होते हैं अतः समानता समान लोगों के मध्य होनी चाहिए असमानों में नहीं।

समानता की परिभाषाएँ

10 दिसम्बर 1948 को सर्व सम्मति से स्वीकार किए गये मानवाधिकार घोषणा पत्र के पहले अनुच्छेद में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सभी मनुष्य जन्म से स्वतंत्र हैं और अधिकार तथा मर्यादा में समान है।’ प्रसिद्ध विद्वान एच. के. लास्की ने अपनी किताब में लिखा है। कि समानता का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाये अथक प्रत्येक व्यक्ति को एक जैसा वेतन दिया जाये अथवा प्रत्येक व्यक्ति को एक जैसा वेतन दिया जाये।

यदि ईट ढोने वाले को वेतन एक प्रसिद्ध गणितज्ञ के बराबर कर दिया जाये तो इससे समाज का उद्देश्य ही नशष्ट हो जायेगा। समानता का मूलतः समानीकरण की प्रक्रिया है इसका अभिप्राय विशेषाधिक्ये की संपत्ति या निषेध से है इसका अर्थ है कि सभी को अपने विकास या उन्नति के समान अवसर प्राप्त हो ।

“समानता की मांग का तात्पर्य है कि सही व्यक्ति सही जगह पर स्थापित हो।

डेविड स्पिट्ज के अनुसार,
समानता

समानता के लक्षण

समानता की निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती है –

  1. जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने में सभी को समान असर मिले।
  2. समाज में विशेषाधिकार समाप्त हो ।
  3. समानता का अधिकार व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
  4. समानता में सभी को अपने व्यक्तित्व का विकास करने में पर्याप्त अवसर मिलता है।
  5. सुविधाओं का उचित रीति से वितरण हो।
  6. समान कार्य के लिए समान वेतन मिले।
  7. वर्ण, जाति, क्षेत्र, संप्रदाय, धर्म के आधार पर विभेदों की समाप्ति हो।

समानता के प्रकार

वर्तमान समय में स्वतन्त्रता का महत्व बहुत अधिक है अतः विभिन्न विचारकों ने समय-समय पर अपने तरीके से समानता के विभिन्न रूप बताये हैं।

1. वैधिक या कानूनी समानता

कानूनी समानता का अर्थ है कि कानून के समक्ष सभी व्यक्ति समान हैं और सभी को समान संरक्षण प्राप्त है। रूसो ने अपनी पुस्तक सोशल कांट्रेक्ट में लिखा है। कि “प्रकृति ने मनुष्यों में बाहुबल या बुद्धिबल की जो विषमता पैदा कर दी है। सामाजिक अनुबन्ध उनसे कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकता परन्तु कानूनी अधिकार की दृष्टि से वह उन्हें समान या समकक्ष बना देता है।’ अतः इस प्रकार कानूनी समानता का तात्पर्य है कि

  1. सभी नागरिक कानून के अधीन समान रूप से होंगे
  2. सभी नागरिकों को कानून का समान संरक्षण प्राप्त होगा। कानूनी समानता में निम्निलखित बातें निहित हैं

(a) कानून के समक्ष समानता

इसका अर्थ यह है कि कानून के सामने सभी व्यक्ति समान है। राज्य सभी व्यक्तियों के लिए एक समान कानून निर्माण करेगा और एक प्रकार समान रूप से लागू करेगा। राज्य जन्म, वंश, धर्म, जाति, अमीर-गरीब या ऊँच-नीच का कोई भाव नहीं रखेगा उसकी दृष्टि में सभी समान होंगे। आइवर जैनिग्ज के अनुसार समान परिस्थितियों में सभी व्यक्तियों के साथ कानून का व्यवहार एक समान होगा।”

(b) सभी को समान कानूनी संरक्षण

इसका अर्थ है कि राज्य में सभी व्यक्तियों को समान रूप से संरक्षण प्राप्त होगा। राज्य कानूनों के माध्यम से जो भी सुविधाएँ अपने नागरिकों को देगा वह एक समान होगी व राज्य इसमें कोई भेदभाव नहीं करेगा तथा कोई व्यक्ति अपने अधिकारों के संरक्षण के लिए न्यायालय की शरण ले सकता है और न्यायालय व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा राज्य पर प्रतिबंधात्मक आदेश लगा कर करता है। अनुच्छेद 14 में (भारतीय संविधान) कहा गया है कि भारत के राज्य क्षेत्र में राज्य किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या कानूनी संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।’ अतः इस प्रकार यह राज्य की अति से कानूनी तौर से अपने नागरिकों को संरक्षण प्रदान करता है।

Equality

(c) कर निर्धारण में समानता

राज्य में कर निर्धारण सभी के ऊपर लागू होता है। अधिक आय वालों अधिक कर व निर्धन व्यक्ति पर कम करों का प्रावधान है और यह व्यक्ति की आय के आधार पर उसका कर निर्धारण होगा। अतः कर का निर्धारण व्यक्ति की आय च क्षमता पर निर्भर करेगा।

(d) सभी व्यक्ति समान कानून के अधीन व समान कर्तव्य

इसका तात्पर्य यह है कि सभी व्यक्तियों पर समान कानून लागू होगा और यह प्रजातन्त्र का आधार बन गया है इसी प्रकार इसी व्यक्तियों के समान कर्तव्य भी होंगे। किसी भी व्यक्ति को न तो कोई विशेष सुविधा प्राप्त होगी और न उनके कर्तव्य अलग होंगे।

(e) विवेक के आधार पर भेदभाव मान्य

विवेक के आधार पर यदि राज्य द्वारा कोई भेदभाव किया जाता है या किसी वर्ग विशेष को विशेष सुविधा दी जाती है तो समानता का सिद्धान्त इसको नहीं रोकता जब तक कि उस वर्ग विशेष के सभी लोगों पर समान रूप से लागू हो जैसे अगर राज्य निर्धन लोगों के लिए सस्ते अनाज, गरीब किसानों के लिए सस्ते कृषि संबंधी साधन, निर्धन बधों की निःशुल्क शिक्षा, अनाज वितरण, गरीब विधवा पेन्शन की योजना लागू करता है तो कोई अन्य सक्षम व्यक्ति इसका न्यायालय में विरोध नहीं कर सकता और यह कानूनी समानता के विरुद्ध होगा और राज्य द्वारा किया गया यह भेदभाव मान्य होगा और इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

2. राजनीतिक समानता

राजनीतिक समानता का अर्थ यह है कि राजनीतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने का अवसर सभी नागरिकों को समान रूप से प्राप्त होने चाहिए।

कानून

3. सामाजिक समानता

सामाजिक समानता का यह अर्थ है, समाज में सभी व्यक्ति को समान समझा जाए तथा धर्म, जाति, वंश, लिंग व जन्म राज्य के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न किया जाए और इसके लिए शिक्षा व नैतिक मापदण्डों की आवश्यकता है और समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता व अशिक्षा को समाप्त करने की आवश्यकता है। सामाजिक समानता में सभी व्यक्तियों को चाहे वह अमीर हो या गरीब या जाति के आधार पर ऊँचा हो या नीचा सबको एक बराबर माना गया है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदान किए गये मौलिक अधिकारों में समानता के अधिकार की विशेष व्यवस्था की गई है और संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को दण्डनीय अपराध माना गया है।

4. आर्थिक समानता

आर्थिक समानता का अर्थ है कि सभी को न्यूनतम आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने के अवसर प्राप्त हो इसमें यह भाव भी निहित है कि उत्पादन और वितरण के साधन कुछ ही व्यक्तियों के हाथों में केन्द्रित न हों और किसी का भी शोषण न हो। प्रत्येक व्यक्ति को जीविकोपार्जन का अधिकार प्राप्त हो । आर्थिक समानता के अभाव में कोई भी स्वतन्त्रता या समानता वास्तविक नहीं हो सकती।

अतः इस प्रकार आर्थिक समानता का मतलब यह नहीं है कि सभी को समान वेतन या सुख साधन एक समान प्राप्त हो यह तो असम्भव ही लगता है परन्तु इतना तो अवश्य होना चाहिए कि सभी व्यक्तियों को न्यूनतम भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए व सबको भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधा मिल सके। सबको रोजगार व पर्याप्त मजदूरी तथा बूढ़े बेरोजगार व्यक्तियों को राज्य द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए दलित व निर्धन व्यक्तियों को अपने व्यक्तित्व के विकास के अवसर प्रदान किये जाने चाहिए. पुरुषों व महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन, नारियों का सम्मान बराबरी का दर्जा व सामाजिक दृष्टि से उनकी दशा में सुधार करना आवश्यक है।

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