समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य – समाजशास्त्र क्या है ? इसे समझने के लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि हम इसके परिप्रेक्ष्य को समझें। शाब्दिक रूप से परिप्रेक्ष्य का अर्थ होता है— नजरिया या दृष्टिकोण। किसी भी घटना या वस्तु को देखने का हर व्यक्ति का अपना अपना एक विशेष नजरिया या दृष्टिकोण होता है। हमारा दृष्टिकोण ही यह निर्धारित करता है कि किसी इकाई की विवेचना में किस पक्ष पर अधिक बल दिया जायेगा तथा किन पक्षों को छोड़ दिया जायेगा। इस तरह विषय की परिधि और सीमाओं का निर्धारण हमारे अध्ययन के दृष्टिकोण के आधार पर ही होता है।

समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य की दृष्टि से समाजशास्त्र में हम समाज का अध्ययन करते हैं, लेकिन समाज का अध्ययन मानवशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, इतिहास और अर्थशास्त्र में भी किया जाता है। इसके बाद भी यह सभी सामाजिक विज्ञान समाज का अध्ययन अपने अपने एक विशेष दृष्टिकोण से करते हैं। दृष्टिकोण का यही अन्तर समाजशास्त्र को दूसरे सामाजिक विज्ञानों से अलग कर देता है। दूसरे सामाजिक विज्ञानों में समाज को जहां एकपक्षीय दृष्टिकोण से देखा जाता है वहीं समाजशास्त्र समाज का अध्ययन उसकी समग्रता अथवा सम्पूर्णता में करने पर बल देता है।

समाजशास्त्र के विकास के आरम्भिक समय से लेकर आज तक विभिन्न विद्वानों ने जिन आधारों पर समाजशास्त्र को विकसित करने का प्रयत्न किया, उन्हें समझने से पहले समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य को समझना जरूरी है। कुछ विद्वानों ने समाजशास्त्र को एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में विकसित करना जरूरी समझा, जबकि अनेक दूसरे विद्वानों ने समाजशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र और अध्ययन के लिए उपयोग में लाई जाने वाली पद्धतियों के आधार पर इसे परिभाषित करने का प्रयास किया है।

मोटे तौर पर सभी समाजशास्त्री समाजशास्त्र को सामाजिक सम्बन्धों का व्यवस्थित अध्ययन मानते हैं तथा इन सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तनों और सामाजिक व्यवस्था पर उनके प्रभाव के अध्ययन को महत्त्वपूर्ण समझते हैं। इसके बाद भी समाजशास्त्र की आरम्भिक नींव जिन विचारों के आधार पर रखी गई उसी को हम समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य कहते हैं। इसे समझने के लिए समाजशास्त्र के मुख्य संस्थापकों जैसे—आगस्त कॉस्ट, हरबर्ट स्पेन्सर, इमाइल दुर्खीम, कार्ल मार्क्स और मैक्स वेबर के विचारों को संक्षेप में समझना जरूरी है।

आगस्त कॉम्ट – समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

आगस्त कॉम्ट (1798-1857) को समाजशास्त्र का जनक कहा जाता है। वह सन् 1789 में फ्रांस की क्रांति से होने वाली राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल से बहुत प्रभावित थे। इस समय नई दशाओं के बीच उन्होंने परम्पराओं से प्रभावित पक्षपातपूर्ण सामाजिक विचारों का विरोध किया। उन्होंने सुझाव दिया कि जिस तरह प्राकृतिक विज्ञानों में वैज्ञानिक पद्धतियों और प्रविधियों के द्वारा प्रयोग करके निष्कर्ष दिये जाते हैं, उसी तरह सामाजिक घटनाओं से सम्बन्धित अध्ययन भी अवलोकन और प्रयोग पर आधारित होना चाहिए।

यह सच है कि कॉस्ट समाजशास्त्र की अध्ययन वस्तु अथवा अध्ययन की शाखाओं को स्पष्ट नहीं करना चाहते थे, इसके बाद भी उन्होंने हमेशा इस बात पर बल दिया कि समाजशास्त्र को एक ऐसे सामाजिक विज्ञान के रूप में विकसित किया जाये जो दो मुख्य भागों में विभाजित हो। इन दो भागों को उन्होंने सामाजिक स्थितिकी (Social Statics) तथा सामाजिक गत्यात्मकता (Social Dynamics) कहा। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

वह यह मानते थे कि किसी समाज का निर्माण जिन भागों और संस्थाओं से होता है, वे उसी तरह व्यवस्थित ढंग से काम करते हैं जिस तरह हमारी जीव-रचना के विभिन्न अंग अपने-अपने स्थान पर रहते हुए निर्धारित कार्य करते हैं। इसी निश्चितता और आपसी निर्भरता के कारण समाज में स्थायित्व बना रहता है। उन्होंने अर्थव्यवस्था, परिवार और राजनीति को उन संस्थाओं का उदाहरण माना जिन्हें समाजशास्त्रीय विश्लेषण की इकाई कहा जा सकता है। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

उन्होंने यह भी लिखा कि समाज के इन भागों को एक-दूसरे से पृथक् करके नहीं समझा जा सकता बल्कि पारस्परिक निर्भरता के दृष्टिकोण से ही समझा जा सकता है। कॉम्ट ने समाजशास्त्र के अध्ययन से सम्बन्धित दूसरे भाग को सामाजिक गत्यात्मकता कहा। उनके अनुसार सामाजिक स्थितिकी इस बात के अध्ययन से सम्बन्धित है कि समाज के विभिन्न भाग अथवा संस्थाएं किस प्रकार एक दूसरे से सम्बन्धित रहते हैं, वहीं सामाजिक गत्यात्मकता का सम्बन्ध यह स्पष्ट करने से है कि विभिन्न संस्थाएं किस प्रकार विकसित होती हैं और उनमें समय के अनुसार किस तरह परिवर्तन होता रहता है।

समाजशास्त्र को सामाजिक स्थितिकी और सामाजिक गत्यात्मकता जैसे दो मुख्य भागों से सम्बन्धित मानने के बाद भी कॉस्ट समाजशास्त्र को एक ऐसे विज्ञान के रूप में विकसित करना चाहते थे जिसकी सहायता से समाज का पुनर्निर्माण किया जा सके। इसी आधार पर समाजशास्त्र को परिभाषित करते हुए कॉम्ट ने लिखा कि “समाजशास्त्र सामाजिक व्यवस्था और प्रगति का विज्ञान है।” (Sociology is the science of social order and progress) सामाजिक व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए कॉम्ट ने बताया कि समाज अनेक उप व्यवस्थाओं से मिलकर बनता है। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

ये सभी उप-व्यवस्थाएं एक-दूसरे पर निर्भर होती हैं। इसी आधार पर कॉम्ट ने सामाजिक सावयव (Social Organism) की कल्पना की जो वैयक्तिक सावयव से कुछ बातों में समान होते हुए भी उससे भिन्न है। यह भिन्नता मुख्य रूप से इस बात में पाई जाती है कि प्राणी के सभी अंग लगभग उसी रूप में बने रहते हैं, लेकिन सामाजिक सावयव के विभिन्न अंगों में हमेशा परिवर्तन होता रहता है। व्यक्ति, परिवार, वर्ग, अर्थव्यवस्था, धर्म तथा विभिन्न प्रकार के समूह और संगठन सामाजिक सावयव का निर्माण करने वाली विभिन्न इकाइयां हैं।

इन इकाइयों के बीच भौतिक, बौद्धिक और नैतिक आधार पर एक सामंजस्य बना रहता है। यही सामंजस्य या सन्तुलन समाज में स्थिरता की दशा पैदा करता है। इस प्रकार समाजशास्त्र का काम उन नियमों का पता लगाना है जिनकी सहायता से सामाजिक व्यवस्था को अधिक संगठित और उपयोगी बनाये रखा जा सके। कॉम्ट के अनुसार सामाजिक प्रगति का अर्थ भौतिक साधनों के संचय से नहीं है बल्कि प्रगति का सम्बन्ध मानव के बौद्धिक और नैतिक विकास से है। इसी को स्पष्ट करने के लिए कॉम्ट ने समाज के पुनर्निर्माण की एक योजना प्रस्तुत की। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

कॉम्ट ने स्पष्ट किया कि समाजशास्त्र का कार्य उन नियमों की खोज करना भी है जिनकी सहायता से समाज का बौद्धिक और नैतिक विकास किया जा सके। कॉम्ट ने स्वयं लिखा, “समाजशास्त्र का प्राथमिक लक्ष्य मानव जाति की आरम्भिक अवस्थाओं से लेकर वर्तमान सभ्यता के विकास तक की अवस्थाओं को खोज निकालना है।” आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

कॉम्ट का उद्देश्य समाजशास्त्र को एक व्यावहारिक और यथार्थ विज्ञान के रूप में विकसित करना था। उन्होंने यह माना कि किसी भी ज्ञान का उपयोग इस तरह करना आवश्यक है जिससे समाज का विकास और मानवता का कल्याण हो सके। इसे स्पष्ट करते हुए टर्नर ने लिखा है “कॉम्ट के अनुसार समाजशास्त्र का उपयोग समाज के विकास तथा मानव के कल्याण के लिए होना आवश्यक है। इसी उद्देश्य को के लिए उन्होंने समाजशास्त्र को व्यावहारिक विज्ञान बनाने का सुझाव दिया तथा इसे सामाजिक दर्शन से पूरा करने पृथक् माना।”

समाजशास्त्र को व्यावहारिक विज्ञान के रूप में देखने के बाद भी कॉस्ट का यह मानना था कि समाजशास्त्र का कार्य विभिन्न घटनाओं का उसी रूप में अध्ययन करना है जैसी कि वे वास्तव में हैं। अध्ययन के इस तरीके को उन्होंने प्रत्यक्षवाद (Positivism) का नाम दिया। प्रत्यक्षवाद एक ऐसी पद्धति है जो अवलोकन, प्रयोग और तथ्यों के वर्गीकरण द्वारा विभिन्न घटनाओं के बीच तुलना करके वास्तविक निष्कर्ष देती है। कॉस्ट का यह मानना था कि जिन अध्ययन पद्धतियों का प्रयोग करके प्राकृतिक विज्ञानों को विकसित करना सम्भव हो सकता है, उन्हीं अध्ययन पद्धतियों के द्वारा सामाजिक जीवन को संचालित करने वाले नियमों का भी यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

हरबर्ट स्पेन्सर – समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए इंग्लैण्ड के समाजशास्त्री हरबर्ट स्पेन्सर (1820-1930) के विचारों को समझना आवश्यक है। सन् 1877 में हरबर्ट स्पेन्सर की पुस्तक ‘प्रिंसिपल्स ऑफ सोशियोलॉजी’ के नाम से तीन खंडों में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक वह पहला व्यवस्थित प्रयत्न था जिसने समाजशास्त्र के विश्लेषण को एक नया रूप दिया। इस पुस्तक के पहले खंड में स्पेन्सर ने यह स्पष्ट किया कि समाजशास्त्र का कार्य समाज का निर्माण करने वाली विभिन्न इकाइयों की पारस्परिक निर्भरता को स्पष्ट करना है।

उन्होंने परिवार, राजनीति, धर्म तथा सामाजिक नियन्त्रण को समाज के मुख्य भागों के रूप में स्पष्ट किया। इसके अतिरिक्त विभिन्न समितियों, तथा समुदायों, श्रम विभाजन, सामाजिक विभिन्नता, स्तरीकरण तथा कला के अध्ययन को भी समाजशास्त्र में स्थान दिया। उनका मानना था कि समाजशास्त्र को एक ऐसे विज्ञान के रूप में विकसित किया जाना चाहिए जिससे समाज के विभिन्न भागों की पारस्परिक निर्भरता को समझा जा सके तथा यह विश्लेषण किया जा सके कि यह समाज के सभी भाग किस प्रकार एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

स्पेन्सर ने यह भी स्पष्ट किया कि समाज की संरचना में होने वाले परिवर्तनों का समाज की विभिन्न इकाइयों के परिवर्तन से क्या सम्बन्ध है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि समाजशास्त्र का काम विभिन्न प्रकार के समाजों के बीच तुलना करके उनके विकास क्रम को समझना भी है। यह कार्य विभिन्न समाजों की संरचना और प्रकार्यों को समझकर आसानी से किया जा सकता है। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

हरबर्ट स्पेन्सर, डार्विन के उद्विकासवाद और मानवशास्त्र सम्बन्धी अध्ययनों से बहुत अधिक प्रभावित थे। जिस तरह डार्विन यह मानते थे कि प्रकृति में केवल वही प्राणी जीवित रहते हैं जो अपनी प्राकृतिक दशाओं से अनुकूलन कर लेते हैं, उसी तरह स्पेन्सर ने इस बात पर जोर दिया कि मनुष्य को अपनी सामाजिक दशाओं से अनुकूलन करना सबसे अधिक जरूरी है। डार्विन के विचारों के आधार पर ही उन्होंने यह माना कि सभी समाज शुरू में सरल होते हैं तथा धीरे-धीरे वे जटिल होते जाते हैं।

परिवर्तन की इसी प्रक्रिया के आधार पर सामाजिक विकास की वास्तविकता को समझा जा सकता है। स्पेन्सर ने लिखा, व्यक्ति की जीव-रचना और समाज के संगठन में इतनी समानता देखने को मिलती है कि इसे हम एक ‘सादृश्यता की दशा कह सकते हैं। जैविकीय और सामाजिक सावयव के जीवन पर समान दशाएं लागू होती हैं। जब हम एक समाज की उत्पत्ति, विकास, परिपक्वता और पतन की प्रक्रिया को देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह उन्हीं सिद्धान्तों पर आधारित है, जो जीव-रचना की उत्पत्ति, विकास और मृत्यु को स्पष्ट करते है।

यही वह दृष्टिकोण है जो हमें समाज की वैज्ञानिक विवेचना की ओर ले जाता है।” इन विचारों के बाद भी स्पेन्सर ने अध्ययन के किसी ऐसे तरीके का उल्लेख नहीं किया जिसके द्वारा समाज की विवेचना को वैज्ञानिक रूप दिया जा सके। वास्तविकता यह है कि समाजशास्त्र के बारे में स्पेन्सर के विचार बहुत अधिक सामान्यीकृत थे। इसी कारण स्पेन्सर को एक सामाजिक वैज्ञानिक की अपेक्षा एक सामाजिक दार्शनिक के रूप में अधिक स्वीकार किया जाता है। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

कार्ल मार्क्स – समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

जर्मन विचारक कार्ल मार्क्स (1818-1883) ने समाजशास्त्र पर कोई पृथक् विचार नहीं दिये लेकिन विभिन्न सन्दर्भों में उनके विचारों ने समाजशास्त्रीय चिन्तन को एक नई दिशा दी। मार्क्स को ‘दुर्बल और सर्वहारा वर्ग का मसीहा’ कहा जाता है। कामगर वर्ग की समस्याओं का समाधान करने और सामाजिक परिवर्तन के कारण व दिशा को स्पष्ट करके उन्होंने सामाजिक संरचना से सम्बन्धित महत्वपूर्ण विचार दिये।

मार्क्स ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी समाज की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना को उत्पादन की शक्तियों में होने वाले परिवर्तन तथा वर्ग संघर्ष के आधार पर ही समझा जा सकता है। उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरणों के द्वारा यह स्पष्ट किया कि उत्पादन के सम्बन्धों के अनुसार ही किसी समाज में सामाजिक सम्बन्धों का निर्धारण होता है तथा उत्पादन के सम्बन्धों में होने वाला परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारण है। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

सामाजिक विश्लेषण में मार्क्स ने उत्पादन के ढंग, उत्पादन के साधन, आर्थिक संरचना, अधिसंरचना, वर्ग-चेतना, वर्ग संघर्ष, भौतिकवाद जैसी अनेक अवधारणाओं को बहुत व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करके उन्हें नये अर्थ दिये। इन अवधारणाओं को वर्तमान समाजशास्त्रीय विवेचना का आधार माना जाता है। आज सभी समाजशास्त्री यह मानते हैं कि प्रत्येक समाज में सहयोग के साथ संघर्ष भी सदैव विद्यमान रहता है। किसी भी व्यवस्था को हम संघर्ष से अलग करके नहीं समझ सकते। इस धारणा पर मार्क्स के विचारों का गहरा प्रभाव है।

मार्क्स ने स्पष्ट किया कि मानव इतिहास के प्रत्येक युग में विभिन्न वर्गों द्वारा अलग-अलग ढंग से आजीविका उपार्जित करने के कारण समाज परस्पर विरोधी वर्गों में विभाजित हो गया। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ के आरम्भ में ही मार्क्स ने लिखा कि “अभी तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।” स्वतंत्र व्यक्ति और दास, कुलीन वर्ग और जनसाधारण, सामन्त और उनके अर्द्ध-दास किसान, मालिक और कामगर, संक्षेप में, शोषक और शोषित सदैव एक-दूसरे के विरोध में खड़े होकर कभी छिपे तौर पर तो कभी खुलेआम एक-दूसरे से संघर्ष करते रहे हैं। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

इस संघर्ष का मुख्य कारण शक्तिशाली या बुर्जुआ वर्ग में अधिक-से-अधिक लाभ पाने की प्रवृत्ति है। स्वयं पूंजीवादी व्यवस्था के अन्तर्विरोध भी वर्ग संघर्ष का कारण है। मार्क्स ने आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था पर सर्वहारा वर्ग के एकाधिकार को पूंजीवादी शोषण के समाधान के रूप में स्पष्ट किया। मार्क्स द्वारा प्रस्तुत ‘इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या तथा ‘वर्ग संघर्ष’ सम्बन्धी इन विचारों से समाजशास्त्रीय विश्लेषण को एक तार्किक आधार मिल सका।

इमाइल दुर्खीम – समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

इमाइल दुर्खीम (1858-1917) उन प्रमुख समाजशास्त्रियों में से एक हैं जिन्होंने समाजशास्त्रीय विवेचन को एक विशेष रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने लेखों और शोध कार्यों के द्वारा दुर्खीम वैज्ञानिक आधार पर एक सामान्य समाजशास्त्र को विकसित करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने एक ओर इतिहास तथा मनोविज्ञान को समाजशास्त्र से पूरी तरह भिन्न मानते हुए यह तर्क दिया कि ऐतिहासिक घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सकने तथा मनोविज्ञान द्वारा समाज की तुलना में व्यक्ति को अधिक महत्वपूर्ण मानने के कारण इन्हें आनुभविक विज्ञान नहीं माना जा सकता।

दूसरी ओर समाजशास्त्र को एक ऐसे विज्ञान के रूप में विकसित करना आवश्यक है जिसमें सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सके। इसके लिए दुर्खीम ने ‘सामाजिक तथ्य’ (social fact) तथा ‘सामूहिक प्रतिनिधान’ (collective representation) की अवधारणा को प्रस्तुत किया। सामाजिक तथ्य को स्पष्ट करते हुए दुर्खीम ने लिखा “सामाजिक तथ्य व्यवहार करने, विचार करने, अनुभव करने या क्रिया करने का कोई भी वह ढंग है जिसका वस्तुनिष्ठ रूप से अवलोकन किया जा सकता है तथा जो व्यक्ति को एक विशेष ढंग से व्यवहार करने को बाध्य करते हैं।” आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

सामाजिक तथ्य व्यक्ति से स्वतन्त्र और अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं तथा यह एक समाज के सभी लोगों को विशेष ढंग से विचार करने और व्यवहार करने को बाध्य करते हैं। दुर्खीम ने सामूहिक प्रतिनिधानों के अध्ययन को समाजशास्त्र की वास्तविक विषय-वस्तु के रूप में स्पष्ट करते हुए लिखा कि “समाजशास्त्र सामूहिक प्रतिनिधानों का अध्ययन करने वाला विज्ञान है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक समाज में व्यवहार के कुछ ऐसे तरीके होते हैं जिनका विकास सामूहिक चेतना के आधार पर होता है। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

इन्हीं को सामूहिक प्रतिनिधान कहा जाता है। धर्म और आत्महत्या सम्बन्धी शोध कार्य के द्वारा दुर्खीम ने आनुभविक अध्ययन की उपयोगिता को स्पष्ट किया। इसके बाद भी दुर्खीम यह चाहते थे कि समाजशास्त्र के अध्ययन की केन्द्रीय विषय वस्तु सामाजिक एकीकरण और सामाजिक संगठन हो। इसी आधार पर उन्होंने नैतिक मूल्यों के अध्ययन पर भी जोर दिया। उनके अनुसार नैतिक मूल्यों और धार्मिक विश्वासों के बीच गहरा सम्बन्ध होता है तथा यह सामाजिक एकीकरण में सहायक होते हैं।

एक पृथक दृष्टिकोण के कारण समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र निर्धारित करने में भी दुर्खीम के विचार बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। वास्तव में दुखम समाजशास्त्र को समाजों के एक सामान्य विज्ञान के रूप में विकसित करना चाहते थे। इसी कारण उन्होंने लिखा कि समाजशास्त्र को तब तक एक विज्ञान नहीं बनाया जा सकता जब तक यह सामाजिक वास्तविकता की समग्रता के अध्ययन से सम्बन्धित न हो। दुर्खीम ने व्यापक सन्दर्भ में समाजशास्त्र के अन्तर्गत विभिन्न संस्थाओं और सामाजिक प्रक्रियाओं के अध्ययन को आवश्यक माना। शायद इसी कारण उन्होंने अपने द्वारा प्रकाशित समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य को सात भागों में विभाजित किया—

  1. सामान्य समाजशास्त्र
  2. धर्म का समाजशास्त्र
  3. कानून तथा नैतिकता का समाजशास्त्र
  4. अपराध का समाजशास्त्र
  5. आर्थिक समाजशास्त्र
  6. जनांकिकी तथा समुदाय
  7. कला का समाजशास्त्र

मैक्स वेबर – समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

मैक्स वेबर (1864-1920) समाजशास्त्र के वह प्रमुख संस्थापक हैं जिन्होंने अपने से पहले के विचारकों से कुछ भिन्न विचार देते हुए समाजशास्त्र को ‘सामाजिक क्रिया (Social action) के बोध पर आधारित ‘विज्ञान’ के रूप में विकसित करने पर जोर दिया। वेबर ने अपनी प्रमुख समाजशास्त्रीय रचना ‘सामाजिक तथा आर्थिक संगठन का सिद्धांत’ में सामाजिक क्रिया की अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए लिखा “समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो सामाजिक क्रिया का व्याख्यात्मक बोध इस तरह करने का प्रयत्न करता है। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

जिससे सामाजिक क्रिया के कार्य-कारण सम्बन्धों तथा इसके परिणामों को समझा जा सके।” इस कथन के द्वारा वेबर ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक क्रिया ही समाजशास्त्र की वास्तविक अध्ययन वस्तु है तथा सामाजिक क्रियाओं के व्याख्यात्मक बोध से ही समाजशास्त्र को वैज्ञानिक रूप दिया जा सकता है। सामाजिक क्रिया की प्रकृति को बहुत व्यवस्थित रूप से स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा “सामाजिक क्रिया कोई भी वह मानवीय दृष्टिकोण अथवा कार्य है जिसका सम्बन्ध क्रिया करने वाले लोगों के अर्थपूर्ण व्यवहार से होता है, चाहे वह कार्य करने की असफलता को स्पष्ट करता हो या निष्क्रिय स्वीकारोक्ति को।”

इस कथन के द्वारा उन्होंने बताया कि प्रत्येक व्यवहार को क्रिया नहीं कहा जा सकता। सामाजिक क्रिया का सम्बन्ध उन्हीं व्यवहारों से होता है, जो अर्थपूर्ण होते हैं तथा जो दूसरे लोगों के दृष्टिकोणों और व्यवहारों से प्रभावित होने के साथ ही स्वयं भी दूसरे लोगों के व्यवहारों को प्रभावित करते हैं। इस आधार पर उन्होंने विभिन्न सामाजिक क्रियाओं को चार भागों में विभाजित किया (1) तार्किक क्रियाएं (2) मूल्यों पर आधारित क्रियाएं, (3) भावनात्मक क्रियाएं (4) परम्परागत क्रियाएं। वेबर के अनुसार परम्परावादी समाजों में भावनात्मक और परम्परात्मक क्रियाओं का अधिक महत्व होता है जबकि तार्किक क्रियाएं तथा मूल्यों पर आधारित क्रियाएं आधुनिक युग की महत्वपूर्ण विशेषता हैं।

सामाजिक क्रियाओं का अध्ययन किस तरह किया जाये? इसके लिए वेबर ने एक विशेष पद्धति प्रस्तुत की जिसे उन्होंने जर्मन भाषा में वर्स्टहीन (Verstehen ) के नाम से सम्बोधित किया। जर्मनी के दार्शनिक समुदाय में पहले से ही एक शब्द हरमेन्यूटिक्स (Hermenutics) का प्रयोग होता रहा था जिसका तात्पर्य किसी कर्ता की क्रिया के अर्थ को समझने के लिए अध्ययनकर्ता को स्वयं उसके स्थान पर रखकर वास्तविकता को ज्ञात करना था। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

वेबर ने हरमेन्यूटिक्स की जगह वर्स्टहीन शब्द का प्रयोग एक ऐसी अध्ययन पद्धति के लिए किया जिसके द्वारा एक अध्ययनकर्ता अपने आप को क्रिया करने वाले व्यक्ति की स्थिति में रखकर उसकी क्रियाओं का व्याख्यात्मक बोध करने का प्रयत्न करता है। सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि जिस तरह एक कलाकार की कलाकृति को समझने के लिए स्वयं को चित्र बनाने वाले कलाकार की स्थिति में रखना जरूरी होता है, उसी तरह किसी व्यक्ति द्वारा की जाने वाली क्रिया के अर्थ को तभी समझा जा सकता है जब कर्ता के दृष्टिकोण से किसी क्रिया से सम्बन्धित प्रयोजनों और अयों को समझ लिया जाये। इस दशा को वेबर ने प्रयोजनात्मक बोध (Motivational understanding) के नाम से सम्बोधित किया।

समाजशास्त्र के अध्ययन की विषय-वस्तु के रूप में सामाजिक क्रिया तथा इसकी अध्ययन पद्धति के रूप में वर्स्टहीन या व्याख्यात्मक बोध को स्पष्ट करने के साथ ही वेबर ने यह भी स्पष्ट किया कि समाजशास्त्र को केवल सिद्धान्त निर्माण तक सीमित रखना सही नहीं है। उन्होंने आनुभविक आधार पर पूंजीवादी व्यवस्था पर धार्मिक आचारों के प्रभाव का विश्लेषण करके यह स्पष्ट किया कि आनुभविक अध्ययनों के द्वारा विभिन्न प्रकार की सामाजिक क्रियाओं की व्यवस्थित विवेचना की जा सकती है। आप समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य के बारे में पूछे गए प्रश्न

समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य की विशेषताएं क्या है?

समाजशास्त्र में समाज का क्रमबद्ध ( विधिवत् ) अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन एक विशिष्ट परिप्रेक्ष्य या चिन्तन द्वारा किया जाता है जिसे समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य या चिन्तन कहते हैं। यह चिन्तन सामान्य बौद्धिक ज्ञान से भिन्न होता है। सामान्य बौद्धिक ज्ञान में दार्शनिक एवं धार्मिक अनुचिन्तन सम्मिलित किया जाता है।

समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य का महत्व क्या है?

समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य हमें अपने परिचित परिवेश को नए सिरे से देखने के लिए आमंत्रित करता है । यह हमें उस दुनिया पर एक नया नज़र डालने के लिए प्रोत्साहित करता है जिसे हमने हमेशा के लिए मान लिया है, हमारे सामाजिक परिवेश की उसी जिज्ञासा के साथ जांच करने के लिए जो हम एक विदेशी विदेशी संस्कृति को ला सकते हैं।

समाजशास्त्र के तीन प्रमुख परिप्रेक्ष्य क्या है?

प्रत्येक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति एक विशेष सैद्धांतिक दृष्टिकोण और अनुस्थापन से सम्बद्ध है। दुर्खीम, मार्क्स और वेबर को आम तौर पर समाजशास्त्र के तीन प्रमुख संस्थापकों के रूप में उद्धृत किया जाता है; उनके कार्यों को क्रमशः प्रकार्यवाद, द्वंद सिद्धांत और गैर-प्रत्यक्षवाद के उपदेशों में आरोपित किया जा सकता है।

guest

0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments