संस्कृतिकरण

संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई निम्न हिन्दू जाति या कोई जनजाति अथवा कोई अन्य समूह किसी उच्च और प्रायः द्विज जाति की दिशा में अपने रीति-रिवाज कर्मकाण्ड, विचारधारा और पद्धति को बदलता है। सामान्यतः ऐसे परिवर्तनों के बाद निम्न जाति, जातीय संस्तरण की प्रणाली में स्थानीय समुदाय में उसे परम्परागत रूप से जो स्थिति प्राप्त है उससे उच्च स्थिति का दावा करने लगती है। सामान्यतः बहुत दिनों तक बल्कि वास्तव में एक दो पीढ़ियों तक दावा किये जाने के बाद ही उसे स्वीकृति मिलती है।

भारतीय समाज सदैव से ही परम्परावादी रहा है, इसलिए प्रगति से उसका संघर्ष स्वाभाविक है। इन संघर्षो के बावजूद भी परिवर्तन नहीं रुका। भारतीय समाज में परम्परा के नाम पर परिवर्तन को रोकने का प्रयास चलता रहता है किन्तु परिवर्तन स्वाभाविक है। इसलिए तमाम बाधाओं के उपरान्त भी परिवर्तन होता है जिसे हम रोक नहीं सकते। इन्हीं परिवर्तनों का एक अंग संस्कृतिकरण है।

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संस्कृतिकरण

संस्कृतिकरण के अन्तर्गत एक निम्न जाति के सदस्यों द्वारा उच्च जाति के रीति रिवाज, कर्मकाण्ड, जीवनशैली, खान-पान आदि को अपना लिया जाता है। इसका उद्देश्य स्वयं की स्थिति को ऊँचा उठाना है। डा. सी. श्रीनिवास ने अपनी पुस्तक “रीलिजन एण्ड सोसायटी एमंग द कुर्ग ऑफ साउथ इण्डिया” में सर्वप्रथम जाति की प्रक्रिया को व्यक्त करनेके लिए “संस्कृतिकरण” शब्द का प्रयोग किया। विभिन्न विद्वानों ने इसे निम्न प्रकार परिभाषित किया है-

संस्कृतिकरण सापेक्ष रूप से बन्द हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में सांस्कृतिक और सामाजिक गतिशीलता की एक प्रक्रिया है। यह सामाजिक परिवर्तन का एक अन्तरजात स्रोत है। एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से संस्कृति करण भविष्य में अपनी प्रस्थिति में सुधार लाने की आशा में उच्च समूह की संस्कृति की ओर अग्रिम समाजीकरण के लिए सार्वभौमिक प्रेरणा का एक सांस्कृतिक विशिष्ट मामला है।

डा. योगेन्द्र सिंह

संस्कृतिकरण की विशेषताएं

विभिन्न विद्वानों के विचारों के आधार पर संस्कृति करण की निम्नलिखित विशेषताएँ प्रकट होती हैं

1. निम्न जाति द्वारा उच्च जाति का अनुकरण

संस्कृतिकरण के अन्तर्गत निम्न जातियाँ केवल ब्राह्मणों की ही जीवन विधि नहीं अपनाती हैं वरन् उस क्षेत्र या उस गाँव की श्रेष्ठ जाति चाहे वह ब्राह्मण, ठाकुर बनिया या गैर ब्राह्मण जाति का ही क्यों न हो, की जीवन विधि को अपना लेती हैं।

2. संस्कृतिकरण का सम्बन्ध निम्न जाति है

संस्कृतिकरण की भावना केवल निम्न जातियों में ही पायी जाती है। वे अपने से श्रेष्ठ जातियों की परम्पराओं, प्रथाओं, रहन-सहन और जीवनशैली को अपनाकर उच्च स्थिति का दावा करने लगते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि संस्कृति करण का सम्बन्ध निम्न जातियों से होता है।

3. सार्वभौमिक प्रक्रिया

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया सार्वभौमिक होती है। यह भारतीय इतिहास के प्रत्येक युग में दृष्टिगोचर होती है। इसको सिद्ध करने के लिए डा. श्री निवास ने वैदिक काल से लेकर आधुनिक समय तक विभिन्न जातियों को ऊँचा उठाने का प्रमाण दिया है।

4. संस्कृतिकरण द्विमुखी प्रक्रिया है तथा यह सामाजिक गतिशीलता प्रकट करती है

संस्कृतिकरण द्विमुखी प्रक्रिया है इसका अर्थ यह है कि इसमें निम्न जातियाँ ही ऊँची जातियों की संस्कृति को नहीं ग्रहण करती हैं अपितु उच्च जातियाँ भी निम्न जातियों की संस्कृति को ग्रहण करती हैं। इसके द्वारा सामाजिक गतिशीलता भी प्रकट होती है। परिवर्तन के सतत् चलते रहने के कारण जातियों में पदमूलक परिवर्तन होता है न संरचनात्मक परिवर्तन। इसका अर्थ यह है कि संस्कृतिकरण करने वाली जाति अपने आस-पास की जातियों से उच्च स्थान प्राप्त कर लेती है और अन्य जातियों नीचे आ जाती हैं।

5. संस्कृतिकरण का सम्बन्ध केवल समूह से समूह होता है

संस्कृतिकरण केवल एक व्यक्ति या परिवार का न होकर पूरे समूह का होता है क्योंकि एक अकेले व्यक्ति या परिवार के ऊँचा उठ जाने पर भविष्य में वैवाहिक सम्बन्धों को बनाने में समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। समूह के अन्य व्यक्ति स्वयं को हीन समझने लगते हैं तथा विवाह आदि के लिए तैयार नहीं होते। अतः कह सकते हैं कि यह पूरे समूह का होता है।

6. संस्कृतिकरण के आदर्श अलग-अलग हो सकते हैं

इसके अन्तर्गत एक छोटी जाति स्वयं से उच्च जाति को आदर्श मानकर उसके रीति-रिवाज, रहन-सहन और जीवनशैली को अपना लेती है। एक जाति के लिए अपने से उच्च जातियाँ आदर्श होती हैं जिनसे उनकी निकटता सर्वाधिक होती है।

7. राजनैतिक और आर्थिक शक्ति का महत्व

इसके अन्तर्गत इनका भी महत्व होता है। एक राष्ट्र किसी देश में राजनैतिक शक्ति प्राप्त कर लेने पर उस देश में अपनी संस्कृति का प्रसार एवं प्रचार करता है। इसी तरह आर्थिक रूप से सुदृढ़ होने पर भी एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर स्वयं की संस्कृति के द्वारा संस्कृतिकरण करने का प्रयास करता है।

8. संस्कृतिकरण निम्न जातियों की उच्चाकांक्षा और प्रयत्नों की सूचना देती है

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया के द्वारा निम्न जातियों की उच्चाकांक्षा प्रकट होती है। वे स्वयं से श्रेष्ठ जातियों के क्रिया-कलापों और जीवन शैली को अपनाकर अपनी जातीय स्थिति को ऊँचा उठाने का प्रयास करते हैं।

9. संस्कृतिकरण की प्रक्रिया हिन्दुओं तक सीमित नहीं है

इस प्रक्रिया का सम्बन्ध हिन्दुओं से ही नहीं है वरन् जन जातीय एवं अर्द्ध-जनजातीय समाजों से भी है। भीलों, गोडों एवं ओरॉव तथा हिमालय के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले समाज ने भी हिन्दुओं की संस्कृति को अपनाया है। संस्कृति अपनाने वाली जनजाति धीरे-धीरे स्वयं को हिन्दू मानने लगती है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि संस्कृतिकरण केवल हिन्दुओं तक ही सीमित नहीं है।

10. अग्रिम समाजीकरण

संस्कृतिकरण को स्वीकार करने वाली जाति की यह भावना भी होती है कि उच्च जाति की संस्कृति को अपनाने से वे उन्हें अपनी जाति में सम्मिलित कर लेंगे। कहीं-कहीं यह देखा भी जाता है कि उच्च जाति निम्न जाति को स्वीकार कर लेती है। डा. योगेन्द्र सिंह इसे अग्रिम समाजीकरण की प्रक्रिया कहते हैं।

11. संस्कृतिकरण के द्वारा सामाजिक पद में परिवर्तन

इसके द्वारा सामाजिक पद में परिवर्तन भी होता है। इसके लिए निम्न जातियों दो या तीन पीढ़ी पहले अपना सम्बन्ध ऊँची जातियों से जोड़ती हैं।

12. संस्कृतिकरण में उच्च जाति के सम्पूर्ण तत्वों को अपनाया जाता है

इसके अन्तर्गत निम्न जातियाँ उच्च जातियों की प्रथाओं और जीवन शैली को ही नहीं अपनाती हैं वरन् उनके कुछ विचार एवं मूल्यों को भी अपनाती हैं। वे साहित्य से सम्बन्धित तत्वों धर्म-कर्म, संसार, पाप-पुण्य, उचित-अनुचित को भी परस्पर संवादों में प्रयोग करते हैं। इसके पीछे उनकी मूल भावना यही होती है कि वे भी सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत दिखें। पढ़े-लिखे सभ्य समाज में ठीक से बोलना, उठना-बैठना, बातचीत करना आदि व्यक्ति के उच्च होने के मापदण्ड होते हैं। संस्कृति को बढ़ावा देने वाली जाति किसी भी स्तर पर पीछे नहीं रहना चाहती है जिसके परिणाम सम्पूर्ण तत्वों को ग्रहण करने की भावना होती है।

संस्कृतिकरण के स्रोत

इसके विभिन्न स्रोतों का उल्लेख डा. श्री निवास ने निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से किया है-

1. संचार तथा यातायात के साधन

ये साधन संस्कृति को एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैलाने में योगदान देते हैं। इन साधनों के माध्यम से जातियाँ एक दूसरे की संस्कृति की विशेषताओं से परिचित होती हैं तथा उनको अपना लेती हैं। किसी भी संस्कृति होने वाले परिवर्तनों की सूचना भी संचार के साधनों से मिलती रहती है।

संचार के साधनों के कारण निम्न जातियों एवं उच्च जातियों में सांस्कृतिक आधार पर ही आदान-प्रदान सम्भव हुआ है। परम्पराओं के आपस में घुलने-मिलने के अवसर बढ़े हैं। इसके परिणामस्वरूप सरल एवं एकरूप संस्कृति का विकास हुआ है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि संचार तथा यातायात के साधनों ने संस्कृतिकरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

2. शिक्षा

यह देखा जा रहा है कि निम्न जातियों में शिक्षा का प्रसार-प्रचार होने से उनमें शिक्षित व्यक्तियों और उच्च जातियों की जीवन-विधि को अपनाने की भावना बलवती हो उठी है।

3. औद्योगीकरण एवं नगरीकरण

औद्योगीकरण होने से नगरों का विस्तार हुआ है। साथ-साथ कम करने, खाने-पीने, उठने-बैठने से जातीय भावना में कमी आयी है। नगरीकरण के कारण उच्च जातियों का निम्न जातियों पर नियन्त्रण कमजोर हुआ है। औद्योगिक नगरों में यह भी पाया जाता है कि निम्न जातियाँ अपनी वास्तविक जाति को छुपाकर ऊँची जातियों में शामिल होने का प्रयास करती हैं, कहीं-कहीं वे ऐसा करने में सफल भी हो रही हैं। नगरीय सभ्यता में द्वैतीयक समूहों की प्रधानता होती है। इसलिए निम्न जातियों द्वारा उच्च जातियों के खान-पान, रहन-सहन, विश्वास और जीवन-विधि को अपनाने पर कोई विरोध भी नहीं करता।

4. धर्मस्थल, मन्दिर तथा तीर्थ स्थान

यह स्थल भी संस्कृतिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन स्थानों पर इकट्ठा जन समूह सांस्कृतिक विचारों का आदान-प्रदान करते हैं तथा एक-दूसरे की संस्कृतियों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। अखंड पाठ, भजन, धार्मिक अनुष्ठान, कर्मकाण्ड तथा साधु-सन्यासी संस्कृतियों के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान देते हैं।

5. आर्थिक सुधार

विभिन्न सरकारी योजनाओं से लाभ लेकर निम्न जातियों ने अपने जीवन स्तर को बेहतर बनाया जिससे प्रभु जातियों में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है।

6. राजनीतिक व्यवस्था एवं सामाजिक सुधार

राजनीतिक व्यवस्था का वर्णन किये बिना संस्कृतिकरण के स्रोत अधूरे हैं। क्षत्रियों में सभी किस्म के वर्ण शामिल होते रहे हैं। क्षत्रियों के पास राजनीतिक शक्ति होती थी। प्रायः यह देखा गया है कि जो भी व्यक्ति शासक या राज्य का प्रधान बनता था उसको क्षत्रिय बनना आवश्यक होता था। इसके सम्बन्ध में चारण या भाट विशेष भूमिका निभाते थे। यह भाट या चारण उस राजा को किसी न किसी क्षत्रिय वंशज के रूप में प्रचारित करते थे।

ब्राह्मण भी राजा की कृपा पाने के लिए इस बात का समर्थन करते थे। इस प्रकार यह आसानी से हो जाता था। सामाजिक सुधार आन्दोलनों से निम्न जातियों का संस्कृतिकरण हुआ है। महात्मा गांधी का अछूतोद्वार कार्यक्रम, दयानन्द सरस्वती का आर्य समाज ने निम्न जातियों के स्तर को ऊँचा उठाया है। समाज में इनके प्रयासों के परिणामस्वरूप इनको अपनाया गया जिससे इनका संस्कृति करण सम्भव हुआ।

7. नये कानून

आजादी के बाद देश में नये संविधान को स्वीकार किया गया। इसके अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई कि रंग, जाति, धर्म, आदि के आधार किसी नागरिक के साथ भेदभाव दण्डनीय अपराध होगा। सन् 1955 में पारित अस्पृश्यता निवारण अधिनियम के द्वारा जातीय भेदभाव को समाप्त कर दिया गया है। 1954 में पारित विशेष विवाह अधिनियम के द्वारा अन्तरजातीय विवाहों को मान्यता प्रदान की गयी। इन व्यवस्थाओं के परिणामस्वरूप निम्न जातियों के संस्कृतिकरण को प्रोत्साहन मिला है।

सामाजिक परिवर्तन परिभाषासामाजिक परिवर्तन के कारक
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