श्रवण बाधित बालक की विशेषताएँ व शिक्षण विधियाँ

श्रवण बाधित बालक – श्रवण, मौखिक सन्देश वाहकता व भाषा विकास का मुख्य ज्ञानेन्द्रीय मार्ग है। श्रवण बोध दोष युक्त होने पर बालक को शाब्दिक अभिव्यक्ति का विकास भी ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है। इसके अतिरिक्त श्रवण अधिगम व मानसिक परिपक्वता के विभिन्न पक्षों को भी प्रभावित करता है।

‘कानों के द्वारा सुनने में बाधा’ से उत्पन्न अयोग्यता व्यक्ति विशेष को श्रवण विकलांग बनाती है। शैक्षिक दृष्टि से ” श्रवण विकलांगता ऐसी शारीरिक निर्योग्यता है जो बालक को मौखिक अभिव्यक्ति द्वारा शिक्षा ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न करती है।” सामान्यतः शिक्षण की प्रक्रिया में मौखिक विद्या का एक अपना महत्व है। श्रवण विकलांग बालकों को भी अतिरिक्त सहायता (उपकरण) या विशिष्ट शिक्षण की आवश्यकता होती है।

श्रवण बाधित बालक की शिक्षा

श्रवण बाधित बालकों की शिक्षा को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है, जो इस प्रकार है-

  1. सम्प्रेषण तकनीकी
  2. शिक्षण तकनीकी

सम्प्रेषण तकनीकी

श्रवण बाधित बालक के सम्बन्ध में जो सबसे बड़ी कठिनाई है वह सम्प्रेषण के सम्बन्ध में है। बालक सुन नहीं सकता है अत: कक्षा में पढ़ाई जाने वाली बातों का सही व पूर्ण अधिगम नहीं कर सकता है। अतः उसे भली प्रकार शिक्षित करने के लिए कुछ विशेष सम्प्रेषण तकनीकी अपनायी जानी चाहिए। कुछ सम्प्रेषण तकनीकी निम्नलिखित हैं-

  1. चिह्न भाषा — बधिर और अत्यधिक ऊँचा सुनने वाले बालकों के लिए चिन्ह भाषाओं का प्रचलन है, जैसे – (1) चिन्हित अंग्रेजी, (2) अमेरिकन चिन्ह भाषाएँ एक-दूसरे से भिन्न होती हैं अब विशेषज्ञ चिह्न भाषा को प्रमाणित कर रहे हैं ताकि उसे अधिकतर ‘विद्यालयों में बोला जा सके और सामान्य बातचीत में तथा टेलीविजन में उसका प्रयोग हो सके। चिह्न भाषा में शब्दों, वर्णों के लिए चिह्न बने रहते हैं।
  2. ओष्ठ पठन – ओष्ठ पठन में बालकों को ओठों के हिलने और गति के आधार पर वर्णों और शब्दों को पढ़ने की शिक्षा दी जाती है। ओष्ठ पठन की कुछ कमियाँ हैं, जैसे—
    • एक बधिर बालक एक सामान्य गति से बोले गये वाक्य को केवल 25 प्रतिशत ही समझा जा सकता है।
    • कुछ ध्वनियों को उच्चारित करते समय ओठ लगभग समान गति से हिलते हैं, जैसे—प, ब, भ, अ, क, त आदि।
    • बालक का ध्यान विभाजित हो जाता है, क्योंकि वह आधा ध्यान ओठों की गतियों पर और आधा ध्यान कही गई बात पर केन्द्रित करता है। फलस्वरूप वह सम्पूर्ण बात को नहीं समझता है।
  3. संकेत भाषा — संकेत उसी भाषा में ओठों को पढ़ने के साथ हाथ से मुँह के पास ही संकेत दिये जाते हैं। संकेत उसी भाषा के होते हैं जिसमें कि बोला जाता है। संकेत भाषा के लाभ निम्नलिखित हैं-
    • इसमें उसी व्याकरण का प्रयोग होता है जो बोली जाती है।
    • इससे बालक आसानी से सुनने वाले भागों के साथ सम्प्रेषण कर सकता है।
  4. गति विधि इसमें शरीर से विभिन्न गतियाँ करवाकर बधिर बालकों के सम्प्रेषण से सहायता दी जाती है।
  5. स्पर्श विधि इसमें स्पर्श द्वारा कही गयी बात को समझने का प्रावधान होता है।
  6. प्रवर्धक प्रयोग – ध्वनि प्रवर्धक यन्त्रों का प्रयोग भी सम्प्रेषण के लिए किया जाता है परन्तु यह केवल उन बालकों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है जो सामान्य से थोड़ा ऊँचा सुनते हैं। बधिर बालकों के लिए यह बेकार है।

शिक्षण तकनीकी

श्रवण बाधित बालकों के लिए निम्नलिखित शिक्षण तकनीकी अपनायी जानी चाहिए-

  1. शिक्षण विषय-वस्तु को सहायक सामग्री की सहायता से पढ़ाया जाना चाहिए। जो सहायक सामग्री प्रयोग की जा सकती है, वह इस प्रकार की हो—आकृतियाँ, चित्र, संकेत शब्द, मॉडल, मानचित्र, इशारे।
  2. शिक्षण के बीच-बीच में प्रश्न पूछना अनिवार्य है। प्रश्न पूछने से यह पता लग सकता है कि बालक पढ़ाई गयी बात को कितना समझ रहा है।
  3. श्रवण बाधित बालक को एक नोट लेने वाला व्यक्ति प्रदान किया जाना चाहिए। इसकी कुछ विशेषताएँ इस प्रकार होना अनिवार्य है—
    • श्रवण बाधित बालक के प्रति भावुक हो।
    • विषय का अच्छा ज्ञान रखता हो।
    • सामान्य से अच्छी शैक्षिक उपलब्धि हो।
    • दिशा और व्यवस्था को स्वीकार करने की इच्छा हो।
    • कक्षा-कक्ष अध्यापक से कार्य लेने में आत्म-विश्वास का अनुभव करता हो।
    • अपनी आलोचना या दिखावे के लिए प्रदर्शित बुरी भावना को स्वीकार करने की इच्छा हो।
  4. यदि नोट लेने वाले व्यक्ति की व्यवस्था नहीं हो पाती है तो श्रवण बाधित बालक के किसी सहपाठी से कहा जा सकता है कि वह जो नोट्स लेता है उसकी कार्बन कॉपी निकाला करें। कार्बन कॉपी का प्रयोग श्रवण बाधित बालक कर सकता है।
  5. श्रवण बाधित बालकों के लिए एक विशेष अध्यापक जो प्रशिक्षण प्राप्त हो, नियुक्त किया जाना चाहिए। इसका कार्य अन्य अध्यापकों और माता-पिता से मिलकर बालकों की पढ़ाई की व्यवस्था करना होगा।
  6. श्रवण बाधित बालकों की अधिगम कमियों की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। यह देखना चाहिए कि वे शब्दों को ठीक लिखते और बोलते हैं अथवा नहीं। प्रारम्भिक अवस्था में ही सुधार कर लेना बालक के हित में होगा।
  7. आजकल श्रवण बाधित बालक के शिक्षण के लिए कम्प्यूटर का प्रयोग किया जाता है। इनका प्रयोग परीक्षण और पुनर्वास के लिए सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
  8. श्रवण बाधित बालकों के लिए कुछ तकनीकी कार्यक्रम बनाने चाहिए। रोचेस्टर तकनीक विज्ञान संस्था में स्थित बधिर राष्ट्रीय तकनीकी संस्था में इस प्रकार के कार्यक्रम उपलब्ध हैं। इन्हें भारतीय संस्कृति के अनुसार परिवर्तित किया जा सकता है और सर्वथा नवीन कार्यक्रम भी बनाये जा सकते हैं।

श्रवण बाधित बालकों की शैक्षिक आवश्यकताएँ

श्रवण बाधित बालकों को दिन-प्रतिदिन के क्रियाकलाप भली प्रकार से करने में सहायता देने के लिए कुछ सुविधाएँ दी जानी चाहिए ये सुविधाएँ उनके ज्ञान को निश्चित रूप से विकसित करेंगी। ये सुविधाएँ तथा साधन निम्नलिखित हैं-

  1. श्रवण सहायक उपकरण का उपयोग
  2. व्यावसायिक प्रशिक्षण
  3. श्रवण प्रशिक्षण
  4. पूर्व प्राथमिक शिक्षा
  5. कक्षा का समुचित प्रबन्धन
  6. बोलने व पढ़ने का प्रशिक्षण
  7. माता-पिता की भूमिका
  8. विद्यालय की भूमिका
  9. अध्यापक की भूमिका
  1. शैक्षिक और व्यावसायिक निर्देशन

श्रवण बाधित बालकों की विशेषताएँ

श्रवण बाधित बालकों की मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. भाषा या वाणी का विकास
    • श्रवण बाधित बालकों को भाषा सीखने और बोलने की कौशल पर गम्भीर प्रभाव होता है।
    • इनके गहन प्रशिक्षण के द्वारा भाषा का सामान्य विकास हो पाता है।
    • श्रवण बाधित बालक के भाषा के उच्चारण में अधिक दोष होता है।
    • जो बालक जन्म से ही बहरा होता है उसे विशिष्ट प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
    • ऐसे बालकों की अभिवृत्ति ऐसे होती है कि वह अपने को बोलने में अयोग्य समझने लगते हैं।
    • गम्भीर रूप से श्रवण बाधित बालकों की बड़ी कठिनाई यह होती है कि उनमें भाषा का सामान्य विकास नहीं होता है।
    • ऐसे बालक बहुत कम ही भाषा का प्रयोग करते हैं।
    • श्रवण बाधित बालकों की सामान्य बालकों के साथ शिक्षा नहीं दी जा सकती। इनके लिए विशिष्ट विद्यालय, विशिष्ट कक्षा तथा विशिष्ट अध्यापक की आवश्यकता होती है। ऐसे बालक होठों की गतिविधि से समझने का प्रयास करते हैं। इनके शिक्षण में सांकेतिक भाषा का अधिक प्रयोग होता है।
  2. बौद्धिक योग्यता का विकास
    • श्रवण बाधित बालकों का मानसिक विकास सामान्य बालकों के समान ही होता है।
    • श्रवण बाधित बालकों की चिन्तन शक्ति सामान्य बालकों की जैसी ही होती है।
    • ऐसे बालकों की मानसिक मन्दिता नहीं होती भाषा के अतिरिक्त अन्य सभी समस्याओं एवं परिस्थितियों को समझ लेते हैं।
    • ऐसे बालकों के बौद्धिक कार्य सामान्य बालकों के जैसे ही होते हैं।
    • भाषा कौशल की दृष्टि से इन्हें मन्दित बालक कहा जा सकता है। ऐसे बालक अशाब्दिक भाषा (सांकेतिक भाषा) जिसे शारीरिक भाषा भी कहते हैं के द्वारा बौद्धिक कार्य करने में सक्षम होते हैं।
    • बौद्धिक अशाब्दिक परीक्षा में इनकी बुद्धि-लब्धि उच्च स्तर की होती है।
  1. शैक्षिक निष्पत्ति का विकास
    • शैक्षिक निष्पत्ति की दृष्टि ऐसे बालकों में अधिक भिन्नता पाई जाती है।
    • ऐसे बालकों का बौद्धिक स्तर ऊँचा होता है परन्तु फिर भी शैक्षिक उपलब्धि अधिक नहीं हो पाती है।
    • ऐसे बालकों को पढ़ने में भी कठिनाई होती है क्योंकि भाषा का सही विकास नहीं हो पाता।
    • शैक्षिक निष्पत्ति की स्थिति ऐसे बालकों की अच्छी नहीं होती क्योंकि शैक्षिक निष्पत्ति में शाब्दिक योग्यता की अहम् भूमिका होती है।
    • ऐसे कुछ ही बालक भाषा को बोधगम्य कर पाते हैं और पुस्तकों का अध्ययन कर लेते हैं।
  2. सामाजिक तथा व्यावसायिक समायोजन
    • श्रवण बाधित बालकों के सामाजिक और व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताएँ सामान्य बालकों से भिन्न होती हैं।
    • ऐसे बालकों में पारस्परिक सम्प्रेषण की समस्या होती है और शाब्दिक अन्तःप्रक्रिया नहीं होती है।
    • सम्प्रेषण की समस्याओं के कारण समाज में इनकी अन्तःप्रक्रिया नहीं हो पाती है जिससे ये अलग दुनिया में ही रहते हैं।
    • इस प्रकार के बालक अपने ही समूह में रहना पसन्द करते हैं और उनसे ही सम्बन्ध बनाते हैं। उनकी रुचियाँ भी समान होती हैं।
    • ऐसे बालकों में इच्छाएँ बड़ी प्रबल होती हैं कि उन्हें सामाजिक मान्यता मिले और सामाजिक अन्तःप्रक्रिया भी हो। इस इच्छा की पूर्ति न होने के कारण हीन भावना अधिक हो जाती है।
    • श्रवण बाधित बालक भावनात्मक समायोजन में सामान्य बालकों के समान होते हैं। सामान्य बालकों की तरह वातावरण के घटक उनके भावात्मक पक्ष को प्रभावित करते हैं।
    • आज बड़ी संख्या में श्रवण बाधित व्यक्ति विभिन्न व्यवसायों में नौकरियाँ कर रहे हैं। कुछ की शैक्षिक योग्यता भी अधिक होती है और वे उच्च पदों पर कार्यरत हैं।
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  1. अन्य विशेषताएँ – कुछ शोध अध्ययनों द्वारा यह विदित होता है कि श्रवण बाधित बालकों की मानसिक योग्यता कम होती है तथा शैक्षिक योग्यता एवं समायोजन में भी अच्छा नहीं होता। इसका मुख्य कारण यह है कि ऐसे बालकों में भाषा का अभाव रहता है क्योंकि उन्हें सुनने और बोलने में कठिनाई होती है। इन छात्रों में ही भावना आ जाती है। श्रवण बाधितों की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताओं को निम्नलिखित छः भागों में विभाजित किया गया है –
    • सामाजिक रूप से बाधित
    • व्यक्तिगत तथा सामाजिक विकास की समस्याएँ
    • व्यक्तित्व की समस्याएँ
    • मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ
    • भाषा की कठिनाई
    • असामान्य संवेगात्मक व्यवहार
    • इस प्रकार उपरोक्त सभी श्रवण बाधित बालकों की प्रमुख विशेषताएँ हैं।
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Seema Alung
Seema Alung
1 month ago

अत्यंत उपयोगी जानकारी के लिए धन्यवाद ।प्रशिक्षण कार्यक्रम पर भी जानकारी दें।