शैशवावस्था

शैशवावस्था मानव की सर्वप्रथम तथा सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है। इस अवस्था की अवधि जन्म से 6 वर्ष तक निर्धारित की गई है। शैशवावस्था को भावी जीवन की आधारशिला के रूप में जाना जाता है। फ्रायड जैसे मनोवैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि व्यक्ति को भावी जीवन में जो कुछ भी बनना होता है उसका निर्धारण चार 5 वर्ष की आयु तक ही हो जाता है। इस अवस्था से संबंधित विशेषताओं एवं शैक्षिक व्यवस्था का ज्ञान शिक्षक के लिए अत्यंत आवश्यक है।

शैशवावस्था की विशेषताएं

मानव जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था शैशवावस्था होती है क्योंकि इस अवस्था में शिशु की विभिन्न अंतर्निहित शक्तियों तथा प्रवृत्तियों का विकास होता है। इसके अतिरिक्त व्यवस्था बालक के भावी जीवन के बारे में भी विभिन्न महत्वपूर्ण संकेत देती है। शैशवावस्था की प्रमुख विशेषताएं निम्न है-

  1. शारीरिक विकास – इस अवस्था में बालक के शारीरिक विकास की गति अत्यंत तीव्र होती है। शुरू में 6 महीने में ही बालक है जन्म से दुगुना हो जाता है तथा 12 महीने में उसका भार तिगुना हो जाता है। 1 वर्ष की आयु में उसके शारीरिक अंग संतुलित हो जाते हैं तथा दूध के दांत निकलने लगते हैं। ढाई वर्ष की अवस्था में बालक के मस्तिष्क में दो तिहाई की वृद्धि हो जाती है तथा इस अवस्था के समाप्त होते होते वह अपने हाथों से परिश्रम करना भी सीख लेते हैं।
  2. मानसिक विकास – फ्रोबेल के शब्दों में “इस अवस्था में बालक की संपूर्ण मानसिक क्रियाएं तीव्र गति से बढ़ती है। वातावरण के बीच जो भी वस्तुएं विद्यमान रहती हैं बालक उनको समझने हेतु सक्रिय रूप में क्रियाशील रहता है।” शैशवावस्था में विशेष रुप से, स्मृति प्रत्यक्षीकरण इत्यादि शक्तियों का विकास होता है।
  3. भाषा का विकास – जन्म के पश्चात बालक की समस्त शक्ति मात्र रोने तक सीमित होती है। कुछ दिनों पश्चात अपने मां बाप भाई और बहनों इत्यादि का अनुकरण करके अनेक शब्द बोलने लगता है। स्मिथ महोदय के अनुसार 6 वर्ष की आयु में बालक लगभग 25627 शब्दों को बोल लेता है।
  4. दोहराने की प्रवृत्ति – इस अवस्था में बालक में दोहराने की प्रवृत्ति अत्यंत तीव्र होती है। शब्दों, गीतों इत्यादि की पुनरावृति करने में वे आनंद का अनुभव करते हैं।
  5. खेल प्रवृत्ति – शैशवावस्था में शिशु स्वकेंद्रित होते हैं, जिस कारण वे अकेले खेलना पसंद करते हैं। खेलते समय वे अकेले ही खिलौनों से बातें करते रहते हैं। अन्य किसी भी बालक के साथ खेलना उन्हें पसंद नहीं आता। क्रो एंड क्रो के अनुसार “बहुत ही छोटा शिशु अकेला रहता है तदुपरांत वह अपनी आयु के बालकों के साथ खेलने में महान आनंद की अनुभूति करता है।”
  1. पर्यावरण के प्रति समायोजन – सिर्फ अपने पर्यावरण के साथ अनुकूलन करने में समर्थ नहीं होता है। सामाजिकता एवं पर्यावरण की समस्याओं के प्रति उदासीन रहने के कारण पूर्ण रूप से वह अपने माता-पिता पर आश्रित रहता है। अपनी दिनचर्या में बाधा उत्पन्न होने पर शिशु असामान्य व्यवहार करने लगता है।
  2. प्रेम भावना तथा काम प्रवृत्ति – फ्राइड के अनुसार शिशु की प्रेम एवं काम प्रवृत्ति निजी स्वार्थ पर आधारित होती है। शिशु सामान्यतया अपने से ही अधिक प्रेम करता है। जब दो-तीन वर्ष का हो जाता है तो अपनी माता से प्रेम करने लगता है तथा मां के प्रति पूर्णतया आसक्त हो जाता है। शिशु के द्वारा हाथ व पैर का अंगूठा चूसना उसकी काम प्रवृत्ति का प्रतीक है।
  3. मूल प्रवृत्ति पर आधारित व्यवहार – इस अवस्था में बालक की मूल प्रवृत्तियों द्वारा ही उसका व्यवहार संचालित हो जाता है। अपनी मूल प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने में वह सफल नहीं होता जैसे भूख लगने पर तेज तेज रोने लगता है।
  4. काल्पनिक जगत – इस अवस्था में शिशु बाय वातावरण की समस्याओं के प्रति अधिक सक्रिय न रहकर काल्पनिक जगत में ही खोया रहता है तथा इस अवस्था के अंतिम चरण में शिशु दिवास्वप्न भी देखने लगता है।
  5. नैतिकता का अभाव – इस अवस्था में शिशु उचित अनुचित सही गलत के बीच अंतर नहीं कर पाते। मात्र अपने कौतूहल अथवा आनंद प्रवृत्ति से अभी प्रेरित होकर वे क्रिया प्रतिक्रिया करने लगते हैं। ऐसे जलती मोमबत्ती से आकर्षित होकर उसे पकड़ने का प्रयास करना।
शैशवावस्था की विशेषताएं

शैशवावस्था एवं शिक्षा

इस अवस्था में शिक्षा निम्न प्रकार की होनी चाहिए।

  1. खेल एवं क्रिया के माध्यम से शिक्षा – शिशु की खेल में जन्म से रूचि होती है। यही शिशु की सक्रियता का प्रमुख आधार होता है। इसलिए इस अवस्था शिशु को खेल प्रक्रिया करने के अधिकाधिक अवसर दिए जाने चाहिए।
  2. दृश्य श्रव्य सामग्री का प्रयोग – इस अवस्था में शिक्षा प्रदान करते समय चित्रों एवं कहानियों से शिशु अधिक प्रभावित होता है तथा शिशुओं की शिक्षा को अधिक से अधिक रोचक बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। शिशुओं की पुस्तकों में चित्र अधिक होने चाहिए।
  3. आत्मनिर्भरता की शिक्षा – शैशवावस्था में बालक को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें अपना कार्य स्वयं करने देना चाहिए तथा शिक्षक द्वारा आत्मविश्वास की भावना विकसित की जानी चाहिए।
  4. ज्ञानेंद्रियों का प्रशिक्षण – शिशु ज्ञान इंद्रियों के द्वारा ज्ञानार्जन करते हैं। इनके द्वारा अर्जित ज्ञान स्थाई होता है। दूसरों के अनुसार शिशु के हाथ पैर तथा आप उसके प्रारंभिक अध्यापक है इसलिए सिसकी ज्ञानेंद्रियों के प्रशिक्षण पर अत्यधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
  5. व्यवहार का सामाजीकरण – शैशवावस्था के आरंभ में शिशु का व्यवहार अबोध होता है। सामाजिक आदर्शों एवं मूल्यों का ज्ञान प्रदान करके उसके व्यवहार को सामाजिक बनाया जाता है। अतः शिशु को इस प्रकार की शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए, जो सामाजिकरण में शिशु को मार्ग निर्देशन प्रदान कर सके।
  6. अच्छी आदतों का निर्माण – शैशवावस्था में शिशु को इस प्रकार की शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए जिसमें उनमें उत्तम अब तो का निर्माण हो सके। जैसे समय पर उठना, खाना, सोना, शरीर की स्वच्छता इत्यादि।
  7. समुचित वातावरण प्राप्त करना – शिशु के विकास के लिए आवश्यक है कि उसे समुचित मनोवैज्ञानिक, भौतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण प्राप्त हो। इस अवस्था में वह स्वस्थ, शांत तथा सुरक्षित वातावरण चाहता है। अतः शिक्षालय तथा परिवार में उसके साथ सहानुभूति, स्नेह एवं शिक्षा का व्यवहार किया जाना चाहिए।

शैशवावस्था की प्रमुख समस्याएं

मानव जीवन के विकास की समस्त अवस्थाओं में शैशवावस्था का सबसे अधिक महत्व है। क्रोल एवं ब्रूस ने इसे जीवन का अनोखा काल बताया है। शैशवावस्था की प्रमुख समस्याएं निम्न है-

  1. शैशवावस्था जो जन्म से 5 वर्ष तक की होती है इस अवस्था में शिशु शारीरिक नियंत्रण करना क्रमशः धीरे-धीरे सीखता है। अतः इस दौरान उसको शारीरिक चोट लगने की प्रमुख समस्या होती है जो उसके भावी जीवन को प्रभावित करती है।
  2. इस अवस्था के बालकों में उचित तथा अनुचित बातों का ज्ञान ना होने के कारण प्रायः उनमें बुरी आदतें उत्पन्न हो जाती है यदि घर का वातावरण ठीक ना हो।
  3. इस अवस्था में बालक अति कल्पनाशील होता है जो उसकी पूर्ति से परे होती है इस स्थिति की अधिकता से शिशु के स्वभाव में चिड़चिड़ापन आने लगता है जो उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।
  4. प्रारंभिक शिशु अवस्था में बालक भय का अनुभव करता है वह अकेले में, अंधेरे में, जानवरों की जोर आवाज से तथा अपरिचित व्यक्तियों से भयभीत होता है। अतः उसे इन परिस्थितियों से बचाना चाहिए।
  5. शिशु अवस्था अत्यंत संवेदनशील अवस्था होती है। संक्रमण का उन पर अति शीघ्र दुष्प्रभाव पड़ता है। अतः संक्रमण से बचाने के पूरे प्रयास करने चाहिए।
  6. कई बार ऐसा होता है कि शिशु अपनी समस्या को ठीक से बताना पानी के कारण कष्ट संहिता रहता है तथा माता पिता उसकी समस्या समझ नहीं पाते हैं। अत: शिशुओं के प्रति सदैव सजग तथा उन पर नजर रखनी चाहिए। ताकि उनको चोट ना लग जाए तथा कोई वस्तु मुंह में ना डालें जो हानिकारक हो।
  7. शिशु का व्यवहार मूल प्रवृत्तयात्मक होता है, अतः इस व्यवहार को बदलने के लिए उसकी मूल प्रवृत्ति का दमन ना करके उनका मार्गान्तीकरण करने का प्रयास करना चाहिए। अन्यथा शिशु का विकास अवरुद्ध हो जाएगा।
अधिगमकिशोरावस्थाबाल्यावस्था
सृजनात्मक बालक Creative Childसमस्यात्मक बालकश्रवण विकलांगता
प्रतिभाशाली बालकपिछड़ा बालकविशिष्ट बालकों के प्रकार
समावेशी बालकबाल विकास के क्षेत्रनिरीक्षण विधि Observation Method
किशोरावस्था में सामाजिक विकाससामाजिक विकासप्रगतिशील शिक्षा – 4 Top Objective
बाल केन्द्रित शिक्षाविकाससृजनात्मकता
बाल्यावस्था में मानसिक विकासमानव विकास की अवस्थाएं
guest

0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments