शैक्षिक तकनीकी

शैक्षिक तकनीकी का अर्थ समझने से पूर्व हमें शिक्षा एवं तकनीकी का अर्थ समझने से पूर्व हमें शिक्षा एवं तकनीकी का अर्थ समझ लेना चाहिए। तकनीकी से सम्बन्धित एक अन्य शब्द विज्ञान भी है जिसका अर्थ समझना आवश्यक है।

शिक्षा ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया को कहते हैं। शाब्दिक अर्थों में शिक्षा का अर्थ “बालक की आन्तरिक शक्तियों, प्रतिभाओं और क्षमताओं को बाहर की ओर अग्रसर कर विकसित करना है।” व्यापक अर्थ में शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवन पर्यन्त चलती रहती है।

विज्ञान किसी वस्तु का वह क्रमबद्ध ज्ञान है जो मानवीय परीक्षण तथा अनुभव से प्राप्त होता है।” विज्ञान के द्वारा व्यक्ति के अन्दर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित होता है जिसके फलस्वरूप उसके विचारों में क्रमबद्धता आती है, उसके निर्णयों तथा निष्कर्षों में वस्तुनिष्ठता आती है और उसे पूर्वाग्रहों तथा पक्षपात की धारणा से मुक्ति मिलती है।

“तकनीकी वैज्ञानिक सिद्धान्त का प्रयोगात्मक लक्ष्यों में प्रयोग मात्र है।”

जैकेटा ब्लूमर

तकनीकी, विज्ञान का कला में प्रयोग है।

ओफीश

विज्ञान का विकास तकनीकी के माध्यम से होता है। वैज्ञानिक ज्ञान को जब व्यवहार में प्रयुक्त किया जाता है तब उसे तकनीकी कहा जाता है। विज्ञान तथा तकनीकी परस्पर सम्बन्धित होते हैं तथा एक दूसरे को आधार प्रदान करते हैं। विज्ञान हमें यह बताता है कि किसी वस्तु अथवा सिद्धान्त को जानना चाहिए, जबकि तकनीकी इस बात पर बल देती है कि उस वस्तु अथवा सिद्धान्त को कैसे जाना जाये?

शिक्षा एवं तकनीकी भी आपस में घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। शैक्षिक तकनीकी के द्वारा बालकों को शिक्षा प्रदान करने में सहायता मिलती है। हमारे देश में छात्रों को विज्ञान के नियम तथा सिद्धान्त तो पढ़ाये जाते हैं लेकिन उन्हें उन नियमों तथा सिद्धान्तों के विषय में व्यावहारिक ज्ञान प्रदान नहीं किया जाता। समाज व राष्ट्र की उन्नति के लिए यह परम आवश्यक है कि विद्यार्थियों को • विज्ञान के साथ तकनीकी का भी ज्ञान प्रदान किया जाये।

शैक्षिक तकनीकी

शैक्षिक तकनीकी एक ऐसी प्रविधि का विज्ञान है जिसके द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है। इसका क्षेत्र केवल उद्देश्यों को निर्धारित करने तक ही सीमित नहीं है, वरन् यह उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में परिभाषित करने में सहायता करता है। इसके द्वारा शिक्षा की वर्तमान प्रक्रिया को उन्नत करने के लिए क्रमबद्ध रूप से प्रयत्न किया।

शैक्षिक तकनीकी के द्वारा शिक्षा के उद्देश्य, विधि, पाठ्यक्रम, सहायक सामग्री तथा मूल्यांकन आदि को विकसित एवं उन्नत किया जाता है। जे. के. गालबैथ के अनुसार प्रत्येक तकनीकी में दो मुख्य विशेषताएँ होती हैं- प्रथम वैज्ञानिक ज्ञान का व्यावहारिक कार्यों में क्रमबद्ध प्रयोग तथा द्वितीय- व्यवहार के कार्यों का खण्ड-उपखण्ड में विभाजन करना।

शिक्षा के क्षेत्र में जो भी विषय इन मापदण्डों की विशेषताओं को पूरा करता है उसे शैक्षिक तकनीकी कहते हैं। इसके द्वारा शिक्षण के उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में परिभाषित किया जाता है। शैक्षणिक तकनीकी शिक्षा के उद्देश्य निर्धारित नहीं करती है। शिक्षा के उद्देश्य तो सामाजिक, राजनीतिक एवं अन्य विचारक निर्धारित करते हैं। शैक्षिक तकनीकी के द्वारा तो शिक्षा के निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न विधियों एवं प्रविधियों का निर्माण तथा विकास किया जाता है।

शैक्षिक तकनीकी परिभाषाएँ

विभिन्न मनोवैज्ञानिक एवं शिक्षाशास्त्रियों ने शैक्षिक तकनीकी की अनेक परिभाषाएँ दी हैं। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

“तकनीकी तथा विज्ञान के आविष्कारों तथा नियमों का शिक्षा की प्रक्रिया में प्रयोग को शैक्षिक तकनीकी कहा जाता है।”

एम. एस. कुलकर्णीीं

“शिक्षा तकनीकी उन क्रमबद्ध विधियों के विकास को तथा उस व्यावहारिक ज्ञान को कहते हैं, जिनका उपयोग विद्यालय में शैक्षिक योजना, प्रक्रिया तथा प्रशिक्षण किया जाता है।”

मैथिस

शैक्षिक तकनीकी से तात्पर्य वैज्ञानिक या अन्य संगठित ज्ञान के व्यवहार में प्रयोग से है। इसमें व्यावहारिक कार्य का खण्ड उपखण्ड में विभाजन किया जाता है।

जे. के. गालवैथ

शैक्षिक तकनीकी को उन विधियों तथा प्रविधियों का ज्ञान माना जा सकता है जिसके शैक्षिक उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके।

एस. के. मित्राद्वारा

“शैक्षिक तकनीकी सीखने और सिखाने की दिशाओं में वैज्ञानिक ज्ञान का प्रयोग है जिसके द्वारा शिक्षण एवं प्रशिक्षण को प्रभावपूर्णता तथा दक्षता में सुधार लाया जाता है।”

जी. ओ. लेथ

“मानव के सीखने की परिस्थितियों में वैज्ञानिक प्रक्रिया के प्रयोग को शैक्षिक तकनीकी कहते हैं।”

आर. ए. कोक्स

“शैक्षिक तकनीकी का प्रमुख उद्देश्य कुछ आवश्यक तत्वों, जैसे -शैक्षिक उद्देश्य, पाठ्यवस्तु, शिक्षण सामग्री, विधि, वातावरण, छात्रों व निर्देशकों के व्यवहार तथा उनके मध्य होने वाली अन्तःक्रिया को नियंत्रित करके अधिकतम शैक्षिक प्रभाव उत्पन्न करना है।”

तकाशी सकामाटो

ज्ञान के व्यवहार में विनियोग की प्रक्रिया ही शैक्षिक तकनीकी है।

ई. एम. बूटर

अधिगम के मनोविज्ञान का व्यावहारिक शैक्षिक समस्याओं पर गहन प्रयोग ही तकनीकी है।

डीसीको

शैक्षिक तकनीकी की विशेषताएँ

शैक्षिक तकनीकी की विभिन्न परिभाषाओं से शैक्षिक तकनीकी के सन्दर्भ में निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती हैं

  1. शैक्षिक तकनीकी विज्ञान पर आधारित है।
  2. यह विज्ञान का व्यावहारिक रूप है, क्योंकि इसमें विज्ञान तथा तकनीकी का प्रयोग किया जाता है।
  3. इसके प्रयोग से शिक्षण विधि, उद्देश्य, नीतियों, पाठ्यवस्तु तथा वातावरण द्वारा विद्यार्थियों व अध्यापकों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाया जाता है।
  4. इसके द्वारा कक्षा शिक्षण को सरल, वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ तथा प्रभावपूर्ण बनाया जा सकता है।
  5. इस तकनीकी के द्वारा वैज्ञानिक ज्ञान का शिक्षण एवं प्रशिक्षण में प्रयोग किया जाता है।
  6. यह विधि निरन्तर प्रगतिशील, विकासशील एवं प्रभावपूर्ण है।
  7. यह तकनीकी शिक्षा सम्बन्धी मूल्यांकन तथा निर्देशन में वैज्ञानिक रूप से सुधार है। करती
  8. शैक्षिक तकनीकी मनोविज्ञान, दृश्य-श्रव्य सामग्री, मशीन, विज्ञान, कला आदि में बहुत सहायता लेती है।
  9. इस तकनीकी के द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में कई नवीन अवधारणाओं का जन्म हुआ, जैसे- अभिक्रमित अध्ययन, अन्तःप्रक्रिया विश्लेषण, प्रोजेक्टर, कम्प्यूटर, वीडियोटेप, टेपरिकॉर्डर, श्रव्य दृश्य सामग्री, सूक्ष्म शिक्षण, सीमुलेटेड शिक्षण आदि।
  10. शैक्षिक तकनीकी का सम्बन्ध शिक्षा की समस्याओं, उनके विश्लेषण, उनके निराकरण के लिए शोध तथा शिक्षा के सुधार से है।
  11. शैक्षिक तकनीकी प्रभावकारी अधिगम के लिए विधाओं, विधियों, प्रविधियों के विकास पर बल देती है।
  12. शैक्षिक तकनीकी वातावरण, संसाधनों और विधियों द्वारा अधिगम प्रक्रिया को सरल बनाती है।

शैक्षिक तकनीकी का महत्व

शैक्षिक तकनीकी का शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक महत्व तथा उपयोगिता है। इसने शिक्षा के क्षेत्र में क्रान्ति उत्पन्न कर दी है। शिक्षण तकनीकी ने शिक्षण प्रक्रिया को विशेष रूप से प्रभावित किया है। शिक्षा तकनीकी का महत्वपूर्ण योगदान यह है कि इसके द्वारा शिक्षण के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। इससे पूर्व सीखने के सिद्धान्त बहुत महत्वपूर्ण माने जाते थे परन्तु ये सिद्धान्त शिक्षा की समस्याओं को हल नहीं कर सके। इसके अतिरिक्त शैक्षिक तकनीकी की निम्नलिखित उपयोगिताएँ हैं –

  1. इसके माध्यम से जनसाधारण के लिए शिक्षा, अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा तथा सतत् शिक्षा आदि कार्यक्रमों का प्रसार तथा विकास सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
  2. शिक्षण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली तथा सार्थक बनाया जा सकता है।
  3. शिक्षा के संगठन, प्रशासन व प्रबन्ध की समस्याओं का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन तथा विकास किया जा सकता है।
  4. आजकल जनसाधारण के पास रेडियो, ट्रांजिस्टर तथा टेलीविजन की सुविधाएँ सुलभ हैं। शिक्षा के लिए इन सब साधनों का उपयोग किया जा सकता है।
  5. विद्यार्थियों की सीखने की उपलब्धि में वृद्धि की जा सकती है।
  6. शैक्षिक तकनीकी के द्वारा अध्यापक की कार्यक्षमता में वृद्धि की जा सकती है।
  7. इसके प्रयोग से अध्यापक का कार्य सरल, स्पष्ट, रुचिपूर्ण एवं प्रभावपूर्ण बन सकता है।
  8. अध्यापक का दृष्टिकोण, वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ एवं मनोवैज्ञानिक हो सकता है।
  9. शैक्षिक तकनीकी का प्रमुख आधार व्यवहार होता है। अतः इसके द्वारा अध्यापकों तथा विद्यार्थियों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाया जा सकता है।
  10. अभिक्रमित अध्ययन द्वारा व्यक्तिगत विभिन्नता की समस्या का हल तथा विद्यार्थियों में स्वतः अध्ययन करने की आदत का निर्माण किया जा सकता
  11. नवीन शिक्षण प्रतिमान, शिक्षण उपकरण एवं विधियों से शिक्षण को प्रभावपूर्ण बनाया जा सकता है।
  12. इस तकनीकी की मदद से अध्यापक एक प्रबन्धक के रूप में विद्यार्थियों के बड़े समूह को कम समय तथा व्यय पर अच्छी शिक्षा प्रदान कर सकता है
  13. सूक्ष्म शिक्षण, सीमुलेटेड शिक्षण, अनुकरणीय शिक्षण आदि के द्वारा प्रशिक्षण को प्रभावपूर्ण बनाया जा सकता है।
  14. नवीन शिक्षा उपकरणों, विधियों तथा मशीनों के प्रयोग से शिक्षण को व्यावहारिक, सार्थक तथा प्रभावपूर्ण बनाया जा सकता है।
  15. राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के स्तर को ऊंचा किया जा सकता है।
  16. शैक्षिक तकनीकी के प्रयोग से शिक्षा में अनुसंधान एवं शोधकार्य का सुधार हो सकेगा।

शैक्षिक तकनीकी का विकास

सर्वप्रथम, शिक्षण में तकनीकी का प्रयोग 1926 में अमेरिका में ओहियो राज्य विश्वविद्यालय में सिडनी प्रैसी ने शिक्षण मशीन के निर्माण द्वारा प्रारम्भ किया। इस मशीन का निर्माण एक शिक्षण युक्ति के रूप में जाँच हेतु किया गया था। तत्पश्चात् 1930-40 के लगभग लम्सडेन तथा ग्लैसर आदि तकनीकी विशेषज्ञों ने शिक्षण के यंत्रीकरण करने का प्रयत्न किया। यह कार्य कुछ विशेष प्रकार की पुस्तकों, कार्डों व बोड़ों के रूप में प्रस्तुत किया गया।

किन्तु वास्तव में शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य सन् 1954 में बी. एफ. स्किनर के प्रयोगों द्वारा प्रारम्भ हुआ। स्किनर ने जानवरों पर किये गये परीक्षणों का उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में सीखने के लिए किया। उसके इन्हीं परीक्षणों के फलस्वरूप अभिक्रमित अधिगम का विकास हुआ। इसी के अनुरूप इंग्लैण्ड में सर्वप्रथम ब्राइनमौर ने प्रयोग किया। तत्पश्चात् औद्योगिक क्रान्ति तथा अन्य क्षेत्रों में प्रगति के फलस्वरूप शिक्षाशास्त्रियों में इसकी विस्तार से व्याख्या की।

अतः 1950 के बाद शैक्षिक तकनीकी का विशेष रूप से विकास हुआ तथा शिक्षा के क्षेत्र में विज्ञान पर आधारित इस प्रत्यय का एक नवीन क्षेत्र विकसित होना प्रारम्भ हुआ। रूस एवं अमेरिका की औद्योगिक प्रगति के कारण 1960 के बाद अन्य देशों में भी शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में विशेष उन्नति हुई। इस समय अनेक प्रकार के तकनीकी आविष्कार हुए, जैसे दृश्य-श्रव्य साधन, रेडियो, टीवी, टेपरिकॉर्डर, प्रोजेक्टर, कम्प्यूटर तथा प्रणाली विश्लेक्षण इत्यादि।

इन तकनीकियों का सुरक्षा, उद्योग, वाणिज्य, स्वास्थ्य एवं शिक्षा आदि के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया जाने लगा। शिक्षा पर भी इन सबका प्रभाव पड़ा और शिक्षा के क्षेत्र में शैक्षिक तकनीकी एवं व्यवहार तकनीकी आदि के क्षेत्र में अनेक शोधकार्य किये गये। परिणामस्वरूप अमेरिका तथा अन्य विकसित देशों में अनेक शिक्षण सिद्धान्तों, प्रतिमानों व डिजाइनों का प्रतिपादन किया गया। अमेरिका में विश्वविद्यालयों के शिक्षा मनोविज्ञान एवं विज्ञान द्वारा सन् 1966 में शिक्षा तकनीकी की एक राष्ट्रीय परिषद स्थापित की गयी।

इसके अतिरिक्त बन्द सर्किट टेलीविजन व अन्य दृश्य-श्रव्य सामग्री का उपयोग किया गया। शैक्षिक तकनीकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान भाषा प्रयोगशाला की स्थापना था। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में एक नवीनतम प्रयोग इलेक्ट्रॉनिक वीडियोटेप भी माना जाता है। कई अन्य वैज्ञानिक 1969 में इस क्षेत्र के विकास के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे और उन्होंने प्रशासन व इंजीनियरिंग के विकास की दृष्टि से सुरक्षा,उद्योग, कृषि, व्यापार व वाणिज्य, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य किये।

विकास के द्वारा अनेक प्रकार की तकनीकियों की खोज हुई जैसे- चीनी तकनीकी, कागज तकनीकी एवं कपड़ा तकनीकी आदि। अमेरिका में एमिडोन, फ्लैंडर्स तथा स्मिथ आदि शिक्षाशास्त्रियों द्वारा व्यवहार तकनीकी के क्षेत्र में कक्षा शिक्षण अन्तःक्रिया को संख्यात्मक उपागम से शिक्षक के शाब्दिक तथा अशाब्दिक व सांकेतिक कक्षा व्यवहार को मापने की खोज की गयी और कई निरीक्षण विधियों का निर्माण किया।

जिनके द्वारा शिक्षक व विद्यार्थी के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाना सम्भव हो सका। इस प्रकार शिक्षा तकनीकी का प्रारम्भ अमेरिका एवं रूस में हुआ। भारत में विज्ञान एवं तकनीकी का उपयोग सबसे पहले सेना व सुरक्षा कार्यों के लिए किया गया। बाद में स्वास्थ्य प्रबन्ध, व्यापार, उद्योग तथा शिक्षा के क्षेत्रों में इसका प्रयोग किया गया। भारत में सर्वप्रथम 1966 में एक भारतीय अभिक्रमित अनुदेशन संगठन स्थापित किया गया।

इस संगठन के द्वारा विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा-तकनीकी के विकास के लिए प्रयास किये गये। शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी के माध्यम से विशेष प्रयत्न सन् 1970 के लगभग किये गये। इस समय राष्ट्रीय अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद एवं उच्च शिक्षा संस्थान, बड़ौदा, मेरठ तथा शिमला विविद्यालयों एवं शिक्षा विभागों में एम. एड. एवं पी. एच. डी. स्तर पर शोध कार्यों को प्रोत्साहित किया गया। इससे अभिक्रमित अनुदेशन एवं शिक्षा तकनीकी के क्षेत्र में विशेष उन्नति सम्भव हो सकी।

व्यवहार में परिवर्तन के विषय में भी कुछ शोध कार्य किये गये। राष्ट्रीय अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद के अंतर्गत एक शिक्षा तकनीकी केंद्र स्थापित किया गया, जिसका कार्य शिक्षा तकनीकी के ज्ञान का प्रसार करना एवं शोध कार्यों द्वारा शिक्षण प्रक्रिया का विकास करना एवं प्रभावशाली बनाना है।

शैक्षिक तकनीकी के कार्य

शैक्षिक तकनीकी के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. शैक्षिक उद्देश्यों के संदर्भ में व्यावहारिक उद्देश्यों को सीखने की परिस्थितियों में परिवर्तित करना।
  2. विद्यार्थियों की उपलब्धियों का मूल्यांकन।
  3. शैक्षिक तकनीकी शैक्षिक संगठन, प्रशासन, प्रबन्ध तथा निर्देशन की रूपरेखा एवं विकास करने में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करती है।
  4. सीखने वालों की विशेषताओं, क्षमताओं तथा गुणों का विश्लेषण करना।
  5. विद्यार्थियों के व्यवहार में सुधार करने के लिए पुनर्बलन तथा पृष्ठ पोषण (Feed back) देना।
  6. पाठ्यवस्तु को व्यविस्थत करना
  7. पाठ्यवस्तु के प्रस्तुत करने की विधियों, साधनों तथा सामग्री की संरचना करना।
  8. शिक्षा के प्रसार के साथ ही साथ शैक्षिक सामग्री के संचित करने में सहायता करना।

शैक्षिक तकनीकी के उद्देश्य

शैक्षिक तकनीकी के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  1. शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित करना तथा उनको व्यावहारिक रूप से परिभाषित करना एवं लिखना ।
  2. सीखने की विधियों तथा प्रविधियों को क्रमबद्ध करके अधिक आधुनिक एवं प्रभावपूर्ण बनाना।
  3. शिक्षण, अधिगम एवं मूल्यांकन प्रक्रिया में सुधार करना तथा इसके द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार में अपेक्षित सुधार करना।
  4. शिक्षा तकनीकी का उद्देश्य कक्षा शिक्षण को स्पष्ट, सरल, वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ तथा प्रभावपूर्ण बनाना है।
  5. अध्यापक के व्यवहार को वस्तुनिष्ठ एवं मनोवैज्ञानिक बनाना।
  6. शिक्षा, प्रशासन, संगठन की समस्याओं का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन करना।
  7. शिक्षा तकनीकी का उद्देश्य मानव जीवन की जटिलतम समस्याओं का निराकरण करके उसका सतत् विकास करना है।
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