शैक्षिक तकनीकी के रूप – शिक्षण, व्यवहार, अनुदेशन तकनीकी

शैक्षिक तकनीकी के रूप – शैक्षिक तकनीकी के चार रूप निम्न है। वैज्ञानिक आविष्कारों तथा तकनीकियों के विकास ने मानव जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित किया है। उद्योग, वाणिज्य, सुरक्षा तथा प्रशासन आदि में यन्त्रीकरण बड़ी तेजी से हुआ है। शिक्षा प्रक्रिया भी इनसे अछूती नहीं रही है और इसने शिक्षा के सभी पक्षों को प्रभावित किया है। फलस्वरूप शिक्षा के क्षेत्र में अनेक तकनीकियों का विकास हुआ है।

शैक्षिक तकनीकी एक प्रकार का व्यावहारिक विज्ञान है जिसके माध्यम से शिक्षण समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। इसके द्वारा शिक्षण तथा अधिगम विधि छात्रों का ज्ञानार्जन आदि भी सुधारे जा सकते हैं। अतः शैक्षिक तकनीकी जहाँ एक तरफ ज्ञान को संचित करती है वहाँ दूसरी तरफ यह इसका प्रसार और विकास भी करती है।

शैक्षिक तकनीकी के रूप

डब्ल्यू कैनेथ रिचमण्ड (1970) ने लिखा है कि- “शैक्षिक तकनीकी अधिगम की समुचित व्यवस्था से युक्त ऐसी परिस्थितियों के प्रस्तुतीकरण से सम्बन्धित होती है जो शिक्षण, प्रशिक्षण एवं उसके लक्ष्यों को दृष्टिगत रखते हुये अनुदेशन को अधिगम का सबसे उपयुक्त स्रोत बनाती है।” इस कथन से स्पष्ट है कि शैक्षिक तकनीकी मुख्य रूप से शिक्षण व्यवहार एवं अनुदेशन से सम्बन्धित होती है। अतएव शैक्षिक तकनीकी के रूप कुल चार हैं-

  1. शिक्षण तकनीकी (Teaching Technology)
  2. व्यवहार तकनीकी (Behavioural Technology)
  3. अनुदेशन तकनीकी (Instructional Technology)
  4. अनुदेशन प्रारूप (Instructional Design)

शिक्षण तकनीकी

शिक्षा शास्त्र की प्रमुख सामाजिक तथा व्यावसायिक क्रिया शिक्षण है। शिक्षण एक विकास की प्रमुख प्रक्रिया है जो छात्र – शिक्षक के अन्त क्रिया द्वारा सम्पन्न होती है। सामाजिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक तथा वैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा अधिनियमों को शिक्षण प्रक्रिया में किन्हीं विशिष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने के प्रयोग को शिक्षण तकनीकी कहते हैं।

शिक्षण एक सोद्देश्य प्रक्रिया है जिसका अंतिम लक्ष्य बालक का पूर्ण विकास करना है। यदि किन्हीं सिद्धान्तों को शिक्षण में प्रयोग किया जाये और अपेक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके तब उस पाठ्य-वस्तु को शिक्षण तकनीकी की संज्ञा दी जाती है।

शिक्षण तकनीकी की विशेषतायें

शिक्षण तकनीकी की विशेषतायें निम्नलिखित हैं-

  1. शिक्षण तकनीकी में ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक तीनों प्रकार के उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।
  1. शिक्षण तकनीकी में पाठ्य-वस्तु के स्वरूप तथा सम्प्रेषण के स्वरूप में समन्वय स्थापित किया जाता है।
  2. शिक्षण तकनीकी में स्मृति स्तर से चिन्तन स्तर के शिक्षण की व्यवस्था की जाती है।
  3. शिक्षण तकनीकी द्वारा शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली तथा सार्थक बनाया जा सकता है।
  4. शिक्षण तकनीकी में शिक्षण सिद्धान्तों के प्रतिपादन का प्रयास किया जाता है।
  5. शिक्षण तकनीकी के अध्ययन से छात्राध्यापक तथा सेवारत अध्यापक अपने शिक्षण में विकास तथा परिवर्तन कर सकते हैं और उसे प्रभावशाली बना सकते हैं।
  6. शिक्षण तकनीकी का सम्बन्ध अदा, प्रक्रिया तथा प्रदा तीनों पक्षों से होता है।
  1. शिक्षण तकनीकी कक्षा व्यवहार के निरीक्षण, विश्लेषण, व्याख्या, मूल्यांकन एवं सुधार के लिये पूर्ण प्रयास करती है।
  2. शिक्षण तकनीकी शिक्षण को अधिक व्यावहारिकता तथा प्रयोगात्मक विषय बनाने के लिये दिशा-निर्देश प्रदान करती है।
  3. यह शिक्षकों को अपने छात्रों के व्यवहारों को नियंत्रित करना सिखाती है साथ ही उन्हें आवश्यकतानुसार परिमार्जित भी करती है।
  4. शिक्षक व छात्र दोनों सक्रिय रहकर काम करते हैं।
  5. इससे शिक्षण प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित व संगठित हो जाती है।
  6. इसके द्वारा शिक्षण कला अधिक स्पष्ट, सरल, वस्तुनिष्ठ तथा वैज्ञानिक बनती है।
  7. यह बच्चों को समाज के साथ समायोजन तथा समस्याओं को स्वयं सुलझाने योग्य बनाती है।
  8. व्यवहारवाद पर आधारित होने के कारण यह बच्चों के व्यवहार का अध्ययन कर उसे परिमार्जित बनाती है।

शिक्षण तकनीकी के उद्देश्य

शिक्षण तकनीकी के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  1. उपलब्ध संसाधनों (Resources) के अधिकतम उपयोग पर बल देना ।
  2. शिक्षक को प्रभावी विधियों, नीतियों तथा युक्तियों के अपनाने में सहायता करना।
  3. अदा (Input), प्रक्रिया (Process) तथा प्रदा (Output) तीनों पक्षों से शिक्षण तकनीकी का सम्बन्ध विकसित करना ।
  4. छात्र व्यवहारों को नियंत्रित तथा परिमार्जित करने के लिये शिक्षक की सहायता करना।
  5. कक्षा व्यवहार का अवलोकन, निरीक्षण, व्याख्या तथा मूल्यांकन व सुधार के लिये प्रयास करना।

शिक्षण तकनीकी के लाभ

शिक्षण तकनीकी के लाभ निम्नलिखित हैं-

  1. शिक्षण तकनीकी ज्ञानात्मक प्रभावात्मक तथा मनोगत्यात्मक पक्षों के अध्ययन में सहायता देती है।
  2. शिक्षण तकनीकी के माध्यम से शिक्षण के दो प्रमुख तत्त्वों–पाठ्यवस्तु तथा कक्षा सम्प्रेषण में उपयुक्त सम्बन्ध स्थापित किया जाता है।
  3. शिक्षण प्रक्रिया को उन्नतशील बनाने के लिये शिक्षण तकनीकी के माध्यम से सामाजिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक तथा वैज्ञानिक ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग किया जाता है।
  4. शिक्षण तकनीकी, कक्षा व्यवहार के निरीक्षण, विश्लेषण, व्याख्या, मूल्यांकन तथा सुधार के लिये उचित प्रयास करती है।
  5. शिक्षण तकनीकी हमें नवीन तथा अधिक उपादेय एवं सुगठित शिक्षण सिद्धान्तों तथा शिक्षण प्रतिमानों के निर्माण हेतु प्रेरित करती है।

व्यवहार तकनीकी

मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान कहते हैं साधारणतः मनोविज्ञान जीवों के व्यवहार की प्रकृति तथा स्वरूप का अध्ययन करते हैं। अधिगम का तात्पर्य भी व्यवहार परिवर्तन से होता है शिक्षा की समस्त प्रक्रियायें अपेक्षित व्यवहार परिवर्तनों से सम्बन्धित होती हैं। मनोविज्ञान में मानव में सभी प्रकार के व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है।

इस प्रकार व्यावहारिक तकनीकी का क्षेत्र शैक्षिक तकनीकी से कहीं अधिक व्यापक है। इसमें कई तकनीकियों-औद्योगिक सुरक्षा, वाणिज्य, सम्प्रेषण, प्रशासन, स्वास्थ्य, अभिप्रेरणा प्रशिक्षण, शिक्षा, शिक्षण, अनुदेशन आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। इन सभी का सम्बन्ध विशिष्ट मानव व्यवहार से है।

बी. एफ. स्किनर ने भी अपनी पुस्तक में व्यावहारिक तकनीकी का उल्लेख किया है। शिक्षण तथा अनुदेशन की क्रियाओं का मुख्य लक्ष्य छात्रों में अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन लाना है जिससे निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके। इस विचार से उपर्युक्त दोनों तकनीकी व्यावहारिक तकनीकी के ही रूप हैं परन्तु यहाँ व्यावहारिक तकनीकी को एक विशिष्ट सन्दर्भ में प्रयुक्त किया गया है। शिक्षक व्यवहार में सुधार एवं परिवर्तन में प्रयोग, ज्ञान को व्यावहारिक तकनीकी की संज्ञा दी गई है। इसे प्रशिक्षण तकनीकी भी कहा जा सकता है।

व्यवहार तकनीकी की प्रक्रिया के अन्तर्गत तीन पहलू महत्त्वपूर्ण होते हैं—प्रथम उसका पुनर्बलित व्यवहार, दूसरा सीखना तथा तीसरा उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न व्यवहार में सापेक्षिक स्थाई परिवर्तन ड्रेवर का कथन है, “व्यवहार अनुक्रियाओं का कुल योग है जिसे कोई भी प्राणी जीवन की परिस्थितियों के प्रति करता है जिससे उनका सामना होता है।”

व्यवहार तकनीकी के क्षेत्र में सर्वाधिक कार्य अमीडन, फ्लैण्डर्स, स्किनर ओवर तथा एण्डरसन ने किया है।

व्यवहार तकनीकी की अवधारणायें

व्यवहार तकनीकी के प्रत्यय निम्नलिखित अवधारणाओं पर आधारित हैं-

  1. शिक्षक व्यवहार का निरीक्षण किया जा सकता है।
  1. शिक्षक व्यवहार का मापन किया जा सकता है।
  2. शिक्षक व्यवहार सापेक्षिक होता है।
  3. शिक्षक व्यवहार में सुधार किया जा सकता है।
  4. शिक्षक व्यवहार सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक होता है।
  5. व्यवहार सुधार के लिये दण्ड तथा पुरस्कार दोनों ही महत्त्वपूर्ण हैं।

व्यवहार तकनीकी की विषय-वस्तु

व्यवहार तकनीकी की विषय-वस्तु निम्नलिखित है-

  1. शिक्षण तथा शिक्षक व्यवहार का अर्थ तथा स्वरूप।
  2. व्यवहार के सिद्धान्त एवं मान्यतायें ।
  3. कक्षा अन्तःप्रक्रिया अध्ययन विधियाँ।
  4. विभिन्न कक्षागत व्यवहारों का अध्ययन, व्याख्या तथा मूल्यांकन एवं मापन।
  5. माइक्रोटीचिंग तथा मिनीटीचिंग।
  6. अनुकरणीय शिक्षण।
  7. प्रशिक्षण समूह
  8. सामूहिक शिक्षण।
  9. शिक्षक व्यवहार के प्रतिमान।
  10. व्यवहार तकनीकी में कक्षा व्यवहार का अध्ययन नहीं किया जाता अपितु अपेक्षित पुनर्बलन प्रविधियों के प्रयोग से अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन लाया जाता है तथा प्रभावशाली शिक्षक तैयार किये जाते हैं।

व्यवहार तकनीकी की विशेषताएँ

व्यवहार तकनीकी की विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. व्यवहार तकनीकी शिक्षकों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं पर बल देती है।
  2. यह मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का शिक्षण व प्रशिक्षण में प्रयोग करती है।
  3. यह व्यावहारिक उद्देश्यों के साथ ज्ञानात्मक और क्रियात्मक उद्देश्यों की पूर्ति भी करती है।
  4. इस तकनीकी में शाब्दिक और अशाब्दिक दोनों प्रकार के व्यवहारों में परिवर्तन करने का प्रयास किया जाता है।
  5. यह शिक्षण सिद्धान्तों के विकास में सहायक है।
  6. इसका उद्देश्य कक्षा के अन्दर शिक्षक व छात्र के व्यवहार में परिवर्तन लाना है।
  7. यह शिक्षण कौशलों को विकसित करती है।
  8. व्यवहार तकनीकी पाठ्यवस्तु तथा सम्प्रेषण दोनों शिक्षण पक्षों में सुधार एवं परिवर्तन लाती है।
  9. इसके प्रयोग से प्रशिक्षण संस्थाएँ अच्छे शिक्षक तैयार कर सकती हैं।
  10. यह शिक्षक अभ्यासकाल में छात्राध्यापकों को पुनर्बलन प्रदान करती है।
शैक्षिक तकनीकीशैक्षिक तकनीकी के उपागमशैक्षिक तकनीकी के रूप
व्यवहार तकनीकीअनुदेशन तकनीकीकंप्यूटर सहायक अनुदेशन
ई लर्निंगशिक्षण अर्थ विशेषताएँशिक्षण के स्तर
स्मृति स्तर शिक्षणबोध स्तर शिक्षणचिंतन स्तर शिक्षण
शिक्षण के सिद्धान्तशिक्षण सूत्रशिक्षण नीतियाँ
व्याख्यान नीतिप्रदर्शन नीतिवाद विवाद विधि
श्रव्य दृश्य सामग्रीअनुरूपित शिक्षण विशेषताएँसूचना सम्प्रेषण तकनीकी महत्व
जनसंचारश्यामपट

अनुदेशन तकनीकी

शिक्षण तकनीकी की भाँति अनुदेशन तकनीकी भी शैक्षिक तकनीकी से पृथक नहीं है। सामान्यतया शिक्षण तथा अनुदेशन तकनीकी में कोई अन्तर नहीं किया जाता है। ‘अनुदेशन तकनीकी’ दो शब्दों से मिलकर बना है- अनुदेशन तथा तकनीकी।अनुदेशन का मतलब है सूचनाएँ प्रदान करना। अतः अनुदेशन तकनीकी एक ऐसा विषय है ‘जो उपलब्ध साधनों के सन्दर्भ में स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति करता है तथा छात्रों में विशेष व्यवहार परिमार्जन करता है।’

यह शैक्षिक तकनीकी की कक्षागत या सीखने की परिस्थितियों में प्रयुक्त एक नयी शिक्षण व्यवस्था है जो अभ्यासजनित परिस्थितियों के द्वारा शिक्षा सिद्धान्तों की पुष्टि करता है। अनुदेशन तकनीकी ने शिक्षा क्षेत्र को अभिक्रमित अध्ययन (Programmed Instruction) का एक बहुत बड़ा उपहार प्रदान किया है, जिसके माध्यम से छात्र अपनी व्यक्तिगत विभिन्नताओं के आधार पर सीखते हैं।

अनुदेशन तकनीकी का प्रयोग कोमल एवं कठोर शिल्प के लिए ही नहीं वरन् इन विधियों के मूल में निहित सिद्धान्तों की व्यवस्था के लिए भी किया जाता है।

मैकमरिन (McMurin) के अनुसार

अतः इसमें अनुदेशन सिद्धान्त तथा अनुदेशन तकनीकी दोनों ही गुम्फित रूप में प्रदर्शित होते हैं।

अतः कहा जा सकता है कि अनुदेशन तकनीकी, शैक्षिक तकनीकी की वह शाखा है जो हमें शिक्षण सामग्री तथा अन्य दृश्य-श्रव्य सामग्री के सही उपयोगों के विषय में सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक, दोनों प्रकार की ही सूचनाएँ प्रदान करती है। (कुलश्रेष्ठ 1987 ) शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में, जब मनोवैज्ञानिक तथा वैज्ञानिक सिद्धान्तों का समावेशन हो जाता है तब वह अनुदेशन तकनीकी कहलाने लगती है।

अनुदेशन तकनीकी की मान्यताएँ

  1. अनुदेशन में कुछ सूचनाएँ दी जानी आवश्यक हैं।
  2. किसी भी विषय-वस्तु को छोटे-छोटे तत्वों में विभाजित किया जा सकता है और उन तत्वों को स्वतन्त्र रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है।
  3. इन तत्वों को इस प्रकार से तार्किक क्रम में बाँधा जा सकता है, जिससे कि वांछित सीखने की बाह्य परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकें।
  4. मानवीय विकास के लिए पृष्ठपोषण (Cybernatic) का सिद्धान्त अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
  5. मानव का प्रत्येक व्यवहार संगठित प्रणाली के अंगों के रूप में कार्य करता है।
  6. छात्रों को उनकी आवश्यकता और गति के अनुसार पढ़ने का अधिकार है।
  7. शिक्षण की प्रक्रिया शिक्षक के बिना भी सम्पादित की जा सकती है।
  8. शिक्षण की प्रक्रिया में सीखने के व्यवहारों को नियन्त्रित तथा परिमार्जित किया जा सकता है।

अनुदेशन तकनीकी की विशेषताएँ

  1. अनुदेशन तकनीकी का प्रमुख कार्य है सूचनाएँ प्रदान करना ।
  2. अनुदेशन तकनीकी के माध्यम से ज्ञानात्मक उद्देश्यों को अधिक प्रभावशाली विधि से प्राप्त किया जा सकता है।
  3. छात्रों को इस तकनीकी के प्रयोग से अपनी गति के अनुसार सीखने के अवसर मिलते हैं।
  4. अनुदेशन तकनीकी में सही उत्तरों का पुनर्बलन होता है।
  5. अनुदेशन तकनीकी, मनोविज्ञान, दर्शन तथा विज्ञान के सिद्धान्तों तथा आविष्कारों का उपयोग करती है।
  6. इसके माध्यम से अनुदेशन सिद्धान्तों का निर्माण किया जाता है।
  7. यह तकनीकी पाठ्य-वस्तु का विश्लेषण कर विषय के विभिन्न प्रकरणों में तारतम्य बनाये रखती है।
  8. यह कक्षागत परिस्थितियों में Terminal Behaviour का मूल्यांकन करती है।
  9. यह शिक्षकों के अभाव में भी शिक्षण प्रक्रिया जारी रखती है।
  10. यह पाठ्य-वस्तु तथा इसके तत्वों के तार्किक क्रम पर बहुत ध्यान देती है।
  11. वह शिक्षण व सीखने की प्रक्रिया को प्रेरित करने में सहायक है।
  12. इसके द्वारा उद्देश्यों की प्राप्ति का मूल्यांकन करके शिक्षण प्रक्रिया को आवश्यकतानुसार सुधारा जा सकता है।
  1. शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिए शिक्षण तकनीकी मानवीय तथा अमानवीय दोनों साधनों का उपयोग करती है।

अनुदेशन तकनीकी की विषय-वस्तु

  1. अनुदेशन तकनीकी का अर्थ एवं स्वरूप ।
  2. अभिक्रमित अनुदेशन (Programmed Instruction) की उत्पत्ति तथा विकास।
  3. अभिक्रमित अनुदेशन के प्रकार, उनकी विशेषताएँ, सिद्धान्त, संरचनाएँ तथा आधारभूत मान्यताएँ एवं उपयोग करती है।
  4. अभिक्रमित अनुदेशन सामग्री निर्माण करने के विभिन्न सोपान तथा उनका वर्णन।
  5. अभिक्रमित अनुदेशन सामग्री निर्माण।
  6. अभिक्रमित अनुदेशन के क्षेत्र में शोध एवं प्रयोग तथा नवीन विचारधाराएँ।

अनुदेशन तकनीकी के सोपान

  1. अनुदेशन सामग्री का चयन करना (उद्देश्यों के अनुसार )
  2. विभिन्न विधियों, प्रविधियों, युक्तियों तथा श्रव्य-दृश्य का प्रयोग करके पाठ को प्रस्तुत करना
  3. मूल्यांकन करना।
  4. सुधार के लिए सुझाव प्रदान करना।
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