शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य

शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य – सामाजिक उद्देश्य के अनुसार समाज या राज्य का स्थान व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है। बैगेल और डीवी ने सामाजिक उद्देश्य का तात्पर्य सामाजिक दक्षता से लगाया है लेकिन अपने अतिवादी स्वरूप में या उद्देश्य व्यक्ति को समाज की तुलना में निचली श्रेणी का मानता है तथा व्यक्ति के सारे अधिकारों एवं उत्तरदायित्व को राज्य के हाथों में सौंप देता है। इस अतिवादी स्वरूप के अंतर्गत समाज को साध्य और व्यक्ति को साधन माना जाता है अर्थात व्यक्ति का अपना अलग कोई अस्तित्व नहीं है।

शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य
शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य

लेकिन यदि हम किस उद्देश्य के अतिवादी रूप को ध्यान में ना रखें तो सरल रूप से इस उद्देश्य का अर्थ होगा व्यक्तियों में सहयोग एवं सामाजिक भावना का विकास करना। इसी सामाजिक भावना के आधार पर रेमंट ने कहा था कि समाज विहीन अकेला व्यक्ति कल्पना की खोज है।

सामाजिक उद्देश्यों के पक्ष में तर्क

शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य के पक्ष में तर्क निम्न है-

  1. व्यक्ति को अपने जीवन यापन की दृष्टि से समाज अनिवार्य है। समाज से अलग उसके जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए समाज का हित ही व्यक्ति को सर्वोपरि रखना चाहिए।
  2. समाज की सभ्यता व संस्कृति को जन्म देता है। जिनसे व्यक्ति संस्कारित होता है।
  3. वंशानुक्रम से व्यक्ति केवल पारिवारिक प्रवृतियां ही प्राप्त करता है लेकिन सामाजिक वातावरण उसे वास्तविक मानव बनाता है।
  4. सामाजिक वातावरण के अंतर्गत ही नागरिकता के गुणों का विकास किया जा सकता है।
  5. समाज में ही व्यक्ति की विभिन्न शक्तियों का विकास होता है।
  6. सामाजिक जीवन ही व्यक्ति को नए आविष्कारों के लिए अवसर प्रदान करता है।
शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य
शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य

सामाजिक उद्देश्यों के विपक्ष में तर्क

शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य में निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं-

  1. इतिहास गवाह है कि सर्वाधिकारी राज्य युद्ध की विभीषिकाओ को जन्म देते हैं।
  2. इस उद्देश्य से व्यक्ति का मानसिक सौंदर्यात्मक, चारित्रिक और आध्यात्मिक विकास नहीं पाता।
  3. इस उद्देश्य पर आधारित शिक्षा संकुचित राष्ट्रीयता का विकास करती है।
  4. इस उद्देश्य के अंतर्गत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का कोई महत्व नहीं है।
  5. इस उद्देश्य के अनुसार समाज को मनुष्य से श्रेष्ठ समझा जाता है जो एक गलत धारणा है।
  6. राज्य समाज के आदर्शों के प्रचार के लिए शिक्षा के साधनों का अनुचित प्रयोग किया जाता है।
  7. यह उद्देश्य मनोवैज्ञानिक है क्योंकि इसमें बालक की व्यक्तिगत रूचि यों प्रवृत्तियों योग्यताओं का विकास नहीं हो सकता है।
  8. इस उद्देश्य में क्योंकि व्यक्तिक स्वतंत्रता का अभाव है इसलिए कला और साहित्य विकास नहीं हो सकता है।
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