शिक्षा का राष्ट्रीयकरण

शिक्षा का राष्ट्रीयकरण – शिक्षा के संदर्भ में राष्ट्रीयकरण का अर्थ है ‘शिक्षा पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण’। कुछ लोग शिक्षा के राष्ट्रीयकरण का अर्थ सरकारीकरण से लगाते हैं। दूसरे शब्दों में शिक्षा के राष्ट्रीयकरण का अभिप्राय शिक्षा के विभिन्न पहलुओं, पक्षों जैसे शिक्षा के स्वरूप एवं उद्देश्यों का निर्धारण, पाठ्यक्रम निर्माण, पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन, शिक्षण विधि, शैक्षिक प्रशासन एवं संगठन, शिक्षकों की नियुक्ति, शिक्षा का माध्यम, परीक्षा व्यवस्था, विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में शिक्षार्थी प्रवेश प्राविधिक शिक्षा तथा शिक्षा संबंधी अन्य व्यवस्था आदि पर सरकार का पूरा अधिपत्य स्थापित होने से है। संक्षेप में केंद्रीय राज्य सरकार द्वारा शिक्षा का अधिग्रहण ही शिक्षा का राष्ट्रीयकरण है।

शिक्षा का राष्ट्रीयकरण

शिक्षा पर पूर्ण नियंत्रण का उपयुक्त स्वरूप वर्तमान तानाशाही एवं साम्यवादी देशों में देखने को मिलता है। हिटलर और मोसोलिनी एवं विश्व के अन्य महान तानाशाहो ने शिक्षा के राष्ट्रीयकरण के इसी स्वरूप क्रियान्वित रूप देने का प्रयास किया। इसी प्रकार आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व ग्रीस में शिक्षा पर राज्य का नियंत्रण था क्योंकि देश की सुरक्षा को खतरा बना हुआ था इसी प्रकार स्पार्टा देश ने भी अपने को शक्तिशाली बनाने के लिए शिक्षा पर पूर्ण नियंत्रण रखा जाता था।

प्राचीन ग्रीक दार्शनिक प्लेटो और अरस्तू ने भी शिक्षा पर पूर्ण नियंत्रण का समर्थन किया था। वास्तव में इस प्रकार का नियंत्रण तानाशाही राज्यों के लिए उपयुक्त सिद्ध हो सकता हाय किंतु वर्तमान शिक्षा के राष्ट्रीयकरण की अवधारणा बहुत संकुचित मानी जाती है क्योंकि इस दृष्टि से शिक्षा राज्य की नीतियों एवं विचारधाराओं के प्रचार का साधन बन जाती है और इसमें व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं उसकी स्वतंत्रता का कोई स्थान एवं महत्व नहीं रह जाता।

शिक्षा को राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता

शिक्षा के राष्ट्रीयकरण करने की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से प्रतीत होती है –

  1. आज गैर सरकारी पूर्व प्राथमिक प्राथमिक तथा माध्यमिक विद्यालय अधिकांश रूप मैं व्यवसायिक दृष्टि से शिक्षा देने का व्यापार कर रहे हैं। इससे शिक्षा का स्तर गिर रहा है।
  2. शिक्षकों की सेवाएं सुरक्षित नहीं है। उन्हें नियमित एवं उचित रूप से वेतन नहीं दिया जाता।
  3. विद्यालय जातीयता संप्रदायिकता तथा राजनीति के अड्डे बनते जा रहे हैं।
  4. शैक्षिक प्रशासन दोषपूर्ण है।
  5. देश में अलग-अलग राज्य में अलग-अलग शिक्षण व्यवस्था चल रही है।
  6. भविष्य में लागू होने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति के राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता होने का ही परिणाम है।
  7. अलग-अलग शिक्षण व्यवस्था होने से विभिन्न क्षेत्रों के छात्रों का शैक्षिक स्तर अलग अलग हो जाता है।
  8. शैक्षिक स्तर अलग-अलग होने से समाधान के छात्रों में प्रतिस्पर्धा समान तरीके से नहीं हो पाती है।
  9. शिक्षा का राष्ट्रीयकरण देश के नागरिकों में राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास करने के लिए आवश्यक है।

शिक्षा के राष्ट्रीयकरण का महत्व

शिक्षा के राष्ट्रीयकरण का महत्व इस प्रकार है-

  1. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह अनुभव किया जाने लगा कि शिक्षा के क्षेत्र में बौद्धिक, संवेगात्मक एवं आर्थिक समस्याएं हैं। इन समस्याओं का समाधान केंद्र या राज्य सरकार द्वारा एक सुव्यवस्थित नीति अपनाकर ही हो सकता है। शैक्षिक क्षेत्र की विभिन्न समस्याएं केवल व्यक्तित्व, सामाजिक एवं अर्द्धराजकीय नियंत्रण या प्रयास द्वारा सुविधाएं नहीं जा सकती।
  2. शिक्षा का राष्ट्रीयकरण द्वारा शिक्षा के स्तर में उन्नति होगी।
  3. विद्यालय प्रबंधकों की तानाशाही मनोवृति से मुक्त होंगे।
  4. शिक्षकों की सेवा दशाएं सुरक्षित रहेंगी।
  5. सभी नागरिकों को शिक्षा की समान सुविधाएं मिलेंगी।
  6. विद्यार्थियों में लोकतांत्रिक गुणों का विकास होगा।
  7. राष्ट्रीयकरण शिक्षा क्षेत्र में उत्पन्न आर्थिक कठिनाइयों को दूर करने में सहायक होगा।
  8. शिक्षा में गुणात्मक उन्नति के लिए प्रयत्न किया जा सकेगा।

शिक्षा का राष्ट्रीयकरण से तात्पर्य यह नहीं है कि सभी राज्यों में एक समान शिक्षा व्यवस्था हो वरन् एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था से है जो राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त कराने में सहायक हो और देश प्रेम एवं राष्ट्रीय एकता की भावना का निर्माण कर सके।

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