शिक्षा का अधिकार रूपरेखा इतिहास व विशेषताएँ

शिक्षा का अधिकार में भारत के प्रत्येक नागरिक को प्राथमिक शिक्षा पाने का अधिकार है। इस सम्बन्ध में ” प्रारम्भिक (प्राथमिक व मध्य स्तर) पर शिक्षा निःशुल्क हो, प्रारम्भिक शिक्षा अनिवार्य हो तथा तकनीकी व्यावसायिक शिक्षा को सर्वसुलभ बनाया जाए एवं उच्च शिक्षा सभी की पहुँच के भीतर हो।” कुछ ऐसे बुनियादी सिद्धान्त हैं जो शिक्षा का अधिकार के अन्तर्गत आते हैं जिसमें संविधान के 86वें संशोधन में शिक्षा के अधिकार को प्रभावी बनाया गया।

उसमें 6 से 14 वर्ष तक प्रत्येक बच्चे को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान किया गया साथ ही सरकारी स्कूल सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा उपलब्ध करायेंगे और स्कूलों का प्रबन्धन स्कूल प्रबन्ध समितियों द्वारा किया जायेगा। निजी स्कूल न्यूनतम 25 प्रतिशत बच्चों को बिना किसी शुल्क के नामांकित करेंगे। गुणवत्ता समेत प्रारम्भिक शिक्षा के सभी पहलुओं पर निगरानी के लिए राष्ट्रीय आयोग बनाया जायेगा आदि प्रावधान रखे गये ।

शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने हेतु रूपरेखा

निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के प्रावधानों पर नजर रखने के लिए, बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय आयोग (एनसीपीसीआर) को एजेंसी के रूप में नामित किया गया है। यह सुनिश्चित करने के लिए RTE अधिनियम सफलतापूर्वक ईमानदारी से लागू किया जाता है। एनसीपीसीआर ने संस्थानों, सरकारी विभागों, नागरिक समाज और अन्य हित धारकों के बीच एक आम सहमति बनाने के लिए पहल की है। उसने शिक्षा के अधिकार के समुचित कार्यान्वयन के लिए योजना पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की है जिसमें विभिन्न

सरकारी विभागों के अधिकारी, शिक्षा के क्षेत्र में श्रेष्ठ काम करने वाले अनुभवी व्यक्ति शामिल हैं। इस समिति ने जिसकी अब तक अनेक बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं बेहतर निगरानी को सुनिश्चित करने की योजना बनायी है। इसमें शिक्षा के अधिकार पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करने के लिए एनसीपीसीआर के भीतर एक अलग विभाग स्थापित करना भी शामिल है। यह सभांग दो आयुक्तों द्वारा समन्वित किया जायेगा और सभी गतिविधियों में स्वतन्त्र कर्मचारियों द्वारा सहायता प्रदानकी जायेगी। यह सभांग मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ सम्पर्क बनायेगा जो इसे सहायता प्रदान करेगा।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ बातचीत के तौर-तरीकों को स्थापित करना भी आवश्यक होगा ताकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के लागूकरण व निगरानी को सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम कर सकें। सुझायी गयी एक तीसरी रणनीति थी। राज्य के प्रतिनिधियों की नियुक्ति जो विभिन्न राज्यों में एनसीपीसीआर के “आँख और कान” के रूप में कार्य करेंगे।

ये प्रतिनिधि नागरिक समाज के सदस्य होंगे जिन्हें शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव होगा और जो सम्बन्धित राज्यों में अधिनियम के क्रियान्वयन की स्थिति के बारे में एनसीपीसीआर को जानकारी प्रदान करेंगे। वे अपने राज्यों से प्राप्त शिकायतों के निस्तारण में भी सहायता करेंगे। अधिक-से-अधिक समन्वय और तालमेल के लिए अन्य मंत्रालयों; जैसे- सामाजिक न्याय और अधिकारिता, श्रम मंत्रालय, आदिवासी मामलों के मंत्रालय तथा पंचायती राज्य मंत्रालय के अधिकारियों के समय बैठकें की गयीं जिससे शिक्षा के अधिकार अधिनियम से प्रभावित होने वाले इन मंत्रालयों के बीच आसान समन्वय और संचार हो ।

शिक्षा का अधिकार की बेहतर निगरानी के लिए व बेहतर सम्बन्ध बनाने के लिए एनसीपीसीआर ने अन्य राष्ट्रीय आयोगों जैसे महिलाओं के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोगों के प्रतिनिधियों के साथ मुलाकात की है। यह सुनिश्चित करने के लिए अभावग्रस्त समुदायों के लड़के व लड़कियाँ शिक्षा के अधिकार से वंचित न रह जायें, आयोग एक साथ कैसे काम कर सकते हैं।

अधिनियम के प्रावधानों और निगरानी के लिए, देश के विभिन्न भागों से शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले नागरिक, समाज के प्रतिनिधियों के साथ परामर्श किया गया। इस बैठक में 20 राज्यों में प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस तरह के नागरिक समाज के साथ राज्य के प्रतिनिधियों की नियुक्ति के लिए सन्दर्भ के नियम बनाने के लिए एनसीपीसीआर द्वारा आयोजित यह बैठक इस प्रकार की श्रृंखला में पहली थी।

अधिनियम के बेहतर कार्यान्वयन और निगरानी के लिए देश में अधिक-से-अधिक इतनी जागरूकता हो ताकि इसके प्रावधान समझे जायें और संस्थाओं द्वारा शामिल किये जायें। ऐसा करने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर एक प्रचार अभियान शुरू करना होगा, जिसमें अधिनियम का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद, सम्भवतः मानव संसाधन विकास मंत्रालय और अन्य एजेन्सियों के साथ संयुक्त रूप से करना होगा।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम का इतिहास

सन् 1936 में जब महात्मा गाँधी जी ने एक समान शिक्षा की बात उठायी थी तब उन्हें भी लागत जैसे मुद्दे पर जो आज भी जीवित हैं, का सामना करना पड़ा था। तब संविधान ने इसे एक अस्पष्ट अवधारणा के रूप में छोड़ दिया था, जिसमें 14 साल तक की उम्र के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने की जवाबदेही राज्यों पर छोड़ दी गयी थी। दिसम्बर, 2002 में अनुच्छेद 21A (भाग 3) के माध्यम से 86वें संशोधन विधेयक में 6-14 साल के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया।

  • अक्टूबर 2003 – उपरोक्त अनुच्छेद में वर्णित कानून, मसलन बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा विधेयक 2003 का पहला मसौदा तैयार कर अक्टूबर 2003 में आम लोगों से इस पर राय व सुझाव आमन्त्रित किये गये।
  • 2004 – मसौदों पर प्राप्त सुझावों के मद्देनजर मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार विधेयक 2004 का संशोधित प्रारूप तैयार किया गया।
  • जून 2005 – केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार पार्षद् समिति ने शिक्षा के अधिकार विधेयक का प्रारूप तैयार किया और उसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंपा मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसे नैक (NAAC) के पास भेजा। नैक (NAAC) ने इस विधेयक को प्रधानमंत्री के ध्यानार्थ भेजा।
  • 14 जुलाई 2006 – सीएसीएल, एमएफआई एमएफएआरई और केप ने आईएलपी तथा अन्य संगठनों को योजना बनाने, बैठक करने तथा संसद की कार्यवाही के प्रभाव पर विचार करने व भावी रणनीति तय करने और जिला तथा ग्राम स्तर पर उठाये जाने वाले कदमों पर विचार के लिए आमन्त्रित किया।
  • 2009 – केन्द्रीय सरकार द्वारा निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की धारा (1) की उपधारा (3) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए बना और 1 अप्रैल, 2010 को इसे लागू कर दिया गया।
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शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की विशेषताएँ

बच्चों के लिए मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. भारत के छः से चौदह वर्ष आयु वर्ग के बीच आने वाले सभी बच्चों को मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा।
  2. प्राथमिक शिक्षा खत्म होने से पहले किसी भी बच्चे को रोका नहीं जायेगा या बोर्ड परीक्षा पास करने की जरूरत नहीं होगी।
  3. ऐसा बच्चा जिसकी उम्र छः साल से ऊपर है, जो किसी स्कूल में दाखिल नहीं है अथवा है भी, तो अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाया / पायी है, तब उसे उसकी उम्र के लायक उचित कक्षा प्रवेश दिया जायेगा, बशर्ते की सीधेतौर से दाखिला लेने वाले बच्चों को समक्ष आने के लिए उसे प्रस्तावित समय सीमा के भीतर विशेष ट्रेनिंग दी जानी होगी, जो प्रस्तावित हो। प्राथमिक शिक्षा हेतु दाखिला लेने वाला / वाली बच्चा/बच्ची को 14 साल की उम्र के बाद भी प्राथमिक शिक्षा को पूरा तक मुफ्त शिक्षा प्रदान की जायेगी।
  4. प्रवेश के लिए उम्र का साक्ष्य-प्राथमिक शिक्षा हेतु प्रवेश के लिए बच्चे की उम्र का निर्धारण उसके जन्म प्रमाण-पत्र, मृत्यु तथा विवाह पंजीकरण कानून 1856 या ऐसे ही अन्य कागजात के आधार पर किया जायेगा जो उसे जारी किया गया हो। उम्र प्रमाण पत्र नहीं होने की स्थिति में किसी भी बच्चे को दाखिला लेने से वंचित नहीं किया जा सकता।
  5. प्राथमिक शिक्षा पूरा करने वाले छात्र को एक प्रमाण-पत्र दिया जायेगा।
  1. एक निश्चित शिक्षक छात्र अनुपात की।
  2. जम्मू व कश्मीर को छोड़कर समूचे देश में लागू होगा।
  3. आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के लिए सभी निजी स्कूलों के कक्षा 1 में दाखिला लेने के लिए 25 प्रतिशत का आरक्षण होगा।
  4. शिक्षा की गुणवत्ता में अनिवार्य सुधार।
  5. स्कूल शिक्षक को पाँच वर्षों की भीतर समुचित व्यावसायिक डिग्री प्राप्त होनी चाहिए।
  6. स्कूल का बुनियादी ढाँचा (जहाँ एक समस्या है) 3 वर्षों में सुधारा जाए अन्यथा उसकी मान्यता रद्द कर दी जायेगी। अन्यथा उनकी नौकरी चली जायेगी।
  7. वित्तीय बोझ राज्य सरकार तथा केन्द्र सरकार के बीच साझा किया जायेगा।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम की निगरानी तथा क्रियान्वयन के नोडल निकाय के रूप में आयोग ने शिक्षा निदेशालय, दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के प्रधान सचिव, शिक्षा को एक पत्र लिखा जिसमें उस सूचना को वापस लेने के लिए कहा गया है तथा उसके स्थान पर शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों को जारी करने का निर्देश दिया। यह भी माँग की गयी कि एक सप्ताह के भीतर सरकार, शिक्षा निदेशालय, दिल्ली के भीतर आने वाले स्कूलों को अपने प्रवेश में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के आदेश दे, ताकि स्कूल अपनी प्रक्रियाओं में आवश्यक फेरबदल कर सके।

चूँकि निदेशालय ने इस माँग के अनुरूप कार्य नहीं किया, उसे जून में आयोग की ओर से सम्मन जारी किया गया और जुलाई तक ही मोहलत दी गयी कि प्रवेश प्रक्रिया को पुनः शिक्षा के अधिकार प्रावधानों के अनुसार सम्पन्न किया जायेगा। यह सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा के अधिकार अधिनियम का अन्य राज्यों में भी उल्लंघन न किया जाए, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षा आयोग ने सभी प्रमुख सचिवों को अपने पत्र में सरकारी आदेशों द्वारा सभी स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम को लागू करने की माँग की। पत्र में निम्नलिखित माँगें रखी गयीं-

  1. प्रवेश प्रक्रियाएँ शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अनुरूप हों।
  2. सभी विशेष वर्गों के स्कूलों तथा बिना सहायता वाले निजी स्कूलों में कमजोर वर्गों के लिए 25% सीटों का आरक्षण सुनिश्चित किया जाए तथा सरकारी सहायता प्राप्त सभी स्कूलों में आरक्षण के नियमों का पालन किया जाए।

साथ ही सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों को इस अधिनियम के प्रावधानों तथा प्रक्रियाओं के बारे में रूपरेखा तैयार कर नोटिस जारी करना चाहिए ताकि आस-पास के बच्चे स्कूल में दाखिला ले सकें। साथ ही शिक्षा के अधिकार अधिनियम पर राज्य के नियमों को अन्तिम रूप देने की प्रक्रिया शीघ्र पूरी की जानी चाहिए।

नवोदय विद्यालयों में भी शिक्षा का अधिकार अधिनियम के भाग 13 के प्रावधान के नियमानुसार ही प्रवेश होंगे। अधिनियम के भाग 13 के प्रासंगिक प्रावधान के अनुसार, “प्रवेश लेने के दौरान कोई भी व्यक्ति या स्कूल किसी प्रकार का शुल्क या किसी बच्चे अथवा उसके अभिभावक से किसी प्रकारकी जाँच नहीं ले सकता, अगर लेता है तो उसे शल्क का 10 गुना जुर्माना देना होगा तथा जांच लेने पर प्रथम बार 25,000 रुपये तथा द्वितीय उल्लंघन पर 50,000 रुपये जुर्माना लगाया जायेगा।”

शिक्षा का अधिकार को सुनिश्चित करने हेतु समुदाय व अभिभावकों की भूमिका

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 पास होना भारत के बच्चों के लिए ऐतिहासिक पहल है। भारत के इतिहास में पहली बार बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा का अधिकार दिया गया है जिसे राज्य द्वारा परिवार और समुदाय की सहायता से किया जायेगा। यह एक अनुमान था कि सन् 2009 में भारत में 6 से 14 वर्ष की आयु के 80 लाख बच्चे ऐसे है।

जो स्कूल नहीं जाते थे। विश्व भारत के बगैर 2015 तक प्रत्येक बच्चे को प्राथमिक शिक्षा पूरी कराने में अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता। स्कूल स्थानीय अधिकरण, अधिकारियों, माता-पिता, अभिभावकों और शिक्षकों को मिलाका स्कूल प्रबंधन समितियाँ (एसएमसी) बनायेंगे। ये एसएमसी स्कूल के विकास के लिए योजनाएं बनायेंगी और सरकार द्वारा दिये गये अनुदान का प्रयोग करेंगी और पूरे स्कूल के वातावरण को नियन्त्रित करेंगी।

शिक्षा का अधिकार में यह घोषित है कि एसएमसी में वंचित श्रेणी से आने वाले बच्चों के माता-पिता और 50 फीसदी महिलाएँ होनी चाहिए। इस तरह के समुदायों की भागीदारी लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय सुविधाओं, स्वास्थ्य, जल, स्वच्छता जैसे मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान के जरिए पूरे स्कूल के वातावरण को बाल मित्रवत बनाने को सुनिश्चित करने हेतु महत्त्वपूर्ण होंगी। कमियाँ एवं आलोचना इस शिक्षा के अधिकार विधेयक की सराहना के साथ-साथ आलोचनाएँ भी की जा रही हैं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

  1. मुफ्त और अनिवार्य से जरूरी है, समान शिक्षा- अच्छा होता कि सरकार मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का बिल लाने पर जोर देने के बजाए कॉमन स्कूल का बिल लाने पर ध्यान केन्द्रित करती। सरकार यह क्यों नहीं घोषणा करती कि देश का हर बच्चा एक ही तरह के स्कूल में जायेगा और पूरे देश में एक ही पाठ्यक्रम पढ़ाया जायेगा।
  2. मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के तहत सिर्फ 25% सीटों पर ही समाज के कमजोर वर्ग के छात्राओं को दाखिला मिलेगा अर्थात् शिक्षा के जरिए समाज में गैर-बराबरी पाटने का जो महान सपना देखा जाता है वह अब भी पूरा नहीं होगा।
  3. मुफ्त शिक्षा की बात महज धोखा है क्योंकि इसके लिए बजट प्रावधान का जिक्र विधेयक में नहीं है।
  4. विधेयक में छः साल तक के 17 करोड़ बच्चों की कोई बात नहीं कही गयी है। संविधान में छः साल तक के बच्चों को संतुलित आहार, स्वास्थ्य और पूर्व प्राथमिक शिक्षा को जो अधिकार दिया गया है, वह उस विधेयक के जरिए छीन लिया गया है।
  5. इस शिक्षा का अधिकार में लिखा है कि किसी भी बच्चे को ऐसी कोई फीस नहीं देनी होगी, जो उसको आठ साल तक प्रारम्भिक शिक्षण देने से रोक दे। इस घुमावदार भाषा का शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर मनमाने ढंग से उपयोग किया जायेगा।
  6. इस कानून का क्रियान्वयन कैसे हो रहा है यह स्पष्ट नहीं है। निःशुल्क शिक्षा को फीस तक परिभाषित नहीं किया जा सकता। इसमें शिक्षण सामग्री से लेकर सम्पूर्ण शिक्षा है या नहीं यह देख होगा।
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