शिक्षा अर्थ परिभाषा प्रकृति विशेषताएं

शिक्षा अपने आप में एक विस्तृत शब्द है जिसके माध्यम से कोई भी मनुष्य विशेषकर शिशु अपनी आंतरिक भावनाओं को प्रकट कर सकता है। शिक्षा को अंग्रेजी भाषा में Education (एजुकेशन) कहते हैं।

शिक्षा एक विशेष प्रकार का वातावरण है, जिसका प्रभाव बालक के चिंतन, दृष्टिकोण व व्यवहार करने की आदतों पर स्थाई रूप से परिवर्तन के लिए डाला जाता है।

वर्तमान समय में Education के कारण ही मानव आज सभ्यता के उच्च शिखर पर पहुंच सका है। मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनाने का श्रेय ही Education को प्राप्त है।

शिक्षा

शिक्षा का अर्थ

यह शब्द हिंदी भाषा से प्रकट हुआ है। हिंदी भाषा की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुई है। यह दो शब्दों से मिलकर बनायह दो शब्दों से मिलकर बना है एक शिक्ष् धातु और दूसरा शाक्ष् धातु। शिक्ष् का अर्थ है सीखना अथवा ज्ञान प्राप्त करना। शाक्ष् का अर्थ है अनुशासन में रखना अथवा नियंत्रण में रखना।

शिक्षा के अर्थ को पूर्ण रूप से समझने के लिए निम्न बातों को समझना आवश्यक है-

  1. शिक्षा से मानव का विकास होता है– इससे मानव का विकास होता है बिना इसके मानव किसी जानवर के समान ही होता है। आज जिस मनुष्य को हम जानते हैं जिससे हम मिलते हैं जो हमारे चारों ओर बिचरता है, वह सब मनुष्य Education के द्वारा ही सभ्य बना है।
  2. शिक्षा प्रशिक्षण का कार्य है– जन्म से मानव पशु के समान होता है अत: उसे प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। Education के कारण ही वह अपने भावों को अभिलाषाओं को तथा अपने व्यवहारों को नियंत्रित करना सीखता है।
  3. मार्गदर्शक का कार्य– यह मनुष्य का मार्गदर्शक है। इसके द्वारा ही मनुष्य का तथा नई पीढ़ी का मार्गदर्शन किया जाता है। इसलिए बच्चों की पढ़ाते समय इस बात का ध्यान सर्वाधिक रखा जाता है कि बच्चों की अविकसित भावनाएं, योग्यताएं, क्षमताएं तथा उनकी रूचि के क्षेत्र का अधिकतम विकास हो।
  4. शिक्षा मनुष्य की मानसिक अभिवृद्धि में भी सहायक होती है। अभिवृद्धि के दो मुख्य कारक होते हैं – प्रशिक्षण तथा वातावरण। अपने प्रशिक्षण व वातावरण के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति क्रिया व प्रतिक्रिया करता है तथा इसी प्रक्रिया में उसके व्यक्तित्व में परिवर्तन होते हैं। यह सही व संतुलित अभिवृद्धि तभी संभव है जब शरीर व व्यक्तित्व के सभी पक्षों शारीरिक मानसिक नैतिक आध्यात्मिक तथा सामाजिक पक्ष का संतुलित तथा समान विकास हो। इस क्रिया विधि में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है।

विद्वानों का विचार है कि विद्यालयों में ही बालक को शिक्षा दी जाती है। वहीं पर रहकर वे जीवन के भविष्य का निर्माण करते हैं। वहीं पर व्यक्ति के सामान्य व्यवहार की रचना होती है और उसी के अनुरूप उसके चरित्र एवं व्यक्तित्व का विकास होता है। डॉक्टर वी डी भाटिया का कथन है कि उद्देश्य के ज्ञान के अभाव में शिक्षक उस नाविक के समान है जिसे अपने लक्ष्य या मंजिल का पता नहीं है।

शिक्षा की परिभाषाएं

शिक्षा की कुछ प्रमुख और महत्वपूर्ण परिभाषाएं निम्न है-

शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक एवं मनुष्य के सर्वांगीण विकास का संबंध शरीर मस्तिष्क एवं आत्मा से है।

महात्मा गांधी जी के अनुसार

शिक्षा में आदतों स्मरण आदर्श, स्वरूप शारीरिक एवं मानसिक कौशल, बौद्धिकता एवं रुचि नैतिक विचार एवं ज्ञान ही नहीं विधियां भी सम्मिलित है।

इस्पेंसर के अनुसार

शिक्षा से मेरा तात्पर्य उस प्रशिक्षण से है जो अच्छी आदतों के द्वारा बालकों में नैतिकता का विकास करें।

प्लेटो के अनुसार

शिक्षा व्यक्ति की उम्र योग्यताओं के विकास का नाम है जो उसे उसके वातावरण पर नियंत्रण रखना सिखाती है और उसकी संभावनाओं को पूर्ण करती है।

जांन डी वी के अनुसार

ये सभी परिभाषाएं यह स्पष्ट करती हैं कि शिक्षा एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो बालक को समाज में रहने वाले विकास की क्षमता की वृद्धि करने में महत्वपूर्ण योगदान देती है। शिशु में अनेक महत्वपूर्ण गुण होते हैं। वे गुण शिक्षण के माध्यम से ही विकसित होते हैं। कुल मिलाकर व्यक्ति को एक संपूर्ण व्यक्ति बनाने में योगदान देते हैं।

शिक्षण और सीखना

शिक्षण वह प्रक्रिया है जिसमें सीखने वाले सीखने वालों के लिए विभिन्न विधियों युक्तियों और साधनों द्वारा सीखने की परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। सीखने वाले इनकी सहायता से सीखते हैं। शिक्षण का तब तक कोई अर्थ नहीं जब तक सीखने वाले सीख नहीं जाते। उनके व्यवहार में वांछित परिवर्तन नहीं हो जाता।

सीखने का अर्थ है – अनुभव, शिक्षण, प्रशिक्षण अथवा अध्ययन द्वारा नए नए तथ्यों को जानने और नई-नई क्रियाओं को करना तथा इन्हें बहुत समय तक धारण करना। तथा आवश्यकता पड़ने पर इनका प्रयोग करना सीखने का तब तक कोई अर्थ नहीं जब तक उसे सीखने वालों के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं हो जाता।

शिक्षा की प्रकृति

शिक्षा को ना तो पूर्णता विज्ञान की श्रेणी में रख सकते हैं और ना ही कला की श्रेणी में। गौर पूर्वक देखें तो यह विज्ञान एवं कला दोनों ही है। ना ही व्यवहारिक इसमें सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक दोनों पक्ष दृष्टिगत होते हैं। वस्तुतः यह व्यावहारिक पहलू अधिक रहता है। अतः विज्ञान की श्रेणी में इसका स्थान सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक विज्ञान दोनों के रूप में है।

इसके संबंध में मूल रूप से दार्शनिकों, समाजशास्त्रियों, राजनीतिशास्त्रीयों, अर्थशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों और वैज्ञानिकों ने विचार किया है। इन्हीं सब के विचारों से इसे निम्न प्रकार निर्धारित किया जा सकता है।

  1. यह एक प्रकार की सामाजिक प्रक्रिया है और इसके मुख्य तीन अंग होते हैं सिखाने वाला, सीखने वाला, सीखने सिखाने की विषय सामग्री।
  2. शिक्षा एक उद्देश्य पूर्ण प्रक्रिया है जिसके उद्देश्य समाज द्वारा निश्चित होते हैं और समाज ही इसे विकासोन्मुख बनाता है तथा शिक्षा ही समाज को विकासोन्मुख बनाती है।
  3. व्यापक अर्थ में शिक्षा समाज में चलने वाली एक निरंतर प्रक्रिया है परंतु प्रचलित या संकुचित अर्थ में यह केवल विद्यार्थियों में ही चलती है।
  4. इसके स्वरूप का निर्धारण उस समाज के धर्म दर्शन, उसकी संरचना, संस्कृति, शासन तंत्र, अर्थतंत्र और वैज्ञानिक प्रगति आदि पर निर्भर करता है।
CSJMU BEd Semester IV Syllabus

अनुदेशन एवं प्रशिक्षण

अनुदेशन से तात्पर्य है शिक्षकों द्वारा शिक्षार्थियों के सम्मुख तथ्यों को सीधे प्रस्तुत करने की प्रक्रिया। अनुदेशन शिक्षण की एक ऐसी विधि है जिसमें सिखाने वाले सीखने वालों को तथ्यों एवं क्रियाओं का ज्ञान स्वयं अथवा किसी अन्य माध्यम से सीधे कराते हैं। और सीखने वाले इन तथ्यों एवं क्रियाओं को अपनी सामर्थ्य के अनुसार सीखते हैं। इससे सीखने और सिखाने वाले के मध्य कोई अंतः क्रिया नहीं होती।

प्रशिक्षण से तात्पर्य कौशलों के विकास से लगाया जाता है। प्रशिक्षण का अर्थ सीखने वालों को किसी कला, कौशल तथा व्यवसाय में अभ्यास द्वारा निपुण बनाना है। इसमें क्रिया पक्ष की प्रधानता होती है, वर्तमान समय में किसी भी प्रशिक्षण कार्यक्रम में उसके सिद्धांत एवं क्रिया दोनों पक्षों को सम्मिलित किया जाता है। और सिद्धांत पक्ष का ज्ञान बुद्धि परख विधियों के द्वारा किया जाता है।

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