वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य

वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य शिक्षा स्वरूप तथा उसकी गंभीरता से यह स्पष्ट होता है कि तत्कालीन शिक्षा के उक्त उद्देश्यों के साथ-साथ एक अति महत्वपूर्ण उद्देश्य तथा आदर्श ज्ञान का विकास था।

ईश्वर भक्ति तथा धार्मिकता की भावना चरित्र निर्माण व्यक्तित्व का विकास नागरिक तथा सामाजिक कर्तव्यों का पालन सामाजिक कुशलता की उन्नति और राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण एवं प्रसार प्राचीन भारत में शिक्षा के मुख्य उद्देश्य एवं आदर्श थे।

डा. अल्तेकर

वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य

भारत आदिकाल से विश्व गुरु रहा है। वैदिक कालीन शिक्षा से प्रभावित होकर दूर-दूर देशों के विद्यार्थी भारत में आकर वैदिक कालीन शिक्षा को ग्रहण किया करते थे। वैदिक कालीन शिक्षा प्रणाली मुख्य रूप से मौखिक थी। मौखिक शिक्षा विधि से ही गुरु अपने शिष्य तक ज्ञान का हस्तांतरण किया करते था। मौखिक विधि दीर्घकालिक थी, जबकि ताड़ पत्र आदि पर तैयार की गई प्रतियां अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रह पाती थी। वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्यों को हम निम्न शीर्षक के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं-

1. स्वास्थ्य का संरक्षण एवं संवर्धन

वैदिककालीन शिक्षा का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है और मोक्ष की प्राप्ति के लिए सबसे पहली आवश्यकता है स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन। यही कारण है कि तत्कालीन गुरुकुलों में शिष्यों के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के संरक्षण एवं संवर्धन पर विशेष ध्यान दिया जाता था। जिसके लिए निम्न निर्देश दिए जाते थे-

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठना
  • दैनिक क्रिया से निवृत्त होना
  • व्यायाम करना
  • सादा भोजन करना
  • वासना से दूर रहना
  • उचित आचार विचार की ओर उन्मुख रहना
  • सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का पालन करना
  • काम, क्रोध, मद, लोभ, अहंकार से दूर रहना

यह शिक्षाएं बालकों को स्वास्थ्य के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से दी जाती थी।

2. सामाजिक एवं राष्ट्रीय कर्तव्यों का बोध एवं पालन

वैदिक काल में राष्ट्रीयता की भावना का अत्यधिक सम्मान तथा महत्व था। यही कारण है कि वैदिककालीन शिक्षा शिष्यों को समाज एवं राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का ज्ञान कराया जाता था। साथ ही उनके पालन के लिए प्रेरित एवं प्रशिक्षित किया जाता था। गुरुकुल कालीन शिक्षा पूर्ण होने के उपरांत होने वाले समावर्तन समारोह में गुरु अपने शिष्यों को उपदेश देते थे। जिसमें वे छात्रों को माता-पिता की सेवा करना, समाज की सेवा करना, गृहस्थ जीवन से कर्तव्य का पालन करना तथा पित्र ऋण एवं देव ऋण से मुक्त होने का उपदेश देते थे।

3. संस्कृति का संरक्षण एवं विकास

वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य में मुख्य संस्कृति का संरक्षण, विकास एवं हस्तांतरण करना भी था। उस काल में गुरुकुल ओं की संपूर्ण कार्य पद्धति धर्म प्रधान थे। स्त्रियों को भी वेदों की शिक्षाएं दी जाती थी। लोग गृहस्थ आश्रम के जीवनयापन के उपरांत वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करते थे। इससे देश की संस्कृति का संरक्षण तथा विकास होता रहता था।

4. नैतिक एवं चारित्रिक विकास

वैदिक काल में चरित्र निर्माण से तात्पर्य मनुष्य को धर्म सम्मत आचरण में प्रशिक्षित करने से लिया जाता था। उसके आहार-विहार तथा आचार विचार को धर्म के आधार पर उचित दिशा देने से लिया जाता था। उस समय बच्चों के नैतिक एवं चारित्रिक विकास के लिए उन्हें प्रारंभ से ही धर्म और नीति शास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। (वैदिककालीन शिक्षा के उद्देश्य)

5. जीविकोपार्जन एवं कला कौशल की शिक्षा

वैदिककालीन शिक्षा में ज्ञान आध्यात्मिक शिक्षा के साथ-साथ जीविकोपार्जन एवं कला कौशल की शिक्षा की उत्तम व्यवस्था का प्रबंध था क्योंकि उस काल की शिक्षा का एक उद्देश्य शिष्यों को स्वावलंबी बनाने का तथा कला कौशल के ज्ञान का विकास करने का भी था। प्रारंभिक वैदिक काल में शिष्यों को उनकी योग्यता अनुसार कला कौशलों की शिक्षा दी जाती थी। जबकि उत्तर वैदिक काल में यह कर्म एवं योग्यता पर आधारित एवं शिक्षा जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था में बदल गई थी। जिसमें ब्राह्मणों को कर्मकांड, अध्यात्म, अध्ययन, अध्यापन, क्षत्रियों को शासन कार्य, युद्ध कौशल, वैश्यों को कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्य की शिक्षा दी जाने लगी थी।

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