विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य Top 12 Objective

विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य- वर्तमान परिस्थितियों में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य छात्रों का सर्वांगीण विकास करने का प्रयास करना है। किसी भी कार्य को करने से पूर्व कोई लक्ष्य या उद्देश्य निर्धारित करना पड़ता है। उद्देश्य के बिना उस कार्य को कोई दिशा नहीं मिलती। उद्देश्यों के अभाव में कार्य सुचारु रूप से संचालित नहीं किया जा सकता। विभिन्न स्तरों पर भिन्न-भिन्न स्तरों के बालकों की आवश्यकताओं, योग्यताओं तथा रुचियों के आधार पर विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य निर्धारित किये जाते हैं।

शिक्षण के उद्देश्य

उद्देश्यों के ज्ञान के अभाव में शिक्षक उस नाविक के समान है जो अपने लक्ष्य या मंजिल को नहीं जानता है और बालक उस पतवारहीन नौका के समान है जो लहरों के थपेड़े खाकर किसी तट पर जा लगेगी।

बी. डी. भाटिया के अनुसार

शैक्षिक उद्देश्य वे लक्ष्य हैं जिनकी सहायता से केवल पाठ्यक्रम की रचना ही नहीं की जाती तथा अनुदेशन के लिए निर्देशन ही नहीं दिया जाता अपितु इनसे ही हमें मूल्यांकन की प्रविधियों की रचना एवं प्रयोग के लिए विस्तृत विशिष्टताओं की प्राप्ति होती है।

बी. एस. ब्लूम

विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य की आवश्यकता

उद्देश्यों को निर्धारित करने से पूर्व अध्यापक को समाज की वर्तमान परिस्थितियों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। आज के प्रौद्योगिकी एवं वैज्ञानिक युग में उद्देश्यहीन शिक्षा का कोई अस्तित्व नहीं है अतः विज्ञान विषयों की शिक्षा देने से पूर्व ही शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित करना आवश्यक है। उद्देश्यों के निर्धारण में बालकों की व्यक्तिगत भिन्नताओं, आवश्यकताओं, रुचियों एवं क्षमताओं का ध्यान रखना चाहिए।

विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य इस प्रकार के होने चाहिए जिनके द्वारा छात्रों के व्यवहार में परिवर्तन लाया जा सके, जिनकी पूर्ति शिक्षा द्वारा हो सके, शिक्षक को अपनाने में कठिनाई न हो एवं यह मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुकूल होने चाहिए। उद्देश्यों का निर्धारण करते समय मुख्य रूप से राष्ट्र एवं समाज की आवश्यकताओं, विषय की प्रकृति, रीति-रिवाज, परम्पराओं तथा मूल्यों को विशेष महत्त्व दिया जाना चाहिए। विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य को निर्धारित करने से पहले निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-

  1. उद्देश्य ऐसे होने चाहिए जो जनतन्त्रीय शिक्षा के लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।
  2. विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य निर्धारित पाठ्यक्रम से सम्बन्धित होने चाहिए।
  3. उद्देश्य बालकों की अधिकाधिक आवश्यकताओं एवं रुचियों की पूर्ति कर सकें।
  4. उद्देश्य बालकों की बुद्धि स्तर के अनुकूल हों ताकि सरलता से प्राप्त किये जा सकें।
  5. उद्देश्य व्यावहारिक हों जो व्यावसायिक आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।
  6. उद्देश्यों का निर्माण मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित होना चाहिए।
  7. विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य वास्तविक एवं सत्य होने चाहिए जो बालकों की प्रगति का सही मूल्यांकन कर सकें।

विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य

शिक्षाविदों की मान्यता है कि उद्देश्य सार्थक और उपयोगी हों, व्यावहारिक हों, जो बालकों को आगाम जीवन में एक अच्छा नागरिक बनाने में सहायक हो सकें। उद्देश्य इस प्रकार के होने चाहिए जिनमें समय एवं परिस्थिति के अनुकूल परिवर्तन भी किया जा सके और विद्यार्थी तथा शिक्षक दोनों के लिए हितकारी साबित हो सके। इन बातों को ध्यान में रखते हुए विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य निम्नलिखित होने चाहिए-

  1. ज्ञान – विज्ञान शिक्षण का सबसे मुख्य उद्देश्य ज्ञान माना जाता है क्योंकि बिना ज्ञान के और दूसरे उद्देश्य निरर्थक हो जाते हैं। इसलिए विज्ञान के लिए ज्ञान प्राप्ति के विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य पर अत्यधिक बल दिया जाता है। अतः विज्ञान के विद्यार्थियों में निम्नलिखित प्रकार का ज्ञान अवश्य होना चाहिए—
    • दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाले विज्ञान के मूलभूत सिद्धान्तों और विचारों का ज्ञान।
    • विज्ञान के आधुनिक आविष्कार तथा वैज्ञानिक साहित्य को समझने का पूर्ण ज्ञान।
    • विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के पारस्परिक सम्बन्धों का ज्ञान।
    • मनुष्य के लिए पशु विज्ञान तथा वनस्पति के महत्व का ज्ञान।
    • मानव शरीर की रचना व उसकी क्रियाओं तथा उसके वर्तमान वातावरण का ज्ञान।
    • वैज्ञानिक तथ्यों, मान्यताओं, प्रतीकों, नामावली तथा सिद्धान्तों का सही ज्ञान।
    • प्राकृतिक प्रक्रियाओं का ज्ञान।
  1. समझ या सूझ — विज्ञान विषय को समझने के लिए विद्यार्थियों में इस प्रकार की समझ होनी चाहिए कि वे वैज्ञानिक तथ्यों, मान्यताओं, सिद्धान्तों और पदार्थों को स्पष्ट कर सकें, उनकी – सही ढंग से व्याख्या कर सकें तथा एक-दूसरे से सम्बन्धित तथ्यों, प्रक्रियाओं तथा पदार्थों में भेद कर सकें। इसके अतिरिक्त विद्यार्थियों में इतनी सूझ-बूझ भी होनी चाहिए कि वे रेखाचित्रों, सूचियों, चार्टी, सूत्रों तथा प्रयोगों का सही विश्लेषण कर सकें, अशुद्ध कथनों, प्रक्रियाओं तथा मान्यताओं में अशुद्धियाँ निकाल सकें और सूचियों, प्रतीकों तथा सूत्रों को एक-दूसरे रूप में परिवर्तित कर सकें।
  2. योग्यताएँ – विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य विद्यार्थियों में कुछ योग्यताओं का विकास करना भी है। वैज्ञानिक योग्यताएँ — समस्या को खोजना, समस्या से सम्बन्धित तथ्यों को एकत्रित करना, उनको संगठित करना, अभिव्यक्त करना, विश्लेषण करना, निष्कर्ष निकालना, प्राप्त प्रदत्तों से भविष्य की घोषणा करना, वैज्ञानिक मेले, प्रदर्शनियों, संगोष्ठियों, कार्यशालाओं आदि का आयोजन करना, विज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करना, तर्क करना, विभिन्न प्रकार के यन्त्रों, उपकरणों आदि के उपयोग में लाने की क्षमता – ये सभी वैज्ञानिक योग्यताएँ हैं।
  3. कौशल – विज्ञान शिक्षण से विद्यार्थियों में विभिन्न प्रकार के कौशलों के विकास की आशा की जाती है। विद्यार्थियों में उपकरण तथा मशीन को प्रयोग करने, उनको प्रयोग के लिए व्यवस्थित करने, विज्ञान के नमूने, रासायनिक पदार्थों को सुरक्षित रखने तथा नमूनों और उपकरणों आदि की उचित आकृतियाँ बनाने की योग्यता होनी चाहिए। इसके साथ उनमें मॉडलों तथा प्रयोग को तुरन्त तैयार करने की जानकारी होनी चाहिए और प्रयोगात्मक ढाँचे तथा प्रक्रिया में अशुद्धियाँ तलाश करने की योग्यता होनी चाहिए।
  4. रुचि — विज्ञान शिक्षक के द्वारा विद्यार्थियों में ऐसी प्रेरणा भरनी चाहिए कि वे विज्ञान के साहित्य को पढ़ें, वैज्ञानिकों के चित्र, सूचनाएँ आदि एकत्रित करें। विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति, उपलब्धियों के प्रति अधिक ज्ञान प्राप्ति के लिए वैज्ञानिक साहित्य के प्रति, नवीन अनुसंधानों और खोजों को जानने की रुचि उत्पन्न करना है। विज्ञान से सम्बन्धित स्थानों का भ्रमण, विज्ञान क्लबों, प्रदर्शनियों, विज्ञान योजनाओं पर कार्य करने, विवादपूर्ण पहलुओं पर आलोचनाएँ करना, प्रतियोगिताएँ आयोजित करना, वैज्ञानिक तथ्यों, चित्रों, सूचनाओं आदि का संग्रह करना सभी कार्य वैज्ञानिक रुचियाँ ही हैं जिनको विकसित करना विज्ञान शिक्षण का महत्वपूर्ण विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य है। इस प्रकार की रुचियों से विद्यार्थियों में अच्छी आदतों का विकास होता है। वे सत्य में विश्वास, ईमानदारी, आत्मविश्वास, सहनशीलता, धैर्य, सहयोग आदि सामाजिक रूप से स्वीकृत नैतिक मूल्यों को स्वतः ही सीख जाते हैं।
  5. अभिवृत्तियाँ — विद्यार्थियों में वैज्ञानिक अभिवृत्तियों का विकास विज्ञान शिक्षण की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। अतः विज्ञान शिक्षण प्रत्यक्ष तथा व्यवस्थित होना चाहिए। वैज्ञानिक अभिवृत्तियों के अन्तर्गत व्यवहार के वे गुण आते हैं, जिनसे व्यक्ति अलग ही पहचाना जा सकता है। वैज्ञानिक अभिवृत्ति से सम्पन्न व्यक्ति के लक्षण निम्नलिखित हैं-
    • उसको अपने ऊपर विश्वास होता है तथा वह संकीर्णता से दूर होता है।
    • अपने निर्णयों को अन्ध-विश्वासों पर नहीं बल्कि प्रमाणित तथ्यों पर आधारित करता है।
    • दूसरे के विचारों को सम्मान देता है तथा अपने विचारों को साक्ष्यों के आधार पर बदलने के लिए तैयार रहता है।
    • अपने चारों ओर की वस्तुओं के सम्बन्ध में क्यों ? क्या ? प्रश्नों के उत्तरों को जानने के लिए उत्सुक रहता है।
    • वह निष्पक्ष तथा सत्य पर आधारित निर्णय लेता है।
    • समस्या समाधान के लिए सुनिश्चित प्रक्रिया को अपनाता है।
    • किसी भी परिणाम को अन्तिम नहीं समझता है।
    • आडम्बरों में विश्वास नहीं करता है बल्कि तथ्यों में विश्वास रखता है।
    • नवीनतम तथा प्रमाणित तथ्यों के आधार पर विविध प्रक्रियाओं को अपनाता है।
    • मानव कल्याण के लिए विज्ञान का समर्थन करता है।
  6. वैज्ञानिक विधि में प्रशिक्षण — वह विधि जिसे वैज्ञानिक अपनाते हैं, वैज्ञानिक विधि कहलाती है। वैज्ञानिक किसी भी समस्या के हल के लिए एक सुनिश्चित प्रक्रिया का उपयोग करते हैं जिससे उस समस्या का सही हल निकल सके तथा परिणामों को जीवन की अन्य परिस्थितियों के उपयोग में लाया जा सके। वैज्ञानिक विधि का प्रशिक्षण विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य है ताकि वे समस्या के खोजने, उसे परिभाषित करने, सम्बन्धित प्रदत्तों व तथ्यों का संग्रह कर उन्हें नियोजित करना, अभिव्यक्त करना, परिकल्पनाओं को निर्मित कर उनका सत्यापन करना और अन्त में निष्कर्षो पर पहुँच सकें। ये सभी पद वैज्ञानिक अभिवृत्ति, वैज्ञानिक आदतों व कौशलों को विकसित कर बहुआयामी चिन्तन को जन्म देते हैं।
  1. व्यवसाय तथा विशिष्ट क्षेत्र के लिए आधार प्रदान करना — विज्ञान के महत्त्व को स्वीकारते हुए इसे विद्यालयी कार्यक्रम का अभिन्न अंग माना गया है । अतः विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य है कि माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों के विशिष्ट क्षेत्र व व्यवसाय का आधार प्रदान करे। क्षेत्र विशेष की उच्च शिक्षा का मार्ग माध्यमिक स्तर की शिक्षा ही निर्धारित करती है। अतः विज्ञान के विविध विषयों तथा अनुभव प्रशिक्षणों का ज्ञान आवश्यक है जिससे विद्यार्थी अपने व्यवसाय का चयन कर सकें तथा भावी उच्च शिक्षा की दिशा निश्चित कर सकें।
  2. प्रशसात्मक क्षमताएँ – विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य बालकों में विज्ञान की खोजें, वैज्ञानिकों की मार्मिक घटनाएँ, उनके साहसिक कार्य, रोमांस की कहानियाँ, वैज्ञानिकों की जीवन कथाएँ, मानव जाति की प्रगति की कहानी तथा वैज्ञानिक विकास का इतिहास आदि को बताकर शिक्षा के द्वारा प्रशंसात्मक दृष्टिकोण उत्पन्न करता है। इससे बालक विज्ञान के महत्त्व को समझते हैं। उन्हें आधुनिक संसार में विज्ञान के रोचक इतिहास को पढ़कर वैज्ञानिक तथा तकनीक की प्रगति के ज्ञान से आनन्द की अनुभूति होती है। उनमें वैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा अनुसन्धानों को समझने और जानने की लालसा उत्पन्न होती है।
  3. अवकाश का सदुपयोग — विज्ञान के बालकों में प्रयोगात्मक कौशल को विकसित करने के लिए अवकाश के समय उनके अध्यापक साधारण वस्तुओं का उनकी रुचि के अनुसार निर्माण करना सिखाते हैं। अपने रोचक कार्य के रूप में साबुन, मोमबत्ती, स्याही, पॉलिश सौन्दर्य प्रशाध आदि वस्तुएँ बनाते हैं। यह उनकी रुचि के अनुसार होता है और अवकाश के समय इन वस्तुओं का निर्माण करते हैं। इसके अलावा वे कई रचनात्मक तथा आविष्कारक काम भी करने लगते हैं। इस प्रकार वे अवकाश के समय का सदुपयोग करते हैं। घर में काम आने वाली छोटी-छोटी वस्तुओं का निर्माण ऐसे समय में हँसते-हँसते करते रहते हैं। इस प्रकार की क्रियाएँ उनमें व्यावहारिकता और ज्ञान का विकास करती हैं।
  4. व्यावहारिक प्रयोग आधुनिक युग में विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य द्वारा बालकों में प्रयोगात्मक योग्यताओं का विकास करना चाहिए ताकि वे विज्ञान से बनी वस्तुओं का उपयोग अपने व्यावहारिक जीवन में कर सकें। इसके लिए विद्यार्थियों को विभिन्न तथ्यों, प्रक्रियाओं, सिद्धान्तों तथा वस्तुओं के प्रयोग के बारे में पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। जैसे— बिजली का समुचित प्रयोग, उसके उपकरणों की जानकारी, उनका घर में प्रयोग, फ्यूज आदि को ठीक करना आदि जीवन में काम आने वाले यन्त्रों को प्रयोग करने की पूरी विधि से अवगत होना चाहिए।
  5. अच्छे जीवन-यापन के लिए विज्ञान बालकों को नये-नये वैज्ञानिक आविष्कार, स्वस्थ रहने के नये तौर-तरीके, साफ रहने की विधि, शरीर को वातावरण के अनुकूल हृष्ट-पुष्ट कैसे रख सकते हैं आदि सभी बातें से परिचित कराता है। प्रदूषण को कैसे रोका जाये, जीवन को इससे कैसे सुरक्षित रखा जाये आदि जीवन सम्बन्धी सभी बातें बतायी जाती हैं। इन बातों की पूर्ण जानकारी होने से मनुष्य तरह-तरह की बीमारियों से अपने जीवन को बचा सकता है और जीवनभर आराम और सुख से व्यतीत कर सकता है।
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विज्ञान शिक्षण के लक्ष्य

विज्ञान के मूल्यों से लाभान्वित होने के लिए आवश्यक है कि शैक्षिक जगत इनसे पूर्णत: परिचित हो। विज्ञान के सभी मूल्यों की उपलब्धि धीरे-धीरे होती हैं और उसमें अल्प समय लगता है। देशकाल की माँग के अनुसार कतिपय मूल्यों को प्रमुखता देनी पड़ती है। शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर भी प्रत्येक मूल्यों की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। अलग-अलग स्तरों पर भिन्न-भिन्न समसय पर पुरुषों एवं स्त्रियों हेतु उपर्युक्त लक्ष्यों को निश्चित करना पड़ता है।

श्री पी. सी. मेहलनोविस ने कुछ प्रमुख विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य या लक्ष्य निर्धारित किये हैं—

  1. औद्योगीकरण मानव श्रम के स्थान पर भाप या बिजली से चलने वाली मशीनों के अधिक-से-अधिक उपयोग द्वारा वस्तुओं के प्रति व्यक्ति उत्पादन तथा सेवाओं के संभरण में वृद्धि ही जीवन-स्तर को उन्नत बनाने का एकमात्र उपाय है। ऐसा तभी सम्भव है कि जब स्तर व्यापारिक निर्माण, कृषि, परिवहन एवं संचार वितरण इत्यादि का व्यापक स्तर पर औद्योगीकरण किया जाये।
  2. योग्य छात्रों की प्राप्ति-विज्ञान शिक्षण का एक अन्य लक्ष्य यह भी होना चाहिए कि उसके द्वारा प्रत्येक स्तर को तकनीकी शिल्प वैज्ञानिक तथा वैज्ञानिक संस्थाओं एवं आधारभूत अनुप्रयुक्त अनुसंधान केन्द्रों को अधिक-से-अधिक संख्या में योग्य छात्र प्राप्त हो सकें।
  3. विज्ञान की शिक्षा, एक प्रणाली-ऐसे में वैज्ञानिकों तथा वैज्ञानिक कार्यकर्ताओं के समाज का निर्माण एवं जन सामान्य में विज्ञान के प्रति सामाजिक सराहना में वृद्धि करना विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य होना चाहिए। अतः सम्पूर्ण देश में विज्ञान स्कूली शिक्षा की एक प्रणाली प्रारम्भ की जाय जो उच्च स्तर पर विज्ञान एवं शिल्प विज्ञान के अध्ययन एवं अनुसंधान को प्रोत्साहन दे सके।
  4. शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश की सुविधाएँ-विज्ञान की शिक्षा जन सामान्य के आर्थिक जीवन के अनुरूप होनी चाहिए। प्रतिभाशाली छात्रों हेतु उच्चतम वैज्ञानिक एवं शिल्प वैज्ञानिक संस्थाओं में प्रवेश की सुविधाएँ प्राप्त होनी चाहिए।
  5. खोज की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन — प्रत्येक स्तर पर यह लक्ष्य होना चाहिए कि खोज की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन दिया जाय और अज्ञात को जानने हेतु प्रेक्षण, मूल्यांकन एवं प्रयोग करने की उत्कण्ठा को प्रेरणा प्रदान की जाय। इस हेतु यह आवश्यक है कि छात्रों को केवल कुछ तथ्यों को स्मृत करने या प्रायोगिक कार्य को मात्र कुछ क्रियाओं तक सीमित करने से रोका जाए।
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