वंश समूह का तात्पर्य व्यक्तियों के उस समूह से होता है जिसमें एक ज्ञात पूर्वज से सम्बन्धित अनेक पीढ़ियों के रक्त सम्बन्धियों का समावेश होता है। ऐसा पूर्वज कोई काल्पनिक या पौराणिक व्यक्ति न होकर पांच-छः पीढ़ी पहले का कोई वास्तविक व्यक्ति होता जिससे आगे की पीढ़ियों की कड़ियां सदस्यों को ज्ञात होती हैं। जब हम अपनी वंशावली से सम्बन्धित पहले की पीढ़ियों के सदस्यों के इतिहास को ज्ञात करके एक वंशावली तैयार करते हैं, तब प्रत्येक पीढ़ी से सम्बन्धित ज्ञात सदस्यों के समूह को ही वंश-समूह कहा जाता है।

वंश समूह

एक कुल अथवा वंश का आकार समरक्त समूह की तुलना में बड़ा होता है। समरक्त समूह में केवल समान रक्त से जुड़े हुए विभिन्न पीढ़ियों के जीवित सदस्यों का समावेश होता है, जबकि एक वंश-समूह में उतनी पीढ़ियों के सदस्यों का समावेश होता है जिनकी विभिन्न प्रमाणों के आधार पर हमें जानकारी होती है। इस प्रकार वंश-समूह में माता या पिता पक्ष से सम्बन्धित क्रम में विभिन्न पीढ़ियों के जीवित तथा मृत दोनों तरह के सदस्यों को सम्मिलित किया जाता है।

एक वंश-समूह से सम्बन्धित रक्त सम्बन्धियों का साथ-साथ रहना आवश्यक नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे से पृथक् परिवारों में विभाजित होने के बाद भी वे एक वंश-समूह के सदस्य हो सकते हैं। वंश-समूह के निर्धारण में सबसे मुख्य प्रश्न यह उठता है कि कितनी पीढ़ियों तक के लोगों को एक वंश-समूह के अन्तर्गत सम्मिलित किया जा सकता है? इसी आधार को ध्यान में रखते हुए विभिन्न विद्वानों ने वंश-समूह को परिभाषित किया है।

एक समय विशेष में किसी व्यक्ति की जीवित सन्तानों से ही एक वंश-समूह का निर्माण होता है।

रैडक्लिफ ब्राउन

जब पिछली पांच-छः पीढ़ियों से ही किसी ज्ञात पूर्वज का सम्बन्ध हो तथा जिसकी सन्तानें विस्तारित परिवारों में फैली हों तो विस्तारित परिवारों के उस वृहत समूह को ही वंश कहा जाएगा।

डॉ. दुबे

वंश-समूह किसी ऐसे अज्ञात संस्थापक पूर्वज की सन्तानों का वह एकपक्षीय और विस्तृत नातेदारी समूह है जो पिछली पांच या छः पीढ़ियों से अधिक विस्तृत नहीं होता। यह पूर्वज कोई काल्पनिक अथवा पौराणिक व्यक्ति नहीं होता, बल्कि एक वास्तविक व्यक्ति होता। इससे स्पष्ट होता है कि किसी विशेष व्यक्ति से रक्त द्वारा सम्बन्धित पांच-छः पीढ़ियों तक की सन्तानें एक वंश-समूह का निर्माण करती हैं।

हॉबेल

वंश एकपक्षीय समरक्त वाले व्यक्तियों का समूह है जिसके सदस्य अपनी उत्पत्ति किसी ज्ञात पूर्वज से बताते हैं।

थियोडोरसन

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि वंश-समूह किसी पुरुष या स्त्री पूर्वज की ओर से आगामी पीढ़ियों की ओर बढ़ने वाला एक रेखीय क्रम है, जिसमें सदस्यों के बीच समान रक्त के सम्बन्ध होते हैं।

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वंश समूह के रूप

वंश समूह को दो मुख्य रूपों में विभाजित किया जा सकता है— पितृपक्षीय वंश-समूह तथा मातृपक्षीय वंश समूह।

1. पितृपक्षीय वंश समूह

वह है जिसमें एक पुरुष पूर्वज से जन्म लेने वाली आगामी पीढ़ियों का समावेश होता है। ऐसे वंश-समूह में एक पुरुष पूर्वज, उसके भाइयों तथा उनसे उत्पन्न होने वाली पुरुष सन्तानों तथा अविवाहित लड़कियों को ही सम्मिलित किया जाता है। कोई लड़की जब विवाह के द्वारा दूसरे परिवार में चली जाती है तो उसका पितृपक्षीय वंश-समूह से कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता।

इसी तरह वंश-समूह के अन्तर्गत यदि कोई पुरुष निःसन्तान रहता है अथवा उसके कोई पुत्र नहीं होता तो वंश-समूह में ऐसे व्यक्ति की शाखा वहीं पर समाप्त मान ली जाती है। जिस तरह एक वृक्ष की कोई शाखा छोटी और कोई बहुत फैली हुई होती है, उसी तरह एक वंश समूह के अन्तर्गत कुछ समरक्तीय परिवार छोटे और कुछ काफी बड़े होते हैं। इसी आधार पर अनेक विद्वान वंश-समूह को एक साथ या अलग-अलग रहने वाले समरक्तीय परिवारों के समूह के रूप में परिभाषित करते हैं।

पितृपक्षीय वंश-समूह पिता से पुत्र की ओर बढ़ने वाली वंश के क्रम की रेखा का नाम है।

इरावती कर्वे

2. मातृपक्षीय वंश समूह

वह होता है जिसमें एक ज्ञात स्त्री पूर्वज की बहनों तथा उनके बच्चों की आगामी पीढ़ियों को सम्मिलित किया जाता है। ऐसे वंश-समूह में उन पुरुषों को सम्मिलित नहीं किया जाता जो विवाह के कारण अपनी पत्नी के वंश में चले जाते हैं। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों तथा अनेक जनजातियों में इस तरह के वंश-समूहों का प्रचलन है।

उदाहरण के लिए, भारत की गारो तथा खासी जनजाति में मातृपक्षीय वंश-समूह की प्रधानता है, जबकि देश के अधिकांश हिस्सों में विभिन्न समुदायों के अन्तर्गत पितृपक्षीय वंश-समूह पाए जाते हैं। वंश-समूह की इस प्रकृति से यह स्पष्ट होता है कि इसका स्वरूप एक ऐसे वृक्ष की तरह है जो एक सीधी दिशा में ऊपर की ओर उठता है तथा जिसमें स्थान-स्थान पर नई शाखाएं बनकर चारों ओर फैलती रहती हैं।

यह शाखाएं एक वंश समूह के अन्तर्गत विभिन्न पीढ़ियों के क्रम को स्पष्ट करती हैं। यह पुनः ध्यान रखना आवश्यक है कि वंश-समूह का सम्बन्ध किसी काल्पनिक पूर्वज से जुड़े हुए व्यक्तियों के समूह से नहीं होता, बल्कि इसमें माता अथवा पिता पक्ष से सम्बन्धित केवल उतनी ही पीढ़ियों का समावेश होता है जो स्पष्ट रूप से ज्ञात होती हैं तथा उनके बारे में कोई मत भिन्नता नहीं होती।

वंश समूह की प्रकृति

वंश समूह की प्रकृति को निम्नांकित विशेषताओं की सहायता से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:

  • एक सामान्य तथा वास्तविक पूर्वज – वंश-समूह अनेक पीढ़ियों के उन समरक्तीय लोगों का समूह है जिनका एक सामान्य और वास्तविक पूर्वज होता है। जिस बिन्दु पर जाकर हम अपने पूर्वज को ज्ञात नहीं कर पाते, वहीं पर वंश समाप्त मान लिया जाता है। दूसरी बात यह है कि वंश से सम्बन्धित पूर्वज कभी भी काल्पनिक नहीं होता, बल्कि वह एक वास्तविक व्यक्ति होता है। ऐसे भी अनेक उदाहरण मिलते हैं जिनमें किसी काल्पनिक व्यक्ति को भी वास्तविक पूर्वज के रूप में स्पष्ट करने का प्रयत्न कर दिया जाता है, लेकिन ऐसे पूर्वज से अपनी उत्पत्ति मानने वाले व्यक्ति एक गोत्र का निर्माण कर सकते हैं, वंश-समूह का नहीं।
  • एकपक्षीय समूह — वंश समूह की प्रकृति एक पक्षीय समूह के रूप में होती है। इसका तात्पर्य है कि पितृसत्तात्मक परिवारों में केवल पिता से पुत्र की ओर तथा मातृसत्तात्मक परिवारों में मां से उसकी पुत्रियों की ओर बढ़ने वाली सन्तानों को ही एक वंश-समूह के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है।
  • समरक्त समूह – वंश समूह के सभी व्यक्तियों का सामान्य पूर्वज होने के कारण उनका रक्त एक-दूसरे के समान होता है। समान रक्त का तात्पर्य प्रत्यक्ष रूप से उनके बीच रक्त सम्बन्धों का पाया जाना है।
  • अनेक पीढ़ियों का समूह – एक वंश समूह के अन्तर्गत अनेक पीढ़ियों के लोगों का समावेश होता है। यदि एक पीढ़ी के ही अनेक भाई अपने अलग-अलग परिवारों की स्थापना कर लें तथा एक-दूसरे से पृथक् रहने लगें तो भी वे एक वंश के ही सदस्य रहते हैं
  • बहिर्विवाही समूह – वंश समूह सदैव बहिर्विवाही होता है। इसका कारण यह है कि एक वंश- समूह के सदस्य समान रक्त के होने के कारण आपस में एक-दूसरे को भाई-बहन मानते हैं, इसलिए एक वंश के सदस्यों का विवाह दूसरे वंश में ही करना आवश्यक माना जाता है।

वास्तविकता यह है कि सामाजिक संगठन में वंश-समूह का इसलिए अधिक महत्व है कि परम्परागत समाजों में ग्रामों का निर्माण एक-एक वंश-समूह द्वारा ही होता था। इस दशा में रक्त पर आधारित सम्बन्ध व्यक्तियों के बीच न केवल ‘समानता की चेतना’ उत्पन्न करते हैं, बल्कि सामाजिक सम्बन्धों को दृढ़ में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कालान्तर में इन्हीं वंश-समूहों के द्वारा सामाजिक संगठन की बड़ी इकाइयों, जैसे— गोत्र तथा गोत्र-समूहों का निर्माण होता है।

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