नातेदारी से एक बड़े और विस्तृत समूह का बोध होता है जिसके सदस्य पिता तथा माता पक्ष के अनेक पीढ़ियों से सम्बन्धित होते हैं। वास्तव में हममें से प्रत्येक व्यक्ति जन्म के एक विशेष परिवार का सदस्य अवश्य होता हैं चाहे हम उस परिवार में जीवन व्यतीत करें या न करें। साथ ही, हम अपने बहुत से ऐसे नेदारों के बीच रहते और अन्तर्क्रिया करते हैं जिनसे हमें अक्सर यह मालूम होता है कि उनसे हमारे वास्तविक नातेदारी के सम्बन्ध क्या हैं? हमें केवल इतना मालूम होता है कि माता अथवा पिता पक्ष में से कभी कोई एक सामान्य पूर्वज हमसे सम्बन्धित रहा है।

इसका तात्पर्य है कि नातेदारी व्यवस्था का सम्बन्ध केवल किसी एक कुल अथवा वंश-समूह से नहीं होता, बल्कि इस व्यवस्था में बहुत से कुलों अथवा वंश-समूहों का समावेश होता है। इसका तात्पर्य है कि वंशक्रम सबसे ऊपर स्थित पूर्वज से वर्तमान पीढ़ी तक के व्यक्तियों के सम्बन्धों की गणना करने का एक तरीका है।

वंश क्रम

एक वंश समूह का पूर्वज जहां ज्ञात होता है, वहीं वंश क्रम का पूर्वज या तो अज्ञात होता है अथवा उसके बारे में वर्तमान पीढ़ी के सदस्यों को कोई निश्चित या स्पष्ट जानकारी नहीं होती। यदि शीर्षस्थ पूर्वज की सन्तानें आगामी पीढ़ियों में अनेक कुलों में विभाजित हो जाती हैं तो विभिन्न कुलों से सम्बन्धित व्यक्ति यह तो जानते हैं कि वे एक-दूसरे के सहवंशी हैं। लेकिन उन्हें अक्सर यह ज्ञात नहीं होता कि सहवंशिता के किस नियम के आधार पर वे आपस में किस प्रकार सम्बन्धित हैं ?

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वंश क्रम अथवा सहवंशिता का सम्बन्ध आवश्यक रूप से पितृ पक्ष अथवा मातृ-पक्ष से ही नहीं होता, बल्कि विभिन्न वंशज माता तथा पिता दोनों की ओर से हो सकते हैं। इसका तात्पर्य है कि वंशक्रम में जहां एक ओर पिता के भाई-बहनों व उनकी सन्तानों की विभिन्न पीढ़ियों को सम्मिलित किया जाता है वहीं माता के भाई-बहनों तथा आगामी पीढ़ियों से सम्बन्धित उनकी सन्तानें भी सहवंशी मानी जाती हैं।

यहीं पर वंशक्रम का अभिप्राय कुछ ऐसे नियमों से हो जाता है जिनके आधार पर हम किसी समारोह या अनुष्ठान जैसे—जन्म, मृत्यु, विवाह अथवा संस्कार आदि के अवसर पर वंश के विभिन्न लोगों को आमन्त्रित करते हैं। यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि यद्यपि एक अवधारणा के रूप में मानेदारी तथा वंशक्रम का अर्थ एक-दूसरे से भिन्न है, लेकिन वंश क्रम की प्रकृति को समझे बिना नातेदारी की प्रकृति को नहीं समझा जा सकता।

साधारणतया जब हम ‘पितृवंशीय वंशक्रम’ अथवा ‘मातृवंशीय वंश क्रम’ की बात करते हैं तो हमारा तात्पर्य कुछ विशेष सामाजिक, सांस्कृतिक और जैविकीय आधारों पर विभिन्न व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों, अधिकारों एवं कर्तव्यों को स्पष्ट करने से होता है। अनेक समाजों में वंश की किसी पदवी अथवा सम्पत्ति अधिकार को एक से दूसरे व्यक्ति को हस्तान्तरित करने का आधार वंश क्रम से सम्बन्धित कुछ विशेष नियम होते हैं।

वंश क्रम की परिभाषा

वंश क्रम से जहां एक ओर किसी अज्ञात पूर्वज से आगे की ओर चलने वाली पीढ़ियों के क्रम का बोध होता है, वहीं दूसरी ओर इसका सम्बन्ध उन रीतियों अथवा नियमों से है, जो नातेदारी समूह में व्यक्ति की प्रस्थिति का निर्धारण करते हैं। अधिकांश विद्वानों ने वंश क्रम को इसी सन्दर्भ में परिभाषित किया है।

वंशक्रम पूर्णतया एक सांस्कृतिक सिद्धान्त की ओर संकेत करता है जिसमें एक व्यक्ति को सामाजिक दृष्टि से एक विशिष्ट रक्त सम्बन्धी नातेदारी (अर्थात् कुल) से जोड़ा जाता है।

मरडॉक

ऐसा प्रतीत होता है कि सरल समाजों में जब व्यक्ति की प्रस्थिति का निर्धारण उसके कुल या वंश के आधार पर होता था, तब वंश क्रम से सम्बन्धित नियम ही यह स्पष्ट कर सकते थे कि व्यक्ति किस श्रेणी की नातेदारी से सम्बन्धित है? इसी बात को स्पष्ट करने के लिए रिवर्स ने वंश क्रम शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया। पहले अर्थ के अनुसार वंशक्रम एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा एक विशेष समूह से व्यक्ति की सदस्यता को जोड़ा जाता है तथा दूसरे अर्थ के अनुसार, वंश क्रम का सम्बन्ध उन रीतियों अथवा नियमों से है जिनके द्वारा एक विशेष अधिकार, पदवी या सम्पत्ति का एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को संचरण होता है।’

फोस्टेस ने मरडॉक से कुछ भिन्न विचार देते हुए लिखा है, “एक वंश-क्रम व्यक्तियों की वह क्रमबद्धता है जिसके द्वारा कुछ वैध अथवा मान्यता प्राप्त सामाजिक और वैयक्तिक लक्ष्यों को प्राप्त किया जाता ‘उदाहरण के लिए, विवाह सम्बन्धों की स्थापना, निकटाभिगमन निषेधों का पालन, सम्पत्ति अधिकार का हस्तान्तरण तथा उपहार देने की परम्परा से सम्बन्धित रीतियां इसी तरह के लक्ष्य हैं जिनका निर्धारण वंश-क्रम की व्यवस्थाओं के आधार पर होता है।

वंश क्रम के नियम वह हैं जो एक सामाजिक समूह के जन्म पर आधारित अधिकारों और सदस्यता का नियमन करते हैं।

राल्फ पिडिंग्टन
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वंश क्रम के रूप

वंश-क्रम का निर्धारण जिन नियमों के आधार पर होता है, उनके सन्दर्भ में वंश-क्रम के विभिन्न रूपों अथवा प्रकारों को समझना आवश्यक है। विभिन्न क्षेत्रों तथा समाजों में एक-दूसरे से भिन्न वंश-क्रम के जो रूप देखने को मिलते हैं, उनमें निम्नांकित रूप मुख्य हैं :

1. एकपक्षीय वंश

क्रम वंश क्रम की गणना जब माता अथवा पिता में से किसी एक पक्ष के आधार पर की जाती है तथा दूसरे पक्ष की अनदेखी कर दी जाती है, तब इसे हम एकपक्षीय वंश-क्रम कहते हैं। इस तरह के वंश क्रम को भी दो भागों में विभाजित किया जा सकता है— पितृपक्षीय वंश-क्रम तथा मातृपक्षीय वंश-क्रम पितृपक्षीय वंश-क्रम वह है जिसमें एक पुरुष पूर्वज की आगामी सन्तानों तथा उनके पुरुष सदस्यों के आधार पर वंश क्रम चलता है।

ऐसे वंश की जो लड़कियां विवाह के द्वारा दूसरे परिवारों में चली जाती हैं, उन्हें पितृपक्षीय वंश-क्रम का अंग नहीं माना जाता। एक सामान्य पुरुष पूर्वज के सभी वंशजों को ‘पितृबन्धु’ कहा जाता है। मातृपक्षीय वंश-क्रम के अन्तर्गत किसी स्त्री पूर्वज की विभिन्न पीढ़ियों की स्त्री सदस्यों अथवा उनके द्वारा निर्धारित नियमों के आधार पर कुछ विशेष पुरुष सदस्यों तथा उनकी सन्तानों को सम्मिलित किया जाता है। जो पुरुष विवाह के द्वारा अपनी पत्नी के वंश में चले जाते हैं, उन्हें ऐसे वंश क्रम में सम्मिलित नहीं किया जाता। मातृपक्षीय वंश-क्रम से सम्बन्धित सभी बन्धुओं को ‘सहोदर बन्धु’ कहा जाता है।

उत्तर भारत तथा देश के अनेक दूसरे हिस्सों में पितृपक्षीय वंश-क्रम की प्रधानता है। अधिकांश जनजातियों मैं भी पितृपक्षीय वंश-क्रम का प्रचलन है ऐसी जनजातियों में खड़िया और भीत जनजाति प्रमुख हैं। दक्षिण भारत के नायरों में मातृपक्षीय वंश क्रम का बहुत स्पष्ट रूप देखने को मिलता है। नायरों में वंश-क्रम और वंश परम्परा के लिए एक ही शब्द ‘तारवाड’ का प्रयोग होता है।

एक वंश परम्परा के सभी सदस्य अपने आप को किसी महिला पूर्वज का वंशज मानते हैं। तारवाड शब्द की उत्पत्ति ‘तरा’ शब्द से हुई है। तरा का अर्थ है ‘ ऊंची नींव जिस पर नायर लोग अपना घर बनाते हैं। एक तारवाड के सदस्य यह मानते हैं कि वंश की एक स्त्री पूर्वज एक ऊंची नींव की तरह है जिस पर बने वंश-क्रम रूपी मकान एकता के दृष्टिकोण से बहुत स्थायी होते हैं। इसकी विस्तृत विवेचना कैथलीन गफ ने नायरों का अध्ययन करके प्रस्तुत की। भारत की जनजातियों में खासी और गारो में भी मातृपक्षीय वंशक्रम पाया जाता है।

2. द्वि-पक्षीय वंश-क्रम

इसका तात्पर्य उस वंश क्रम से है जिसका निर्धारण माता अथवा पिता में से किसी एकपक्ष के आधार पर न होकर दोनों पक्षों से सम्बन्धित होता है। ऐसे वंश क्रम को द्विनामी या ‘दोहरा वंशक्रम’ भी कहा जाता है। इसका तात्पर्य है कि ऐसे वंश क्रम में व्यक्ति एक ओर अपने दादा और उनसे ऊपर के पूर्वजों से सम्बन्धित रहता है तो दूसरी ओर अपने नाना-नानी एवं उस पक्ष के पूर्वजों से सम्बन्धित रहता है।

जिन समुदायों में द्विपक्षीय वंशक्रम का प्रचलन है इनमें दोनों पक्षों का प्रतिनिधित्व करने वाले एकरेखीव स्वजनों को ही सम्मिलित किया जाता है, उनके सम्बन्धित छोटी-छोटी शाखाओं के लोगों को नहीं। साधारणतया वंश-क्रम की ऐसी व्यवस्था में व्यक्ति को पितृपक्ष तथा मातृपक्ष की ओर से अलग-अलग तरह की सम्पत्तियां अथवा अधिकार प्राप्त होते हैं। दूसरे शब्दों में, पितृपक्षीय तथा मातृपक्षीय वंश-क्रम की सदस्यता अलग-अलग प्रयोजनों के लिए हो सकती है।

3. उभयपक्षीय वंश-क्रम

इसे हम ‘उभयवाही वंश क्रम’ भी कहते हैं। इसका विस्तृत उल्लेख ‘रैडक्लिफ ब्राउन ने किया। यह वह वंश-क्रम है जिसमें नातेदारों की गणना माता अथवा पिता पक्ष के बीच कोई अन्तर न करते हुए दोनों में से किसी भी एक पक्ष की ओर से की जा सकती है। इस व्यवस्था में व्यक्ति अपने दादा तथा नाना दोनों के वंश से समान रूप से सम्बन्धित रहता है तथा व्यक्ति को मिलने वाले सम्पत्ति अधिकार माता अथवा पिता में से किसी भी पक्ष की ओर से प्राप्त हो सकते हैं।

द्वि-पक्षीय वंश -क्रम का सम्बन्ध जहां माता तथा पिता दोनों ओर के नातेदारों से स्थापित होने वाले सम्बन्धों से है, वहीं उभयपक्षीय वंश क्रम का नियम दोनों पक्षों से प्राप्त होने वाले सम्पत्ति अधिकारों को स्पष्ट करता है। वर्तमान युग में अधिकांश परिवार उभयवाही वंश क्रम के नियम पर ही आधारित हैं।

4. संदिग्ध वंश-क्रम

यदि किसी समुदाय में व्यक्ति अपने वंश -क्रम की गणना माता या पिता में से किसी भी एक पक्ष की ओर से करने के लिए स्वतन्त्र हो तो, इसे संदिग्ध वंश-क्रम कहा जाता है। ऐसे वंश क्रम में व्यक्ति को यह स्वतन्त्रता मिलती है कि वह अपने पिता अथवा माता में से किसी एक के नातेदारी समूह के साथ स्वयं को जोड़ सकें। इस तरह के वंश-क्रम का प्रचलन सबसे कम देखने को मिलता है।

ऐसे वंश-क्रम का सबसे स्पष्ट उदाहरण न्यूजीलैण्ड की माओरी जनजाति है जिसमें एक ही परिवार के सदस्यों में से कुछ अपने आप को पितृपक्ष से सम्बन्धित मानते हैं जबकि कुछ दूसरे सदस्य मातृपक्ष से सम्बन्धित रहते हैं। ऐसा वंश क्रम विभिन्न सदस्यों की सुविधा तथा मातृपक्ष और पितृपक्ष की आर्थिक प्रस्थिति से अधिक प्रभावित होता है।

5. समानान्तर वंश-क्रम

यह वंश क्रम का वह प्रकार है जिसका निर्धारण लिंग के अनुसार होता है। इसका तात्पर्य है कि इस तरह के वंश क्रम की सदस्यता किसी पुरुष पूर्वज द्वारा उसके पुत्रों, पौत्रों, प्रपौत्रों तथा उनके आगे की पीढ़ियों के पुरुषों को प्राप्त होती है जबकि महिलाओं पर आधारित वंश -क्रम की सदस्यता उनकी पुत्रियों तथा पुत्री की आगामी पीढ़ियों की महिला सदस्यों को प्राप्त होती है।

इसके बाद भी समानान्तर वंश क्रम में मातृवंशीय समूह और पितृ वंशीय समूह साथ-साथ भी रहते हैं। यह वंश -क्रम का एक विशेष प्रकार अवश्य है, लेकिन इस तरह की व्यवस्था विश्व में बहुत कम देखने को मिलती है। इस व्यवस्था से सम्बन्धित अनेक विशेषताएं ब्राजील के ‘अपिनये’ समुदाय में पाई जाती है। भारत में इस तरह के वंश क्रम का प्रचलन नहीं है। वंश-क्रम के अर्थ तथा विभिन्न प्रकारों से स्पष्ट होता है कि वंश क्रम का सम्बन्ध एक विशेष पूर्वज से सम्बन्धित विभिन्न पीढ़ियों के उन नातेदारी सम्बन्धों से है, जो जैविकीय, सामाजिक तथा सांस्कृतिक रूप से वैध तथा मान्यता प्राप्त होते हैं।

वंश क्रम की विशेषताएं

वंश क्रम की प्रकृति को निम्नांकित प्रमुख विशेषताओं का आधार समझा जा सकता है-

  1. एक सामान्य तथा वास्तविक पूर्वज – वंश क्रम अनेक पीढ़ियों के उन समरक्तीय लोगों का समूह है जिनका एक सामान्य और वास्तविक पूर्वज होता है। जिस बिन्दु पर पहुंचने के बाद हम अपने पूर्वज को ज्ञात नहीं कर पाते, वहीं पर वंश-क्रम को समाप्त मान लिया जाता है। जब बहुत से व्यक्ति अपनी उत्पत्ति को किसी ऐसे पूर्वज से सम्बन्धित मान लेते हैं जो या तो ज्ञात नहीं होता अथवा काल्पनिक होता है तब ऐसे लोगों के समूह को गोत्र (Clan) कहते हैं।
  2. समरक्त समूह — एक वंश-क्रम के सभी व्यक्तियों का एक सामान्य पूर्वज होने के कारण उन्हें एक-दूसरे का समरक्त माना जाता है। समान रक्त में माता तथा पिता के रक्त का समावेश होने के कारण वंश-क्रम में मातृ-पक्ष तथा पितृ-पक्ष दोनों के सम्बन्धियों का समावेश हो सकता है। रक्त की समानता ही एक वंश-क्रम से जुड़े हुए लोगों को एकता के सूत्र में बांधती है।
  3. अनेक पीढ़ियों का समूह — एक वंश-क्रम के अन्तर्गत एक ज्ञात पूर्वज से वर्तमान पीढ़ी तक के बीच आने वाली अनेक पीढ़ियों के लोगों का समावेश होता है। यदि अनेक पीढ़ियों के एक वंश-क्रम से सम्बन्धित होने के बाद भी एक-दूसरे से दूर के स्थानों पर अलग रहें, तो भी उन्हें उसी वंश-क्रम से सम्बन्धि माना जाता है।
  4. वंश-क्रम के नियमों में भिन्नता वंश क्रम के विभिन्न प्रकारों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वंश-क्रम सदैव एकपक्षीय समूह के रूप में ही नहीं होता। साधारणतया पितृवंशीय और मातृवंशीय वंश-क्रम की प्रकृति अलग-अलग होती है, लेकिन व्यावहारिक रूप से एक वंश क्रम में पिता तथा माता पक्ष की विभिन्न पीढ़ियों का भी समावेश हो सकता है। भारत के विभिन्न भागों में वंश-क्रम की प्रकृति की भिन्नता इस तथ्य को स्पष्ट कर देती है।
  5. बहिर्विवाही समूह — एक वंश-क्रम से सम्बन्धित व्यक्तियों में समान रक्त होने के कारण उनके बीच विवाह सम्बन्ध स्थापित नहीं होते। भारतीय समाज में इस नियम को इतना विस्तार दे दिया गया कि एक काल्पनिक पूर्वज से सम्बन्धित व्यक्तियों के समूह, अर्थात् गोत्र से सम्बन्धित स्त्री-पुरुष भी आपस में विवाह नहीं कर सकते। दक्षिण भारत के नायरों में वंश-क्रम अथवा ‘तारवाड’ के अन्दर विवाह करने पर कुछ समय पहले तक जाति पंचायत द्वारा व्यक्ति के मृत्युदण्ड तक देने का प्रचलन था ।

वंश क्रम के कार्य

वर्तमान समाजों में वंश-क्रम के नियमों का प्रभाव तेजी से कम होता जा रहा है, लेकिन सरल और ग्रामीण समाजों में वंशक्रम एक विशेष समूह को सदस्यों के सामाजिक सम्बन्धों को दृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।

  1. वंश-क्रम एक ऐसा आधार है जिसकी सहायता से भारत में एक लम्बे समय तक संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में विभिन्न सदस्यों के अधिकारों का निर्धारण किया जाता रहा। फोरटेस ने अपने एक लेख में यह स्पष्ट किया कि वंश-क्रम के आधार पर ही समूह में विभिन्न व्यक्तियों के अधिकारों और दायित्वों का निर्धारण होता है। यदि किसी सम्पत्ति का उपयोग विभिन्न पीढ़ियों के अनेक वंशजों द्वारा सम्मिलित रूप से किया जाता रहा हो तो आवश्यकता पड़ने पर वंश-क्रम की सहायता से ही उस सम्पत्ति के वास्तविक उत्तराधिकारियों का निर्धारण करना सम्भव हो पाता है।
  2. सरल तथा पूर्व-औद्योगिक समाजों में सामाजिक जीवन से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों के संगठन को निर्धारित करने में भी वंश-क्रम की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वंश क्रम के द्वारा यह तय किया जाता है कि विभिन्न व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों की प्रकृति क्या होगी तथा किन व्यक्तियों के बीच विवाह सम्बन्धों का निर्धारण किस प्रकार होगा ? इसका तात्पर्य है कि प्रजनन सम्बन्धों के निर्धारण में भी वंशक्रम एक महत्वपूर्ण आधार है।
  3. एक वंश-क्रम से जुड़े हुए व्यक्ति विभिन्न अवसरों पर अपने आप को एक संयुक्त सामाजिक धार्मिक तथा सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखते हैं। वंश-क्रम की यह इकाई जितनी बड़ी होती है, साधारणतया उस वंश क्रम को उतना ही प्रभावपूर्ण और शक्तिशाली मान लिया जाता है। यही कारण है कि परम्परागत समाजों में व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति का निर्धारण उसके वंश क्रम के आधार पर ही होता था।
  4. एक समूह के अन्दर व्यक्तियों के पारस्परिक मतभेदों को दूर करने में भी वंश-क्रम की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। वंश-क्रम के नियम व्यक्ति के सामाजिक जीवन को अनुशासित बनाते हैं तथा व्यक्तियों को अपने वंश की संस्कृति के अनुसार व्यवहार करने का प्रशिक्षण देते हैं। इसका तात्पर्य है कि एकपक्षीय परम्परा को एक न्यायिक इकाई भी कहा जा सकता है।
  5. वंश-क्रम से सम्बन्धित नियम ही इस बात का निर्धारण करते हैं कि विभिन्न धार्मिक क्रियाओं, संस्कारों की पूर्ति, दाह-संस्कार की परम्परा तथा जन्म और विवाह से जुड़े दायित्वों में किन-किन व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाएगा? नातेदारी की विभिन्न रीतियों का सम्पादन भी वंश-क्रम के नियमों के अनुसार ही होता है।
  6. बोहनन ने लिखा है कि परिवार में जब एक बच्चे का जन्म होता है तब उसके सम्बन्ध तथा प्रशिक्षण की प्रक्रिया किस तरह पूरी की जाएगी, इसका निर्धारण वंश-क्रम के द्वारा ही होता है। वंश-क्रम के अनुसार, वह मातृ-पक्ष, पितृ पक्ष अथवा दोनों पक्षों से समान रूप से सम्बन्धित हो सकता है। बोहनन का यह भी विचार है कि वंश-क्रम से सम्बन्धित व्यक्ति पारस्परिक सहायता में भी वृद्धि करते हैं तथा जीवन के अनेक ऐसे पक्षों का नियमन करते हैं जो वर्तमान जीवन में सरकार और कानून से सम्बन्धित हैं।

नातेदारी व्यवस्था के अन्तर्गत वंश-क्रम को स्पष्ट करने के लिए फोरटेस तथा लीच ने इसका वंश समूह से अन्तर स्पष्ट किया है। आपके अनुसार वंश समूह के अन्तर्गत माता अथवा पिता से सम्बन्धित उतनी ही पीढ़ियों का समावेश होता है जो जीवित होती हैं। इसके विपरीत, वंश-क्रम की परम्परा ऊपर की ओर उतनी पीढ़ियों तक विस्तारित होती है जहां तक के पूर्वज का हमें ज्ञान होता है। इस प्रकार वंश-क्रम के अन्तर्गत जीवित तथा मृत दोनों तरह की पीढ़ियों का समावेश होता है।

वंश-क्रम आगे की ओर बढ़ने वाली पीढ़ियों के बीच जनन सम्बन्धी सम्बन्धों को समझने के लिए एक सुविधाजनक शब्द है।

थॉमसन
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