राष्ट्रीय पाठ्यक्रम निर्माण 2005

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम निर्माण 2005 – मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा बुलाई गई राष्ट्रीय अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की कार्यकारिणी सभा में चिंतन किया गया कि राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा के पाठ्यक्रम 2000 में क्या सुधार किया जाए?

14 जुलाई से 19 जुलाई 2004 में बुलाई गई सभा में निर्णय लिया गया कि 21 वी शताब्दी के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में तैयार करने के लिए मैसूर, भोपाल, भुवनेश्वर, अजमेर और शिलांग में पांच सभाओं का आयोजन करके नया पाठ्यक्रम 2005 तैयार किया गया।

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम निर्माण 2005 उद्देश्य

पाठ्यक्रम में सभी एस सी ई आर टी के सचिव देश के सभी परीक्षा बोर्डों का सहयोग लिया गया। गहन अध्ययन के उपरांत विस्तार से तर्क वितर्क करके नए पाठ्यक्रम में निम्न सुझावों को ध्यान में रखकर 2005 का पाठ्यक्रम तैयार किया गया-

  1. संविधान मैं सुधार करके प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा को दिशा निर्देशक अधिकार की अपेक्षा मूल अधिकारों में सम्मिलित कर, माध्यमिक शिक्षा को निशुल्क और अनिवार्य किया जाए।
  2. परंपरागत विरासत तथा संस्कृति और आधुनिक संस्कृति एवं सभ्यता का पाठ्यक्रम में समन्वय किया जाए।
  3. पाठ्यक्रम को लचीला बनाया जाए जिसमें सामाजिक परिवर्तन वातावरण के अनुकूल घटाया और बढ़ाया जा सके।
  4. प्रजातांत्रिक सफलता के लिए नागरिकों के दिशा निर्देशक और मूल अधिकारों कर्तव्य और प्रजातांत्रिक भावना के विकास को सिद्धांतों में समावेश करना चाहिए।
  5. पाठ्यक्रम में सतत प्रक्रिया का सिद्धांत पाठ्यक्रम की विषय वस्तु सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का निरंतर और व्यापक मूल्यांकन करते रहना चाहिए।
  6. महिला अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अंग हीन और आर्थिक रूप से पिछड़े अल्पसंख्यक समुदाय सभी को शिक्षा के समान अवसर प्रदान किए गए हैं। क्षेत्र धर्म जाति आदि के आधार पर किसी प्रकार का शिक्षा में भेदभाव नहीं रखा गया। महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति आदि के विद्यार्थियों को आर्थिक सामाजिक सुविधाएं देकर माध्यमिक और उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
लार्ड कर्जन की शिक्षा नीति, मुदालियर आयोग, राष्ट्रीय पाठ्यक्रम निर्माण 2005
राष्ट्रीय पाठ्यक्रम निर्माण 2005
  1. पाठ्यक्रम को अब उत्पादन, व्यवसाय और व्यापार के साथ रोजगार परक बनाया गया है, जिससे शिक्षा प्राप्त के उपरांत बेरोजगारी का सामना न करना पड़े। पाठ्यक्रम में कृषि, फल उत्पादन, बागवानी, सब्जी उत्पादन, कार्यानुभव और हस्तकला को सम्मिलित किया गया है।
  2. पाठ्यक्रम में कार्यशालाओं, लघु उद्योग, धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक क्षेत्र, ऐतिहासिक स्थानों, अनुसंधान केंद्रों, देश विदेश की शिक्षण संस्थाओं का भ्रमण, एक दूसरे प्रांतों और विदेशी भ्रमण करके, ज्ञान में वृद्धि करना भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया है। जिससे विश्व के नागरिकों में मेल मिलाप और विश्वास बढ़े। उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, औद्योगिक, सभ्यता और संस्कृति का विकास हो।
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