राष्ट्रीय जनसंख्या नीति

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति – भारत में जनसंख्या वृद्धि के खतरों को महसूस करते हुए स्वतन्त्रता के बाद सन् 1952 से ही परिवार नियोजन कार्यक्रम आरम्भ किया गया। लगभग 10 वर्षों तक इस कार्यक्रम को अधिक प्राथमिकता नहीं दी गयी सन् 1961 की जनगणना के आंकड़े बहुत चौंकाने वाले थे। फलस्वरूप भारत सरकार ने सन् 1966 में एक पृथक् परिवार नियोजन विभाग की स्थापना की जिससे जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण लगाने के कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान दिया जा सके।

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति

इसके बाद भी सन् 1971 की जनगणना से यह स्पष्ट हुआ कि यहां जन्म दर और मृत्यु दर का अन्तर तेजी से बढ़ता जा रहा है। इस दशा में यदि जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाये गये तो विकास से सम्वन्धित सभी प्रयत्न असफल हो सकते हैं। फलस्वरूप अप्रैल, 1976 में पहली बार एक व्यवस्थित राष्ट्रीय जनसंख्या नीति घोषित की गयी। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की विशेषताएं अथवा लक्ष्य इस प्रकार हैं:

  1. परिवार कल्याण से सम्बन्धित सभी तरह की सेवाओं की निःशुल्क व्यवस्था करना।
  2. माताओं तथा बच्चों के स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यक्रमों को विशेष महत्व प्रदान करना।
  3. औपचारिक तथा अनौपचारिक माध्यमों के द्वारा स्त्रियों के शैक्षणिक स्तर में सुधार करना।
  4. लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष तथा लड़कों के विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष करना।
  5. सन् 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर विभिन्न राज्यों को केन्द्रीय सहायता और आर्थिक अनुदान प्रदान करना ।
  6. परिवार कल्याण कार्यक्रमों में राज्यों के प्रयत्नों के आधार पर केन्द्रीय सहायता का 8 प्रतिशत हिस्सा परिवार कल्याण कार्यों पर व्यय करने के लिए देना।
  1. जनसंख्या से सम्बन्धित शिक्षा पर अधिक ध्यान देना।
  2. प्रचार माध्यमों के द्वारा तथा राज्य सरकारों द्वारा परिवार कल्याण कार्यक्रमों को अपनाने की अधिक से अधिक प्रेरणा देना।
  3. परिवार कल्याण कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए ऐच्छिक संगठनों की सेवाओं का अधिक-से-अधिक लाभ उठाना।
  4. परिवार कल्याण कार्यक्रम के लिए सरकार अथवा मान्यता प्राप्त स्वयंसेवी संगठनों को व्यक्तियों द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता को आय कर से मुक्त करना ।
  5. प्रजनन तथा गर्भ निरोध से सम्बन्धित अनुसंधान कार्यों पर विशेष ध्यान देना।
  6. परिवार कल्याण कार्यक्रम से भारत सरकार तथा राज्य सरकारों के सभी मन्त्रालयों और विभागों को सम्बन्धित करना।
  7. राज्यों में परिवार कल्याण कार्यक्रम को सावधानीपयूँक लागू करना तथा केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल द्वारा विकास की समीक्षा करना

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के लागू होने के समय भारत में आपातकाल (इमरजेन्सी) की घोषणा की जा चुकी थी। फलस्वरूप उन सभी दम्पतियों को ‘लक्ष्य दम्पति’ घोषित कर दिया गया जिनके तीन सन्तानें थीं तथा जिनमें पति या पति की आयु 40 वर्ष से कम थी। ऐसे सभी दम्पतियों के लिए बन्ध्याकरण करवाना अनिवार्य कर दिया गया। इस नियम का उल्लंघन करने वाले सरकारी तथा अर्द्ध-सरकारी कर्मचारियों की वेतन वृद्धि रोक दी गयी। इससे उत्पीड़न की घटनाओं में भी वृद्धि हुई।

केवल वर्ष 1976-77 में 82.6 लाख व्यक्तियों का बन्ध्याकरण किया गया। इस दशा ने जनसाधारण में व्यापक असन्तोष को जन्म दिया। तत्कालीन सरकार के प्रति बढ़ते हुए विरोध के कारण सन् 1978 में पहली बार भारत में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। जनवरी, 1980 में कांग्रेस के पुनः सत्ता में आ जाने के फलस्वरूप सन् 1981 में जनसंख्या-नीति में संशोधन करके इसे देश के सामाजिक आर्थिक विकास के साथ जोड़ने के प्रयत्न किये गये।

बन्ध्याकरण को ऐच्छिक बनाकर प्रचार के द्वारा गर्भ निरोधक साधनों के अपनाने पर अधिक बल दिया जाने लगा। कानून के द्वारा लड़कों और लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाकर क्रमशः 21 वर्ष तथा 18 वर्ष कर दी गयी। सन् 1982 में जब विकास के लिए 20 सूत्री कार्यक्रम तैयार किया गया, तब परिवार कल्याण कार्यक्रम को उसी के एक अंग के रूप में स्वीकार कर लिया गया।

1. परम्परागत भारतीय सामाजिक व्यवस्था की आधारभूत विशेषताएं
1. भारतीय सामाजिक व्यवस्था के आधार
2. भारतीय समाज का क्षेत्रपरक दृष्टिकोण1. भारतीय समाज में विविधता में एकता
3. भारत का जनांकिकीय परिवेश1. भारतीय जनसंख्या के लक्षण
2. जनांकिकी
3. राष्ट्रीय जनसंख्या नीति
5. भारत में विवाह : हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई तथा जनजातीय1. विवाह के उद्देश्य व नियम
2. हिन्दू विवाह
3. मुस्लिम विवाह
4. हिंदू व मुस्लिम विवाह में अंतर
5. ईसाई विवाह
6. जनजातीय विवाह
6. भारत में परिवार तथा परिवर्तन की प्रवृत्तियां1. भारतीय संयुक्त परिवार
2. एकाकी परिवार
7. भारत में नातेदारी1. नातेदारी
2. पितृसत्ता
3. मातृसत्ता
4. वंश क्रम
5. वंश समूह
8. भारत में जाति व्यवस्था: परिप्रेक्ष्य, विशेषताएं एवं परिवर्तन के आयाम1. जाति अर्थ परिभाषा लक्षण

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 के अनुसार जनसंख्या के आकार को सीमित रखने के साथ ही जनसंख्या में गुणात्मक सुधार लाना आवश्यक समझा गया। इसका तात्पर्य है कि लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा के स्तर, जीवन अवधि तथा विवाह की आयु में सुधार लाकर लोगों की कार्य कुशलत को बढ़ाया जाये। इस नीति में तीन उद्देश्यों को प्राथमिकता दी गयी।

  1. तात्कालिक उद्देश्य अर्थात् गर्भ निरोधक तरीकों का विस्तार करने के साथ ही स्वास्थ्य सम्वन्धी सुविधाओं में वृद्धि करना
  2. अल्पकालिक उद्देश्य अर्थात् सन् 2010 तक जन्म-दर में कमी करना।
  3. उद्देश्य अर्थात् सन् 2045 तक जनसंख्या वृद्धि को स्थिर विन्दु तक बना जिससे देश का तेजी से आर्थिक विकास किया जा सके।

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 में 14 उद्देश्यों का समावेश किया गया जिनमें माताओं तथा शिशुओं के लिए स्वास्थ्य सेवाओं, 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा, टीकाकरण, विवाह की आयु में वृद्धि, संक्रमित बीमारियों की रोकथाम, परिवार कल्याण कार्यक्रम का विस्तार तथा बच्चे के जन्म के समय माताओं की मृत्यु दर में कमी आदि प्रमुख हैं।

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति को व्यावहारिक रूप देने के लिए एक ‘राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग का गठन किया गया। इस आयोग के अध्यक्ष प्रधानमन्त्री है, जबकि इसमें विभिन्न मन्त्रालयों के मन्त्रियों, प्रदेश के मुख्यमन्त्रियों, लोक सभा और राज्य सभा में विपक्ष के नेता एवं विभिन्न नेताओं सहित 100 सदस्यों को सम्मिलित किया गया है। इस आयोग का कार्य नयी जनसंख्या नीति के क्रियान्वयन की समीक्षा करना और इस बारे में सम्बन्धित विभागों को आवश्यक निर्देश देना है।

ऐसा अनुमान है कि भारत में परिवार कल्याण कार्यक्रम के द्वारा जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाने के लिए जो प्रयत्न किये गये, उनके फलस्वरूप अब तक लगभग 22 करोड़ अतिरिक्त बच्चों के जन्म को रोकना सम्भव हो सका है। यह भी अनुमान है कि आज बच्चों के जन्म दे सकने योग्य लगभग 45 प्रतिशत दम्पति परिवार कल्याण के विभिन्न साधनों का लाभ उठा रहे हैं। इसके बाद भी भारत में शिक्षा और सामाजिक जागरूकता की कमी होने तथा अधिकांश व्यक्तियों का जीवन-स्तर बहुत निम्न होने के कारण जन्द-दर को आशा के अनुकूल कम करने में सफलता नहीं मिल सकी है।

guest

0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments