राज्य अर्थ परिभाषा

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहने के लिए राज्य की आवश्यकता होती है। राज्य शब्द को अंग्रेजी भाषा में State कहा जाता है। अंग्रेजी शब्द State लैटिन भाषा के Status से निकला है ‘Status’ का प्रयोग किसी व्यक्ति या व्यक्ति समूह के सामाजिक स्तर का बोध कराने के लिए होता होगा परन्तु इसके अर्थ में परिवर्तन होता चला गया और सिसरो (106-63 ई. पू.) के समय से इसका अर्थ सम्पूर्ण समाज का स्तर हो गया।

चीन स्थिति भूवैज्ञानिक संरचना

राजनीतिक शब्दावली में स्टेट शब्द का प्रयोग 16वीं शताब्दी के प्रारम्भ में पुनर्जागरण यूरोप में हुआ। प्राचीन यूनान और रोम के लेखकों ने इसका आधुनिक अर्थ में प्रयोग नहीं किया ‘स्टेट’ शब्द का प्रयोग इटली में हो रहा था जहाँ मैकियावेली (1469-1527 ई.) ने अपने ग्रंथ प्रिंस में स्टेट शब्द का प्रयोग गणराज्यों व जागीरों या वंशानुगत राजतंत्रों का वर्णन करते समय किया। 16वीं शताब्दी में फ्रांस में Etat और अंग्रेजी में State शब्द प्रचलन में आए। तब से राजनीति समाज के लिए सार्वभौमिक रूप से इस शब्द का प्रयोग होने लगा।

राज्य परिभाषा

अरस्तू से लेकर आधुनिक विचारों ने राज्य की परिभाषा अपने-अपने विचार से दी है –

“राज्य परिवारों तथा ग्रामों का एक ऐसा समुदाय है जिसका उद्देश्य आत्मनिर्भर जीवन की प्राप्ती है।’

अरस्तू

“राज्य उस समुदाय को कहते हैं जिसमें यह भावना विद्यमान रहती है कि सब मनुष्यों को उस समुदाय के लाभों का मिलन उपयोग करना है।’

सिसरो

किसी निश्चित भू-भाग में राजनीतिक दृष्टि से संगठित व्यक्तियों को राज्य कहा जा सकता है।

“राज्य समुदाय के रूप में श्रेष्ठतम इकाई है।”

बोंदा
अल्पविकसित देश की व्यवस्था

राज्य के उद्देश्य

“मानव समाज का कल्याण और सम्पत्ति की रक्षा ही राज्य का उद्देश्य है।

लॉक के अनुसार

स्मिथ के अनुसार राज्य के उद्देश्य निम्न हैं-

  1. अन्य स्वतन्त्र राज्यों के आक्रमण से रक्षा करना।
  2. सभी सदस्यों के अन्याय व अत्याचार से रक्षा करना।
  3. जनहितकारी कार्य व जनहितकारी संस्था का निर्माण करना।

बर्गेस के अनुसार राज्य के उद्देश्य निम्न हैं-

  1. शांति, सुरक्षा व न्याय की स्थिति उत्पन्न करना।
  2. राष्ट्रीयता का विकास, राष्ट्रीय प्रतिभा शक्ति की वृद्धि करना।
  3. सम्पूर्ण मानव सभ्यता का विकास करना।

राज्य के उद्देश्य के सम्बन्ध में विचारकों ने जो भी मत दिये हैं उसमें से कुछ ऐसे उद्देश्य है। जिसके बारे में सभी एकमत है। अतः इस प्रकार राज्य के निम्न उद्देश्य है-

  1. शान्ति व सुरक्षा की स्थापना करना – सभी विचारकों ने यह माना है कि राज्य ऐसी परिस्थियाँ उत्पन्न करें जो राज्य में रहने वाले नागरिकों के लिए शांति व सुरक्षा की स्थापना करे जिससे मानवीय जीवन सुखमय व सुरक्षित रह सके।
  2. सामूहिक हित सम्बन्धी कार्य करना – चूँकि आज का मानव इतना व्यस्त है कि उसका जीवन समस्याओं व जटिलता से भरा हुआ है। ऐसी स्थिति में राज्य का यह कर्तव्य बन जाता है कि उसकी सुविधा के लिए यातायात, डाक व्यवस्था व मुद्रा एवं उद्योगों की स्थापना राज्य स्वयं करे जिससे मानव का जीवन उन्नति की ओर अग्रसर हो सके।
  3. राज्य व व्यक्ति के बीच सम्बन्धों की स्थापना – राज्य को ऐसी स्थिति का निर्माण करना चाहिए जिससे कि राज्य व व्यक्ति के बीच उचित सम्बन्ध स्थापित हो सके तथा उनमें सामंजस्य बना रहे।
Political Science

राज्य के तत्व

जनसंख्या

किसी भी मानवीय संस्था की रचना के लिए जनसंख्या का अस्तित्व सबसे आवश्यक तत्व है। राज्य भी एक मानवीय समुदाय है। मनुष्य ही राज्य का निर्माण करते हैं। व्यक्तियों के बिना राज्य का अस्तित्व सम्भव नहीं है। ब्लंटशाली राज्य के व्यक्तित्व का आधार जनता में निहित है। राज्य के निर्माण के लिए कितनी जनसंख्या होनी चाहिए इस सम्बन्ध में विचारकों के मत अलग-अलग है।

निश्चित भू-भाग

यह राज्य का दूसरा आवश्यक तत्व है, जब तक जन निश्चित प्रदेश पर निवास नहीं करता वह राज्य नहीं बन सकता। भूमि के बिना राज्य का अस्तित्व नहीं है। राज्य संगठित मनुष्यों का समुदाय होता है। अतः इनको रहने के लिए निश्चित भू-भाग की आवश्यकता होती है। राज्य के पास भूमि कितनी हो इस पर विचारकों के मतों में विभिन्नता है।

सरकार

यदि जनसंख्या राज्य का व्यक्तिगत तत्व है और प्रदेश राज्य का भौतिक तत्व तो सरकार राज्य का संगठनात्मक तत्व है। यह राजनीतिक संगठन या सरकार का एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा राज्य के लक्ष्य, नीतियों को क्रियान्वित किया जाता है।

राजनीति विज्ञान इतिहास संबंध, राजनीतिशास्त्र, राज्य

सम्प्रभुता

सम्प्रभुता को राज्य का प्राण कहा जा सकता है। गैटेल के अनुसार सम्प्रभुता ही राज्य का लक्षण है जो उसे अन्य समुदायों से अलग करता है। राज्य की सम्प्रभुता से हमारा तात्पर्य है कि राज्य आन्तरिक रूप से उच्चतम हो अर्थात् क्षेत्र में स्थित सभी व्यक्तियों एवं समुदायों को आज्ञा प्रदान कर सके तथा उसका पालन करा सके। वह बाह्य नियंत्रण से मुक्त हो।

सम्प्रभुता राज्य का अन्तिम आवश्यक तत्व है। सम्प्रभुता से हमारा आशय है कि यह राज्य को प्राप्त सर्वोच्च शक्ति है जो राज्य को स्वयंप्रभु (Supreme) बनाती है। यह स्वयं को आतंरिक और बाह्य क्षेत्रों में अभिव्यक्त करती है। स्वयंप्रभु होने की दशा में ही राज्य का निर्माण पूर्ण होता है। आन्तरिक दृष्टि से सम्प्रभुता का तात्पर्य है राज्य की सीमाओं के अन्तर्गत सभी मनुष्यों या मनुष्यों के समूहों या समुदायों, मनुष्यों पर व्यक्तिगत रूप से ही नहीं वरन उनके आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, कलात्मक, साहित्यिक सभी प्रकार के अन्य समुदाय को नियमित नियंत्रित बाह्य और दण्डित करने की सर्वोच्च शक्ति राज्य को प्राप्त होनी चाहिए।

राज्य भूमि की सीमाओं में जो भी पदार्थ प्राप्त होते हैं उन पर भी राज्य के शासन और अधिकार को सर्वोपरि होना चाहिए। बाहा दृष्टि से सम्प्रभुता का तात्पर्य सम्पूर्ण स्वतन्त्रता से होता है। बाह्य सम्बन्धों अर्थात् अन्य राज्यों से सम्बन्धों के क्षेत्र में राज्य किसी विदेशी राज्य या शक्ति से आदेश नहीं लेता है। वह अपनी स्वतन्त्रता विदेशी नीति का अनुसरण करता है अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में फिर भी राज्य संधियों, समझौतों और प्रतिबंधों को स्वीकार कर लेता है। परन्तु इससे बाह्य सम्प्रभुता खण्डित नहीं होती क्योंकि राज्य उन्हें अपनी इच्छा से स्वीकार करता है और जब चाहे उन्हें स्वीकार करने से मना कर सकता है।

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राज्य के कार्य

वर्तमान समय में राज्य में किए जाने वाले कार्यो को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं- 1. अनिवार्य कार्य 2. ऐच्छिक कार्य

राज्य के अनिवार्य कार्य

आन्तरिक क्षेत्र में शांति व व्यवस्थाराज्य का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है शांति और व्यवस्था की ऐसी परिस्थितियों उत्पन्न करना जिससे व्यक्ति अपना जीवन सुरक्षापूर्ण ढंग से व्यतीत कर सके। इन कार्यों में नागरिकों के जानमाल की सुरक्षा उपद्रवियों से सुरक्षा एवं उनकी अन्य समस्या जिससे देश की शांति भंग होने का डर हो इसका समाधान करना राज्य का कर्तव्य है। इस शान्ति को स्थापित करने के लिए वह चाहे तो पुलिस या न्याय का सहारा ले सकता है। ताकि राज्य में रहने वाले नागरिक अपने को सुरक्षित महसूस करें और राज्य में शांति बनी रहे।
उचित न्याय की व्यवस्थाउचित न्याय का प्रबन्ध करना राज्य का मुख्य कार्य है क्योंकि शांति व सुरक्षा तभी रहेगी जबकि राज्य में उचित न्याय का प्रबन्ध हो । एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से तथा व्यक्ति व राज्य के सम्बन्ध में उत्पन्न विवादों को निपटाने के लिए न्यायालय की स्थापना होनी चाहिए ताकि व्यक्ति भय व आतंक के साये से हटकर शांतिपूर्ण जीवन जी सके।
बाह्य आक्रमण से सुरक्षाराज्य अपने अस्तित्व की रक्षा तभी कर सकता है जब वह अपने राज्य की सीमाओं को बाह्य आक्रमण से बचाकर रखे और उसके लिए उसे अपने राज्य में सेना का निर्माण करना होगा। ये सेनाएँ जल, थल, वायु सेना रूप में राज्य की रक्षा करेंगी और तभी राज्य में रहने वाला व्यक्ति व राज्य दोनों ही सुरक्षित रह सकेंगे।
वैदेशिक सम्बन्धों का संचालन राज्य को चाहिए कि वह अपने राज्य के अन्य राज्यों के हित के लिए साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाकर रखे और इसलिए उसे वैदेशिक सम्बन्धों का संचालन करना होगा। पूर्व से वर्तमान तक सभी कालों में राज्य द्वारा राजदूतों को नियुक्त किया जाता है जो अपने राज्य से बाहर के राज्यों में जाकर अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करता है और उनसे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित रखें।
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राज्य के ऐच्छिक कार्य

शिक्षा का सम्बन्धशिक्षित मनुष्य ही एक सभ्य नागरिक होता है। अतः राज्य उचित शिक्षा का प्रबन्ध करे क्योंकि शिक्षा के बगैर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं कर सकता है। राज्य को चाहिए कि वह नागरिकों की सुविधा व निर्धन छात्रों की सहायता के लिए निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करें। इसके साथ-साथ औद्योगिक व व्यावसायिक शिक्षा पर भी बल दें। राज्य में पुस्तकालय, वाचनालय की स्थापना करें।
स्वास्थ्य की रक्षा व सफाई का प्रबन्धस्वास्थ्य एक मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी है। जब तक मनुष्य मानसिक, शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं होगा उसका जीवन व्यर्थ ही लगता है और इसका तात्पर्य है कि स्वास्थ्य ही जीवन का आनन्द है।
मनोरंजन की व्यवस्थाराज्य को चाहिए कि स्वस्थ मनोरंजन की व्यवस्था करें क्योंकि जब व्यक्ति का मन प्रसन्न होगा तो उसका मन मस्तिष्क दोनों स्वस्थ रहेगा और वह मानसिक रूप से सुखी होगा जो राज्य के हित में है।
कृषि की उन्नति एवं ग्राम विकास के कार्यराज्य को अपने राज्य के अन्दर जो गाँव है उनका विकास करके शहर से जोड़ना चाहिए ताकि ग्रामीण जनता भी वर्तमान दुनिया में होने वाले कार्यों से भली-भाँति जुड़ सके गाँव में भी नाली, पानी व बिजली की व्यवस्था करनी चाहिए तथा ग्रामीण संगठनों का निर्माण करना चाहिए।
यातायात के साधनों का प्रबन्धआज का युग रफ्तार व तेजी का युग है। कोई भी देश यातायात के साधनों के बगैर आगे नहीं बढ़ सकता। अतः राज्य को सड़क, रेल, हवाई जहाज व अन्य। साधनों का उचित प्रबन्ध करना चाहिए जिससे आर्थिक विकास हो सके और राज्य दूसरे राज्य से सम्बन्ध भी स्थापित कर सके और यह तभी सम्भव है जब राज्य में उचित यातायात का प्रबन्ध होगा।
श्रमिकों का कल्याणराज्य को चाहिए कि वह श्रमिकों के कल्याण हेतु कार्यों व कानूनों का निर्धारण करें, बाल श्रम पर रोक लगाएं तथा फैक्ट्री कानून व न्यूनतम मजदूरी कानून आदि का निर्माण करें ताकि कोई भी पूँजीपति या जमींदार किसी श्रमिक का शोषण न कर सके।
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