यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन

प्राचीन काल से ही भारत का विदेशों से संपर्क रहा है। 16 वीं शताब्दी से भारत से व्यापार करने के लिए यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन प्रारम्भ हुआ। जिसमें पुर्तगाली ,डच ,फ्रांसीसी और ब्रिटिश प्रमुख थे। प्रथम मार्ग फारस की खाड़ी से होता हुआ समुद्र मार्ग का जिस मार्ग से इराक तुर्की वेनिस और जिनेवा से व्यापार होता था। दूसरा मार्ग लाल सागर से अलेक्जेंड्रिया का था जहां से समुद्र द्वारा वेनिस और जिनेवा को जाया जाता था।

तीसरा मार्ग मध्य एशिया से मिस्र और फिर यूरोप के लिए था। इस प्रकार से यूरोप के सभी क्षेत्रों में भारत की वस्तुओं के वितरण के लिए वेनिस और जिनेवा प्रमुख व्यापारिक केंद्र थे। इटली ने भारत की प्रमुख वस्तुओं के व्यापार पर अपना एकाधिकार जमाए रखने के लिए यूरोप की शक्तियों की व्यापार में हिस्सेदारी को रोक दिया।

CSJMU BEd Semester IV Syllabus
यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन

यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन

15 वी सताब्दी (1453) में कुस्तुनतुनिया पर तुर्कों ने अपना अधिकार कर लिया। अब तुर्कों ने यूरोप और भारत के मध्य पुराने सभी संचार के माध्यमों को बंद कर दिया। कुस्तुनतुनिया नगर व्यापार मार्ग का मुख्य द्वार था। अतः व्यापार के लिए यूरोप के लिए यूरोप के व्यापारियों को कुस्तुनतुनिया नगर पार करना ही पड़ता था।लेकिन तुर्कों द्वारा मार्ग पर कब्जा होने के कारण यूरोप और भारत के मध्य व्यापार को बहुत धक्का लगा।

समुद्री मार्ग की खोज

अब यूरोप वासियों ने व्यापार के लिए नए समुद्री मार्ग की खोज करना आरंभ कर दिया । इन जगहों की खोज मात्र संभावनाओं के आधार पर थी,इसलिए कुछ नाविकों ने यूरोप के उभरते राज्यों के महत्व से राजाओं और रानियों को धन, धर्म और ध्वज के सपने दिखाए। धन-राज्य की आमदनी के लिए खजाना इकट्ठा करना, कीमती धातु सोनां चांदी आदि मसाले के फायदेमंद व्यापार से कर एकत्रित करने की संभावना थी।

  • धर्म-ईसाई धर्म का दूर -दराज इलाकों में प्रचार करना।
  • ध्वज-यूरोप के राष्ट्रों का झंडा दूर-दूर के उपनिवेशो पर फहराए जिससे उसका साम्राज्य बढ़ेगा ।
  • यूरोप के राजाओं ने इन नाविकों की समुद्री यात्राओं का खर्चा वहन किया।
अल्पविकसित देश की व्यवस्था
यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन

इसके नाविकों ने कुतुबनुमा की सहायता से रास्तों की खोज में लंबी समुद्री यात्राएं की। कुतुबनुमा के द्वारा दिशाओं का ज्ञान होता है। भारत की खोज में निकले स्पेन निवासी कोलंबस ने अमेरिका की खोज की। पुर्तगाल निवासी वास्कोडिगामा अपनी लंबी जलयात्रा के दौरान अफ्रीका के दक्षिणी छोर से होते हुए भारत के पश्चिमी समुद्र तट के कालीकट बंदरगाह (1498) पर पहुंच गया। अब पुर्तगालियों को हिंद महासागर होते हुए पूर्वी द्वीप समूह का नया जलमार्ग मिल गया। अब यूरोप और भारत के मध्य व्यापार पुनः आरंभ हो गए।

पुर्तगालियों ने हिंद महासागर के माध्यम से होने वाले व्यापार पर अपना अधिकार कर लिया। वे सोना चांदी लाते और हमारे देश से सूती रेशमी कपड़े और विभिन्न मसाले ले जाते थे और बहुत मुनाफा कमाते थे । पुर्तगाल की मजबूत नौसेना के कारण हिंद महासागर से कोई दूसरा देश पुर्तगाल की इजाजत के बिना अपना जहाज नहीं ले जा सकता था। वास्कोडिगामा के भारत पहुंचने के बाद एक-एक करके हॉलैंड,फ्रांस और इंग्लैंड के व्यापारी भारत आने लगे।

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भारत में यूरोपीय व्यापारियों की होड़

व्यापार के लिए धन, लंबी यात्रा करने वाले जहाज तथा नाविक तीनों साधनों का बहुत ही महत्व था।इन साधनों को प्राप्त करने के लिए कुछ अन्य यूरोपीय व्यापारियों ने 70 वीं शताब्दी की शुरुआत में (1600-1670 ईस्वी) के बीच व्यापारिक कंपनियां स्थापित की। व्यापारिक कंपनियों का अर्थ है-व्यापार में कई लोगों की हिस्सेदारी (शेयर )होती थी। सभी हिस्सेदार व्यापार में अपनी अपनी पूंजी लगाते थे लगाई गई पूंजी के अनुपात में व्यापार से प्राप्त मुनाफे को आपस में बांट लेते थे। हॉलैंड में डच ईस्ट इंडिया, कंपनी इंग्लैंड में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी बनी और फ्रांस में फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी बनी। आज भी निजी कंपनियां इसी प्रकार पूंजी इकट्ठा करती हैं।

भारत में सबसे पहले पुर्तगाली व्यापार करने आए। उन्होंने पश्चिमी समुद्र तट पर गोवा, दमन दीव मैं अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किए। विदेशी कंपनियों के इन व्यापारिक केंद्रों को कोठी (फैक्ट्री ) कहा जाता था। इस प्रकार यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन की शुरुआत हो चुकी थी।

चीन स्थिति भूवैज्ञानिक संरचना, यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन
यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन

फैक्ट्री की स्थापना (कोठी)

यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन का पहला चरण ही कोठी की स्थापना करना था। फैक्ट्री शब्द का प्रयोग व्यापारिक केंद्रों में स्थापित कार्यालय अथवा कोठी से है। फेक्टर शब्द का अर्थ एजेंट है। कंपनी की ओर से कार्य करने वाले व्यापारिक (एजेंट) जिस कोठी में कार्य करते थे उसी फैक्ट्री कहा जाता था। यूरोपीय की बस्तियों के लिए भी सैनिकरखे जाते थे कोठियों की रक्षा किलो की तरह होती थी और इन किलोकी तरह होती थी और इन किलो की सुरक्षा के लिए यूरोपीय व्यापारियों को सशस्त्र सैनिक तैनात रहते थे।

वास्कोडिगामा के भारत पहुंचने के बाद एक-एक करके हालैंड, इंग्लैंड और फ्रांस के व्यापारी जल के रास्ते भारत आने लगे। इस समय तक हिंदुस्तान के तो किसी भी शासक नैसेना तैयार करने की बात सोची तक नहीं।

हॉलैंड निवासियों ने, जो टच कहलाते है, कालीकट, कोचीन, नागापटनम तथा चिनसुरा में व्यापारिक केंद्र खोले। फ्रांसीसी ने मछलीपट्टनम, पांडिचेरी, चंद्रनगर, माही स्थानों में अपने व्यापार के मुख्य केंद्र बनाए। अंग्रेजों ने अपने को केवल समुद्र तट तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि सूरत, कैंबे, अहमदाबाद ,आगरा, भनोच,पटना, कासिम बाजार स्थानों पर व्यापारिक केंद्र बनाए। जिसने यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन को सुनिश्चहित ही कर दिया।

चीन स्थिति भूवैज्ञानिक संरचना
यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन

भारत में, यूरोप के सभी देशों के व्यापारी पुर्तगालियों के हाथ से व्यापार चीनी कीबोर्ड में लगे रहते थे। उनकी कोशिश रहती थी कि वह भारत में कम से कम कीमत देकर सामान खरीद सकें, फिर भी इन सामान को यूरोप में अधिक से अधिक दाम पर बेचकर खूब मुनाफा कमा सकें। उन्होंने पाया कि सूरत, मसूलीपट्टनम (मछलीपट्टनम) जैसे बड़े बंदरगाहों पर जो सामान व्यापारियों द्वारा बिकने लाया जाता है, वह महंगा मिलता है।इसलिए यूरोप के व्यापारी गांव गांव में अपना आदमी एजेंट भेज कर सीधे कारीगरों से माल खरीदने की कोशिश में रहते ताकि सस्ता माल मिले।

समय के साथ पुर्तगाली नौसेना और किलो की ताकत, अंग्रेज, दक्ष और फ्रांसीसीयो से कई मुकाबलों के कारण कमजोर पड़ गई। कुछ समय तक किसी एक का भारत के व्यापार पर अधिकार नहीं जम सका।

विदेशी कंपनियों ने व्यापार में लाभ के तरीके

यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन हो जाने के बाद उन्होंने कई ऐसे कदम उठाए जो की यादगार हो चुके है।

चीन सुदूर पूर्व एशिया
यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन
  • उन्होंने बादशाह व राजाओं के पास अपने अपने प्रतिनिधि या सैनिक भेजें और भारत में खुलकर व्यापार करने की इजाजत मांगी। अनुमति प्राप्त करने के लिए यह खुशामद भी किया करते थे फल स्वरुप राजाओं ने अधिकार पत्र फरमान जारी किए।
  • व्यापारियों व्यापारियों के सैनिकों सैनिकों ने कुछ करो को ना देने की छूट मांगी।
  • इसके इसके बदले में उन्होंने बादशाह व राजाओं को नवीन वस्तुएं भेंट की।

मुगल बादशाह जहांगीर के दरबार में कैप्टन हॉकिंग्स (1608) इसवी आने वाला प्रथम अंग्रेज राजदूत था। इसके बाद संत थॉमस रो (1615) इसवी जहांगीर के दरबार में आया जब उसने मुगल जहांगीर के दरबार की शान शौकत देखी तो वह उस से बहुत प्रभावित हुआ, उसने सम्राट को अंग्रेजी दस्ताने वेट किए और इंग्लैंड में इस्तेमाल की जाने वाली बग्गी दी, जिससे जहांगीर प्रसन्न हुआ। इस प्रकार यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन हुआ।

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