मानव का शारीरिक विकास

मानव का शारीरिक विकास मुख्य रूप से शैशवावस्था तथा बाल्यावस्था में ही हो जाता है। मानव विकास की मुख्य रूप से तीन अवस्थाएं हैं शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था।

शारीरिक विकास की गति स्थिर नहीं होती, वरन् पृथक् आयु अंतराल में भिन्न होती है।

मानव का शारीरिक विकास

शारीरिक विकास से तात्पर्य, सामान्य शारीरिक रचना, शरीर की ऊँचाई, भार, शारीरिक अवयवों का अनुपात, आंतरिक अंगों, हड्डियों तथा मांसपेशियों का विकास, स्नायु मंडल तथा मस्तिष्क तथा अन्तःस्रावी ग्रंथियों के विकास से है। इनमें से किसी भी एक अंग के विकास के कुंठित हो जाने से बालक के शारीरिक स्वास्थ्य पर ही प्रभाव नहीं पड़ता, वरन् उसका मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक, क्रियात्मक विकास आदि भी प्रभावित होता है।

क्योंकि बालक का शारीरिक विकास उसके अन्य सभी प्रकार के विकासों के साथ किसी न किसी रूप में सम्बन्धित होता है और इसी पर बालक का बौद्धिक, व्यावहारिक, संवेगात्मक तथा सामाजिक समायोजन मानव का शारीरिक विकास पर निर्भर करता है।

शैशवावस्था में मानव का शारीरिक विकास

मानव का शारीरिक विकास शैशवावस्था में निम्न प्रकार से होता है –

  1. भार – जन्म के समय और पूरी शैशवावस्था में बालक का भार बालिका से अधिक होता है जन्म के समय बालक का भार लगभग 7.15 पाउंड होता है जबकि बालिका का भार 7.13 पाउंड होता है। पहले 6 माह में शिशु का भार दुगना और 1 वर्ष के अंत में तिगुना हो जाता है।
  2. लंबाई – जन्म के समय और संपूर्ण शैशवावस्था में बालक की लंबाई बालिका से अधिक होती है। जन्म के समय बालको की लंबाई लगभग 20.5 इंच और बालिका की लंबाई 20.3 इंच होती है। अगले 3 या 4 वर्षों में बालिकाओं की लंबाई बालकों से अधिक हो जाती है। उसके बाद बालकों की लंबाई बालिकाओं से आगे निकलने लगती है।
  3. सिर व मस्तिष्क – नवजात शिशु के सिर की लंबाई उसके शरीर की कुल लंबाई की एक बटे चार गुनी होती है। पहले 2 वर्षों में सिर बहुत ही व्यक्ति से बढ़ता है पर उसके बाद गति धीमी हो जाती है। जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क का भार 350 ग्राम होता है और शरीर के भार के अनुपात में अधिक होता है।
  4. हड्डियां – नवजात शिशु की हड्डियां छोटी और संख्या में 270 होती हैं। संपूर्ण शैशवावस्था में यह छोटी, कोमल, लचीली और भली प्रकार जुड़ी हुई नहीं होती है। यह कैल्शियम फास्फेट और खनिज पदार्थों की सहायता से दिन प्रतिदिन कड़ी होती चली जाती हैं। इस प्रक्रिया को अस्थिकरण कहते हैं।
  5. दांत – छठे माह में शिशु के अस्थाई या दूध के दांत निकलने आरंभ हो जाते हैं। सबसे पहले नीचे के अगले दांत निकलते हैं और 1 वर्ष की आयु तक उनकी संख्या 8 हो जाती है तथा लगभग 4 वर्ष की आयु तक शिशु के दूध के सभी दांत निकल आते हैं।
  6. अन्य अंग – नवजात शिशु की मांसपेशियों का भार उसके शरीर के कुल भार का 23 परसेंट होता है। यह भार धीरे धीरे बढ़ता चला जाता है। जन्म के समय हृदय की धड़कन कभी तेज और कभी धीमी होती है। जैसे जैसे हृदय बड़ा होता चला जाता है वैसे वैसे धड़कन में स्थिरता आती जाती है।

बाल्यावस्था में मानव का शारीरिक विकास

मानव का शारीरिक विकास बाल्यावस्था में निम्न प्रकार से होता है –

  1. भार – बाल्यावस्था में बालक के भार में पर्याप्त वृद्धि होती है। 12 वर्ष के अंत में उसका भार 80 से 95 पौंड के बीच में होता है। 9 या 10 वर्ष की आयु तक बालकों का भार बालिकाओं से अधिक होता है। इसके बाद बालिकाओं का भार बालकों से अधिक होना आरंभ हो जाता है।
  2. लंबाई – बाल्यावस्था में 6 या 12 वर्ष तक शरीर की लंबाई कम बढ़ती है। इन सब वर्षों में लंबाई लगभग 2 या 3 इंच ही बढ़ती है।
  3. सिर व मस्तिष्क – बाल्यावस्था में सिर के आकार में क्रमशः परिवर्तन होता रहता है। 5 वर्ष की आयु में शेर आकार का 90% और 10 वर्ष की आयु में 95% होता है। बालक के मस्तिष्क के भार में भी परिवर्तन होता रहता है। नव वर्ष की आयु में बालक के मस्तिष्क का भार उसके कुल शरीर के भार का 90% होता है।
  4. हड्डियां – बाल्यावस्था में हड्डियों की संख्या और अस्थि करण में वृद्धि होती रहती है इस अवस्था में हड्डियों की संख्या 270 से बढ़कर 350 हो जाती है।
  5. दांत – लगभग 6 वर्ष की आयु में बालक के दूध के दांत गिरने और उसके बजाय स्थाई दांत निकलने आरंभ हो जाते हैं। 12 या 13 वर्ष तक उसके सब स्थाई दांत निकल आते हैं जिनकी संख्या लगभग 32 होती है। बालिकाओं के स्थाई दांत बालकों से जल्दी निकलते हैं।
  6. अन्य अंग – इस अवस्था में मांस पेशियों का विकास धीरे-धीरे होता है। नव वर्ष की आयु में बालक की मांसपेशियों का भार उसके शरीर के कुल भार का 27 परसेंट होता है। हृदय की धड़कन की गति में निरंतर कमी होती जाती है। 12 वर्ष की आयु में धड़कन 1 मिनट में 85 बार धड़कती है। बालक के कंधे चौड़े को ले पतले और पैर सीधे और लंबे होते हैं। 11 या 12 वर्ष की आयु में बालक और बालिकाओं के यौन अंगों का तीव्र विकास होता है।
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