समाजशास्त्रीय अध्ययन के मानविकी उन्मेष का तात्पर्य सामाजिक घटनाओं का इस तरह अध्ययन करना है जिससे जटिल और परिवर्तनशील मानवीय सम्बन्धों और विभिन्न प्रकार के व्यवहारों को उनकी पृष्ठभूमि एवं कुछ विशेष अर्थों के सन्दर्भ में समझा जा सके। ऐसे अध्ययन पूरी तरह वस्तुपरकता पर जोर न देकर अध्ययन की विषयपरकता (Subjectivity) को भी महत्वपूर्ण मानते हैं।

इनके अनुसार समाजशास्त्रियों का मुख्य दायित्व आज के बदलते हुए समाज में दिन-प्रतिदिन की समस्याओं, मुद्दों और घटनाओं को इस तरह समझना है जिससे समाज के छोटे और कमजोर वर्गों के अध्ययन में हमारी रुचि बढ़ सके। मानविकी उन्मेष से प्रभावित विद्वान समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए नैतिक तटस्थता को उतना महत्वपूर्ण नहीं मानते जैसा कि इसे वैज्ञानिक उन्मेष से सम्बन्धित लेखकों ने आवश्यक मान लिया था। संक्षेप में, समाजशास्त्रीय अध्ययन के मानविकी उन्मेष से सम्बन्धित विशेषताओं और पक्षों को निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है।

मानविकी उन्मेष की प्रमुख विशेषताएं

मानविकी उन्मेष की प्रमुख विशेषताएं निम्न हैं-

  1. मानविकी उन्मेष वैज्ञानिक उन्मेष से भिन्न है। इसके अन्तर्गत वस्तुपरक (Objective) अध्ययन के साथ विषयपरक (Subjective) अध्ययन को भी महत्वपूर्ण माना गया। इसके अनुसार आनुभविक अध्ययनों पर आधारित कुछ आंकड़ों के द्वारा ही सामाजिक वास्तविकता को नहीं समझा जा सकता।
  2. मानविकी उन्मेष दिन-प्रतिदिन के जीवन से सम्बन्धित उन छोटी-छोटी घटनाओं तथा मानवीय व्यवहार के उन पक्षों के अध्ययन पर जोर देता है जो समाज के शोषित और कमजोर वर्गों के जीवन से सम्बन्धित होते हैं।
  3. मानविकी उन्मेष के अनुसार समाजशास्त्रीय अध्ययन से सम्बन्धित नैतिक तटस्थता की अवधारणा स्वयं में एक भ्रान्ति है। इसका कारण यह है कि सामाजिक अध्ययनकर्ता केवल साक्षात्कार पर आधारित कुछ सूचनाओं के आधार पर वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं दे सकता। समाजशास्त्रीय अध्ययन तभी उपयोगी और वास्तविकता के निकट हो सकते हैं जब एक अध्ययनकर्ता अपने विवेक से प्राप्त उत्तरों अथवा सूचनाओं की पृष्ठभूमि और उनकी वास्तविकता का मूल्यांकन करके कोई निष्कर्ष प्रस्तुत करें।
  4. मानविकी उन्मेष यह मानता है कि कोई भी सामाजिक तथ्य प्राकृतिक घटनाओं की तरह स्थिर नहीं होता। इस दशा में उन सिद्धान्तों तथा नियमों को उपयोगी नहीं माना जा सकता जिन्हें वैज्ञानिक उन्मेष के अन्तर्गत वृहत् और सर्वकालिक सिद्धान्त कहा जाता है।
  5. मानविकी उन्मेष में व्यक्तियों के विभिन्न व्यवहारों को उस अर्थ के सन्दर्भ में समझने पर अधिक बल दिया जाता है, जो अर्थ एक विशेष व्यवहार करने वाले व्यक्ति द्वारा स्वयं लगाया जाता है। इसी दशा को ‘वेबर ने ‘व्याख्यात्मक बोध’ (Interpretative Understanding) का नाम दिया।
  6. मानविकी उन्मेष में सहभागी अवलोकन, व्यक्तिगत जीवन के अध्ययन, व्यक्तिगत डायरियों तथा आत्मकथाओं आदि के आधार पर अध्ययन करने पर अधिक बल दिया जाता है। ऐल्विन गोल्डनर का यहां तक कथन है कि जिन वैज्ञानिक पद्धतियों के नाम पर हम एक अध्ययनकर्ता द्वारा तटस्थ रहकर वैज्ञानिक निष्कर्ष देने की बात करते हैं, वह स्वयं में एक अवैज्ञानिक विचार है। वास्तव में अवलोकन पर आधारित निष्कर्ष वास्तविकता के कहीं अधिक निकट होते हैं।
  7. मानविकी उन्मेष के अन्तर्गत सामाजिक वास्तविकता का सम्बन्ध केवल कुछ बड़े-बड़े सिद्धान्तों को प्रस्तुत करने से नहीं है। इसकी मान्यता है कि कोई ज्ञान अथवा अध्ययन तभी उपयोगी होता है जब उसका व्यावहारिक उपयोग किया जा सके।

मानविकी उन्मेष से सम्बन्धित प्रमुख उपागम

अव यह माना जाने लगा है कि सभी समाजशास्त्रीय अध्ययनों की प्रकृति प्राकृतिक अध्ययनों की तरह वैज्ञानिक नहीं हो सकती। सामाजिक घटनाओं का मानविकी परिप्रेक्ष्य वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य के समान ही महत्वपूर्ण है। इस दशा में सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के लिए जो विभिन्न उपागम विकसित हुए, उनमें चार उपागम अधिक महत्वपूर्ण हैं। इन्हें हम लोकपद्धतिशास्त्र, प्रघटनाशास्त्र, प्रतीकात्मक अन्तर्क्रियावाद तथा आमूल परिवर्तनवाद कहते हैं। संक्षेप में मानविकी उन्मेष की प्रकृति को निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है—

  1. लोकपद्धतिशास्त्र
  2. प्रघटनाशास्त्र
  3. प्रतीकात्मक अन्तर्क्रियावाद
  4. आमूल परिवर्तनवाद

1. लोकपद्धतिशास्त्र

लोकपद्धतिशास्त्र अध्ययन का एक विशेष तरीका है। इसके द्वारा यह समझने का प्रयत्न किया जाता है कि विभिन्न लोग अपने चारों ओर की घटनाओं को किस दृष्टि से देखते हैं, उसके बारे में किस तरह से सोचते-विचारते हैं और एक विशेष अर्थ उगाते हैं। इसके लिए व्यक्तियों द्वारा दिन-प्रतिदिन के जीवन में जिन तरीकों का उपयोग किया जाता है अध्ययन के उसी तरीके को लोकपद्धतिशास्त्र अथवा लोकजीवन-पद्धति कहा जाता है। आप मानविकी उन्मेष के उपागम hindibag पर पढ़ रहे है।

अध्ययन के इस उपागम के लिए एथनोमैथाडोलॉजी शब्द का प्रयोग सबसे पहले अमरीकी विद्वान हैरॉल्ड गारफिन्केल ने किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस नृजाति अथवा लोकपद्धतिशास्त्र का सम्बन्ध अध्ययन के उस तरीके से है जिसके द्वारा विभिन्न लोग सामान्य ज्ञान पर आधारित अपने स्वयं के विवेक के द्वारा विभिन्न क्रियाओं और व्यवहारों को एक विशेष अर्थ देते हैं।

अध्ययन का यह उपागम क्योंकि लोक-जीवन या एक सांस्कृतिक समूह के रूप में जनसाधारण के जीवन से सम्बन्धित है, इसलिए इसे लोक-जीवन पद्धति कहा जाता है। इस पद्धति का काम यह जानना है कि किसी विशेष समाज में व्यक्ति तरह-तरह की क्रियाओं और व्यवहारों के दौरान विभिन्न प्रकार के संकेतों द्वारा उन्हें किस तरह का अर्थ प्रदान करते हैं। ऐसे शब्दों या उनसे सम्बन्धित अभिव्यक्ति का अर्थ घटना के अनुसार बदलता रहता है। इसका तात्पर्य है कि एक ही क्रिया अथवा व्यवहार का सन्दर्भ बदलने से उसका अर्थ बदल जाता है।

इस उपागम के समर्थक यह मानते हैं कि समाजशास्त्रीय अध्ययनों का काम उन नियमों की खोज करना है जिनके द्वारा हम एक विशेष सामाजिक व्यवस्था में व्यक्तियों के द्वारा किए जाने वाले व्यवहारों का अर्थ समझ सकें। दूसरे शब्दों में इस पद्धति का काम उस सामान्य ज्ञान की खोज करना है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी दिन-प्रतिदिन की क्रियाओं का एक विशेष अर्थ लगाते हैं। वास्तविकता यह है कि लोक पद्धतिशास्त्र के द्वारा पहले की तरह यह नहीं माना जाता कि हमारे सभी सामाजिक सम्बन्ध एक विशेष संरचना से बंधे हुए होते हैं। आप मानविकी उन्मेष के उपागम hindibag पर पढ़ रहे है।

इसके विपरीत, गारफिंकेल ने इस पुराने दृष्टिकोण से हटकर इस बात पर जोर दिया कि समाजशास्त्र में व्यक्ति के दैनिक जीवन से सम्बन्धित उन व्यवहारों और मानवीय घटनाओं का अध्ययन करना आवश्यक है जिन्हें कुछ समय पहले तक बेकार समझकर छोड़ दिया जाता था। वर्तमान में एंथोनी गन्स ने अपनी पुस्तक ‘द कॉन्स्टीट्यूशन ऑफ सोसाइटी’ (1984) में लोकपद्धतिशास्त्र को बहुत व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने का काम किया। इस प्रकार यह उपागम एक तरह से समाजशास्त्र के वैज्ञानिक उन्मेष को अधिक महत्वपूर्ण न मानकर मानविकी उन्मेष को अधिक महत्व देता है।

2. प्रघटनाशास्त्र (Phenomenology)

प्रघटनाशास्त्र अध्ययन की वह विधि है जिसके द्वारा किसी घटना के बारे में व्यक्ति के उन वास्तविक अनुभवों को जानने का प्रयत्न किया जाता है, जो तरह-तरह के पूर्वाग्रहों और मान्यताओं से प्रभावित न हों। दूसरे शब्दों में, समाज में विभिन्न घटनाएं जिस वास्तविक रूप में घटित होती हैं, उनके बारे में कर्ता के अपने अनुभवों और ज्ञान की जानकारी को ही हम प्रघटनाशास्त्र कहते हैं। इसका तात्पर्य है कि अध्ययन का यह तरीका विभिन्न घटनाओं की प्रकृति तथा अध्ययनकर्ता को परस्पर सम्बन्धित न मानकर उन्हें एक-दूसरे से अलग-अलग मानता है।

समाज में एक ही घटना को विभिन्न लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते हैं। इससे किसी घटना के वास्तविक रूप को समझना कठिन हो जाता है। इस आधार पर प्रघटनाशास्त्र यह मानता है कि जो कुछ हमें ऊपर से दिखाई देता है, उसका वास्तव में सत्य या यथार्थ होना आवश्यक नहीं होता। इसका कारण यह है कि अक्सर वास्तविकता पर कुछ पूर्व धारणाओं का आवरण पड़ा हुआ होता है। इस दशा में घटना की सत्यता को तभी समझा जा सकता है जब हम यह समझने का प्रयत्न करें कि कोई विशेष घटना किस रूप में घटित हुई।

अध्ययन का यह उपागम इस बात पर बल देता है कि व्यक्ति के कुछ अनुभव संयुक्त (Shared Experiences) होते हैं, जिसमें अन्य व्यक्तियों के विचारों और कल्पनाओं का भी समावेश होता है। दूसरी ओर, उसके कुछ अनुभव विशिष्ट (Unique Experiences) होते हैं जो दूसरे सभी लोगों से भिन्न होते हैं। इस दिशा में एक प्रघटना का अध्ययन उस रूप में किया जाना चाहिए जिसकी एक विशेष परिस्थिति या संरचना में एक विशेष पहचान हो। आप मानविकी उन्मेष के उपागम hindibag पर पढ़ रहे है।

इसे किसी विशेष परीक्षण के द्वारा नहीं समझा जा सकता। घटनाओं के वास्तविक रूप को हम तभी समझ सकते हैं जब हम यह देखने का प्रयत्न करें कि विभिन्न घटनाओं के बारे में मानव मस्तिष्क किस तरह काम करता है तथा विभिन्न घटनाओं के बारे में वह किस तरह के तर्कों का सृजन करता है। इस तथ्य को एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। नाटक में प्रत्येक पात्र को उसी तरह अभिनय करना पड़ता है जो भूमिका पहले से ही निर्धारित होती है।

दूसरी ओर खेल के मैदान में एक टीम का प्रत्येक खिलाड़ी अपने-अपने स्थान पर रहते हुए परिस्थिति के अनुसार एक विशेष ढंग से सोचने और खेलने के लिए स्वतन्त्र होता है। पहली दशा संरचनात्मक उपागम अथवा वैज्ञानिक उन्मेष से सम्बन्धित है, जबकि दूसरी दशा प्रघटनावादी उपागम से सम्बन्धित है जिसमें परिस्थिति के अनुसार व्यक्तियों के व्यवहारों में होने वाले परिवर्तन का अध्ययन किया जाता है। अध्ययन के इस उपागम को एक व्यवस्थित विधि के रूप में विकसित करने का काम जर्मन दार्शनिक एडमण्ड हस्सल और उनके शिष्य अल्फ्रेड शूज ने किया ।

3. प्रतीकात्मक अन्तर्क्रियावाद

आज समाजशास्त्र में प्रतीकात्मक अन्तर्क्रियावाद के अध्ययन को विशेष महत्व दिया जाने लगा है। प्रतीकात्मक अन्तर्क्रियावाद की मौलिक मान्यता यह है कि मनुष्य की अधिकांश क्रियाएं पूरी तरह से प्रत्यक्ष और स्पष्ट नहीं होतीं। व्यक्ति अपने विचारों और क्रियाओं को कुछ विशेष प्रतीकों के द्वारा अभिव्यक्त करता है तथा व्यक्ति की परिस्थितियों के सन्दर्भ में ही उसकी क्रियाओं के सही अर्थ को समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए, हमारे बारे में दूसरे लोग जैसा सोचते और अनुभव करते हैं, उन्हीं के अनुसार हमारी क्रियाओं और सामाजिक सम्बन्धों का रूप निर्धारित होता है।

कूले और मीड़ ने इसी बात को अपने सम्पूर्ण समाजशास्त्रीय विश्लेषण का आधार माना । परेटो (Pareto) ने भी इस बात पर जोर दिया कि सभी युगों और सभी समाजों में मनुष्य द्वारा जो क्रियाएं में की जाती रही हैं, उनमें से अधिकांश क्रियाओं का आधार तर्क न होकर कुछ मानवीय संवेदनाएं होती हैं । इस अर्थ में हमारी बहुत सी क्रियाएं अतार्किक होती हैं, लेकिन फिर भी यह क्रियाएं मानवीय व्यवहारों को प्रभावित करती हैं। इससे भी यह स्पष्ट होता है कि समाजशास्त्रीय अध्ययन में वैज्ञानिक आधार के साथ मानविकी आधार को भी महत्व देना आवश्यक है।

4. आमूल परिवर्तनवाद

अध्ययन का यह उपागम अपनी प्रकृति से मानवतावादी होने के कारण मानविकी उन्मेष से विशेष रूप से सम्बन्धित है। यूरोप में बढ़ती हुई नयी प्रौद्योगिकी के प्रभाव से सामाजिक संरचना तथा सामाजिक समस्याओं का जो नया रूप सामने आया, उसी के फलस्वरूप अध्ययन के इस उपागम का उदय हुआ। हार्टन, ड्यूच तथा मैक्डॉनेल्ड ने इस उपागम को ‘रेडिकल सोशियोलॉजी’ कहा। ऐल्विन गोल्डनर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द कमिंग क्राइसिस ऑफ वेस्टर्न सोशियोलॉजी’ में इस उपागम को ‘रिफ्लेक्सिय सोशियोलॉजी’ अथवा ‘प्रतिवर्ती समाजशास्त्र’ का नाम दिया।

इस उपागम के अनुसार समाजशास्त्र का मुख्य कार्य समाज के कमजोर, शोषित और अधिकार- विहीन वर्गों के अध्ययन पर अपना ध्यान केन्द्रित करके उनकी स्थिति में सुधार लाना है। रेडिकल समाजशास्त्री इस बात पर बल देते हैं कि संरचनात्मक प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य यह मानकर चलता है कि सामाजिक संरचना की सभी इकाइयों के अपने निर्धारित प्रकार्य होते हैं। तथा इन्हें बनाये रखने से ही सामाजिक जीवन संगठित रहता है। अप्रत्यक्ष रूप से यह यथास्थिति का समर्थन करता है।

इसके विपरीत आज की बदलती हुई दशाओं में समाज की संरचना में परिवर्तन लाकर ही एक ऐसे समाज का निर्माण किया जा सकता है, जो सभी तरह के शोषण और भेद-भाव से मुक्त हो। इसका तात्पर्य है कि आमूल परिवर्तनवादी उपागम की जड़ें संघर्ष सिद्धान्त से सम्बन्धित हैं। जिन समाजों में सांस्कृतिक तथा राजनीतिक आधार पर विभिन्न समूहों के बीच भेद-भाव करने का लम्बे समय से प्रचलन रहा है, उसमें आमूल परिवर्तनवादी उपागम के द्वारा ही मानवतावादी व्यवस्थाओं को मजबूत किया जा सकता है।

उपर्युक्त विवेचना का तात्पर्य यह नहीं है कि समाजशास्त्रीय अध्ययन को वैज्ञानिक न माना जाये अथवा समाजशास्त्र को एक विज्ञान के रूप में विकसित करने के प्रयत्न न किये जायें। यह पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि विज्ञान का सम्बन्ध घटनाओं का निष्पक्ष रूप से अध्ययन करके ऐसे सामान्य निष्कर्ष प्रस्तुत करना है जिससे वर्तमान के आधार पर भविष्य की घटनाओं का अनुमान लगाया जा सके। आप मानविकी उन्मेष के उपागम hindibag पर पढ़ रहे है।

समाजशास्त्र की अध्ययन-वस्तु स्वयं मनुष्य, उसकी सामाजिक क्रियाएं तथा मनुष्य द्वारा बनायी गयी संस्कृति और उस पर आधारित सामाजिक संरचना है। इन सभी में मानवीय तत्वों का समावेश है। दूसरी बात यह है कि मानविकी दृष्टिकोण भी स्वयं में एक वैज्ञानिक उपागम है। इसके अन्तर्गत हम मानव, उसकी परिस्थितियों तथा दृष्टिकोण का अध्ययन मनमाने रूप से न करके आनुभविक और निष्पक्ष रूप से करते हैं।

विज्ञान स्वयं आनुभविक और तार्किक होता है। इस आधार पर मानविकी दृष्टिकोण के आधार पर किये जाने वाले अध्ययन को भी अवैज्ञानिक नहीं कहा जा सकता। इससे स्पष्ट होता है कि समाजशास्त्रीय अध्ययन में वैज्ञानिक और मानविकी दृष्टिकोण का मिश्रण होने से ही समाजशास्त्र को अधिक उपयोगी और व्यावहारिक बनाया जा सकता है। आप मानविकी उन्मेष के उपागम hindibag पर पढ़ रहे है।

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