मातृसत्ता शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है। इसका पहला अर्थ इस सामान्य धारणा से मिलता-जुलता है कि मातृसत्ता सामाजिक संगठन का एक विशेष रूप है जिसमें परिवार की मुखिया कोई स्त्री होती तथा वंशक्रम माता की ओर चलता है। मार्शल ने समाजशास्त्र के शब्दकोश में लिखा है कि मातृसत्ता का दूसरा अर्थ उद्विकासीय सिद्धान्तों पर आधारित है।

उद्विकासीय सिद्धान्त की मान्यता को स्पष्ट करते हुए फ्रेड्रिक एंजिल्स ने अपनी पुस्तक ‘ओरिजिन ऑफ द फैमिली, प्राइवेट प्रापर्टी एण्ड द स्टेट’ में लिखा है कि प्रारम्भ के आखेटक समाजों में सम्पत्ति अधिकार जैसी कोई चीज नहीं थी तथा स्त्रियों द्वारा बच्चों को जन्म देने तथा उनके पालन-पोषण की व्यवस्था करने के कारण समाज का शासन स्त्रियों के हाथों में ही था। बाद में जब पुरुषों ने बच्चों के जन्म की वैधता के दृष्टिकोण से विचार करना आरम्भ किया तो धीरे-धीरे समाज में स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों के अधिकार बढ़ने लगे।

मातृसत्ता

समाज में मातृसत्ता से पितृसत्ता की ओर होने वाले परिवर्तन को ऐतिहासिक प्रमाणों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सका है। विश्व के विभिन्न भागों में मातृसत्ता तथा पितृसत्ता से सम्बन्धित व्यवस्था साथ-साथ देखने को मिलती है। इस दृष्टिकोण से यह आवश्यक है कि नातेदारी से सम्बन्धित एक विशेष व्यवस्था के रूप में मातृसत्ता की प्रकृति को समझा जाए।

मातृसत्ता का सम्बन्ध स्त्री-प्रधान सामाजिक व्यवस्था से है। यदि हम विभिन्न जनजातियों की संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था की ओर देखें तो ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं जो एक व्यवस्था के रूप में मातृसत्ता की प्राचीनता को स्पष्ट करते हैं। कुछ समय पहले तक भारत की अधिकांश जनजातियों में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक अधिकार अधिक थे।

बहुत-सी जनजातियों में परिवार की आर्थिक गतिविधियों का संचालन करना भी स्त्रियों के अधिकार क्षेत्र से सम्बन्धित था । जनजातीय समाजों द्वारा बाह समूहों की सांस्कृतिक विशेषताओं को ग्रहण करने से उनकी परम्परागत प्रस्थिति में परिवर्तन होने लगा, लेकिन एक व्यवस्था के रूप में मातृसत्ता से सम्बन्धित परम्पराएं आज भी प्रभावपूर्ण हैं। इस अर्थ में मातृसत्ता की प्रकृति को मातृसत्तात्मक समाज के सन्दर्भ में सरलतापूर्वक समझा जा सकता है।

मातृसत्तात्मक समाज वे हैं जिनमें बच्चे अपने कुल वंश का नाम माता से ग्रहण करते हैं, पिता से नहीं। इस व्यवस्था में वंश का नाम किसी पुरुष पूर्वज से भी सम्बन्धित हो सकता है, लेकिन यह पुरुष पिता के वंश से सम्बन्धित न होकर माता के वंश से सम्बन्धित होता है। इन समाजों में सभी से यह आशा की जाती है कि वे अपनी मां, नानी, नानी की मां तथा उसी पक्ष से सम्बन्धित स्त्री – पूर्वजों के नाम की रखें और उन्हीं के सन्दर्भ में अपना परिचय दें।

साधारणतया विवाह के बाद पुरुष अपनी पत्नी के निवास स्थान पर आकर रहता है, स्त्री को अपने पति के घर जाकर रहना अनिवार्य नहीं होता। इसका अर्थ यह नहीं है कि मातृसत्तात्मक समाज में पुरुषों की कोई भूमिका नहीं होती। वास्तविकता यह है कि ऐसे समाजों में भी आजीविका का प्रबन्ध मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा ही किया जाता है, लेकिन आर्थिक साधनों का वितरण करने में स्त्रियों के अधिकार पुरुषों से अधिक होते हैं।

मातृसत्ता की विशेषताएँ

परिवार में बच्चों की देखभाल और उनके प्रशिक्षण का काम उनके मामा के द्वारा किया जाता है, पिता के द्वारा नहीं। यह व्यवस्था भी मातृसत्ता के अन्तर्गत मातृपक्ष के महत्व को स्पष्ट करती है। मातृसत्ता से सम्बन्धित समाज में कुछ अन्य विशेषताएं इसकी अनुपमता को स्पष्ट करती हैं।

  1. मातृसत्ता में सम्पत्ति का अधिकार साधारणतया माता से उसकी पुत्रियों या भाई के पुत्रों को प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए, असम की खासी जनजाति में उत्तराधिकार मां से उसकी सबसे छोटी पुत्री को प्राप्त होता है तथा परिवार की स्त्री मुखिया की मृत्यु के बाद उसकी सबसे छोटी पुत्री को ही उसका दाह संस्कार करने का अधिकार मिलता है। इसके विपरीत असम की जयन्तिया पहाड़ों पर रहने वाली गारो जनजाति में सबसे बड़ी पुत्री को छोड़कर उत्तराधिकार किसी भी अन्य पुत्री को देने की परम्परा है।
  2. यदि कर्ता स्त्री के कोई पुत्री न हो, तब भी उत्तराधिकार उसके पुत्र को प्राप्त नहीं होता, बल्कि कर्ता स्त्री की बहन की पुत्री अथवा भाई की पुत्री को मिल जाता है।
  3. परिवार से सम्बन्धित सभी महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक निर्णयों में स्त्री के पति की तुलना में स्त्री के भाई को अधिक महत्व दिया जाता है।
  4. मातृसत्तात्मक परिवारों में स्त्रियों का जीवन तुलनात्मक रूप से कहीं अधिक स्वतन्त्र होता है। यही कारण है कि अनेक मातृसत्तात्मक समाजों में अक्सर स्त्रियों के पूर्व वैवाहिक तथा अतिरिक्त वैवाहिक यौन सम्बन्धों को भी अनुचित नहीं समझा जाता।
  5. बहुपति विवाह की परम्परा वास्तव में मातृसत्ता का ही एक विशेष रूप है। जिस तरह पितृसत्ता के अन्तर्गत पुरुषों द्वारा एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करने को अनुचित नहीं समझा जाता, उसी तरह मातृसत्ता वाली व्यवस्था में एक स्त्री के अनेक पति होने के उदाहरण मिलते हैं।
  6. वंश परम्परा तथा वैवाहिक मामलों में स्त्रियों की प्रधानता होने के फलस्वरूप मातृसत्ता के अन्तर्गत नातेदारी सम्बन्धों का निर्धारण भी मातृपक्ष की श्रेष्ठता को ध्यान में रखते हुए होता है।

मातृसत्ता के उदाहरण भारत में मातृसत्ता का स्पष्ट रूप खासी और जनजाति तथा मालाबार के नायरों में देखने को मिलता है। असम की खासी जनजाति मातृसत्तात्मक, मातृवंशीय और मातृस्थानीय है। इस जनजाति में सभी लोग अपनी वंश परम्परा किसी स्त्री पूर्वज से मानते हैं। विवाह के बाद पुरुष से यह अपेक्षा की जाती है कि यह अपनी पत्नी के परिवार में आकर रहे। पुरुष द्वारा उपार्जित सम्पत्ति पर भी स्त्रियों के अधिकार को प्रधानता दी जाती है।

पारिवारिक और सामाजिक जीवन में स्त्रियों का महत्व अधिक होने के कारण प्रत्येक खासी परिवार में कम-से-कम एक पुत्री के जन्म को आवश्यक समझा जाता है। असम की गारो जनजाति में भी मातृसत्ता का स्पष्ट रूप विद्यमान है। यहां सम्पत्ति के उत्तराधिकार के लिए माता द्वारा अपनी पुत्रियों में से किसी भी एक पुत्री को चुन लिया जाता है। जिस पुत्री को उत्तराधिकार मिलता है, नातेदारी व्यवस्था में उसके पति को विशेष सम्मान मिल जाता है तथा उसे ‘नोक्रोम’ शब्द से सम्बोधित किया जाने लगता है।

अन्य पुत्रियों के पतियों को ‘चोबारी’ कहा जाता है। इस जनजाति में एक पुरुष को दो या तीन स्त्रियों तक से विवाह करने की अनुमति दी जाती है, लेकिन इससे पुरुषों की श्रेष्ठता स्थापित नहीं होती। ऐसी अनुमति केवल इसलिए दी जाती है जिससे आवश्यकता पड़ने पर कोई पुरुष अपनी विधवा सास या उत्तराधिकार प्राप्त करने वाली विधवा साली से विवाह कर सके। साधारणतया स्त्री द्वारा जिस पुरुष से विवाह करने की इच्छा की जाती है, पुरुष द्वारा उस पर आपत्ति करना परम्परा की अवहेलना करने के रूप में देखा जाता है।

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मालाबार के नायरों की आर्थिक और सामाजिक प्रस्थिति जनजातियों से भिन्न होने के बाद भी यहां मातृसत्ता की परम्परा आज भी बनी हुई है। स्थानीय भाषा में नायर परिवारों को ‘तारवाड’ कहा जाता है। इन परिवारों की प्रकृति संयुक्त परिवारों की तरह होने के बाद भी यह मातृसत्तात्मक और मातृवंशीय होते हैं। इसके बाद भी खासी और गारो परिवारों की तुलना में नायर पुरुषों की प्रस्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर देखने को मिलती है।

साधारणतया एक नायर परिवार में मातृपक्ष की अनेक पीढ़ियों के सदस्य साथ-साथ निवास करते हैं तथा पुरुष को विवाह के बाद अपनी पत्नी के निवास स्थान पर जाकर रहना आवश्यक समझा जाता है। इसके साथ ही एक नायर पुरुष अपने पिता के परिवार में रहते हुए भी पत्नी से सम्बन्ध बनाए रख सकता है। यह सच है कि परिवार की सम्पत्ति का प्रबन्ध किसी पुरुष सदस्य द्वारा ही किया जाता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह पुरुष जिसे नायर परिवार में ‘कार्णवान’ कहते हैं, अपनी सबसे बड़ी बहन और दूसरी स्त्री सदस्यों की सहमति से ही आर्थिक क्रियाओं का संचालन करता है।

विशेष बात यह है कि सम्पत्ति का हस्तान्तरण मामा से भान्जे को प्राप्त होता है। इसका उद्देश्य सम्पत्ति को मातृ पक्ष तक ही सीमित रखना तथा उसे विभाजन से बचाना है। कोई भी सदस्य परिवार से अलग हो जाने पर उसकी सम्पत्ति का हिस्सेदार नहीं रहता। वर्तमान में नायर समुदाय की आर्थिक स्थिति में सुधार होने और बढ़ती हुई सामाजिक जागरूकता के कारण मातृसत्ता से प्रभावित व्यवस्था में तेजी से परिवर्तन होने लगा है।

पितृसत्ता तथा मातृसत्ता नातेदारी से सम्बन्धित ऐसी व्यवस्थाएं हैं जिनमें नातेदारी सम्बन्धों का रूप एक-दूसरे से भिन्न होता है। नातेदारी सम्बन्धों के अनुसार ही इन दोनों व्यवस्थाओं में वैवाहिक नियमों, नातेदारी शब्दावली के उपयोग उत्तराधिकार तथा उपहारों के आदान-प्रदान के रूप में एक स्पष्ट भिन्नता देखने को मिलती है। इसे भारत में नातेदारी व्यवस्था से सम्बन्धित आगामी विवेचन की सहायता से समझा जा सकता है।

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