मातृभाषा

सामान्यतः जिस भाषा को व्यक्ति अपने शिशु काल में अपनी माता एवं सम्पर्क में आने वाले अन्य व्यक्तियों का अनुकरण करके सीखता है, उसे उस व्यक्ति की मातृभाषा कहते हैं। परन्तु भाषा विज्ञान में इसे बोली कहा जाता है। भाषा वैज्ञानिक कई समान बोलियों की प्रतिनिधि बोली को विभाषा और कई समान विभाषाओं की प्रतिनिधि विभाषा को भाषा कहते हैं। और यही भाषा यथा क्षेत्र के व्यक्तियों की मातृभाषा मानी जाती है।

मातृभाषा

भाषा शिक्षण की दृष्टि से भी मातृभाषा से तात्पर्य इसी भाषा से होता है। प्रायोगिक दृष्टि से मनुष्य अपने परिवार अथवा क्षेत्र में मौखिक रूप से चाहे जिस विभाषा की चाहे जिस बोली का प्रयोग करता हो परन्तु लिखित रूप में वह इसी सर्वमान्य भाषा का प्रयोग करता है। और यही इस क्षेत्र के व्यक्तियों की मातृभाषा मानी जाती है। अब यदि हम मातृभाषा को परिभाषा में बांधना चाहें तो निम्नलिखित रूप में परिभाषित कर सकते हैं

किसी व्यक्ति की मातृभाषा से तात्पर्य उस सर्वमान्य भाषा से होता है जिसकी किसी विभाषा की किसी बोली को वह अपने शिशुकाल में अपने परिवार एवं समाज के बीच रहकर स्वाभाविक रूप से सीखता है और जिसके सर्व स्वीकृत स्वरूप को वह सप्रयास सीखता है।

भाषा के रूप

मातृभाषा का महत्त्व

मातृभाषा मनुष्य के विकास की आधारशिला होती है। इसके माध्यम से ही वह भावाभिव्यक्ति करता है, इसी के माध्यम से विचार करता है और इसी के माध्यम से विचार-विनिमय करता है। मातृभाषा सामाजिक व्यवहार एवं सामाजिक अन्तःक्रिया की भी आधार होती है। प्रायः सभी समाज अपनी शिक्षा का माध्यम भी मातृभाषा को ही बनाते हैं। शिक्षा का माध्यम होने के नाते यह अन्य भाषाओं एवं समस्त ज्ञान-विज्ञान को सीखने-सिखाने का साधन होती है।

इस प्रकार व्यक्ति एवं समाज दोनों के विकास में मातृभाषा की आधारभूत भूमिका होती है। मातृभाषा हिन्दी की तो एक और विशेषता है और वह यह कि यह हमारे देश की जन भाषा, सम्पर्क भाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा है। इतना ही नहीं अपितु कई प्रान्तों-दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार की भी राजभाषा है। इस प्रकार हमारे देश में मातृभाषा हिन्दी का महत्त्व और भी अधिक है। मातृभाषा के महत्त्व को हम अग्रलिखित रूप में क्रमबद्ध कर सकते हैं-

भाषा के रूप, मातृभाषा

अभिव्यक्ति का सरलतम माध्यम एवं मानव विकास की आधारशिला

मातृभाषा को बच्चे जन्म के कुछ दिन बाद ही सीखना प्रारम्भ कर देते हैं, इस भाषा पर उनका सहज अधिकार होता है। मनुष्य अपने भावों एवं विचारों की अभिव्यक्ति जितनी सरलता एवं सहजता से अपनी मातृभाषा के माध्यम से करते हैं उतनी सरलता और सहजता से किसी अन्य भाषा के माध्यम से नहीं। मातृभाषा मानव विकास की आधारशिला होती है।

शिक्षा का माध्यम एवं अध्ययन-अध्यापन की आधारशिला

मातृभाषा भावाभिव्यक्ति एवं विचार-विनिमय का सरलतम माध्यम होती है इसलिए प्रायः सभी समाज इसे अपने बच्चों की शिक्षा का माध्यम बनाते हैं। जिन क्षेत्रों की मातृभाषा शिक्षा के माध्यम हेतु सक्षम नहीं होती उन क्षेत्रों में भी प्रारम्भिक शिक्षा का माध्यम प्रायः उन क्षेत्रों की मातृभाषा को ही बनाया जाता है। इस प्रकार मातृभाषा अन्य भाषाओं एवं समस्त ज्ञान – विज्ञान को सीखने का साधन होती है, अध्ययन-अध्यापन की आधारशिला होती है।

भाषा के दो रूप, मातृभाषा का महत्व

बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक

बच्चों के विकास में सबसे अधिक भूमिका उसकी मातृभाषा और उसके साहित्य की होती है। आज हमारे देश में शिक्षा के द्वारा बच्चों की शारीरिक, मानसिक, वैयष्टिक एवं सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक एवं चारित्रिक और व्यावसायिक विकास करने पर सर्वाधिक बल दिया जा रहा है। इनके अतिरिक्त लोकतन्त्र और नागरिकता की शिक्षा और राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति पर भी बल है। इस समय राष्ट्रीय लक्ष्यों में जनसंख्या शिक्षा, पर्यावरण शिक्षा और वैज्ञानिक प्रवृत्ति का विकास मुख्य हैं। राष्ट्रीय एकता और अन्तर्राष्ट्रीय अवबोध समय की सबसे बड़ी मांगे हैं। कुछ शिक्षाविद् शिक्षा द्वारा बच्चों के आध्यात्मिक विकास पर भी बल देते हैं। इन सब उद्देश्यों की प्राप्ति में मातृभाषा और उसके साहित्य की मूल भूमिका होती है।

  1. मातृभाषा और बच्चों का शारीरिक विकास – शारीरिक विकास के लिए जितना आवश्यक पौष्टिक भोजन होता है उतना ही आवश्यक प्रसन्न चित्त रहना और पूरी नींद सोना होता है। मातृभाषा दूसरी आवश्यकता की पूर्ति में सहायक होती है। माताएँ शिशुओं को मातृभाषा में संगीतप्रधान ध्वनियों के उच्चारण द्वारा प्रसन्न करती हैं और निद्रामग्न कराती हैं। कहानी सुनने में तो बच्चों की स्वाभाविक रुचि होती है, कहानी सुनने में वे बड़ा आनन्द लेते हैं। बड़ा होने पर वे मातृभाषा साहित्य में भी रुचि लेते हैं और आनन्द की अनुभूति करते हैं। फिर मातृभाषा की पाठ्य पुस्तकों में स्वास्थ्य सम्बन्धी लेख होते हैं। इनके अध्ययन से बच्चे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होते हैं। जन-संचार के माध्यमों से स्वास्थ्य सम्बन्धी जो जानकारी दी जाती हैं वे भी मातृभाषा के माध्यम से दी जाती हैं। इस प्रकार मातृभाषा बच्चों के शारीरिक विकास में बहुत बड़ी भूमिका अदा करती है।
  2. मातृभाषा और बच्चों का मानसिक विकास – मानसिक विकास के लिए सबसे पहली आवश्यकता विचार-शक्ति की होती है। विचार तथा भाषा में अटूट सम्बन्ध होता है, विचार भाषा को जन्म देते हैं और भाषा विचारों को जन्म देती है। जिस व्यक्ति के पास जितनी सशक्त मातृभाषा होती है उतनी ही सशक्त उसकी विचार-शक्ति होती है। इतना ही नहीं अपितु मातृभाषा के माध्यम से ही बच्चे अन्य भाषाओं एवं ज्ञान-विज्ञान को सीखते हैं। इस प्रकार मातृभाषा बच्चों के मानसिक विकास में बड़ी सहायता करती है। महात्मा गाँधी बच्चों के मानसिक विकास के लिए मातृभाषा को उतना ही आवश्यक मानते थे जितना उनके शारीरिक विकास के लिए माता का दूध आवश्यक होता है।
  1. मातृभाषा और बच्चों का वैयष्टिक एवं सामाजिक विकास – बच्चे स्वतन्त्र रूप से जो भी विचार करते हैं, अपनी मातृभाषा में करते हैं, इससे उनके व्यष्टित्व का विकास होता है। मातृभाषा के माध्यम से ही वे सामाजिक व्यवहार और सामाजिक अन्तःक्रिया करते हैं और इस प्रकार उनका सामाजिक विकास होताहै। बच्चे प्रारम्भ में मातृभाषा-भाषी व्यक्तियों के ही सम्पर्क में आते हैं और उनसे मातृभाषा में ही विचार-विनिमय करते हैं। वे उन्हीं का अनुकरण करते हैं और उन्हीं के सामाजिक गुणों को ग्रहण करते हैं। मातृभाषा की पाठ्य पुस्तकों में संकलित लेख, कहानी, नाटक और कविताओं के माध्यम से भी बच्चों को सामाजिकता की शिक्षा मिलती है।
  2. मातृभाषा और बच्चों का सांस्कृतिक विकास – बच्चे सबसे पहले अपनी मातृभाषा सीखते हैं और फिर उसके माध्यम से विचार-विनिमय कर अपने समाज के व्यक्तियों के आचार-विचार को ग्रहण करते हैं। धीरे-धीरे वे लोकरीति सीखते हैं और लोक जीवन की शैली में ढलते हैं। बस यहीं से उनका सांस्कृतिक विकास शुरू हो जाता है। अपनी मातृभाषा की शिक्षा के साथ-साथ बच्चे अपनी मातृभाषा के साहित्य का भी अध्ययन करते हैं। इस साहित्य में उन्हें अपने समाज के इतिहास, दर्शन, सभ्यता एवं संस्कृति के दर्शन होते हैं। और वे अपनी संस्कृति की मूल मान्यताओं, विश्वासों और मूल्यों से परिचित होते हैं। वास्तविकता यह है कि मनुष्य के सांस्कृतिक विकास के दो ही मूल आधार हैं-एक लोकजीवन और दूसरा लोकसाहित्य (मातृभाषा साहित्य) ।
  1. मातृभाषा और बच्चों का नैतिक एवं चारित्रिक विकास – हम जानते हैं कि बच्चों के प्रारम्भिक जीवन में जो संस्कार विकसित होते हैं वे बड़े स्थायी होते हैं और वे ही उनकी नैतिकता और चरित्र को निश्चित करते हैं। इस काल में माताएँ अपने बच्चों को मातृभाषा के माध्यम से जो नीति एवं चरित्रप्रधान कहानियाँ सुनाती हैं उनसे बच्चों का नैतिक एवं चारित्रिक विकास होता है। मातृभाषा की पाठ्य-पुस्तकों में जो लेख, निबन्ध, कहानी और कविताएँ संकलित होती हैं उनके अध्ययन से भी बच्चे नैतिक एवं चारित्रित गुणों को ग्रहण करते हैं।
  2. मातृभाषा और बच्चों का व्यावसायिक विकास – प्रारम्भ में बच्चे जो कुछ भी सीखते हैं मातृभाषा के माध्यम से ही सीखते हैं। घरेलू उद्योगों की शिक्षा वे प्रायः अनुकरण द्वारा प्राप्त करते हैं और इसके सम्बन्ध में अपनी शंकाओं का समाधान मातृभाषा के माध्यम से ही करते हैं। संसार के सभी विकसित देशों में बच्चों को औद्योगिक शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से ही दी जाती है। परन्तु हमारे देश में कृषि विज्ञान, तकनीकी और मेडिकल की शिक्षा अभी भी अंग्रेजी के माध्यम से दी जा रही है और यही कारण है कि सामान्य बच्चे इसे प्राप्त नहीं कर पाते। क्या अच्छा हो यदि हम संसार की अन्य भाषाओं में निहित समस्त ज्ञान-विज्ञान को अपनी मातृभाषा में अनुदित कर फिर उसी के माध्यम से शिक्षा दें।
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  1. मातृभाषा और शासनतन्त्र एवं नागरिकता की शिक्षा – हमारे देश में लोकतन्त्र है और हमारे लोकतन्त्र के मूल सिद्धान्त हैं- स्वतन्त्रता, समानता, भ्रातृत्व, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और न्याय और इनकी शिक्षा दो प्रकार से दी जा रही है-एक विद्यालयों के माध्यम से और दूसरे जन-संचार के माध्यम-पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से विद्यालयी शिक्षा का माध्यम तो मातृभाषा होती ही है, पत्र-पत्रिकाएँ भी मातृभाषा में प्रकाशित की जाती हैं और रेडियो तथा टेलीविजन पर जो तत्सम्बन्धी कार्यक्रम प्रसारित होते हैं वे भी क्षेत्र विशेष के व्यक्तियों की मातृभाषा में प्रसारित होते हैं।
  2. मातृभाषा और राष्ट्र की आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं की पूर्ति – आज हमारे राष्ट्र के सामने मुख्य लक्ष्य हैं-जनसंख्या नियन्त्रण, पर्यावरण संरक्षण, आधुनिकीकरण, राष्ट्रीय एकता और अन्तर्राष्ट्रीय अवबोध। जिस प्रकार लोकतन्त्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की शिक्षा विद्यालयों एवं जन-संचार के माध्यम, दोनों के द्वारा दी जाती है उसी प्रकार जनसंख्या शिक्षा, पर्यावरण शिक्षा और वैज्ञानिक प्रवृत्ति के विकास के लिए इन दोनों का प्रयोग किया जाता है और यह सब कार्य क्षेत्र विशेषों में वहाँ की मातृभाषाओं के माध्यम से किया जाता है। मातृभाषा में प्रसारित कार्यक्रमों का प्रभाव मस्तिष्क के साथ-साथ हृदय पर भी होता है और स्थायी होता है। हम जानते हैं कि किसी मातृभाषा-भाषी व्यक्तियों में भावात्मक एकता होती है। यदि किसी राष्ट्र के व्यक्तियों की मातृभाषा और राष्ट्रभाषा एक होती है तो उस राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता स्वभावतः होती है। परन्तु हमारे देश में अनेक मातृभाषाएँ हैं और इनमें से एक भाषा हिन्दी राष्ट्रभाषा है। परन्तु एक बात अच्छी है कि हमारे देश की सभी मान्यता प्राप्त मातृभाषाओं के साहित्य में राष्ट्र का इतिहास और उसकी संस्कृति निहित है।

मातृभाषा हिन्दी की एक और विशेषता

हिन्दी भारत की कुल जनसंख्या के आधे से अधिक व्यक्तियों की मातृभाषा है। यह भारत की जनभाषा, सम्पर्क भाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा है और साथ ही उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, बिहार और झारखण्ड प्रान्तों की भी राजभाषा है। यह बात दूसरी है कि अंग्रेजी सह राजभाषा के रूप में अभी तक प्रयोग की जाती है। देश की एकता और अखण्डता और उसके त्वरित विकास के लिए हमारे देश में मातृभाषा हिन्दी का सर्वाधिक महत्त्व है।

ब्रज भाषा साहित्य

सौ बातों की एक बात यह है कि विचार और भाषा परस्पर अभिन्न रूप से सम्बद्ध हैं। मनुष्य के विचार उसकी अपनी मातृभाषा में उठते, पनपते और समाप्त होते हैं। भाषा के अभाव में विचार नहीं किया जा सकता और विचार के अभाव में प्रगति नहीं की जा सकती। मनुष्य ने अब तक जो भी प्रगति की है उसका मूल आधार उसकी मातृभाषा ही है। मानव जीवन में सर्वाधिक महत्त्व उसकी मातृभाषा का ही होता है।

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