भुगतान संतुलन

भुगतान संतुलन अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के आर्थिक लेन-देन या संव्यवहारों का लेखांकन है। यह विदेशों से प्राप्तियों व भुगतानों का विवरण-पत्र होता है। भुगतान संतुलन एक विवरण है जो एक वर्ष की अवधि में एक देश के कुल आयातों एवं निर्यातों के मूल्यों को बताता है। यह किसी देश का विश्व के अन्य देशों में होने वाले सम्पूर्ण लेनदेन का विस्तृत लेखा-जोखा है। इसके दो पक्ष प्राप्तियाँ एवं भुगतान होते है। भुगतान संतुलन इन दोनों पक्षों के अन्तर को बताता है। वास्तव में भुगतान संतुलन सदैव संतुलित होता है क्योंकि अन्त में स्वर्ण के आयात-निर्यात द्वारा इसे सन्तुलित करना होता है।

भुगतान संतुलन

भुगतान संतुलन एक ऐसा विवरणपत्र है जिसमें किसी देश के एक निश्चित समय के समस्त विदेशी लेन-देनों का ब्यौरा लिखा जाता है। इस विवरण में समस्त लेनदारियाँ व देनदारियों अलग-अलग दिखाई जाती है। इस प्रकार भुगतान संतुलन में व्यापार सन्तुलन में तथा अदृश्यों के सन्तुलन को शामिल किया जाता है। इन अदृश्य सम्पत्तियों में वस्तुओं का जहाजों पर लगान, अधिकोषण, बीमा, तकनीकी सेवायें, पर्यटन के हिसाब किताब शामिल होते हैं। भुगतान सन्तुलन को वाल्टर क्रास द्वारा परिभाषित किया गया है, “भुगतान सन्तुलन एक देश के नागरिकों और शेष विश्व के नागरिकों के मध्य हुए समस्त आर्थिक व्यवहारों का संक्षिप्त विवरण होता है।” यह एक निश्चित अवधि (प्रायः 1 वर्ष) से सम्बन्धित होता है।

“भुगतान शेष एक निश्चित समयावधि में एक देश का शेष विश्व के साथ सम्पन्न हुए मौद्रिक व्यवहारों का अभिलेख है।

वेनहम के अनुसार,

“भुगतान शेष शब्द का उपयोग सम्पूर्ण माँग एवं पूर्ति सम्बन्धी परिस्थिति के आशय में किया जाता है तथा यही अर्थ है जिसमें भुगतान सन्तुलन की अवधारणा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार वेनों में सर्वाधिक प्रयोग होती है।

हेवरलर के अनुसार,

किसी देश का भुगतान संतुलन उन समस्त आर्थिक सौदों का क्रमबद्ध लेखा है जो सूचनादाता देश के नागरिकों एवं विदेशी नागरिकों के मध्य होते हैं।

चार्ल्स पी. किण्डलवर्गर के अनुसार

भुगतान संतुलन किसी देश के अन्तर्राष्ट्रीय सौदों का एक दिए हुए समय का ग्राह्य सारांश है।”

व्हिटल्सी, फ्रीमैन, हरमैन के अनुसार

भुगतान संतुलन किसी देश के निवासियों एवं विश्व के निवासियों के बीच किसी समय विशेष सामान्य रूप से एक वर्ष में सम्पन्न किए गए समस्त आर्थिक सौदों का एक व्यवस्थित लिपिबद्ध विवरण है।

वाल्टर क्रॉस के अनुसार

भुगतान संतुलन की विशेषताएं

इस प्रकार भुगतान संतुलन की विशेषताएँ अग्रवत है-

  1. यह आर्थिक संव्यवहारों का व्यवस्थित अभिलेख होता है।
  2. यह एक विवरण के रूप में होता है।
  3. यह निश्चित समयावधि हेतु होता है।
  4. इसमें दृश्य तथा अदृश्य मदें शामिल होती है।
  5. भुगतान शेष हमेशा संतुलित होता है

भुगतान संतुलन में असंतुलन के कारण

प्रायः निम्नलिखित कारणों से भुगतान संतुलन असन्तुलित हो जाता है-

  1. चक्रीय उच्चावचन – अलग-अलग देशों में अलग-अलग चक्रीय उच्चावचन होते हैं। ये चक्रीय उच्चावचन व्यापार चक्र के परिणामस्वरूप होते हैं। इनके द्वारा भुगतान सन्तुलन असन्तुलित हो जाता है।
  2. निर्यात में मॉंग परिवर्तन – विकासशील देशों द्वारा निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की माँग में परिवर्तन के कारण भी भुगतान सन्तुलन असन्तुलित हो जाता है। विकसित देश अब उन खाद्यान्नों का उत्पादन करने लगे हैं जिन वस्तुओं का आयात विकासशील देशों से करते हैं। इसके परिणामस्वरूप विकासशील देशों के निर्यातों में कमी हुई एवं उनके भुगतान सन्तुलन में असन्तुलन पैदा हो गया।
  3. विकास एवं विनियोग कार्यक्रम – विकासशील देशों में भारी मात्रा में विकास एवं विनियोग सम्बन्धी कार्यक्रम होने के कारण यहाँ का भुगतान सन्तुलन असन्तुलित हो गया। इन देशों को अपने आर्थिक विकास के लिए पूँजी एवं अन्य साधनों का विदेशों से आयात करना होता है।
  4. आय प्रभाव एवं कीमत प्रभाव – आर्थिक विकास के फलस्वरूप विकासशील देशों में तथा यहाँ के लोगों की आय में वृद्धि हुई, फलस्वरूप कीमतें भी बढ़ी। इससे आयात प्रोत्साहित तथा निर्यात हतोत्साहित होते हैं, इस प्रकार देश का भुगतान सन्तुलन असन्तुलित हो जाता है।
  5. भारी मात्रा में आयात – भारत एक विकासशील देश होने के नाते उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारी मात्रा में आयात करना पड़ता है। भारी मात्रा में आयात के कारण भुगतान सन्तुलन बिगड़ जाता है। भारत देश में खाद्य सामग्री, रक्षा सामग्री, पेट्रोलियम पदार्थो, मशीनों एवं उपकरणों का आयात किया जाता है।
  1. निर्यात योग्य आधिक्य का अभाव – भारत देश की जनसंख्या विशाल होने के कारण जो भी उत्पादित किया जाता है वह देश में ही उपभोग कर लिया जाता है जिससे निर्यात के लिए आधिक्य का अभाव रहता है।
  2. निम्न स्तर की आधारभूत सुविधायें – भारत में आधारभूत सुविधाओं का स्तर एक वांछित स्तर से बहुत निम्न है जबकि नियोजन काल में आधारभूत सुविधाओं में सुधार किया जा चुका है। इससे निर्यातको को कई असुविधाओं का सामना करना पड़ता है।
  3. निम्न उत्पादन एवं उत्पादकता – हमारे देश में उत्पादन की तकनीकी का वांछित विकास न होने के कारण उत्पादन एवं उत्पादकता निम्न है, जिससे निर्यातों में वृद्धि नहीं हो पाती है और आयातो में वृद्धि निरन्तर होती रहती है।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता का अभाव – हमारे देश के उद्योगों में इतनी क्षमता नहीं है कि वे अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का सामना कर सके। प्रतिस्पर्धा का सामना करने की क्षमता न होने के देश के उद्योग अन्य देशों के उद्योगों से पिछड़ जाते हैं।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय ऋण का भार – भारत पर अन्तर्राष्ट्रीय ऋण का भार बहुत अधिक है जिसके कारण मूलधन व व्याज के भुगतान के लिए एक जटिल समस्या खड़ी हो जा रही है। इस कारण भी भुगतान सन्तुलन पर अधिक प्रभाव पड़ता है।
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भुगतान संतुलन को ठीक करने के उपाय

भुगतान संतुलन को ठीक करने के उपाय निम्न है-

  1. आयातों में कमी तथा आयात प्रतिस्थापन
    भुगतान असन्तुलन की स्थिति को सन्तुलित रखने के लिए सबसे पहले आयातों में कमी तथा आयात प्रतिस्थापन पर बल देना चाहिए। जो आयात हमारे देश में किया जाता है वह केवल आवश्यक वस्तुओं का ही होता है। अतः इन वस्तुओं के आयात में एक निश्चित सीमा से अधिक कमी नहीं की जा सकती है क्योंकि इसका प्रतिकूल प्रभाव देश के जन जीवन पर पड़ता है।
  2. निर्यात योग्य वस्तुओं की पहचान
    देश में उन वस्तुओं का उत्पादन अधिक किया जाए जिनके निर्यात की सम्भावनाये अधिक हो। इसके लिए विश्व बाजार या अन्तर्राष्ट्रीय बाजार का अध्ययन, करना आवश्यक है।
  3. निर्यात क्षमता का विकास
    देश में निर्यात के विकास के लिए सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों के उपक्रमों को एक साथ मिलाकर प्रयास करने चाहिए। जिन उद्योगों में निर्यात की संभावनाएं अधिक है, उन उद्योगों में निर्यात को आवश्यक व वैधानिक कर देना चाहिए। सरकार को निर्यातोन्मुखी उद्योगों के विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
  4. निर्यातों के लिए सुविधाओं का विकास
    देश की निर्यात व्यवस्था इस ढंग की बनानी चाहिए कि जिससे निर्यातको को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। निर्यात के मार्ग में आने वाली सभी प्रशासनिक औपचारिकतायें एवं बाधाओं को न्यूनतम किया जाना चाहिए। देश में यातायात, बँकिंग, बीमा आदि सुविधाओं का भी विस्तार किया जाना चाहिए।
  5. पर्यटन को प्रोत्साहन
    हमारे देश में विश्व के कुल 0.5% या 15 लाख पर्यटक प्रति वर्ष आते हैं लेकिन हमारा देश इस क्षेत्र का लाभ नहीं उठा पा रहा है अतः हमारे देश के लिए यह आवश्यक है कि देश में यातायात तथा संवहन आदि की सुविधाओं का अधिक से अधिक विकास करे जिससे पर्यटन को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
  1. परियोजना निर्यात को प्रोत्साहन
    कुछ समय से देश में परियोजना निर्यात की क्षमता का विस्तृत विस्तार हुआ है तथा इसके साथ ही इसके निर्यात की सम्भावनायें भी उत्पन्न हुई हैं अतः यह आवश्यक है कि इन सम्भावनाओं का पता लगाकर इसके निर्यात को प्रोत्साहन प्रदान किया जाये।
  2. निर्यात योग्य बाजारों की पहचान
    अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में उन बाजारों की पहचान करनी चाहिए जिनमें निर्यात किये जाने या निर्यात को बढ़ाये जाने की संभावना रहती है। हमारे देश के निर्यातकों का बाजार आधार बहुत ही सीमित रहा है तथा इस आधार को बढ़ाने के प्रायस नहीं किये गये है।
  3. पेट्रोलियम पदार्थों के प्रयोग में मितव्ययिता
    पेट्रोल तथा अन्य पेट्रोलियम पदार्थों के क्षय को रोकने के हर सम्भव प्रयास किये जाने चाहिए, जिससे पेट्रोलियम पदार्थों के प्रयोग में मितव्ययिता लाई जा सकती है।
  4. खाद्य तेलों एवं अन्य पदार्थों का समुचित उपयोग
    हमारे देश में खाद्य तेलों, कागज, लोहा, इस्पात तथा उर्वरक एवं रासायनिक पदार्थों आदि की पर्याप्त उत्पादन क्षमता एवं योग्यता उपलब्ध है। अतः इनका समुचित उपयोग करके इन वस्तुओं के आयात पर खर्च होने वाली बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की बचत की जा सकती है।
  5. अनिवासी भारतीयों की जमा को प्रोत्साहन
    अनिवासी भारतीयों को विनियोग की अधिक सुविधायें देकर तथा उन्हें इस विनियोग पर अधिक व उचित ब्याज दर देकर उन्हें अधिक से अधिक विनियोग को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
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