भाषा परिभाषा प्रकृति महत्व

भाषा भावाभिव्यक्ति एवं विचार-विनिमय का सांकेतिक साधन है। संसार के विभिन्न प्राणियों द्वारा प्रयुक्त भावाभिव्यक्ति के इन साधनों- अंग-प्रत्यंगों के संचालन, भाव-मुद्राओं और ध्वनि संकेतों को भाषा कहते हैं। इस अर्थ में संसार के सभी प्राणियों की अपनी-अपनी भाषाएँ हैं। अपने आदि काल में तो मनुष्य कार्य प्रायः अंग-प्रत्यंगों के संचालन, भाव-मुद्राओं और विभिन्न प्रकार की ध्वनियों के माध्यम से करता था। परन्तु धीरे-धीरे उसने विचार-प्रधान निश्चित ध्वनि संकेतों के लिए निश्चित लिपि का विकास किया।

मनुष्य की भाषा की व्याख्या मुख्य रूप से समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों और भाषा-वैज्ञानिकों ने की है। समाजशास्त्रियों ने स्पष्ट किया कि भाषा का विकास सामाजिक अन्तःक्रिया द्वारा होता है और सामाजिक अन्तःक्रिया भाषा के माध्यम से होती है। इस प्रकार भाषा सामाजिक अन्तःक्रिया का आधार एवं परिणाम दोनों है। भाषा के द्वारा ही मनुष्य सामाजिक समूहों में संगठित होते हैं और भाषा के द्वारा ही वे अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का विकास करते हैं। भाषा मानव समाज के विकास की आधारशिला है।

भाषा

मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से भाषा का जन्म मनुष्य के मनोवेगों, मनोभावों और विचारों की अभिव्यक्ति के प्रयत्नस्वरूप हुआ है और आज उसके द्वारा मनुष्य अपने मनोवेगों, मनोभावों और विचारों की अभिव्यक्ति करते हैं। इस प्रकार भाषा विचार प्रक्रिया का परिणाम एवं आधार दोनों है। विचारों से भाषा का विकास होता है और भाषा से विचारों का विकास होता है। भाषा और विचार एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।

भाषा की परिभाषा

भारतीय भाषा-वैज्ञानिकों की दृष्टि से विचार की अभिव्यक्ति के लिए किसी समाज द्वारा स्वीकृत जिन ध्वनि संकेतों का व्यवहार होता है, उसे भाषा कहते हैं। भाव एवं विचारों की अभिव्यक्ति एवं सामाजिक अन्तःक्रिया के लिए किसी समाज द्वारा स्वीकृत जिन ध्वनि संकेतों का प्रयोग होता है, उसे बोली कहते हैं। कई समान बोलियों की प्रतिनिधि बोली को विभाषा कहते हैं और कई समान विभाषाओं की प्रतिनिधि सर्व स्वीकृत विभाषा को भाषा कहते हैं।

भाषा वह व्यापार है जिससे हम वर्णात्मक या व्यक्त शब्दों द्वारा अपने विचारों को प्रकट करते हैं।

पतंजलि के अनुसार

भाषा स्वैच्छिक ध्वनि संकेतों की वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से कोई सामाजिक समूह सहयोग एवं अन्तःक्रिया करता है।

ब्लोच और ट्रेगर के अनुसार

भाषा ध्वनियों द्वारा मानव के विचारों की अभिव्यक्ति है।

अंग्रेज भाषा वैज्ञानिक स्वीट महोदय के अनुसार

Language is the system of arbitrary vocal symbols by means of which a social group cooperate and interact.

Bloch and Tragar
भाषा के रूप

भाषा के मूल तत्व अथवा अंग

अक्षर, शब्द, वाक्य, लिपि, विराम चिह्न, उच्चारण और वर्तनी भाषा के मूल तत्त्व अथवा अंग होते हैं। भाषा के इन मूल तत्त्वों के सर्वमान्य स्वरूप का व्याख्याकार होता है – व्याकरण। कुछ विद्वान व्याकरण को भी भाषा का मूल तत्त्व मानते हैं। यहाँ भाषा के इन सब मूल तत्त्वों अथवा अंगों का सापेक्षिक महत्व प्रस्तुत है।

  • भाषा की इकाई वाक्य होते हैं। भाषा अपने प्रयोजन में तभी खरी उतरती है जब वाक्यों की रचना सर्वमान्य हो। सर्वमान्य वाक्य रचना का अर्थ है व्याकरण सम्मत वाक्य रचना। जब तक मनुष्य को भाषा की वाक्य रचना का स्पष्ट ज्ञान नहीं होता वह भाषा को उसके सही रूप में प्रयोग नहीं कर सकता। कभी-कभी तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है।
  • वाक्य की इकाई शब्द होते हैं। वाक्य अपने प्रयोजन में तभी खरे उतर सकते हैं जब उनमें भावाभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त शब्दों का प्रयोग किया गया हो। जब तक मनुष्य को भाषा के शब्दों का स्पष्ट ज्ञान नहीं होता वह भाषा को उसके सही रूप में प्रयोग नहीं कर सकता। कभी-कभी तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है।
  • शब्द की इकाई अक्षर होते हैं। अक्षरों से तात्पर्य भाषा की मूल ध्वनियों से है। किसी भी भाषा की मूल ध्वनियों का उच्चारण निश्चित होता है और उसके लिए ध्वनि संकेत भी निश्चित होते हैं। जब तक मनुष्य को भाषा की इन मूल ध्वनियों का स्पष्ट ज्ञान नहीं होता तब तक वह भाषा का सही प्रयोग नहीं कर सकता। कभी-कभी तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है।
  • भाषा को लिखित रूप देने के लिए उसकी लिपि का ज्ञान होना आवश्यक होता है। किस अक्षर की क्या आकृति अर्थात् बनावट है, उसे कैसे लिखा जाता है, शब्द कैसे लिखे जाते हैं, शब्दों के बहुवचन कैसे बनाए और लिखे जाते हैं, वाक्य कैसे लिखे जाते हैं और वाक्यों में विराम चिह्न कैसे लगाए जाते हैं, इस सबका ज्ञान भी आवश्यक होता है।
  • अक्षरों के उच्चारण, शब्दों की रचना, शब्दों की वर्तनी, वाक्यों की रचना और उनमें विराम चिह्नों के प्रयोग का ज्ञान होता है भाषा के व्याकरण से। किसी भी भाषा के पूर्ण ज्ञान और उसके उपयुक्त प्रयोग के लिए उस भाषा के व्याकरण का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। व्याकरण के ज्ञान के अभाव में भाषा के सर्वमान्य स्वरूप को न सीखा जा सकता है और न उसका अपने सही रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

यदि ध्यानपूर्वक देखा-समझा जाए तो स्पष्ट होगा कि भाषा के उपरोक्त सभी अंग एक-दूसरे से जुड़े-बंधे हैं। एक में अशुद्धि होने से दूसरे में अशुद्धि हो जाती है और परिणामस्वरूप भाषा के स्वरूप में विकृति हो जाती है और अर्थ में परिवर्तन हो जाता है। कभी-कभी तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

भाषा की प्रकृति

भाषा के मूल आधार

जब हम भाषा की बात करते हैं तो हमारा तात्पर्य भाषा के मौखिक एवं लिखित, दोनों रूपों से होता है। इस रूप में भाषा के मूल आधारों को भाषा वैज्ञानिकों ने दो वर्गों में विभाजित किया है-भौतिक आधार और मानसिक आधार।

भाषा के भौतिक आधार

भाषा के भौतिक आधार के अन्तर्गत, भाषा के मूल तत्त्व (अक्षर, शब्द, वाक्य, लिपि एवं विराम चिह्न), ध्वनियों को उच्चारण करने वाले अंग (फेफड़े, कण्ठ, मुख विवर और नाक), ध्वनियों को सुनने वाले अंग (कान), ध्वनि संकेतों को धारण करने वाली सामग्री (तख्ती, सलेट एवं कागज), ध्वनियों को लेखबद्ध करने वाली सामग्री (लेखनी एवं स्याही) और लेखबद्ध भाषा का पठन करने वाले अंग (आँख, फेफड़े, कण्ठ, मुख विवर और नाक) आते हैं।

हम जानते हैं कि किसी भी मानव समाज में उसकी भाषा का विकास सामाजिक अन्तःक्रिया द्वारा हुआ है और आज भी मनुष्य भाषा को सामाजिक अन्तः क्रिया द्वारा ही सीखता है। इतना ही नहीं अपितु किसी भी भाषा का विकास सामाजिक अन्तःक्रिया द्वारा होता है और सामाजिक अन्तः क्रिया के लिए सामाजिक पर्यावरण आवश्यक होता है। तब कहना न होगा कि सामाजिक पर्यावरण भी भाषा का मूल आधार होता है।

भाषा को सीखने के लिए जिस सामाजिक पर्यावरण की आवश्यकता होती है वह भी भाषा के भौतिक आधार के अन्तर्गत आता है। यहाँ एक बात और समझ लेनी चाहिए कि किसी भी मानव समाज की भाषा का सम्बन्ध उसकी संस्कृति से होता है और किसी समाज की भाषा एवं संस्कृति एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। तब कहना न होगा कि समाज विशेष की संस्कृति भी उसकी भाषा का मूल आधार होती है।

भाषा का महत्व

भाषा के मानसिक आधार

भाषा भावाभिव्यक्ति एवं विचार-विनिमय का सांकेतिक साधन है। तब कहना न होगा कि मनुष्य के मनोवंग, मनोभाव एवं विचार उसकी भाषा के मूल आधार होते हैं। और चूँकि मनुष्य के मनोवेग, मनोभाव एवं विचारों का सम्बन्ध उसके मन-मस्तिष्क से होता है इसलिए इन्हें भाषा के मानसिक आधार कहा जाता है। यदि और ध्यानपूर्वक सोचा-समझा जाए तो स्पष्ट होगा कि भाषा के भौतिक आधार भी भाषा के इन मानसिक आधारों पर निर्भर करते हैं।

भाषा के सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने की क्रिया तब तक शुरू नहीं होती जब तक मनुष्य का मन-मस्तिष्क इनके लिए तैयार नहीं होता। हमारी समस्त कर्मेन्द्रियाँ एवं ज्ञानेन्द्रियाँ, मन-मस्तिष्क से ही संचालित होती हैं। मन, मस्तिष्क, मनोवेग, मनोभाव और विचार, ये सब भाषा के मानसिक आधार हैं। भाषा वैज्ञानिक विचार को भाषा की आत्मा और शब्द को भाषा का शरीर मानते हैं। इनमें से किसी के अभाव में भी भाषा के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती।

भाषा का स्वरूप

भाषा की प्रकृति

भाषा के संदर्भ में उपरोक्त तथ्य जान लेने के बाद हम उसकी प्रकृति को सरलता से समझ सकते हैं। पहली बात तो यह है कि जब हम भाषा की बात करते हैं तो हमारा तात्पर्य केवल मनुष्यों की भाषाओं से होता है और वह भी ध्वनि संकेतों की उस भाषा से जो लिपि का वरदान प्राप्त कर लिखित रूप धारण करती है। मनुष्य की इस भाषा का मूल आधार विचार होते हैं।

इस भाषा को मनुष्य समाज के बीच रहकर सामाजिक अन्तः क्रिया द्वारा सीखता-सिखाता है। और इस भाषा की एक विशेषता यह भी है कि इसमें सदैव परिवर्तन एवं विकास होता रहता है। मनुष्य की भाषा की यही प्रकृति है। भाषा की इस प्रकृति को हम निम्नलिखित रूप में क्रमबद्ध कर सकते हैं-

  1. भाषा मानव की विशेषता है– जहाँ तक भावाभिव्यक्ति की बात है यह कार्य संसार के सभी प्राणी करते हैं और अपने-अपने तरीकों से करते हैं। सामान्यतः इन्हीं तरीकों को उनकी भाषा कहते हैं। परन्तु वे अपनी इस भाषा में विचार-विनिमय नहीं कर पाते और विचार के अभाव में अपनी भाषा में विकास नहीं कर पाते। विचारप्रधान एवं विकासशील भाषा तो मनुष्य की ही विशेषता है।
  2. भाषा भावाभिव्यक्ति एवं विचार-विनिमय हेतु किसी समाज द्वारा स्वीकृत ध्वनि संकेतों का समूह है-भाषा की उत्पत्ति मनुष्य के मनोभावों को अभिव्यक्त करने के प्रयत्न से हुई है और उसका विकास विचार-विनिमय के द्वारा निरन्तर होता रहता है। यह भावाभिव्यक्ति एवं विचार-विनिमय का साधन होती है। हम जानते हैं कि मनुष्य यह भावाभिव्यक्ति एवं विचार-विनिमय ध्वनि संकेतों के माध्यम से करते हैं। ये ध्वनि संकेत समाज द्वारा विकसित एवं स्वीकृत होते हैं।
  3. भाषा और विचार में अटूट सम्बन्ध होता है– यूँ भाव और विचारों को अभिव्यक्त करने के प्रयत्न में मनुष्य ने भिन्न-भिन्न ध्वनि संकेतों (भाषा) का विकास किया है परन्तु यह भी बात सत्य है कि जैसे-जैसे मनुष्य भाषा सीखता जाता है और उसकी भाषा में विकास होता जाता है तैसे-तैसे वह विचार करने और विचार-विनिमय करने में भी सक्षम होता जाता है। इस प्रकार भाषा एवं विचारों का विकास एक-दूसरे पर निर्भर करता है। सच बात तो यह है कि विचारों के अभाव में भाषा की उत्पत्ति एवं विकास नहीं हो सकता। और भाषा के अभाव में विचारों की उत्पत्ति एवं विकास नहीं हो सकता। इन दोनों में अटूट सम्बन्ध होता है।
  4. भाषा वाचिक प्रतीकों की एक व्यवस्था है– मनुष्यों की सभी भाषाओं में वाचिक प्रतीकों की अपनी-अपनी व्यवस्था है। प्रत्येक भाषा की अपनी मूल ध्वनियाँ (अक्षर, वर्ण) हैं, अपने शब्द हैं और अपनी-अपनी वाक्य रचना है। भाषा सम्बन्धी ये नियम निश्चित होते हुए भी लचीले होते हैं और भाषा के विकास के साथ-साथ इनमें भी परिवर्तन होता रहता है।
  5. भाषा लिपि संकेतों के द्वारा लिखित रूप धारण करती है-यूँ प्रारम्भ में मौखिक भाषाओं का ही विकास हुआ था परन्तु धीरे-धीरे सभी समाजों ने अपनी-अपनी भाषाओं की मूल ध्वनियाँ निश्चित कीं, उन निश्चित मूल ध्वनियों के लिए भिन्न-भिन्न चिह्न निश्चित किए और इस प्रकार अपनी-अपनी भाषाओं के लिए लिपियों का विकास किया। आज मानव समाज की प्रत्येक भाषा किसी-न-किसी लिपि में लिखी जा सकती है। कुछ लिपियाँ तो ऐसी हैं जिनमें संसार की किसी भी भाषा को लिखा जा सकता है। देवनागरी उन सबकी सिरमौर है।
आशा परिभाषा
  1. भाषा अर्जित सम्पत्ति है-मनुष्य में भाषा सीखने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। वह जिस समाज में रहता है, उसी के सदस्यों का अनुकरण कर उस समाज की भाषा सीख जाता है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में पैदा होने वाला बच्चा अपने सामाजिक पर्यावरण में हिन्दी भाषा सीखता है लेकिन यदि उसे जन्म के बाद मद्रास (चेन्नई) में तमिल भाषा-भाषियों के बीच भेज दिया जाए तो वह उनका अनुकरण कर तमिल भाषा ही सीखेगा। और यदि किसी मनुष्य को किसी भी भाषा-भाषी का सम्पर्क प्राप्त न हो तो वह भाषा सीखने से वंचित रह जाएगा।
  2. भाषा परिवर्तनशील एवं विकासशील होती है-यद्यपि प्रत्येक समाज अपनी भाषा में कम-से-कम • परिवर्तन करना चाहता है परन्तु फिर भी देश, काल एवं विकास के साथ-साथ उसकी भाषा में परिवर्तन होता रहता है। उदाहरण के लिए भारत की आदि भाषा वैदिक संस्कृत कालान्तर से संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश आदि रूपों को पार करती हुई आज की हिन्दी के रूप में विकसित हुई है। यदि हम हिन्दी को ही देखें तो आज की हिन्दी आज से पाँच सौ वर्ष पूर्व की हिन्दी से बहुत भिन्न है। परन्तु किसी भी भाषा में जो परिवर्तन होता है वह सदैव विकासोन्मुख होता है। जैसे-जैसे किसी समाज में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में विकास होता है तैसे-तैसे उसकी भाषा के शब्दकोश में वृद्धि होती है, नए-नए शब्दों का निर्माण होता है और लेखन की नई-नई शैलियों का विकास होता है।
  3. भाषा का मूल रूप सदैव सुरक्षित रहता है – किसी भी समाज में भाषा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी द्वारा ग्रहण की जाती है। यही कारण है कि किसी भाषा में कितना भी परिवर्तन हो, उसमें कितना भी विकास हो, लेकिन उसमें उसके मूल रूप के दर्शन अवश्य होते हैं। उदाहरण के लिए आज की हिन्दी अपनी मूल भाषा संस्कृत से एक दम भिन्न है परन्तु फिर भी उसमें संस्कृत के तत्सम् एवं तद्भव शब्द इतने अधिक हैं कि उसे संस्कृत की वंशजा के रूप में सरलता से पहचाना जा सकता है।
  4. मनुष्य एक से अधिक भाषा सीख सकता है-भाषा सामाजिक व्यवहार का साधन होती है। जब मनुष्य को भिन्न भाषा-भाषियों से व्यवहार करना होता है तो वह उनकी भी भाषा को सीख लेता है परन्तु इस भाषा को सीखने के लिए उसे विशेष प्रयत्न करना होता है।

भाषा का महत्व

मनुष्य जीवन में सबसे अधिक महत्त्व भाषा का है। उसने अब तक जो भी विकास किया है, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जो भी प्रगति की है, वह सब भाषा के माध्यम से की है। भाषा व्यष्टि एवं समाज दोनों के विकास की आधारशिला है। भाषा का महत्त्व स्वयं सिद्ध है।

  1. भाषा भावाभिव्यक्ति एवं विचार-विनिमय का साधन है – मनोभावों की अभिव्यक्ति के प्रयत्न ने भाषा को जन्म दिया। बुद्धिप्रधान प्राणी होने के कारण मनुष्य ने धीरे-धीरे विचारप्रधान भाषा का विकास किया। आज मनुष्य भाषा के माध्यम से भावाभिव्यक्ति के साथ-साथ विचार भी करता है और विचार-विनिमय भी। इस दृष्टि से मानव जीवन में भाषा का बड़ा महत्त्व है।
  2. भाषा सामाजिक व्यवहार एवं सामाजिक अन्तःक्रिया का आधार है – मनुष्यों के बीच जो भी सामाजिक अन्तःक्रिया होती है वह सब भाषा के माध्यम से होती है, वे आपस में जो भी व्यवहार करते हैं, वह सब भी भाषा के माध्यम से करते हैं। भाषा के माध्यम से ही मानव जाति सामाजिक समूहों में संगठित हुई है, राष्ट्र के रूप में गुंथी है और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक मंच पर आसीन हुई है। भाषा के अभाव में यह सब सम्भव नहीं था। इस दृष्टि से भी मानव जीवन में भाषा का बड़ा महत्त्व है।
  3. भाषा मानव विकास का मूल आधार है – सृष्टि के सभी पशु-पक्षी एवं कीट-पतंग मनुष्य से प्राचीन हैं परन्तु प्रगति पथ पर केवल मनुष्य ही अग्रसर हुआ है। आखिर वह कौन-सी शक्ति है जिसके द्वारा मनुष्य जाति ने यह सब विकास किया है? वह शक्ति भाषा की शक्ति है, विचार की शक्ति है। यूँ तो संसार के अन्य प्राणियों के पास भी अपनी-अपनी भाषाएँ हैं परन्तु विचारप्रधान भाषा मनुष्य की ही विशेषता है। मनुष्य की भाषा और उसके विचारों में अटूट सम्बन्ध होता है, विचार से भाषा प्रस्फुटित होती है और भाषा के माध्यम से विचार। भाषा के अभाव में मनुष्य विचार नहीं कर सकता और विचार के अभाव में वह अपने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति नहीं कर सकता। संस्कृताचार्य दंडी के शब्दों में-यदि शब्दरूपी ज्योति इस संसार में प्रकाशित न हुई होती तो तीनों लोक अज्ञानरूपी घने अन्धकार से परिपूर्ण रहे होते।
  4. भाषा मानव के भाव, विचार, अनुभव एवं आकांक्षाओं को सुरक्षित रखती है – भाषा के माध्यम से हम अपने भाव, विचार, अनुभव एवं आकांक्षाओं को सुरक्षित रखते हैं और उसी के माध्यम से हम उस सबको आने वाली पीढ़ी को हस्तान्तरित करते हैं। आने वाली पीढ़ी उसमें अपने भाव, विचार, अनुभव एवं आकांक्षाएँ जोड़कर अपने से आगे की पीढ़ी को हस्तान्तरित करती है। इस प्रकार विचारों में सदैव परिवर्तन एवं परिवर्द्धन होता रहता है। मानव जाति ने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जो भी उपलब्धियाँ की हैं, वे सब भाषा के माध्यम से सुरक्षित हैं। आज का ज्ञान-विज्ञान कल के ज्ञान-विज्ञान की नींव है। भाषा के अभाव में यह सब सम्भव नहीं।
  5. भाषा मानव सभ्यता एवं संस्कृति की पहचान है – भाषा की कहानी मानव सभ्यता एवं संस्कृति की कहानी है। जैसे-जैसे किसी मानव समाज ने अपनी भाषा में प्रगति की तैसे-तैसे उसकी सभ्यता एवं संस्कृति में विकास हुआ, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति हई, श्रेष्ठतर साहित्य का सृजन हुआ। तभी किसी जाति, समाज अथवा राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति का आँकलन उसके साहित्य से किया जाता है। आदिकाल में भारत जगत् गुरु था, इसका प्रमाण उस समय का साहित्य – वेद, उपनिषद और स्मृतियाँ ही हैं।
भाषा के दो रूप
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मातृभाषा ही शिक्षा का माध्यम क्यों?देवनागरी लिपिलेखन अर्थ
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