भारतीय संयुक्त परिवार

भारतीय संयुक्त परिवार भारत की पूरी सांस्कृतिक विरासत में विशेष महत्व रहा है। एक साधारण भारतीय के लिए परिवार का अर्थ संयुक्त परिवार से ही होता है। संयुक्त परिवार की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए इरावती कर्वे ने लिखा है, “संयुक्त परिवार ऐसे व्यक्तियों का समूह है, जो एक ही घर में रहते हैं, एक रसोई में बना भोजन करते हैं, जिनकी सम्पत्ति का रूप संयुक्त होता है, पूजा-उपासना में मिल-जुलकर हिस्सा लेते हैं तथा किसी-न-किसी रूप में एक-दूसरे के रक्त सम्बन्धी होते हैं।”

भारतीय संयुक्त परिवार

भारतीय संयुक्त परिवार की इन्हीं विशेषताओं के आधार पर के. एम. पणिवकर ने लिखा है कि “हिन्दू समाज की इकाई व्यक्ति नहीं बल्कि संयुक्त परिवार है।” कानूनी रूप से भी हम उसी परिवार को संयुक्त परिवार कहते हैं जिसमें तीन-चार पीढ़ियों के सदस्यों के बीच सम्पत्ति का बंटवारा न हुआ हो। आई. पी. देसाई ने गुजरात के महुआ जैसे छोटे से नगर में परिवारों का अध्ययन करके संयुक्त परिवार के तीन मुख्य रूपों का उल्लेख किया है :

  1. परम्परागत संयुक्त परिवार – जब चार या इससे अधिक पीढ़ियों के लोग एक ही घर में सम्मिलित रूप से रहते हैं, संयुक्त सम्पत्ति के स्वामी होते हैं तथा परिवार में आयोजित विभिन्न अनुष्ठानों में सामूहिक रूप से हिस्सा लेते हैं, तो इसे हम परम्परागत संयुक्त परिवार कहते हैं।
  2. प्रकार्यात्मक संयुक्त परिवार — यह वे परिवार हैं जिनकी स्थापना एक संयुक्त परिवार से सम्बन्धित कुछ व्यक्तियों द्वारा एक अलग घर में रहने से होती है। अलग-अलग रहने के बाद भी वे भावनात्मक रूप से अपने संयुक्त परिवार से जुड़े रहते हैं तथा साधारणतया अपने माता-पिता या संयुक्त परिवार के किसी बुजुर्ग की राय के अनुसार ही प्रमुख निर्णय लेते हैं। भारतीय समाज में आज जिन्हें हम एकाकी परिवार कहते हैं, वे काफी सीमा तक प्रकार्यात्मक संयुक्त परिवार के ही अन्तर्गत आते हैं।
  3. सीमान्त संयुक्त परिवार – देसाई के अनुसार सीमान्त संयुक्त परिवार वह होता है जिसमें माता-पिता के साथ उनके एक या दो विवाहित पुत्र और उनके बच्चे साथ-साथ रहते हैं। यह परिवार परम्परागत संयुक्त परिवार से आकार में कुछ छोटे होते हैं तथा विभिन्न सदस्यों द्वारा किसी भी काम से आजीविका उपार्जित की जाती है। इन्हीं परिवारों को विस्तृत परिवार भी कहा जाता है।

भारतीय समाज में आज संयुक्त परिवार के यह सभी रूप साथ-साथ देखने को मिलते हैं। यहां नगरों में जो लोग अपने लिए एक अलग एकाकी परिवार की स्थापना कर रहे हैं, वे भी अपने संयुक्त परिवार से किसी-न-किसी रूप में जरूर जुड़े होते हैं। इसी कारण यह कहा जाता है कि यहां परिवार का रूप कैसा भी हो, उसकी मूल प्रकृति संयुक्त परिवार से अधिक भिन्न नहीं होती।

संयुक्त परिवार की विशेषताएं

संयुक्त परिवार की प्रकृति को इसकी संरचना और व्यवहार के तरीकों के आधार पर सरलता से समझा जा सकता है। विभिन्न लेखकों ने इन विशेषताओं का उल्लेख निम्नांकित रूप से किया है :

  1. बड़ा आकार एक संयुक्त परिवार में तीन-चार पीढ़ियों तक के रक्त सम्बन्धियों और विवाह के द्वारा इसमें सम्मिलित होने वाले सदस्यों का समावेश होता है। परम्परागत रूप से एक संयुक्त परिवार के सदस्यों की संख्या 40-50 तक होती थी। अब जन्म दर कम हो जाने के कारण परिवार का आकार कुछ छोटा होने लगा है, लेकिन एकाकी परिवारों की तुलना में इनका आकार काफी बड़ा होता है।
  2. सामान्य विकास – हम उसी परिवार को एक संयुक्त परिवार कहते हैं जिसके सभी सदस्य एक ही घर में रहते हैं। आज रहन-सहन के तरीकों में कुछ परिवर्तन हो जाने के कारण एक-दूसरे में मिले हुए दो-तीन घरों में संयुक्त परिवार के सदस्य रहने लगे हैं। इसके बाद भी वे त्योहारों, उत्सवों और पूजा के अवसर एक ही स्थान पर एकत्रित होकर अपने कर्तव्यों को पूरा करते हैं।
  3. सामान्य रसोई – केवल उसी परिवार को संयुक्त परिवार कहा जाता है जिसमें परिवार के सभी सदस्य एक ही रसोई में बना भोजन करते हैं। भोजन बनाने में परिवार की सभी स्त्रियां सहयोग करती है, यद्यपि रसोई का संचालन परिवार के मुखिया की पत्नी या सबसे वयोवृद्ध स्त्री द्वारा किया जाता है।
  4. संयुक्त सम्पत्ति – कानूनी और सामाजिक तौर पर एक संयुक्त परिवार के सदस्यों के बीच सम्पत्ति का कोई बंटवारा नहीं होता। परिवार के सबसे वयोवृद्ध पुरुष सदस्य द्वारा परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकता को पूरा किया जाता है। सदस्यों द्वारा अर्जित की जाने वाली आय भी एक सामान्य कोप में रखी जाती है जिसकी देख-रेख परिवार का मुखिया करता है।
  1. कर्ता की प्रधानता – संयुक्त परिवार के मुखिया को कर्ता कहा जाता है, कर्ता ही परिवार की आय की व्यवस्था करता है. सभी सदस्यों को विभिन्न प्रकार के काम सौंपता है तथा अपने रीति-रिवाजों के अनुसार सदस्यों के व्यवहारों पर नियन्त्रण लगाता है। इसी कारण कर्ता को संयुक्त परिवार का संचालक माना जाता है।
  2. अधिक स्थायित्व – एकाकी परिवार की तुलना में संयुक्त परिवार की प्रकृति काफी स्थायी होती है। एक संयुक्त परिवार के सभी सदस्यों में एक-दूसरे को सहयोग देने और ‘हम की भावना होती है। बेकारी, बीमारी या दुर्घटना की दशा में प्रत्येक सदस्य की देख-रेख करना परिवार के दूसरे सभी सदस्यों की जिम्मेदारी होती है। इसी कारण संयुक्त परिवार में विघटन की सम्भावना बहुत कम रह जाती है।
  3. परम्पराओं की प्रधानता — भारतीय समाज में प्रथाओं और परम्पराओं का विशेष महत्व है। यह परम्पराएं लोगों को सामूहिकता की भावना से जोड़ती हैं तथा परिवार के सदस्यों को स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करती हैं। प्रथाओं को तोड़ना संयुक्त परिवार द्वारा एक सामाजिक अपराध माना जाता है। इसी कारण विवाह के निर्धारण, उत्सवों के आयोजन, शिक्षा और व्यवसाय आदि के लिए व्यक्ति अपनी परम्पराओं से बंधा रहता है।
  4. धार्मिक क्रियाओं में संयुक्त सहभाग — प्रत्येक संयुक्त परिवार की अपनी कुछ धार्मिक परम्पराएं होती हैं। अनेक धार्मिक परम्पराओं का सम्बन्ध परिवार की वंश परम्परा से होता है। धार्मिक क्रिया किसी भी तरह की हो, संयुक्त परिवार के सभी सदस्य इसमें मिल-जुलकर सहभाग करते हैं। परिवार में पूजा का स्थान नियत होता है। एक विशेष पूजा जिस ढंग से की जाती है उसका पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसी रूप में हस्तान्तरण होता रहता है। अपने पूर्वजों को पिण्डदान करना भी संयुक्त परिवार द्वारा की जाने वाली एक विशेष धार्मिक क्रिया है। धार्मिक क्रियाओं में सहभाग के कारण ही संयुक्त परिवार के सदस्यों में अपनेपन की भावना बढ़ती है।
  5. समाजवादी व्यवस्था — एक समाजवादी व्यवस्था का मूल सिद्धान्त है— प्रत्येक सभी के लिए और सभी प्रत्येक के लिए इसे ध्यान में रखते हुए सदस्यों के बीच कार्यों का बंटवारा इस तरह किया जाता है। जिससे प्रत्येक व्यक्ति की योग्यता और क्षमता का अधिकतम उपयोग किया जा सके। कोई व्यक्ति चाहे कितनी भी आजीविका उपार्जित करता हो, लेकिन सभी सदस्यों को उनकी जरूरत के अनुसार ही सुविधाएं दी जाती हैं। इसी कारण संयुक्त परिवार की प्रकृति अधिक अनुशासित होती है।
1. परम्परागत भारतीय सामाजिक व्यवस्था की आधारभूत विशेषताएं
1. भारतीय सामाजिक व्यवस्था के आधार
2. भारतीय समाज का क्षेत्रपरक दृष्टिकोण1. भारतीय समाज में विविधता में एकता
3. भारत का जनांकिकीय परिवेश1. भारतीय जनसंख्या के लक्षण
2. जनांकिकी
3. राष्ट्रीय जनसंख्या नीति
5. भारत में विवाह : हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई तथा जनजातीय1. विवाह के उद्देश्य व नियम
2. हिन्दू विवाह
3. मुस्लिम विवाह
4. हिंदू व मुस्लिम विवाह में अंतर
5. ईसाई विवाह
6. जनजातीय विवाह
6. भारत में परिवार तथा परिवर्तन की प्रवृत्तियां1. भारतीय संयुक्त परिवार
2. एकाकी परिवार
7. भारत में नातेदारी1. नातेदारी
2. पितृसत्ता
3. मातृसत्ता
4. वंश क्रम
5. वंश समूह
8. भारत में जाति व्यवस्था: परिप्रेक्ष्य, विशेषताएं एवं परिवर्तन के आयाम1. जाति अर्थ परिभाषा लक्षण

संयुक्त परिवार के गुण

बहुत प्राचीन काल से भारत एक कृषि प्रधान समाज रहा है। अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण ही यहां भौतिक सुख-सुविदाओं को अधिक महत्व नहीं दिया गया। यह प्रयत्न किया गया कि आर्थिक साधनों की कमी के बाद भी परिवार के लोगों का जीवन सुरक्षित रहे तथा उनके बीच पारस्परिक सहयोग में कमी न हो सके। इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करने के लिए यहां संयुक्त परिवार व्यवस्था विकसित की गई। संयुक्त परिवार व्यक्ति, समाज और संस्कृति के लिए जो महत्वपूर्ण कार्य करते जा रहे हैं, वे संक्षेप में निम्नांकित हैं:

  • व्यक्ति का समाजीकरण – बच्चे को अपने समाज के नियमों और मानवीय गुणों को सिखाने में संयुक्त परिवार बहुत उपयोगी काम करते हैं। इन परिवारों में बच्चों के पालन-पोषण और उनके सामाजिक प्रशिक्षण का काम अनेक वृद्ध और अनुभवी सदस्यों की देख-रेख में होता है। परिवार में आरम्भ से ही बच्चोंअनुशासन, एक-दूसरे से अनुकूलन करने तथा सेवा और त्याग का व्यवहार करने की सीख दी जाती है। सामाजिक प्रशिक्षण व्यक्ति को उसके जीवन भर व्यवहारों को प्रभावित करता रहता है।
  • सामाजिक सुरक्षा संयुक्त परिवार द्वारा अपने सभी सदस्यों को बेरोजगारी, बीमारी, दुर्घटना, किसी आकस्मिक कठिनाई या वृद्धावस्था की दशा में पूरी सुरक्षा दी जाती है। विधवाओं, विकलांगों और माता पिता से विहीन बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करने में भी संयुक्त परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
  • संस्कृति का हस्तान्तरण – संयुक्त परिवार व्यक्ति को अपनी संस्कृति की सीख देने का सबसे उपयोगी केन्द्र है। परिवार का प्रत्येक वृद्ध और अनुभवी सदस्य नयी पीढ़ी के लोगों को अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं और सामाजिक मूल्यों के अनुसार व्यवहार करने की सीख देता है। सदस्यों को यह बताया जाता है कि कौन-से व्यवहार उचित हैं तथा कौन-से अनुचित वृद्ध सदस्यों के अनुभवों का लाभ उठाकर परिवार के सदस्य व्यवहार के नये ढंगों की जोखिम उठाने से बच जाते हैं।
  • अनौपचारिक सामाजिक नियन्त्रण– संयुक्त परिवार का एक महत्वपूर्ण कार्य अनेक धार्मिक और नैतिक नियमों के द्वारा सदस्यों के व्यवहारों पर नियन्त्रण रखना है। सदस्यों को आरम्भ से ही यह सिखाया जाता है कि व्यक्तिगत स्वार्थों की तुलना में पूरे परिवार का हित अधिक महत्वपूर्ण है। परिवार में प्रत्येक बड़ा सदस्य अपने से छोटे सदस्य का शिक्षक और सलाहकार होता है। किसी कर्तव्य को पूरा न करने की दशा में परिवार में मिलने वाला तिरस्कार व्यक्ति के जीवन को अनुशासित रखता है।
  • स्वस्थ मनोरंजन – परिवार में बच्चों का एक-दूसरे के साथ खेलना, भाई-बहिनों द्वारा एक-दूसरे के प्रति त्याग का व्यवहार करना, समय-समय पर विभिन्न उत्सवों और आयोजनों में प्रसन्नता से सहभाग करना, सदस्यों द्वारा बच्चों को शिक्षाप्रद कहानियां सुनाना आदि संयुक्त परिवार में मनोरंजन के प्रमुख साधन हैं। ऐसा मनोरंजन व्यक्ति को उसके चरित्र का निर्माण करने में बहुत सहायता देता है।
  • सामाजिक श्रम विभाजन — संयुक्त परिवार का एक मुख्य कार्य उत्पादन और उपभोग के क्षेत्र में एक ऐसा श्रम विभाजन करना है जिससे सभी सदस्य एक-दूसरे के पूरक बनकर काम कर सकें। यह श्रम विभाजन घर के अन्दर और घर के बाहर दोनों जगह देखने को मिलता है। घर के अन्दर वृद्ध स्त्रियां धार्मिक क्रियाओं की व्यवस्था करती हैं तथा नयी बहुओं को व्यवहार के उपयोगी तरीके सिखाती हैं। युवा स्त्रियां घरेलू उत्पादन से सम्बन्धित कार्यों के अतिरिक्त भोजन बनाने का कार्य करती हैं। घर के बाहर युवा पुरुषों द्वारा अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार काम किया जाता है, जबकि वृद्ध सदस्य नातेदारी से सम्बन्धित कर्तव्यों को पूरा करते हैं।
  • सम्पत्ति की विभाजन से रक्षा—जब अनेक पीढ़ियों के सदस्य एक ही मकान में रहते हैं और अपनी-अपनी आय को एक सामान्य कोष में जमा करते हैं तो परिवार की सम्पत्ति का विभाजन नहीं हो पाता है। गांवों में संयुक्त परिवारों के कारण ही कृषि भूमि अनेक टुकड़ों में विभाजित होने से बच जाती है। परिवार में सदस्यों को अपनी मामूली आवश्यकता की वस्तुओं का अलग-अलग प्रबन्ध नहीं करना पड़ता। इसके फलस्वरूप कम आर्थिक साधनों के बाद भी सभी सदस्यों की आवश्यकताएं पूरी होती रहती हैं।

संयुक्त परिवार के दोष या समस्याएं

अनेक लाभों के बाद भी संयुक्त परिवार की संरचना में कुछ ऐसे दोष हैं जिनके कारण आज की बदलती हुई दशाओं में इन परिवारों को अधिक उपयोगी नहीं माना जाता। समाजशास्त्रियों ने संयुक्त परिवार के ऐसे अनेक दोषों अथवा अकार्यों को स्पष्ट किया है-

  1. व्यक्तिगत के विकास में बाधक संयुक्त परिवार में सभी सदस्यों को समान सुविधाएं मिलने से योग्य बच्चों को अपने समुचित विकास के अवसर नहीं मिल पाते। परिवार में जो सदस्य आजीविका उपार्जित करने के लिए बहुत अधिक मेहनत करते हैं, उन्हें इसका कोई लाभ नहीं मिलता। सभी सदस्य अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए माता-पिता और परिवार के कर्त्ता पर निर्भर बने रहते हैं। यह दशाएं व्यक्तित्व के विकास में बाधक हैं।
  2. सदस्यों में द्वेष और कलह व्यावहारिक रूप से संयुक्त परिवारों की संरचना से इसके सदस्यों के बीच द्वेष और कलह की दशाएं पैदा होने लगती हैं। परिवार में सभी लोग कर्ता को प्रसन्न करके अधिक-से-अधिक सुविधाएं प्राप्त करने के कोशिश करते हैं। जिन सदस्यों को सुविधाएं नहीं मिल पाती, वे कुटिल तरीकों से दूसरे सदस्यों पर अपना अधिकार जमाने का प्रयत्न करने लगते हैं। पारस्परिक मतभेद बढ़ने से परिवार में आपसी तालमेल कम होने लगता है। बच्चे बचपन से ही व्यवहार के ऐसे तरीके सीखने लगते हैं, जो द्वेषपूर्ण होते हैं। जब बड़ी-बूढ़ी स्त्रियां नयी बहुओं का शोषण करती हैं तो परिवार के अन्दर कलह का वातावरण बनने लगता है।
  3. सामाजिक समस्याओं का पोषण – भारतीय समाज की अधिकांश समस्याएं किसी-न-किसी रूप में संयुक्त परिवार की ही देन हैं। उदाहरण के लिए, हमारे समाज में बाल-विवाह, दहेज प्रथा, स्त्रियों का शोषण, अशिक्षा, रूढ़िवादिता, कर्मकाण्डों पर अपव्यय और जातिवाद को बढ़ाने में संयुक्त परिवार सबसे आगे रहे हैं। संयुक्त परिवार द्वारा ऐसे सभी व्यवहारों को धर्म का अंग मानकर उन्हें प्रोत्साहन दिया जाता है। विधवाओं के साथ होने वाला अमानवीय व्यवहार संयुक्त परिवार की कार्यप्रणाली का ही परिणाम है।
  4. पीढ़ियों के बीच तनाव — संयुक्त परिवार की संरचना इस तरह की है कि बदलती हुई दशाओं के बाद भी व्यवहार के किसी भी नये ढंग को स्वीकार नहीं किया जाता। बुजुर्ग लोग परम्परागत मूल्यों और विश्वासों को ही अपनी संस्कृति मानकर उनका कठोरता से पालन करने पर जोर देते हैं। दूसरी ओर नयी पीढ़ी उन व्यवहारों को अधिक महत्वपूर्ण मानती है जो समय के अनुकूल और सुविधाजनक हो इसके फलस्वरूप पुरानी और नयी पीढ़ी के बीच तनाव बढ़ने लगते हैं। इससे प्रायः परिवार का वातावरण अशान्त बनने लगता है।
  5. गतिशीलता में बाधक — वर्तमान युग में आर्थिक सफलता के लिए यह जरूरी है कि व्यक्ति उस स्थान पर जाकर काम करे जहां उसे अपनी मेहनत और योग्यता का अधिक से अधिक लाभ मिल सके। संयुक्त परिवार किसी भी व्यक्ति को अपने परिवार या गांव से बाहर जाकर काम करने की अनुमति नहीं देते। इससे अधिकांश संयुक्त परिवार आर्थिक कठिनाइयों में फंसे रहते हैं।
  6. अस्वस्थ आवास — संयुक्त परिवार में अनेक पीढ़ियों के लोग एक ही मकान में रहते हैं। यहां पति-पत्नी को रहने के लिए एक अलग कमरा भी नहीं मिल पाता। फलस्वरूप पति-पत्नी को एक-दूसरे को समझने का अवसर नहीं मिल पाता। बच्चों को भी माता-पिता का वह स्नेह नहीं मिलता जो उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए जरूरी है। स्थान की कमी के कारण बच्चे अवांछित घटनाओं को देखते और सुनते हैं। इससे बचपन से ही बच्चों में बुरी आदतें विकसित होने लगती हैं।

अनेक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि संयुक्त परिवार के अधिकाशं सदस्य धीरे-धीरे आलसी और कमजोर बनने लगते हैं। सभी सदस्य यह जानते हैं कि वे चाहें काम करें या न करें, उनकी आवश्यकताएं हर दशा में पूरी होती रहेंगी। इसी कारण पणिक्कर ने लिखा है कि आज संयुक्त परिवारों के पास रूढ़ियों को बढ़ाने और जाति के नियमों को प्रोत्साहन देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचा है।

अनेक समाजशास्त्रियों का यह भी विचार है कि भारतीय समाज में स्त्रियों के शोषण का मुख्य कारण संयुक्त परिवारों की कार्य-प्रणाली है। यह सच है कि इन दोषों के बाद भी ग्रामीण भारत में आज भी संयुक्त परिवारों का प्रचलन बना हुआ है, लेकिन नगरीय क्षेत्रों में संयुक्त परिवारों को अब अधिक उपयोगी नहीं समझ जाता।

संयुक्त परिवार में परिवर्तन के कारक

विभिन्न विद्वानों ने संयुक्त परिवार में होने वाले परिवर्तन की दशा को अनेक कारकों के आधार पर स्पष्ट किया है। कापड़िया का कथन है कि भारत में आज नये सामाजिक विधान शिक्षा का प्रसार तथा बदलती हुई मनोवृत्तियां संयुक्त परिवार में होने वाले परिवर्तन का प्रमुख कारण हैं। बॉटोमोर ने लिखा है कि संयुक्त परिवारों का विघटन इस कारण हुआ कि यह आर्थिक विकास की आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ रहे।

पणिक्कर के अनुसार, संयुक्त परिवार द्वारा अपने सदस्यों पर आवश्यकता से अधिक नियन्त्रण लगाना तथा उनके सामाजिक सम्बन्धों के क्षेत्र को बहुत संकुचित बना देना ही संयुक्त परिवार में परिवर्तन के दो मुख्य कारण हैं। प्रस्तुत विवेचन में यह आवश्यक है कि उन सभी दशाओं को संक्षेप में समझने का प्रयत्न किया जाय जो संयुक्त परिवारों की संरचना तथा कार्यों में परिवर्तन के लिए प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी हैं-

1. औद्योगीकरण

औद्योगीकरण संयुक्त परिवार व्यवस्था को परिवर्तित करने वाला आज सर्वप्रमुख कारक है। भारत में बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से ही जब नये नये उद्योगों की स्थापना होना शुरू हुई, तब रोजगार के अवसरों में तेजी से वृद्धि होने लगी। इसके फलस्वरूप अपनी आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए व्यक्ति संयुक्त परिवार के परम्परागत व्यवसाय पर ही निर्भर नहीं रहे।

बल्कि उन्हें संयुक्त परिवार के बाहर जाकर किसी भी नये रोजगार के द्वारा आजीविका उपार्जित करने का अवसर मिल गया। औद्योगीकरण से गांवों के वह कुटीर उद्योग-धन्धे भी नष्ट होने लगे जिनके द्वारा अधिकांश ग्रामीण परिवार अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते थे। औद्योगीकरण के अन्तर्गत परम्परागत मनोवृत्तियों के स्थान पर तार्किक विचारों का अधिक महत्व है।

इसके फलस्वरूप व्यक्तियों की वे परम्परागत मनोवृत्तियां कमजोर होने लगी जो संयुक्त परिवार व्यवस्था को बनाये रखने के लिए आवश्यक थीं। स्त्रियों को रोजगार के अवसर मिल जाने के कारण उन्होंने ऐसे संयुक्त परिवार को अस्वीकार कर दिया जिसमें उनके जीवन का कोई मूल्य नहीं था। जिन व्यक्तियों ने वैज्ञानिक शिक्षा ग्रहण करना आरम्भ किया, वे धीरे-धीरे संयुक्त परिवार के परम्परागत जीवन के विल्कुल विरुद्ध हो गये।

2. नगरीकरण

नगरीकरण वास्तव में, औद्योगीकरण तथा नगरीकरण संयुक्त प्रक्रियाएं हैं, लेकिन नगरों के विकास ने पृथक रूप से अनेक ऐसी दशाएं उत्पन्न की जिनके फलस्वरूप संयुक्त परिवार विघटित होने लगे। सर्वप्रथम, नगरों के विकास से एक नगरीय मनोवृत्ति का विकास हुआ। नगरीय मनोवृत्ति वह है जिसमें व्यक्ति परिवर्तन का स्वागत करता है, व्यक्तियों से उतना ही सम्बन्ध रखता है जितने से उसे लाभ मिल सके, आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए सदैव स्थान परिवर्तन करता रहता है तथा उन नियमों को स्वीकार नहीं करता जिन्हें तर्क के द्वारा नहीं समझा जा सकता।

नगरीकरण से औद्योगिक नगरों में जनसंख्या का दबाव इतना अधिक बढ़ गया कि अधिकांश व्यक्ति किराये के मकानों में रहने लगे। ऐसे मकानों में स्थान का अभाव होने के कारण यह सम्भव नहीं था कि वहां संयुक्त परिवार के सभी सदस्य साथ-साथ रह सकें। नगरों में व्यक्ति को मनोरंजन के वे व्यावसायिक साधन उपलब्ध होने लगे जो स्वतन्त्र जीवन के पक्ष में थे। यहां व्यक्ति को प्राप्त होने वाली शिक्षा तथा भौतिक आकर्षण उसे संयुक्त परिवार के परम्परागत जीवन से दूर ले जाने लगे।

3. पश्चिमीकरण

भारत में एक लम्बे समय तक अंग्रेजों का शासन रहने के कारण यहां की संस्कृति तथा परम्परागत विश्वासों पर पश्चिम की संस्कृति तथा सभ्यता का व्यापक पड़ने लगा। इसके फलस्वरूप हम अपनी परम्पराओं तथा प्रथाओं को अपनी सफलता के मार्ग में बाधक समझने लगे। कापड़िया का कथन है कि व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा सामाजिक स्वतन्त्रता की भावना पश्चिमीकरण का ही परिणाम है।

स्वतन्त्रता की यह भावना संयुक्त परिवार के उस आदर्श से मेल नहीं खाती जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को कर्ता के नियन्त्रण में रहना आवश्यक था। शिक्षा में वृद्धि संयुक्त परिवारों के विघटन का एक प्रमुख कारण भारत में शिक्षा में होने वाली वृद्धि है। व्यक्ति को संयुक्त परिवारों द्वारा केवल यही शिक्षा दी जाती थी जो उसे अपनी प्रथाओं और परम्पराओं में विश्वास करना सिखाती हो।

स्वतन्त्रता के पश्चात् जव आधुनिक शिक्षा का व्यापक रूप से प्रसार लगा, तव प्रत्येक जाति के सभी व्यक्तियों को एक ऐसी शिक्षा मिलनी आरम्भ हुई जो समानता और न्याय के सिद्धान्त पर आधारित थी इसके फलस्वरूप युवा तथा स्त्री वर्ग अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने लगा। वह एक ऐसी चेतना है जो संयुक्त परिवारों की मर्यादाओं के विरुद्ध है। ग्रामीण संयुक्त परिवारों के युवा सदस्य भी जब नगरों में जाकर नई शिक्षा ग्रहण करने लगे तो उन्होंने संयुक्त परिवारों की व्यवस्था को चुनौती देना आरम्भ कर दिया।

4. जनसंख्या की वृद्धि

भारत में स्वतन्त्रता के वाद जनसंख्या में तेजी से वृद्धि होनी आरम्भ हुई। इसके फलस्वरूप कृषि भूमि पर जनसंख्या का दवाव इतना अधिक बढ़ गया कि यदि सभी व्यक्ति अपने परम्परागत व्यवसाय के द्वारा ही आजीविका उपार्जित करते रहते तो उनकी अनिवार्य आवश्यकताएं भी पूरी न हो पातीं। इस तरह आवश्यक हो गया कि व्यक्ति अपने संयुक्त परिवार को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जाकर बसें तथा किसी अन्य व्यवसाय के द्वारा आजीविका उपार्जित करें।

5. महिला जागरूकता

स्वतन्त्रता के बाद यहां स्त्रियों की स्वतन्त्रता तथा अधिकारों के प्रति जब एक नया सामाजिक आन्दोलन आरम्भ हुआ तो धीरे-धीरे स्त्रियों ने सभी क्षेत्रों में स्वतन्त्रता की मांग करना आरम्भ कर दी। इसका सबसे पहला प्रभाव संयुक्त परिवारों की स्थिरता पर पड़ा।

6. परिवहन के साधनों की सुविधा

बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से जब देश के सभी स्थान सड़कों और रेलमार्गों से आपस में जुड़ने लगे, तब व्यक्ति के सामने स्थान परिवर्तन की यह समस्या समाप्त हो गयी ग्रामीणों के लिए भी यह सम्भव हो गया कि वे प्रतिदिन गांव से नगर जाकर शाम को पुनः अपने गांव वापस लौट आयें। इस दशा ने एक ओर संयुक्त परिवार पर व्यक्ति की निर्भरता को कम किया तथा दूसरी और उसे अपने गांव या नगर से बाहर के पर्यावरण से परिचित कराया।

7. नये सामाजिक विधान

भारत में स्वतन्त्रता के बाद जितने भी नये सामाजिक विधान बने, – उन सभी ने संयुक्त परिवारों की स्थिरता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया। सन् 1956 के हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के द्वारा स्त्रियों को भी पैतृक सम्पत्ति में पुरुषों के समान अधिकार मिल गये। अनेक दूसरे सामाजिक अधिनियमों के द्वारा वाल-विवाह पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार प्राप्त हो गया।

अन्तर्जातीय विवाह को मान्यता दे दी गयी अपनी सम्पत्ति के उपयोग के लिए विधवा स्त्री को भी किसी बच्चे को गोद लेने की अनुमति प्राप्त हो गयी तथा कानूनी संरक्षण मिल जाने के कारण विवाह विच्छेदों की संख्या में वृद्धि होने लगी। यह सभी परिवर्तन वे हैं जिन्हें संयुक्त परिवारों द्वारा मान्यता नहीं दी जाती

8. परिवार के कार्यों में कमी

कुछ समय पहले तक संयुक्त परिवार व्यक्तित्व के विकास, सामाजिक सुरक्षा, मनोरंजन तथा आर्थिक जीवन में व्यक्ति के लिए इतने महत्वपूर्ण कार्य करते थे कि व्यक्ति संयुक्त परिवार में रहना अधिक उपयोगी समझता था। आज यह सभी कार्य दूसरी संस्थाओं को हस्तान्तरित हो गये हैं। सामाजिक सुरक्षा का कार्य राज्य ने ले लिया है क्लव तथा विभिन्न व्यावसायिक संगठन मनोरंजन देने का कार्य करते हैं, व्यक्तित्व के विकास का कार्य शिक्षा संस्थाओं को हस्तान्तरित हो गया है तथा आर्थिक जीवन में सफल होने के लिए संस्थागत प्रशिक्षण को आवश्यक समझा जाने लगा है। इस प्रकार संयुक्त परिवार की उपयोगिता में कमी हो जाने से इनका विघटन होने लगा।

9. संचार क्रान्ति

विभिन्न दशाओं के प्रभाव से भारत में स्वतन्त्रता के बांट से ही संयुक्त परिवार व्यवस्था कमजोर पड़ने लगी थी. लेकिन 1980 के दशक से जब घर-घर में टी. वी. सेट लगने लगे तो संयुक्त परिवार के संकुचित घेरे में रहने वाले लोग बाहरी दुनिया के तौर-तरीकों से परिचित होने लगे। इक्कीसवी सदी के आरम्भ से जैसे-जैसे मोबाइल नेटवर्क में वृद्धि हुयी, लोगों के सम्पर्क का दायरा बढ़ने लगा।

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