बाघ परियोजना

टाइगर प्रोजेक्ट (बाघ परियोजना) को 1 अप्रैल 1973 में शुरू किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में बाघों की जनसंख्या को उचित स्तर पर बनाये रखना है ताकि वैज्ञानिक, सौन्दर्यात्मक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक मूल्य बनाए रखे जा सके। इससे प्राकृतिक धरोहर को भी संरक्षण मिलेगा जिसका लोगों को शिक्षा और मनोरंजन के रूप में लाभ होगा। एक अनुमान के अनुसार बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में देश में बाघों की संख्या लगभग 40,000 थी।

बाघ परियोजना

यह परियोजना केन्द्र सरकार द्वारा प्रायोजित है। भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण, कृषि भूमि के विस्तार अधिवासों की स्थापना, इमारती लकड़ी की प्राप्ति आदि कारणों से वन विनाश होता चला गया। इससे बाघों के प्राकृतिक आवास नष्ट होते गये। वैध एवं अवैध शिकार जारी रहने से बाघों की संख्या सैकड़ों में पहुँच गई । वन्य प्राणियों की यह प्रजाति बाघ के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो गया। इनकी घटती हुई संख्या को देखकर भारत सरकार ने 1 अप्रैल 1973 ई. में परियोजना प्रारम्भ की।

भारत वर्ष में चीतो (Tiger) की आश्चर्यजनक कमी के कारण और वन्य जीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर 1980-81 में ‘टाइगर प्रोजेक्ट’ की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य चीतों की संख्या को बढ़ाने के साथ अन्य वन्य जीवों के लिए ‘अभ्यारण्य’ (Sanctuary) का निर्माण करना था। टाइगर प्रोजेक्ट का गठन भारतीय वन्यजीव परिषद के तत्वावधान में किया गया और एतदर्थ एक समिति का गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने की। इस समिति की स्थापना 1982 ई. में हुई एक बैठक में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये जो निम्न हैं

बाघ परियोजना

बाघ के विषय में संक्षिप्त जानकारी

भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ (चीता) बिल्लियों की 36 प्रजातियों में से एक है। यह हमारी राष्ट्रीय शक्ति का प्रतीक है। यह हमारे गौरव का प्रतीक है। यह पारिस्थितिक पिरामिड के शिखर पर है अतः इसे पारिस्थितिकी सन्तुलन का प्रतीक माना गया है। यह (बाघ) उष्णकटिबन्धीय जंगलों, मैंग्रोव दलदलों, सदाबहार वनों तथा घास के मैदानों में पाया जाता है। इसकी लम्बाई लगभग 1.8 मीटर से 2.8 मीटर तक और पूँछ 90 सेंटीमीटर होती है। इसमें छलांग लगाने की बहुत क्षमता होती है। यह लगभग 8.5 मीटर की छलांग लगाकर शिकार को दबोच लेता है।

बाघ परियोजना के उद्देश्य

बाघ परियोजना के निम्न उद्देश्य निर्धारित किये गये है –

  1. भारत में बाघों के वैज्ञानिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व के लिए बाघों की संख्या को बनाये रखना।
  2. देश में बाघों के लिए अनुकूलतम जैविक महत्व के क्षेत्रों को शिक्षा और मनोरंजन के लिए राष्ट्रीय विरासत के रूप में परिरक्षित रखने के उपाय करना।
  3. वन्यजीव प्रबन्धन के अन्तर्गत बाघ संरक्षण के निकटवर्ती क्षेत्र का समग्र पारिस्थितिक विकास करना।
बाघ परियोजना टाइगर प्रोजेक्ट

बाघ संरक्षण क्षेत्र

बाघ संरक्षण क्षेत्र को 2 मंडलों में बांटा गया है-

  1. कोड क्षेत्र – यह केन्द्रीय क्षेत्र होता है। इस क्षेत्र में मानवीय क्रियाकलाप पर प्रतिबन्ध होता है। इस पूर्णरूपेण रक्षित क्षेत्र में बाघ प्राकृतिक क्रियाकलाप के लिए स्वच्छन्द होते हैं। यह एक प्राकृतिक पारिस्थितिक तन्त्र होता है।
  2. सीमांत क्षेत्र – यह बहु उपयोगी क्षेत्र होता है। इसमें कोड क्षेत्र के प्राणियों की अतिरिक्त संख्या के लिए पूरक आवास के कराने के साथ ही सीमावर्ती गाँवों के निवासियों की पशुचारण व जलावन की अनुमति होती है।

टाइगर प्रोजेक्ट की आवश्यकता

भारतवर्ष मैं जैसा कि कहा जा चुका है कि चीतों की संख्या में तीव्र गति से ह्रास हुआ है। इसके विभिन्न कारण बताए गए हैं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

  1. चीतों के निवास क्षेत्र में मानवीय क्रियाकलाप का बढ़ना
  2. चावल और गन्ने की खेती के साथ-साथ उद्योगों और नदी घाटी परियोजनाओं द्वारा चीतों के निवास स्थान की क्षति।
  3. चीतों का अत्यधिक शिकार मानव के क्रियाकलापों से घबराकर चीतों का अन्य क्षेत्रों में पलायन और वहां की प्रतिकूल स्थिति में उनकी मौत।
  4. चीतों का उनकी खाल के लिए व्यापक पैमाने पर वध।

बाघ परियोजना स्थल का चयन

बाघ संरक्षण के लिए परियोजना स्थल का चयन बाघों के प्राकृतिक वितरण को माना गया है। अर्थात् बाघों के प्राकृतिक आवास स्थलों को ही बाघ परियोजना हेतु चुना गया है। बाघ हर तरह के पर्यावरण में रह सकता है। यह राजस्थान के मरुस्थल से लेकर पश्चिम बंगाल में सुन्दरवन के दलदल तथा हिमालय की तलहटी से लेकर पश्चिमीघाट के सदाबहार वनों तक मिल सकता है लेकिन दुर्भाग्य से बाघों की संख्या कम होती जा रही है।

1972 में बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया और 1973 में भारत के 17 राज्यों में लगभग 37761 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 81 बाघ अभ्यारण्य बनाये गये। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2006 में 1411 बाघ बचे हुए हैं। 2010 में जंगली बाघों की संख्या 1701 हो गई है। 2014 में 2226 बाघ प्राकृतिक वातावरण में थे।

टाइगर प्रोजेक्ट

बाघ रिजर्व परियोजनाएं

बांदीपुर बाघ परियोजनायह कर्नाटक में स्थित प्रमुख बाघ परियोजना है। यह पार्क मैसूर-उटकमण्ड मार्ग द्वारा दो भागों में विभाजित है। कुल 866 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से बाघों के लिए 573 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र है।
कार्बेट टाइगर प्रोजेक्टयह भारत का सबसे पुराना अभ्यारण्य उत्तरांचल राज्य में स्थित है। यह 1316 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है। पहले इसका नाम हैली राष्ट्रीय पार्क था लेकिन 1959 में जिम कार्बेट नामक आखेटक के नाम पर इसका नाम जिम कार्बेट कर दिया गया।
कान्हा किसथी बाघ परियोजनायह मध्य प्रदेश में 1945 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 1933 में स्थापित किया गया था। यहाँ बाघों के लिए 940 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र सुरक्षित है।
मानस टाइगर प्रोजेक्टइस परियोजना की स्थापना 1928 में असम में की गई। इसमें बंगाल टाइगर की प्रधानता है। वर्षा अधिक होने के कारण यह जीवों के लिए अच्छा आवास है।
मेलघाट टाइगर परियोजनायह 1677 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत अभ्यारण्य महाराष्ट्र में स्थित है। यहाँ गोरीलागढ़ की पहाड़ियाँ स्थित हैं। यहाँ बाघ के अतिरिक्त तेंदुआ, हिरण, चिंकारा नीलगाय जंगली सुअर आदि पाये जाते हैं।
पालम वाघ परियोजनायह झारखण्ड में छोटानागपुर के पठार पर स्थित है। यहाँ लगभग 140 प्रजातियों के पक्षी पाये जाते हैं। ये पलामू क्षेत्र वनों से आच्छादित है।
रणथंम्भौर टाइगर प्रोजेक्टयहाँ राष्ट्रीय उद्यान 1957-58 में राजस्थान में स्थापित किया गया था। यह 1973-74 में बाघ परियोजना के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया। इस राष्ट्रीय उद्यान में बाघ के तेदुआँ वन-विलाव, चीतल, नीलगाय तथा विविध प्रकार के पक्षी आदि पाये जाते हैं।
सिमलीपाल टाइगर परियोजनायह उड़ीसा राज्य में 1957 में वन्य जीव अभ्यारण्य के रूप में तथा 1980 में राष्ट्रीय पार्क के रूप में विकसित किया गया। यहाँ छोटी बड़ी 12 नदियाँ कई स्थानों पर बहती हुई जलप्रपात बनाती है। यहाँ की पहाड़ियों पर मैना पाई जाती हैं।
सुंदरवन वाघ परियोजनायह 1973-74 में बाघ रिजर्व के रूप में घोषित किया गया है। यह राष्ट्रीय उद्यान 2,585 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में पश्चिम बंगाल में स्थित है। सुन्दरवन भारत की एक मात्र कच्छ वनस्पति का क्षेत्र है। यहाँ पर भारत के सबसे अधिक बाघ पाये जाते हैं। यह भारत की सबसे बड़ी बाघ परियोजना में रॉयल बंगाल टाइगर पाये जाते हैं।
पेरियार टाइगर प्रोजेक्टयह 1934 में एक अभ्यारण्य के रूप में केरल राज्य में स्थित है। यह 777 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत 1978-79 में बाघ रिजर्व में परिवर्तित किया गया है।
सरिस्का बाघ परियोजनायह राष्ट्रीय उद्यान 1958 में राजस्थान में स्थापित किया गया यह 1978-79 में बाघ रिजर्व के रूप में घोषित किया गया।
बुक्शा बाघ परियोजनायह हिमालय की तलहटी में 759 वर्ग किलोमीटर में पश्चिम बंगाल में विस्तृत है। यह 1982-83 में बाघ रिजर्व के रूप में विकसित किया गया। यहाँ जलीय जीव भी पाये जाते हैं।
इंद्रावती टाइगर प्रोजेक्टयह छत्तीसगढ़ में 2,799 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में स्थापित किया गया।
नागार्जुन सागर टाइगर परियोजना1978 में आन्ध्रप्रदेश में स्थापित किया गया। यहाँ नागार्जुन सागर बहुउद्देशीय परियोजना के कारण 1982-83 में इसे बाघ रिजर्व घोषित किया गया।
नामदपा बाघ परियोजनाइस परियोजना की स्थापना 1972 में अरुणाचल प्रदेश में की गई। यह 1982-83 में बाघ रिजर्व घोषित किया गया। यहाँ वन्यजीवों के लिए पर्याप्त सुविधायें है।
दुधवा टाइगर प्रोजेक्टयह 811 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत उत्तर प्रदेश में 1968 में स्थापित किया गया।
कालाकड मुंडनथुराई वाघ परियोजनायह 800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में तमिलनाडु राज्य में स्थित है। यह 1988-89 में बाघ परियोजना में सम्मिलित किया गया। यह कपि वानरों के लिए विख्यात अभ्यारण्य है।
वाल्मीकि वाघ परियोजनायह परियोजना बिहार के राज्य में नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में 1970 में स्थापना की गई है। यहाँ गण्डक नदी से पर्याप्त जल प्राप्त होता है।
पेचबाघ परियोजनायह राष्ट्रीय पार्क मध्यप्रदेश में सिबूनी तथा छिन्दवाड़ा जिलों में विस्तृत है।
ताडोबा अंधारी टाइगर प्रोजेक्टइसकी स्थापना 1935 में महाराष्ट्र में हुई थी।
बांधवगढ़ टाइगर परियोजनाबाघ परियोजना यह 1162 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है। यहाँ बाघ व सफेद बाघ व अन्य जीव पाये जाते है।
पन्ना वाघ परियोजनाइसकी स्थापना 1962 में पन्ना बहतरपुर में हुई है। यहाँ बाघ, तेंदुआ, चीतल तथा चिंकारा विशेषरूप से पाये जाते है।
डम्पा टाइगर प्रोजेक्टयह अभ्यारण्य मिजोरम राज्य के आइजोल में 500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है। यह 1994-95 में बाघ रिजर्व घोषित किया गया है।
भद्रा टाइगर परियोजनायह कर्नाटक राज्य में 492 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है यह 1998-99 में बाघ परियोजना में सम्मिलित किया गया।
पखुईनामेरी बाघ परियोजनायह 1999-2000 में बाघ परियोजना में सम्मिलित किया गया है यह अरुणाचल प्रदेश तथा असम में स्थित है।
वोरी सतपुड़ा पंचमढ़ी वाघ परियोजनायह मध्यप्रदेश में 1486 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में स्थित है। इसे 1999-2000 में बाघ परियोजना में सम्मिलित किया गया है।
टाइगर
पर्यावरण भूगोलपर्यावरणपारिस्थितिकी
पारिस्थितिक तंत्रमृदा तंत्र विशेषताएं महत्व संघटकहरित गृह प्रभाव
ओजोन क्षरणपर्यावरण परिवर्तन के कारणमृदा अपरदन
पर्यावरण अवनयनभारत में वनोन्मूलनमरुस्थलीकरण
जल प्रदूषणवायु प्रदूषणमृदा प्रदूषण
बाघ परियोजनाजैव विविधता ह्रास के कारणभारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण
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