प्रेम पचीसी की विशेषताएं

प्रेम पचीसी की विशेषताएं – प्रेम पचीसी सनेही जी द्वारा ब्रज भाषा में रचित एक लघु कृति है जिसमें मात्र 25 छंद हैं। सनेही जी की एक मुख्य विशेषता यह है कि वे श्रंगार प्रधान रचनाएं ब्रज भाषा में लिखते थे जबकि राष्ट्रीय कविताएं खड़ी बोली में लिखते थे।

प्रेम पचीसी की विशेषताएं

प्रेम पचीसी के काव्य सौंदर्य का उद्घघाटन हम निम्नलिखित शीर्षकों में कर सकते हैं-

  1. वण्र्य विषय
  2. ब्रजभाषा का प्रयोग
  3. वियोग श्रृंगार की प्रधानता
  4. सवैया छंद का प्रयोग
  5. अलंकार विधान
प्रेम पचीसी की विशेषताएं

वण्र्य विषय

प्रेम पच्चीसी का वण्र्य विषय प्रेम है। प्रेम करने वालों को दुख ही उठाने पड़ते हैं। इस पर कवि कहता है कि यदि मैं यह जानता कि प्रेम करने के कारण यह दशा होगी तो इस बला को अपने सिर पर कभी नहीं लेता। स्नेह के मार्ग पर पैर रखने वाले को अपना कलेजा पत्थर पर रख लेना चाहिए। कभी कहता है कि –

जानत जौ यह हैं दसा तौ बलाय न यों अपने सिर लेते।

ठानते जो मरिबो मन मैं, करि औरई जुक्ति कहूं मरि लेते।

होत सचेत हमेस जु तो, दिल आपन यां सहजे हरि लेते।

देत जु पांव स्नेह के पंथ, करेजहु पाथर को करि लेते।।

प्रेम पचीसी
प्रेम पचीसी की विशेषताएं

यदि यह सोचकर प्रेम करता है कि इससे सुख मिलेगा तो वह पूरी तरह गलत सोचता है क्योंकि प्रेम करने वाले को अंततः कलंक ही लगता है। इसलिए कभी सचेत करता है कि प्रेम के फंदे में पढ़ना यमराज के फंदे में फसना है। जो अभी मन को अच्छा लगता है वही कुछ दिन बीतने के बाद जब वियोग व्यथा देगा तो प्राणों का ग्राहक बन जाएगा। कवि ने प्रेम को ऊंची दुकान फीका पकवान कहा है। जिसमें अंततः व्यक्ति की पश्चाताप के अलावा कुछ और हाथ नहीं लगता। यह तो हलाहल है जिसे पचा पाना सबके बस की बात नहीं है-

हठि चाह के मार्ग में पग दै बनि बावरे व्याकुल डोलिए ना।

सहिए ना वियोग व्यथा करि प्रेम, हलाहल पीवे को धोलियो ना।।

ब्रजभाषा का प्रयोग

यद्यपि सनेही जी द्विवेदी युग के कवि थे परंतु उन्होंने युगीन परंपरा के विपरीत ब्रजभाषा में अपनी काव्य रचना की। वे ब्रज भाषा तथा खड़ी बोली दोनों में काव्य रचना करते थे परंतु उनकी यह मान्यता थी कि श्रृंगारी रचनाएं ब्रज भाषा में ही की जानी चाहिए और खड़ी बोली इसके लिए उपयुक्त नहीं है। इसी कारण सनेही जी ने प्रेम पचीसी की रचना श्रृंगारी विषय होने के कारण ब्रजभाषा में की।

सनेही जी द्वारा प्रयुक्त ब्रजभाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों का भी पर्याप्त प्रयोग हुआ है। सच तो यह है कि आप तो ब्रजभाषा के मर्मज्ञ थे और आपके जैसी साफ-सुथरी ब्रज भाषा का प्रयोग बहुत कम कवियों की रचना में देखने को मिलता है। आप प्रेम पचीसी की विशेषताएं Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

वियोग श्रृंगार की प्रधानता

यद्यपि प्रेम पचीसी की विषय वस्तु श्रंगार प्रधान है परंतु इसमें संयोग श्रृंगार का नहीं बल्कि वियोग श्रृंगार की प्रधानता है। प्रिय अर्थात नायक श्री कृष्ण निष्ठुर है, निर्मम है परंतु प्रिया अर्थात नायिका उनसे पहले की ही तरह प्यार करती हैं। वह प्रिय की निर्मलता का भी उपलब्भ नहीं देती। प्रिया दुख दे या सुख दे, प्रिया को सब स्वीकार है और इस प्रेम संबंध का निर्वाह अंत तक करना है।

ब्रज भाषा साहित्य
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सवैया छंद का प्रयोग

सनेही जी ने प्रेम पचीसी में सवैया छंद का प्रयोग किया है। वे छंद शास्त्र के अच्छे ज्ञाता थे। आपने सवैया के अन्य छंदों का प्रयोग न करके मत्तगयन्द का ही प्रयोग प्रेम पचीसी में किया है। सवैया का प्रभाव अंतिम चरण में कहीं बात से ही व्यक्त होता है। जैसे बिच्छू का जहर उसके डंक में होता है उसी प्रकार से सवैया का अंतिम चरण ही पूरे सवैया का प्राण होता है। कभी-कभी तो समस्या की पूर्ति के लिए जो पंक्ति दी जाती है उसमें भी शर्त यही रहती है कि यह कविता के अंतिम चरण में आनी चाहिए।

अलंकार विधान

सनेही जी ने प्रेम पचीसी की रचना रीतिकालीन पद्धति पर की है जिसके कारण इसमें चमत्कार प्रदर्शन की प्रवृत्ति, अलंकारिकता का अच्छा पुट आ गया है। प्रेम पच्चीसी के कई छंदों में यमक, रूपक तथ अनुप्रास अलंकार जैसे चंदू का प्रयोग किया गया है। आप प्रेम पचीसी की विशेषताएं Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

आधुनिक ब्रजभाषा साहित्य
प्रेम पचीसी की विशेषताएं

अतः उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि प्रेम पचीसी सनेही जी की एक उत्कृष्ट रचना है जिसमें प्रेम की पीड़ा का वर्णन करने के लिए कवि ने इसमें सवैया छंद का प्रयोग किया है। चाहे भले ही स्नेही जी आधुनिक काल के द्विवेदी युगीन कवि हूं परंतु प्रेम पचीसी की रचना उन्होंने रीतिकालीन पद्धति पर ब्रज भाषा में की है।

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