प्रयोगशाला विधि परिभाषा उपयोगिता गुण व दोष

प्रयोगशाला विधि का सार यह है कि यहां अध्यापक पृष्ठभूमि में ओझल रहता है और समस्याएं स्थूल रूप से सामने प्रस्तुत रहती हैं। कक्षा में पढ़ाते समय वह विद्यार्थियों के सम्मुख रहता है प्रयोगशाला कार्य में वह छात्र की कठिनाई को दूर करने में सहायता करता है। प्रयोगशाला विधि में विद्यार्थी के मस्तिष्क को पूर्णता समझना चाहिए तथा तार्किक पहलू की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक पहलू को प्रधानता देनी चाहिए।

विज्ञान विषयों की वास्तविक शिक्षा के लिए प्रयोगशाला के द्वारा बालकों को सही सरल तथा बोधगम्य तरीके से ज्ञान की प्राप्ति होती है। प्रयोगशाला में विद्यार्थी स्वयं प्रयोग करके सीखता है उसे निरीक्षण का अवसर प्राप्त होता है तथा अपने ही प्रयासों से परिणाम निकालने की कोशिश करता है इससे उसकी त्रुटियां भी तत्काल ही दूर हो जाती है। इस प्रकार प्रयोगशाला विधि अनुदेशन आत्मक प्रक्रिया होती है जिसके द्वारा किसी घटना के कारण प्रभाव प्रकृति अथवा गुड चाहे सामाजिक मनोवैज्ञानिक अथवा भौतिक को वास्तविक अनुभव अथवा प्रयोग द्वारा नियंत्रित दशाओं में सुनिश्चित किए जाते हैं।

उदाहरण– किसी पहाड़ की चोटी की ऊंचाई ज्ञात करना, छात्रों द्वारा छोड़े गए रास्तों की गति ज्ञात करना, नदी को बिना पार किए उसकी चौड़ाई व गहराई ज्ञात करना, खेल के मैदान में दौड़ से ट्रैक बनाना आदि।

प्रारंभ में विद्यार्थी यह नहीं समझ पाता है की परिभाषा व नियमों सूत्रों आदि से क्या सूचित होता है तथा उन्हें कैसे प्रयोग में लाया जा सकता है। वह रटने के लिए बाध्य होता है। प्रयोगशाला में उसका कार्य के अनुभव तथा अपनी क्रियाओं से सीधा संबंध होता है। वस्तुओं का अपने हाथ से प्रयोग करने तथा समस्याओं को हल करने में उसे अपनी सफलताओं पर आनंद प्राप्त होता है।

प्रयोगशाला विधि

विज्ञान के सभी विषय इस प्रकार के हैं कि उनके लिए प्रयोगशाला का होना आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, जीव विज्ञान, भू विज्ञान आदि। इन विषयों की वास्तविक शिक्षा के लिए प्रयोगशाला के द्वारा सही ज्ञान बालक को मिलता है। प्रयोगशाला में विद्यार्थी स्वयं प्रयोग करता है। उसे निरीक्षण करने का सुअवसर मिलता है तथा अपने ही प्रयासों से परिणाम निकालने की कोशिश करता है।

प्रयोगशाला में अध्यापक उसके कार्य का निरीक्षण करते हैं और विद्यार्थी लिखित कार्य भी करते हैं। इसीलिए आजकल की शिक्षा प्रणाली में विज्ञान अनिवार्य है और विज्ञान कक्षाओं के लिए हर विद्यालय में प्रयोगशाला का होना भी आवश्यक है। इन प्रयोगशालाओं में विज्ञान संबंधी सा सामान उपकरण तथा रासायनिक पदार्थ में जो पर क्रमानुसार रखे जाते हैं।

विचारों का पृथक्करण एवं सामान्यीकरण नीव नहीं है बल्कि अंतिम उपज है।

प्रोफ़ेसर यंग के अनुसार

विज्ञान शिक्षण के लिए प्रयोगात्मक विधि सर्वाधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि विज्ञान के तथ्यों को प्रयोगशाला परीक्षण के उपरांत ही अच्छी तरह से समझा जा सकता है। यह विधि पूर्णत: करके सीखने के सिद्धांत पर कार्य करती है। प्रयोगशाला विधि में छात्र पूर्ण रूप से क्रियाशील होकर सर्वांगीण ज्ञानार्जन करता है। यह शिक्षण की एक उत्तम विधि है।

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प्रयोगशाला विधि की उपयोगिता

शिक्षण की एक सामान्य अवधारणा स्वयं करके सीखने की शिक्षण विधि पर भी आधारित होती है। विज्ञान जैसे विषयों के लिए यह विधि और भी अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि प्रयोगशाला विधि में प्रयोगात्मक कार्य अनिवार्य होते हैं। अत: प्रयोगशाला विधि का उद्देश्य ही यह है कि छात्र स्वयं करके सीखे तथा उपकरणों से भलीभांति परिचित हों तथा उनके प्रयोगों को भी जाने।

माध्यमिक स्तर पर विज्ञान शिक्षण में प्रयोगशाला विधि का प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। विज्ञान विषय के शिक्षण को तीन स्तरों की दृष्टि से प्रयुक्त किया जा सकता है। पहला आपका उद्देश्य यह है कि बच्चे कुछ समय के लिए विषय वस्तु को याद रखें तो व्याख्यान विधि का प्रयोग करें। दूसरा उद्देश्य यह है कि विद्यार्थी लंबे समय तक विषय वस्तु को स्मरण रखें तो व्याख्यान विधि का प्रयोग करना चाहिए थी तथा यदि आपका उद्देश्य है कि छात्र विषय वस्तु को सदैव के लिए कंठस्थ कर ले तो समझ ले कि प्रयोग द्वारा विधि का प्रयोग किया जाना चाहिए।

विज्ञान विषयों के शिक्षण की प्रयोगशाला विधि की उपयोगिता को निम्न बिंदुओं के द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. प्रयोगशाला विधि से छात्र स्वयं करके अनुभव द्वारा सीखता है।
  2. इस विधि में छात्रों की क्रियाशीलता बढ़ती है वह ज्ञान प्राप्त करने के लिए सक्रिय होते हैं।
  3. इससे छात्रों की तर्क शक्ति का विकास होता है।
  4. यह विधि छात्रों की कल्पना क्षमता को बढ़ाती है।
  5. प्रयोगशाला विधि से छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होता है।
  6. इससे छात्रों का सामाजिकरण होता है क्योंकि प्रयोगशाला में सहयोग एवं सहकारिता की व्यवस्था होती है।
  7. छात्रों में आत्मविश्वास की वृद्धि का विकास होता है।
  8. छात्र सिद्धांतों को प्रयोगशाला में स्वयं सिद्ध करके सीखते हैं।
  9. इस विधि से प्राप्त ज्ञान स्थाई होता है।

प्रयोगशाला विधि के गुण

  1. यह विधि छोटे बच्चों के लिए लाभदायक है।
  2. इस विधि में छात्रों की संपूर्ण ज्ञान इंद्रियों का प्रयोग होने के कारण सर्वांगीण विकास में सहायक होती है।
  3. यह विधि सूक्ष्म से स्थूल की ओर तथा अज्ञान से ज्ञान की ओर के सिद्धांत पर कार्य करती है।
  4. कठिन विषय को भी आसानी से समझा जा सकता है।
  5. छात्रों की तार्किक शक्ति विकसित होती है।
  6. छात्रों को स्कूल के अतिरिक्त व्यवहारिक जीवन में भी यह विधि उपयोगी है।
  7. यह विधि बालकों में वैज्ञानिक क्षमता उत्पन्न करती है।
  8. बालक कार्य करते समय बड़े उत्साह और उत्सुकता से भर जाता है और कुछ ना कुछ निकालने की तलाश में रहता है।
  9. इस प्रणाली में अधिकतर बालक सक्रिय रहते हैं क्योंकि प्रत्येक को अपनी सीट पर खड़े होकर कार्य करना पड़ता है और सब की यही एकमात्र कोशिश होती है कि निश्चित लक्ष्य को प्राप्त किया जाए।
  10. इस विधि में विद्यार्थी पुस्तक में पड़े हुए अथवा अध्यापक द्वारा समझाएं गए ज्ञान का सत्यापन स्वयं प्रयोगशाला में करते हैं। पुणे प्रयोगशाला में पाई जाने वाली वस्तुओं और उपकरणों का सही उपयोग करने का अवसर भी मिलता है।
  11. विद्यार्थी स्वयं प्रयोग करता है इसलिए उनका दृष्टिकोण पूर्णता वैज्ञानिक हो जाता है। इस प्रकार स्वयं प्रयोग करने उपकरणों का प्रयोग करने तथा निरीक्षण करने के लिए विवेकपूर्ण चिंतन की दक्षता प्राप्त करता है।
  12. प्रयोगशाला में विद्यार्थी मान्य वैज्ञानिक परिणामों की स्वता जांच करता है इसीलिए उनके मन मस्तिष्क में तथा सिद्धांत पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाते हैं और स्थाई बनकर याद भी हो जाते हैं।

प्रयोगशाला विधि के दोष

  1. यहां एक खर्चीली विधि है जो सभी छात्रों के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं है।
  2. विज्ञान से संबंधित सूची विचारों को इस विधि द्वारा छात्रों को नहीं समझाया जा सकता।
  3. विज्ञान के विभिन्न सिद्धांतों को प्रयोगशाला द्वारा हल करना कठिन है।
  4. इस विधि में समय अधिक खर्च होता है।
  5. शिक्षण कार्य उपकरणों तथा प्रयोगशाला पर निर्भर करता है।
  6. यह विधि छोटी दशाओं के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि बालक प्रयोगशाला में ठीक प्रकार से ना तो कार्य कर पाएंगे और ना उनकी समझ में कुछ आया था वे उपकरणों का प्रयोग भी ठीक से नहीं कर पाएंगे।
  7. कक्षा में पिछड़े हुए तथा मंदबुद्धि वाले बालक प्रयोग नहीं कर पाते हैं इसलिए वे अक्सर अच्छे बच्चों की कॉपियों से नकल कर लिख लेते हैं।
  8. किसी प्रयोग को करने में काफी समय लग जाता है इसके अलावा उपकरणों को समझने में भी कठिनाई होती है।
  9. यह देखा गया है कि अक्सर प्रयोगों के चक्कर में पाठ्यक्रम पूर्ण नहीं हो पाता है। क्योंकि प्रत्येक विद्यार्थी अलग-अलग सीट पर अपने उपकरणों तथा सामग्री के प्रयोग से प्रयोग करता है, जिससे काफी धन खर्च होता है अध्यापक को भी प्रत्येक विद्यार्थी को उसी सीट पर जाकर देखने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

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